Wednesday, July 13, 2011

ये बदलाव कितने जरूरी हैं



व्‍यापार का एक सिद्धांत यह होता है कि जैसे ही व्यापारी को महसूस हो कि उसके बिजनेस की चमक फीकी पड़ने लगी है, वह या तो अपना बिजनेस बदल दे या उसे जल्द ही रेनोवेशन की प्रक्रिया में लाए. आजकल क्रिकेट के व्यापारीकरण से तो सभी वाकिफ हैं. यह बिजनेस भी अपनी लोकप्रियता और मुनाफे के शिखर पर है, लेकिन पिछले कुछ दिनों से भारतीय क्रिकेट टीम ने इतना क्रिकेट खेला कि लोग खेल से ही उकताने लगे. पहले विश्वकप हुआ, उसके तुरंत बाद आईपीएल और फिर वेस्टइंडीज दौरा.

 बात यहीं खत्म नहीं होती. टीम इंडिया वेस्टइंडीज दौरे के बाद इंग्लैंड रवाना होगी. नतीजतन, आईपीएल में क्रिकेट प्रायोजकों और प्रबंधन को उतना फायदा नहीं पहुंचा, जितने की उन्हें उम्मीद थी. हालांकि बिजनेस के टर्म में कम मुनाफे को नुकसान की ही संज्ञा दी जाती है. लगता है कि अब आईसीसी को भी इसका अंदाजा हो चुका है, इसलिए अब वह भी रेनोवेशन की प्रक्रिया से गुजर रहा है. अभी हाल में नियमों के बदलाव को लेकर जो भी विवाद और चर्चाएं हुई हैं, उनसे तो यही लगता है कि क्रिकेट के नियमों में बदलाव करके एक बार फिर से लोगों में क्रिकेट के प्रति दिलचस्पी पैदा की जाए.

गौरतलब है कि लंबी बहस के बाद आखिर में अंपायरों के फ़ैसले की समीक्षा (डीआरएस) करने वाली तकनीकी प्रणाली स्वीकार कर ली गई. अब यूडीआरएस का नया बदला हुआ रूप टेस्ट और वन डे मैचों में लागू हो जाएगा. अब विवादास्पद अंपायर डिसिजन रिव्यू सिस्टम (यूडीआरएस) का संशोधित रूप सभी अंतरराष्ट्रीय मैचों में लागू होगा. उसमें हॉट स्पॉट तकनीक तो होगी, लेकिन हॉक आई नहीं होगी, जिससे गेंद की दिशा का पता चलता है. यानी यूडीआरएस में एलबीडब्ल्यू के फैसले शामिल नहीं होंगे. इसमें अब थर्मल इमेजिंग और साउंड तकनीक शामिल होगी. 2008 के बाद अगले महीने शुरू हो रही इंग्लैंड सीरीज में भारत पहली बार यूडीआरएस के तहत मैच खेलेगा. अब यूडीआरएस का नया बदला हुआ रूप टेस्ट और वन डे मैचों में लागू हो जाएगा. अब विवादास्पद अंपायर डिसिजन रिव्यू सिस्टम (यूडीआरएस) का संशोधित रूप सभी अंतरराष्ट्रीय मैचों में लागू होगा. उसमें हॉट स्पॉट तकनीक तो होगी, लेकिन हॉक आई नहीं होगी, जिससे गेंद की दिशा का पता चलता है. यानी यूडीआरएस में एलबीडब्ल्यू के फैसले शामिल नहीं होंगे. इसमें अब थर्मल इमेजिंग और साउंड तकनीक शामिल होगी. एक तरफ जहां आईसीसी इस बात को लेकर संतुष्ट है कि वह भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई को इसके लिए राज़ी करने में सफल हुआ, वहीं बीसीसीआई ख़ुश है कि सिर्फ़ ट्रैकिंग टेक्नालॉजी के सहारे डीआरएस के इस्तेमाल का उसका विरोध भी मान लिया गया. पिछले दिनों अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद आईसीसी की हांगकांग में हुई बैठक में फ़ैसला हुआ कि समीक्षा करने वाली प्रणाली यानी डीआरएस के तहत इंफ्रारेड कैमरों और विकेट में लगी आवाज़ पकड़ने वाली मशीनों की मदद ली जाएगी.

 इंफ्रारेड कैमरे यह देख सकेंगे कि अगर विकेट के पीछे कैच या एलबीडब्ल्यू की अपील हुई है तो कहीं गेंद बल्ले को छूते हुए तो नहीं निकली थी. साथ ही विकेट में लगी आवाज़ पकड़ने वाले उपकरण भी यह बताएंगे कि गेंद के बल्ले से छूने की आवाज़ हुई है या नहीं. बीसीसीआई अब तक इस्तेमाल होने वाली बॉल ट्रैकिंग टेक्नालॉजी के विरुद्ध था और आईसीसी ने भी अब बीसीसीआई के रुख़ पर मुहर लगाते हुए कहा है कि इस तकनीक का इस्तेमाल द्विपक्षीय सीरीज में दोनों टीमों की सहमति पर होगा. यानी अगले महीने होने वाले इंग्लैंड के दौरे में अंपायरों के फ़ैसले की समीक्षा की प्रणाली लागू तो होगी, मगर एलबीडब्ल्यू के फैसलों के लिए यह लागू नहीं होगी, क्योंकि वे फ़ैसले बॉल ट्रैकिंग टेक्नालॉजी के इस्तेमाल पर निर्भर होते हैं. इन तब्दीलियों से इतना तो तय है कि आईसीसी के नए नियम क्रिकेट के स्वरूप को बदल डालेंगे.


 आईसीसी की बैठक में यह भी फ़ैसला हुआ कि एक दिवसीय मैचों में टीमों को अंपायर के फ़ैसले के विरुद्ध अब दो के बजाय एक बार अपील का मौक़ा मिलेगा और अगर अपील सही हुई तो वह मौक़ा बरक़रार रहेगा. अब बैटिंग और बॉलिंग के पावर प्ले 16 से 40 ओवरों के बीच ही लिए जा सकेंगे. साथ ही गेंदबाज़ों के दोनों छोरों से नई गेंद का इस्तेमाल होगा यानी मैच के बीच में अब गेंद बदलने की ज़रूरत नहीं होगी. साथ ही एक साल के भीतर अगर किसी टीम का कप्तान दो बार धीमे ओवर रेट का दोषी पाया गया तो उसे निलंबन का सामना करना पड़ेगा, पहले इसकी इजाज़त तीन बार की थी. विश्वकप को ध्यान में रखते हुए परिषद ने 2015 में ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में होने वाले क्रिकेट विश्वकप के लिए एक क्वालिफ़िकेशन की प्रक्रिया अपनाने की सलाह दी है यानी आयरलैंड और नीदरलैंड जैसी टीमों के इस विश्वकप में शामिल होने की राह खुल गई है. हालांकि यह सिफ़ारिश नहीं की गई है कि विश्वकप में कितनी टीमें शामिल की जाएं, लेकिन इससे इतना तो तय है कि अब अगले विश्वकप में छोटी टीमें भी भाग ले सकेंगी. इसके अलावा एक और बदलाव हुआ है, जिसे लेकर सुनील गावस्कर काफी खफा हैं.

दरअसल, बदलाव यह है कि आईसीसी की एग्जीक्यूटिव कमेटी ने फैसला किया है कि वन डे में घायल बल्लेबाजों को रनर नहीं दिए जाएंगे यानी अब रनर का इस्तेमाल करने का अधिकार बल्लेबाज को नहीं मिलेगा. जब भी इस तरह के परिवर्तन होते हैं, इन्हें लेकर सहमति और असहमति की स्थिति बनती रहती है.  इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ है. गावस्कर इस बात को लेकर इतने नाराज है कि उन्होंने यहां तक कह दिया कि अगर बल्लेबाज को रनर नहीं दोगे तो फिर गेंदबाज को मैच के बीच में पानी भी न दिया जाए.


 उनके मुताबिक, बल्लेबाजों पर लागू होने वाला नियम उतनी ही कड़ाई से फील्डिंग वाली टीम पर भी लागू होना चाहिए. नाराज गावस्कर ने यह सुझाव तक दे डाला कि गेंदबाजों को पानी न दिया जाए. वे एक ओवर डालते हैं और बाउंड्री पर आ जाते हैं, जहां उन्हें एनर्जी ड्रिंक्स दिया जाता है. गावस्कर ने कहा कि अगर आईसीसी को लगता है कि घायल बल्लेबाजों को रनर देना नाइंसाफी है तो उसे ड्रिंक्स ब्रेक भी खत्म कर देने चाहिए और वैकल्पिक फील्डर का कॉन्सेप्ट भी खत्म कर देना चाहिए. किसी हद तक उनकी यह नाराजगी जायज नजर आती है. लेकिन सवाल अब भी वही है कि इस तरह के बदलावों का क्या औचित्य है? अच्छा तो यह होता कि खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर चर्चा होती, नई प्रतिभाओं के भविष्य को लेकर योजनाएं बनतीं और इस खेल से जुड़े उन कर्मचारियों के विकास की बात होती, जो हमेशा पर्दे के पीछे रहकर क्रिकेट के विशाल आयोजनों को कामयाबी की दहलीज तक ले जाते हैं. लेकिन ऐसा नहीं होगा, क्योंकि क्रिकेट का व्यापार अभी जोरों पर है और सिर्फ रेनोवेशन मात्र से ही पब्लिसिटी बटोरने वालों की कमी नहीं है 

Thursday, July 7, 2011

विवादों ने तोड़ी करियर की कमर


वेस्टइंडीज क्रिकेट इस व़क्त अपने उसी दौर से गुजर रहा है, जिस दौर से भारतीय हॉकी टीम गुजर रही है. लगातार हार का सामना और खिलाड़ियों के बढ़ते विवाद ने इस टीम को आज ऐसे मुक़ाम पर खड़ा कर दिया है, जहां इसके भविष्य पर सवाल खड़े होने लगे हैं. क्रिकेट से लगाव रखने वाले हर एक शख्स को वेस्टइंडीज क्रिकेट का स्वर्णिम दौर याद होगा. वह दौर ऐसा था, जब अफ्रीकी खिलाड़ियों के सामने अच्छे-अच्छे बल्लेबाज़ों के बैट कांप जाते थे. उस व़क्त शायद ही किसी को इस बात का एहसास रहा होगा कि वेस्टइंडीज क्रिकेट का एक ऐसा दौर भी आएगा, जब ख़ुद उसके ही खिलाड़ी बग़ावत पर उतर आएंगे. इस दौर से वेस्टइंडीज एक दिन तो उबर ही जाएगा, लेकिन खामियाजे के तौर पर उसे कई बेहतरीन खिलाड़ी खोने पड़ रहे हैं. इसमें अव्वल नाम तो आईपीएल में जलवा बिखेरने वाले धुआंधार बल्लेबाज़ क्रिस गेल का है. इस बेहतरीन क्रिकेटर के करियर की कमर ख़ुद उसके द्वारा पैदा किए गए विवादों ने तोड़कर रख दी है. हाल यह है कि क्रिस गेल का करियर लगभग ख़त्म माना जाने लगा है. अगर इन सब विवादों पर ग़ौर किया जाए तो एक बात साफ हो जाती है कि अगर क्रिस गेल जैसा खिलाड़ी इतने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के बाद टीम में अपनी जगह को लेकर संघर्ष कर रहा है तो इसमें बोर्ड से ज़्यादा ज़िम्मेदारी उसके ख़ुद के पैदा किए विवादों की है.

 इन विवादों से जितना नुक़सान इस खिलाड़ी का होगा, उससे कहीं ज़्यादा उनके चाहने वाले हज़ारों प्रशंसकों और बेहतरीन क्रिकेट के शौकीनों का होगा. ग़ौरतलब है कि क्रिस गेल की टीम में वापसी की उम्मीदों को गहरा झटका लगा है. वेस्टइंडीज क्रिकेट बोर्ड डब्ल्यूआईसीबी और गेल के बीच हुई गर्मागर्म बैठक के बाद अब इस विस्फोटक बल्लेबाज़ के करियर पर भी पूर्ण विराम लगता दिखाई दे रहा है. भारत के ख़िला़फ वन डे सीरीज में जगह न बना पाने के बाद गेल द्वारा टेस्ट टीम में स्थान तलाशने की कोशिश भी नाकाम हो गई. आप सोच रहे होंगे कि क्रिस गेल के साथ वेस्टइंडीज क्रिकेट बोर्ड इस तरह से सौतेला व्यवहार क्यों कर रहा है? दरअसल, इसमें कुछ क्रिकेट बोर्ड द्वारा पैदा की हुई ग़लत़फहमियां तो हैं ही, लेकिन उससे ज़्यादा ज़िम्मेदार ख़ुद गेल द्वारा पैदा किए गए विवाद हैं. इस बात से तो सभी वाक़ि़फ हैं कि क्रिस गेल और विवादों का साथ चोली-दामन जैसा है. दरअसल, इस विवाद की असली वजह यह थी कि डब्ल्यूआईसीए ने गेल को टीम की कप्तानी नहीं सौंपी थी. इसके पीछे वजह यह बताई गई कि उन्होंने बोर्ड के साथ रिटेनर क़रार नहीं किया था.

जबकि इस खिलाड़ी को लगा कि क़रार पर हस्ताक्षर न करने का असर उसकी कप्तानी पर नहीं पड़ेगा. बोर्ड ने हालांकि कहा कि कप्तान बनने के लिए खिलाड़ी का रिटेनर क़रार पर हस्ताक्षर करना ज़रूरी है. बैठक के दौरान डब्ल्यूआईसीए चाहता था कि बोर्ड गेल को टीम में शामिल कर ले और रेडियो साक्षात्कार के दौरान की गईं उनकी टिप्पणियों को व्यक्तिगत माना जाए, जबकि बोर्ड चाहता है कि गेल उन बयानों का खंडन करें, लेकिन गेल ने क्रिकेट बोर्ड के पिछले महीने उसके ख़िला़फ रेडियो साक्षात्कार के दौरान की गई टिप्पणियों का खंडन करने के आग्रह को ख़ारिज कर दिया. इसी बात ने गेल के ख़िला़फ बोर्ड को भड़का दिया. इसके अलावा एक वजह यह भी थी कि आईपीएल के दौरान गेल ने अपने देश से ज़्यादा आईपीएल को तवज्जो दी.

सूत्रों के मुताबिक़, पिछले दिनों बोर्ड और गेल के बीच चार घंटे चली बैठक एक समय काफी उग्र हो गई थी और राम नारायण एक समय हिलेयर पर हमला करने के क़रीब थे. दरअसल, डब्ल्यूआईसीए और बोर्ड के बीच विवाद आईपीएल शुरू होने से पहले ही बढ़ गया था, क्योंकि गेल उसी स्थिति में वेस्टइंडीज क्रिकेट टीम की ओर से खेलना चाहते थे, यदि बोर्ड उन्हें उतना पैसा चुकाए, जितना गेल को आईपीएल में मिल रहा है. रॉयल चैलेंजर्स बेंगलूर ने गेल को आठ लाख डॉलर की रकम देकर आईपीएल के लिए ख़रीदा था. इसमें कोई दो राय नहीं है कि गेल बेहतरीन खिलाड़ी हैं, लेकिन उनकी तीखी प्रतिक्रिया ने हमेशा उन्हें कठघरे में खड़ा किया है. स़िर्फ एक बयान ने क्रिस गेल को हाशिए पर ला दिया है. लेकिन यह पहली बार नहीं है, जब गेल ने बागी तेवर दिखाए हैं. वर्ष 2005 में भी क्रिस और बोर्ड के बीच विवाद हो चुका है. 2005 तक वेस्टइंडीज क्रिकेट को केबल्स एंड वायरलेस नामक कंपनी प्रायोजित करती थी. बोर्ड के साथ कंपनी के कुछ खिलाड़ियों से निजी क़रार भी थे, लेकिन 2005 में विंडीज बोर्ड ने केबल्स एंड वायरलेस की प्रतिद्वंद्वी कंपनी डिजिसेल के साथ क़रार कर लिया. बोर्ड ने इस अनुबंध के तहत टीम के खिलाड़ियों को केबल्स एंड वायरलेस से संबंध तोड़ने के आदेश दिए, लेकिन क्रिस गेल समेत कुछ खिलाड़ियों ने बोर्ड की इस बात को मानने से इंकार कर दिया.

 नतीजतन, दक्षिण अफ्रीका के ख़िला़फ पहले टेस्ट से गेल समेत सभी बागी खिलाड़ियों का पत्ता साफ हो गया. हालांकि गेल ने बोर्ड के आगे झुकते हुए केबल्स एंड वायरलेस से क़रार ख़त्म कर लिया और उन्हें दूसरे टेस्ट की टीम में शामिल कर लिया गया. इसके बाद 2006 में गेल स्लेजिंग के  प्रकरणों में लिप्त रहे. पहले न्यूजीलैंड के ख़िला़फ टेस्ट मैच में गेल अपना आपा खो बैठे. उसके बाद भारत में आयोजित चैंपियंस ट्राफी 2006 में ऑस्ट्रेलिया के ख़िला़फ मैच में वह माइकल क्लार्क से उलझ गए. गेल ने पहले क्लार्क पर ताना कसकर उन्हें उकसाया और फिर जब क्लार्क भड़क गए तो दोनों के बीच हाथापाई की नौबत आ गई. मैदान पर तैनात अंपायरों ने टीम के कप्तान राम नरेश सरवन को गेल को संभालने की हिदायत दी. उस दौरान गेल को उनकी हरकत के  लिए दंडित किया गया. 2007 में क्रिस गेल ने एक बार फिर बागी तेवर दिखाते हुए वेस्टइंडीज क्रिकेट बोर्ड की सार्वजनिक तौर पर आलोचना कर डाली. इंग्लैंड दौरे पर हुई इस घटना से गुस्साए बोर्ड ने गेल को फटकार लगाई और चेतावनी दी. 2009 में इंग्लैंड दौरे पर ही क्रिस गेल ने सार्वजनिक रूप से कह दिया कि वह वेस्टइंडीज टीम की अगुवाई नहीं करना चाहते, क्योंकि यह बहुत तनाव भरा काम है.


साथ ही उन्होंने यहां तक कह दिया कि वह बहुत ख़ुश होंगे, यदि 20-20 क्रिकेट टेस्ट क्रिकेट का खात्मा कर देता है. टेस्ट क्रिकेट के भविष्य पर दिए इस विवादास्पद बयान पर गेल की जमकर खिंचाई हुई थी. इन सबके बाद कैरिबियाई बोर्ड के रवैये पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाकर गेल ने विवाद खड़ा कर दिया. एक साक्षात्कार के दौरान गेल द्वारा दिए गए इस बयान के बाद बोर्ड ने उन्हें टीम से बाहर कर दिया. अगर इन सब विवादों पर ग़ौर किया जाए तो एक बात साफ हो जाती है कि अगर क्रिस गेल जैसा खिलाड़ी इतने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के बाद टीम में अपनी जगह को लेकर संघर्ष कर रहा है तो इसमें बोर्ड से ज़्यादा ज़िम्मेदारी उसके ख़ुद के पैदा किए विवादों की है. इन विवादों से जितना नुक़सान इस खिलाड़ी का होगा, उससे कहीं ज़्यादा उनके चाहने वाले हज़ारों प्रशंसकों और बेहतरीन क्रिकेट के शौकीनों का होगा. 

Friday, July 1, 2011



कुछ खेल ऐसे होते हैं जो खिलाड़ियों को नाम, दाम और शौहरत दिलाते हैं और कुछ खिलाड़ी ऐसे भी होते हैं जिनके नाम से उस खेल की पहचान जुड़ जाती है. फुटबॉल का नाम लेते ही आम फुटबॉल प्रेमियों के ज़ेहन में पहला नाम पेले का आता है और पेले के बाद माराडोना, लेकिन नई पी़ढी के लिए अगर कोई नाम इस तरह का है तो वह निश्चित तौर पर रोनाल्डो का है. वैसे लोग भी जो फुटबॉल में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं रखते, वे भी रोनाल्डो के नाम से अपरिचित नहीं हैं. रोनाल्डो फुटबॉल के मैदान में ही नहीं खेल की दुनिया का एक ऐसा चमचमाता सितारा है, जिसकी चमक आने वाले कई सालों तक धूमिल नहीं पड़ने जा रही है. बावजूद इसके कि फुटबॉल मैदान पर रोनाल्डो का वह रोमांचित करने वाला कारनामा देखने को फिर नहीं मिलेगा, क्योंकि रोनाल्डो ने फुटबॉल को अलविदा कह दिया है. बिना रोनाल्डो का नाम लिए लीजेंड लिस्ट पूरी ही नहीं हो सकती है. अगर फुटबॉल का जादूगर पेले को माना जाता है तो इस खिलाड़ी का जादू भी फुटबॉल प्रेमियों के सर कम च़ढकर नहीं बोला है, लेकिन फुटबॉल प्रेमियों के लिए यह बहुत बुरी खबर है. अब रोनाल्डो को चाहने वालों को इस महान खिलाड़ी की किक देखने को नहीं मिलेगी. इसकी वजह यह है कि रोनाल्डो ने हाल ही में फुटबॉल को अलविदा कह दिया है. जी हां, ब्राजील के रोनाल्डो लुइस नाज़ारियो डी लीमा ने फुटबॉल से आ़िखरकार अलविदा कह ही दिया. ग़ौरतलब है कि रोनाल्डो पिछले कुछ समय से लगातार चोटों से दो चार हो रहे थे. ऐसे में क़यास लगने शुरू हो गए थे कि अब शायद यह नायाब खिलाड़ी बहुत दिनों तक मैदान में टिक नहीं पाएगा. ऐसा ही हुआ.

फुटबॉल के 100 शीर्ष खिलाड़ियों में स्थान दिया. इंटर के लिए रोनाल्डो ने 68 मैचों में 49 गोल किए, जबकि रियल के लिए उन्होंने 127 मैचों में खेलते हुए 83 गोल किए. विश्व कप के लिए ब्राजीली टीम में जगह नहीं मिलने से निराश रोनाल्डो ने 2009 में ब्राजील के क्लब कोरिंथियंस के साथ क़रार किया और अपने करियर के अंतिम दिनों तक इसी क्लब के लिए खेले. इस क्लब के लिए रोनाल्डो ने 31 मैचों में 18 गोल किए.

ब्राजील के लिए 97 अंतरराष्ट्रीय मुक़ाबले खेल चुके  रोनाल्डो ने आंसुओं के साथ अपने फुटबॉल करियर की समाप्ति की घोषणा की. रोनाल्डो ने कहा कि अब मैं और इंतज़ार नहीं कर सकता. मैं खेलना चाहता हूं, लेकिन शरीर इसकी इजाज़त नहीं दे रहा है. विश्व के महानतम फुटबॉल खिलाड़ियों में शुमार रोनाल्डो तीन बार फी़फा द्वारा वर्ष के  सर्वश्रेष्ठ फुटबॉल खिलाड़ी चुने जा चुके  हैं. यहां पर ग़ौर करने वाली बात यह है कि रोनाल्डो ने अपने संन्यास की घोषणा अपनी ब़ढती उम्र की वजह से नहीं, बल्कि चोट के कारण की है. 2010 की फ़रवरी में रोनाल्डो ने कहा था कि वह 2011 में खेल से रिटायर हो जाएंगे और उन्होंने ऐसा ही किया. उनकी उपलब्धियों का ज़िक्र किया जाए तो शायद शब्द कम पड़ जाएं. फुटबॉल के जादूगर पेले ने दुनिया के महानतम फुटबॉलरों की सूची तैयार की थी, उसमें रोनाल्डो का भी नाम था. पिछले साल ही फुटबॉल की एक मशहूर वेबसाइट गोल डॉट कॉम के एक ऑनलाइन पोल में दशक के खिलाड़ी के रूप में रोनाल्डो को सबसे ज़्यादा वोट मिले. इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इस खिलाड़ी में जीत का कितना जज़्बा था. 34 वर्षीय रोनाल्डो फी़फा द्वारा तीन बार वर्ष का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुने जाने वाले विश्व के दूसरे फुटबॉल खिलाड़ी हैं. इससे पहले फ्रांस के जिनेदिन जिदान को यह सम्मान मिल चुका है. रोनाल्डो 1994 और 2002 में विश्व कप जीतने वाली ब्राजीली टीम के सदस्य रह चुके  हैं. फुटबॉल के इतिहास में जिनेदिन जिदान और रोनाल्डो ही दुनिया के स़िर्फ दो ऐसे खिलाड़ी हैं, जिन्हें खेल की शीर्ष संस्था फ़ीफ़ा का प्लेयर ऑफ़ द ईयर अवॉर्ड तीन बार हासिल हुआ है.

22 सितंबर 1976 को रोनाल्डो लुइस नाज़ारियो दि लीमा नाम के साथ जन्मे रोनाल्डो फुटबॉल खेल जगत में उस समय चमक के साथ प्रकट हुए थे जब 20वीं सदी का आ़खिरी दशक चल रहा था और 21वीं सदी आ रही थी. 21 साल की उम्र में अपना पहला खिताब पाने वाले रोनाल्डो फुटबॉल की वह जादुई चमक हैं जिसकी झलक पेले और माराडोना ने दिखाई थी. पेले और माराडोना के बाद रोनाल्डो समकालीन लातिन फुटबॉल के सर्वाधिक प्रसिद्ध खिलाड़ियों में एक हैं. रोनाल्डो के खेल की यह रोचकता है कि उन्हें देखते ही प्रतिस्पर्धी दाएं बाएं नहीं हो जाता. वह उन्हें कुछ इस तरह दोस्ताना चुनौती में सहजता में साथ ले आते हैं और फिर उनके बीच अपनी वह निराली विनम्र टॉसिंग फ्लिकिंग करते थे. वहां गेंद प्रतिस्पर्धी खिलाड़ी के पांव से टकराती हुई वापस रोनाल्डो के पांवों से चिपक जाती है. वह अपने दोनों पांवों को गेंद खेलाते हुए दौड़ते जाते हैं. रोनाल्डो ने बड़ी स्ट्राइको की अपेक्षा बजाय ज़्यादातर सरकाते हुए कोण बनाते हुए ऐन गोलपोस्ट तक पहुंचते हुए छकाते हुए गोल किए हैं. अपने दिग्गज अग्रजों और अपने प्रतिभाशाली समकालीन खिलाड़ियों की खेल ऊर्जा को रोनाल्डो ने अपने खेल में समाहित करने की कोशिश की थी. रोनाल्डो ने खेल की बदौलत अपार लोकप्रियता, अपार प्रतिष्ठा और अपार अमीरी हासिल की.

वह उन असाधारण दिनों में अपनी पीली जर्सी पहने चमक रहे थे, जब बाज़ार फुटबॉल के  मैदान में बढ़ता ही चला आ रहा था. रोनाल्डो ऐसे ही उस दौर के शिकंजे में आए हुए बीमार पस्त खिलाड़ी रह चुके थे जब 1998 के विश्व कप में उनकी टीम को फ्रांस से मात खानी पड़ी थी. इंजेक्शन देकर उन्हें मैदान पर उतारा गया था. वह फ़ाइनल खेलने लायक़ नहीं थे. पारिवारिक मुश्किलों, अवसाद और चोटों से बीमार रोनाल्डो ड्रेसिंग रूम में उल्टी कर रहे थे, लेकिन उनकी टीम उनके देश उनकी कंपनी उनके क्लब उनके नाम का इतना भारी दबाव था कि रोनाल्डो को न उतारने की कल्पना कोई कर ही नहीं सकता था. ख़ुद रोनाल्डो हैरान थे. उस दिन उन्हें पहली बार लगा था कि प्रेत भी फुटबॉल के मैदान पर जाकर भाग सकते हैं. इधर-उधर निरीह ढंग से गेंद को धकियाते ख़ुद को फेंकते रह सकते हैं. 2002 का विश्व कप इसका गवाह है. जहां रोनाल्डो अविश्वसनीय और ऐतिहासिक ज़िद के साथ मैदान पर उतरे थे और अपनी टीम को विश्व कप जिताने में प्रमुख भूमिका उन्होंने निभाई थी. रोनाल्डो इस जीत के बाद ब्राज़ील ही नहीं, सहसा पूरे खेल के ही महानायक बन गए थे. कहते हैं कि किसी की भी सफलता में उसके संघर्ष की महान गाथा छिपी होती है, ऐसी ही गाथा रोनाल्डो की भी है. अपने प्रदर्शन और योगदान की बदौलत कुछ ऐसी भूमिका में आ जाते हैं कि उनके जाने के बाद उस टीम के अस्तित्व की कल्पना करना ही मुश्किल हो जाता है. ऐसा लगने लगता है कि जब यह खिलाड़ी संन्यास की घोषणा करेगा तो फिर उसकी जगह कैसे भरेगी. जहां क्रिकेट में मास्टर बलास्टर सचिन तेंदुलकर को लेकर इस तरह की चर्चाएं होंगी, वहीं रोनाल्डो के संन्यास लेने के बाद फुटबॉल प्रेमियों के बीच भी कुछ ऐसी ही बहस छिड़ गई है. बहरहाल, रोनाल्डो ने भले ही खुद को फुटबॉल मैदान से दूर कर लिया, लेकिन उनके करोड़ों फैंस उन्हें अपने दिल से दूर नहीं कर सकेंगे.

तमगे ज़्यादा और कंधा छोटा

रोनाल्डो ने यूरोप और दक्षिण अमेरिकी फुटबॉल क्लबों के लिए खेलते हुए 350 से अधिक गोल किए. रोनाल्डो को वर्ष 1997 में सबसे पहले 21 वर्ष की उम्र में यूरोप का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुना गया था. वर्ष 2007 में फ्रांस फुटबॉल ने अपने सर्वकालिक महान अंतरराष्ट्रीय टीम में रोनाल्डो को जगह दी. इसके अलावा फीफा ने इसी वर्ष रोनाल्डो को ब्राजील के महानतम खिलाड़ी पेले के साथ अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल के 100 शीर्ष खिलाड़ियों में स्थान दिया. इंटर के लिए रोनाल्डो ने 68 मैचों में 49 गोल किए, जबकि रियल के लिए उन्होंने 127 मैचों में खेलते हुए 83 गोल किए. विश्व कप के लिए ब्राजीली टीम में जगह नहीं मिलने से निराश रोनाल्डो ने 2009 में ब्राजील के क्लब कोरिंथियंस के साथ क़रार किया और अपने करियर के अंतिम दिनों तक इसी क्लब के लिए खेले. इस क्लब के  लिए रोनाल्डो ने 31 मैचों में 18 गोल किए. रोनाल्डो ने विश्व कप में कुल 15 गोल किए हैं. वर्ष 2006 के फी़फा विश्व कप में हिस्सा लेने वाले रोनाल्डो ने विश्व कप में सर्वाधिक गोल करने वाले खिलाड़ी बनने का गौरव हासिल किया. उन्होंने इस वर्ष जर्मनी के गर्ड मुलर के 14 गोल के रिकार्ड को ध्वस्त किया.

रोनाल्डो के नाम और भी कई रिकॉर्ड हैं. 2007 में हुए एक पोल में उन्हें सर्वकालिक टीम के ग्यारह खिलाड़ियों में से एक चुना गया.

Wednesday, June 8, 2011

भद्रजनों की अभद्रता




क्रिकेट को देश की जनता धर्म मानती है तो थ्योरी में इसे जेंटलमैन गेम का दर्जा दिया गया है. कुछ लोग इसे सामंतों को खेल बताते हैं, जिसमें दो सामंती खेलते हैं और बाकी खिलाड़ी मज़दूरी करते हैं. लेकिन अब क्रिकेट को लेकर एक नई परिभाषा ग़ढी जा रही है. अब इसे पैसा, ग्लैमर और विवादों का पिटारा माना जा रहा है. ज़ाहिर है, इस नई परिभाषा में क्रिकेटर भी ख़ुद को सांचे में ढालने की कोशिश कर रहे हैं. अभी हाल में क्रिस गेल के अभद्र व्यवहार ने इतना तो साबित कर ही दिया कि स्टारडम का नशा इन क्रिकेटरों के सिर पर इस कदर च़ढा है कि वे इसे संभाल नहीं पा रहे हैं. गेल ने एक पत्रकार और कैमरामैन से न स़िर्फ बदसलूकी की, बल्कि इस बात का भी एहसास कराया कि वह कितने बड़े स्टार हैं.

 इसके साथ ही शेन वॉर्न का राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव संजय दीक्षित के साथ जो भी विवाद रहा, उससे उनके प्रशंसकों को काफ़ी निराशा हुई. पिछले कुछ सालों से इस तरह के मामलों में खासा इज़ा़फा देखा गया है. हॉकी खिलाड़ियों के आरोपों का समर्थन वेट लिफ्टिंग में चैंपियन रहीं कर्णम मल्लेश्वरी ने भी किया था. उनके मुताबिक़, खेल चाहे कोई भी हो, महिला खिलाड़ियों को हर जगह ऐसी दिक्कतों से गुजरना पड़ता है. अलग-अलग खेलों से जुड़ी महिलाएं विभिन्न मौकों पर इस तरह के यौन शोषण की शिकायत करती रही हैं. एक समय गेंदबाज़ी का सिरमौर रहा यह खिलाड़ी क्यों ऐसी ग़लती कर बैठता है, जिससे उसकी सारी उपलब्धियों पर पानी फिरता नज़र आता है. ड्रग टेस्ट में नाकाम होने के बाद 2003 के विश्वकप से ठीक पहले पाबंदी झेल चुके शेन वॉर्न विवादों का पिटारा साथ लेकर चलते हैं. कभी उन पर महिलाओं को अश्लील संदेश भेजने के आरोप लगते हैं तो कभी विवाहेत्तर संबंधों के कारण वह सुर्ख़ियां बटोरते हैं. सट्टेबाज़ों के  साथ कथित रिश्तों के कारण भी वॉर्न को काफ़ी आलोचना झेलनी पड़ी है. मैदान पर गाली-गलौज तो वह कई बार कर चुके हैं. पता नहीं, क्रिकेट के जेंटलमैन इतने बदतमीज क्यों होते जा रहे हैं. बात ऑस्ट्रेलिया की हो तो साइमंड्‌स का ज़िक्र ज़रूरी है. एक समय ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ी की ज़रूरत बन चुके साइमंड्‌स आईपीएल में भी शायद अपने करियर का आख़िरी दौर देख रहे हैं. अजीब बात यह है कि उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट से उस समय नाता तोड़ा या यूं कहें कि ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट से वह उस समय किनारे कर दिए गए,

जब उनमें काफ़ी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट बची थी, लेकिन मैदान और मैदान के बाहर अपने अजीबोग़रीब व्यवहार के कारण एक अच्छा क्रिकेटर असमय ऑस्ट्रेलियाई टीम से निकल गया. उनका हरभजन के साथ हुआ नस्लवादी टिप्पणी वाला किस्सा तो सभी को याद होगा. साइमंड्‌स पर भारतीय दर्शकों द्वारा नस्लभेदी टिप्पणियों और श्रीसंत के व्यवहार की बहुत चर्चा रही है. मैदान के बाहर भले ही वह अन्य देशों के खिलाड़ियों से मित्रवत व्यवहार करते हैं, पर मैदान पर उनके दुर्व्यवहार की चर्चा सभी देशो के खिलाड़ी करते हैं. कई बार तो उन्हें सचिन, सौरभ और द्रविड़ जैसे खिलाड़ियों के साथ बदतमीज़ी करते देखा गया है. उनके क्षेत्ररक्षकों द्वारा बल्लेबाज़ों का ध्यान भंग किया जाता, ताकि वे अपनी एकाग्रता खो बैठें और उसमें वे सफल भी रहते हैं. श्रीलंका के मुथैया मुरलीधरन ने टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया है. मुरलीधरन और उनके चाहने वालों के लिए इससे बड़ी ख़ुशी और क्या हो सकती है कि मुरलीधरन ने अपने आख़िरी टेस्ट में 800वां विकेट लिया और श्रीलंका यह टेस्ट मैच जीत भी गया, लेकिन उनके बॉलिंग एक्शन को लेकर काफ़ी विवाद रहा और कई बार अंपायरों ने मुरली की गेंदबाज़ी पर आपत्ति भी उठाई. बार-बार मुरलीधरन इससे उबरते रहे और अपनी सफलता से आलोचकों को चुप कराते रहे. अब थोड़ा देशी खिलाड़ियों की बात भी कर लेते हैं.


अगर विवाद और भारतीय क्रिकेटरों की बात हो तो जेहन में सबसे पहला नाम श्रीसंत और हरभजन का आता है. हरभजन ने श्रीसंत को थप्पड़ मारकर पाबंदी तो झेली ही, चेतावनी भी झेली और फिर अपने में सुधार किया. श्रीसंत का आक्रामक व्यवहार एक हद तक शोभा देता है, लेकिन कभी-कभी सीमा लांघने से नुक़सान श्रीसंत का ही हुआ है. यही वजह है कि गाहे-बगाहे मैदान पर श्रीसंत के बदतमीज़ी भरे व्यवहार की चर्चा होती रहती है. कभी धोनी उन्हें समझाते नज़र आते हैं तो कभी कोई और वरिष्ठ खिलाड़ी. विश्वकप से पाकिस्तानी टीम के बाहर होने के दूसरे दिन ही कोच बॉब वूल्मर की मौत से इतना तो ज़ाहिर हो गया था कि टीम में काफी कुछ पक रहा है. 2007 के इस विश्वकप की शुरुआत से पहले ही भारतीय उपमहाद्वीप की दो प्रमुख टीमों भारत एवं पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाड़ियों के चयन और उनकी फिटनेस को लेकर तरह-तरह के विवादों ने माहौल बिगाड़ रखा था. पाकिस्तान में शोएब अख्तर जैसा खिलाड़ी डोप टेस्ट में असफल और टीम से बाहर रहा, वहीं शोएब मलिक भी इस मामले में पीछे नहीं रहे. इसी कारण आज पाकिस्तान क्रिकेट टीम की जो दुर्दशा हुई है, उससे सभी वाक़ि़फ हैं. बॉब वूल्मर की मौत शायद यह भी दिखाती है कि इस उपमहाद्वीप में खेल के नाम पर जो राजनीति हो रही है, वह कितनी गंदी है और अगर इसमें कुछ खिलाड़ी शामिल हैं तो वे किस हद तक बैडमैन हैं. पाकिस्तान क्रिकेट के लिहाज़ से 20-20 वर्ल्डकप का फाइनल और अब वर्ल्डकप 2011 का सेमी फाइनल, दोनों बड़े मैच फ्लाप शो साबित हुए. इन दोनों मुक़ाबलों में टीम को भारत के ख़िला़फ हार झेलनी प़डी.

दोनों ही मैचों के खलनायक टीम के मध्य क्रम के बल्लेबाज़ मिस्बाह उल हक बने. हक ने 20-20 वर्ल्डकप के फाइनल में घटिया शॉट जमाकर टीम की हार पर मुहर लगा दी थी तो अब वह धीमी बल्लेबाज़ी करके पाकिस्तानी जनता की नज़र में खलनायक बन गए हैं. हालांकि यहां मामला थोड़ा अलग था, पर जनता की नज़र में तो टीम विलेन बन ही गई थी. स़िर्फ क्रिकेट ही नहीं, अन्य खेलों में भी खिलाड़ियों की करतूतें सुनने में आती रहती हैं. आमतौर पर फील्ड पर अपने आचरण के  चलते विवादों में रहने वाले आस्ट्रेलियाई क्रिकेटरों के बाद वहां के  एथलीटों का भी असली चेहरा सामने आया है. पहले एक आस्ट्रेलियाई पहलवान द्वारा भारतीय पहलवान अनिल कुमार से पटखनी खाने के बाद अभद्र इशारा करने पर पदक छीन लिया गया तो अब एक साइकिलिस्ट के ग़लत आचरण के चलते आस्ट्रेलियाई अधिकारियों को शर्मिंदगी झेलनी पड़ी. आस्ट्रेलियाई साइकिलिस्ट शेन पाकिंस पर आरोप है कि उन्होंने मुक़ाबले के दौरान ख़तरनाक ड्राइविंग की, जिससे दक्षिण अफ्रीका और स्कोत्लेंद के साइकिलिस्ट आपस में भिड़ गए. और तो और, इस साइकिलिस्ट ने अपने किए पर माफ़ी मांगने के बजाय अधिकारियों को दो उंगलियों से सैल्यूट करके उनका मज़ाक भी उड़ाया. परिणामस्वरूप अधिकारियों ने उसे रेस से डिसक्वालीफाई कर दिया. कुछ साल पहले शेन को शराब पीकर ह़ुडदंग करने के चलते आस्ट्रेलियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट स्कॉलरशिप से वंचित कर दिया गया था. अब बात हॉकी की. भारतीय महिला हॉकी तो हमेशा से कई विवादों से जूझती रही है, लेकिन सबसे बड़ा मसला यौन शोषण वाला रहा, जिसने कोच के साथ-साथ पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर दिया.

 ग़ौरतलब है कि महिला हॉकी टीम के वीडियोग्राफर की आपत्तिजनक तस्वीरों के बाद उन्हें निलंबित तो कर दिया गया, लेकिन बड़ा मुद्दा कोच एम के कौशिक से जुड़ा था, जिन पर महिला खिलाड़ियों के यौन शोषण का आरोप है. आरोप लगा, तब कौशिक ने पहले तो इसे साजिश कहा और फिर जब मामले ने तूल पकड़ लिया तो इस्तीफे की पेशकश कर दी इस विवाद ने खिलाड़ियों और कोच के व्यवहार को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए. इस विवाद ने एक लंबी बहस को जन्म दिया. कुछ लोग इसे नज़रिए से जोड़कर देखने लगे तो कुछ लोग इसे साजिश का रूप मानते हैं. लोग कहते हैं कि एक्सरसाइज़ में बदन तो दिखता ही है, तो उस पर कोच की नज़र को लेकर सवाल नहीं उठाए जाने चाहिए. इससे समझ में आ सकता है कि टीम मैनेजमेंट में रहने वाले पुरुषों का लड़कियों को लेकर क्या नज़रिया रहता होगा और वे उनसे कैसे बर्ताव करते होंगे. यहां ग़ौर करने वाली बात यह है कि कोच एम के कौशिक पर जो गंभीर आरोप लगे हैं, वे ख़ुद खिलाड़ियों ने लगाए हैं. ये वे खिलाड़ी हैं, जिन्हें मालूम है कि यदि झूठे आरोप लगाए गए तो उन्हें टीम में कभी जगह नहीं मिलने वाली. उनकी आवाज़ को कुछ पुराने खिलाड़ियों के बयानों से भी ताक़त मिली है.


 महिला खिलाड़ियों का कहना है कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है और जैसे ही मामले की एक कड़ी सामने आई, उससे जुड़ी कई कहानियों के पन्ने खुलने लगे. इन खिलाड़ियों की मानें तो कोच के व्यवहार को लेकर पहले भी कई बार शिकायतें होती रही हैं, लेकिन ऐसी शिकायतों पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता, बल्कि शिकायत करने वाली लड़की को ही बड़ी बेशर्मी के साथ टीम से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है. हॉकी खिलाड़ियों के आरोपों का समर्थन वेट लिफ्टिंग में चैंपियन रहीं कर्णम मल्लेश्वरी ने भी किया था. उनके मुताबिक़, खेल चाहे कोई भी हो, महिला खिलाड़ियों को हर जगह ऐसी दिक्कतों से गुजरना पड़ता है. अलग-अलग खेलों से जुड़ी महिलाएं विभिन्न मौर्ज्ञेो पर इस तरह के यौन शोषण की शिकायत करती रही हैं. पिछले साल हैदराबाद में एक महिला मुक्केबाज़ ने ख़ुदकुशी कर ली. अपने सुसाइड नोट में उसने लिखा था कि उसे उसका एक पुरुष कोच तंग कर रहा था. आंध्र प्रदेश की महिला क्रिकेटरों ने भी आरोप लगाया था कि टीम में चयन के लिए बीसीसीआई के एक अधिकारी ने उनसे सेक्स को लेकर छूट लेनी चाही थी. बिना किसी सबूत के इस तरह के आरोपों को साबित करना आमतौर पर मुश्किल होता है. पहलवान से मॉडल बनी एक लड़की ने आरोप लगाया कि उससे भी ऐसी छूट लेने की कोशिश की गई. उसका कहना है कि मामला यौन उत्पीड़न भर का नहीं, भ्रष्ट अफसरों का है, जो किसी को टीम में शामिल करने से पहले उससे तरह-तरह के फेवर चाहते हैं, चाहे वह मर्द हो या औरत.

 हालांकि यह कहना कि स़िर्फ सारे कोच ही भ्रष्ट हैं, ग़लत होगा. कई बार ऐसा भी होता है कि टीम में जगह पक्की करने के लिए कई खिलाड़ी कोच को इस्तेमाल करते हैं और जब बाद में उनका शोषण होने लगता है तो फिर इस तरह के विवाद पैदा होते हैं. अब कसूर चाहे कोच का हो या फिर खिलाड़ियों का, इतना तो तय है कि इससे खेल की अस्मिता पर सवाल उठते हैं. ऐसा नहीं है कि काजल की इस काली कोठरी में सभी काले हैं. कुछ खिलाड़ी ऐसे भी होते हैं, जो सालों से इस क्षेत्र में हैं और अपनी गरिमा को बचाकर रखते हैं. सचिन इस बात के जीते-जागते उदाहरण हैं. इन सभी खिलाड़ियों को एक बात समझनी चाहिए कि ऐसा व्यवहार उनकी उपलब्धियों को बौना करता है. अगर उन्हें सीखना है तो सचिन जैसे खिलाड़ियों से सीखें. वरना जो जनता उन्हें सिर पर बैठाकर स्टार होने का रुतबा देती है, वही अर्श से फर्श तक पहुंचाने का भी माद्दा रखती है.

Tuesday, May 31, 2011

वर्ल्‍डकप, आईपीएल और अब वेस्‍टइंडीज






अब इसे पैसे कमाने की कभी न ख़त्म होने वाली भूख कहें या कुछ और, लेकिन इतना तो तय है, अब क्रिकेट लगता है कि कभी ख़त्म नहीं होगा. मतलब आईपीएल ख़त्म होगा तो वर्ल्डकप, वर्ल्डकप ख़त्म तो आईसीएल, फिर 20-20 वर्ल्डकप और फिर विदेशों में दौरे. एक दौर था, जब साल में क्रिकेट के नाम पर एक-दो सीरीज़ और एकाध दौरे का कार्यक्रम हुआ करता था और बाक़ी व़क्त कहा जाता था कि अब क्रिकेटर अभ्यास मैच खेलेंगे और समय मिला तो परिवार के साथ छुट्टियां मनाएंगे. लेकिन अब अगर भारत में क्रिकेट का शेड्यूल देखा जाए तो पता चलेगा कि दिन ही नहीं, रात भर क्रिकेट के कार्यक्रम हैं. टेलीविज़न पर स़िर्फ क्रिकेट की ही स्टोरी चलती दिखाई देती है. अभी हाल में कहा जा रहा था कि भारतीय क्रिकेट टीम को वर्ल्डकप की जीत के जश्न में डुबा दिया जाएगा और क्रिकेटर आराम करेंगे, लेकिन फिर पता चला कि आईपीएल की आंधी आने वाली है. अब आईपीएल ख़त्म हुआ तो भारत चला वेस्टइंडीज के दौरे पर.

भारतीय टीम में कई बड़े खिलाड़ी हैं और गैरी कर्स्टन ने ख़ुद को पृष्ठभूमि में रखते हुए उन खिलाड़ियों के साथ काम किया. ऐसे में डंकन फ्लेचर का रुख़ देखने वाला होगा और गैरी कर्स्टन के साथ उनकी तुलना भी शायद होती ही रहेगी. कुल मिलाकर भारत जिस तरह इतना क्रिकेट खेल रहा है, उसकी थकान का असर वेस्टइंडीज दौरे में तो दिखाई देगा ही, साथ ही शुरुआती मैचों में दिग्गज खिलाड़ियों की कमी भी खलेगी, लेकिन क्रिकेट के प्रशंसकों का पूरा मनोरंजन होना तय है.

इस बार के वेस्टइंडीज़ दौरे पर कई बदलाव देखने को मिलेंगे. मसलन, कई वरिष्ठ खिलाड़ियों को आराम दिया जाएगा और कई नए चेहरों को मैदान पर काफी दिनों बाद देखा जाएगा. वहीं गौतम गंभीर टीम की कमान पहली बार थामते नज़र आएंगे. हालांकि इससे फायदा यह होगा कि इस दौरे के बहाने कई नए चेहरों को अपनी काबिलियत दिखाने का मौक़ा मिल जाएगा. इस बार कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और सचिन तेंदुलकर सहित कुछ वरिष्ठ खिलाड़ियों को राष्ट्रीय क्रिकेट के चयनकर्ताओं ने वेस्टइंडीज़ दौरे के लिए वन डे सीरीज़ में आराम का मौक़ा दे दिया. ग़ौरतलब है कि इन वरिष्ठ खिलाड़ियों को आराम देने की नौबत ही क्यों आई. मामला सा़फ है, जब इन खिलाड़ियों से इतने कम अंतराल में ज़रूरत से ज़्यादा क्रिकेट खिलवाया जाएगा तो ऐसा होना लाज़िमी है. तमिलनाडु के बल्लेबाज़ एस बद्रीनाथ और बंगाल के विकेट कीपर रिद्धिमान साहा की 16 सदस्यीय टीम में वापसी हुई है. गंभीर को कप्तान बनाया गया है. उनकी अगुवाई वाली टीम में कर्नाटक के तेज गेंदबाज़ आर विनय कुमार को भी जगह मिली है, जबकि अमित मिश्रा, रोहित शर्मा और ईशांत शर्मा की वापसी हुई है. युवा सुरेश रैना को उप कप्तान बनाया गया है. बीसीसीआई सचिव एन श्रीनिवासन ने चयन समिति की बैठक के बाद टीम की घोषणा की, जिसमें लेग स्पिनर पीयूष चावला और तेज गेंदबाज़ एस श्रीसंत को शामिल नहीं किया गया. ये दोनों भारत की वर्ल्ड चैंपियन टीम का हिस्सा थे. धोनी, तेंदुलकर एवं तेज गेंदबाज़ ज़हीर ख़ान को वन डे और 20-20 मैच के लिए आराम दिया गया है, लेकिन ये तीनों टेस्ट सीरीज़ के लिए मौजूद रहेंगे. सीरीज की शुरुआत 4 जून को 20-20 मैच के साथ होगी, जिसके बाद 5 वन डे मैचों की सीरीज़ खेली जाएगी. पहला वन डे मैच 6 जून को होगा. 3 टेस्ट मैचों की सीरीज़ की शुरुआत 20 जून से होगी.

श्रीनिवासन ने कहा, धोनी, सचिन और ज़हीर ख़ान को आराम दिया गया है, लेकिन वे टेस्ट सीरीज़ के लिए उपलब्ध रहेंगे. वहीं सलामी बल्लेबाज़ वीरेंद्र सहवाग के नाम पर विचार नहीं किया गया, क्योंकि उन्हें कंधे का ऑपरेशन कराना है, जिसके कारण वह 6 हफ्तों तक क्रिकेट नहीं खेल पाएंगे. तेज गेंदबाज़ आशीष नेहरा के नाम पर भी विचार नहीं किया गया, क्योंकि वह वर्ल्डकप के दौरान उंगली में लगी चोट से उबर रहे हैं. आईपीएल में बेहतरीन प्रदर्शन कर रहे अंबाती रायडू को टीम में जगह नहीं मिली, क्योंकि चयनकर्ताओं ने उन पर अनुभवी बद्रीनाथ को तरजीह दी. बद्रीनाथ को आईपीएल और घरेलू टूर्नामेंट में अच्छे प्रदर्शन का ईनाम मिला है. उन्होंने रणजी टूर्नामेंट में 131 के औसत से 922 रन बनाए, जबकि आईपीएल में वह अब तक 349 रन बना चुके हैं. चयन समिति के अध्यक्ष के श्रीकांत के मुताबिक़, यह सर्वश्रेष्ठ संभावित टीम है. मुझे यक़ीन है कि टीम में अच्छा संतुलन रहेगा, टीम अच्छा प्रदर्शन करेगी और लय बरक़रार रखेगी. कोहनी में चोट के कारण वर्ल्डकप टीम से बाहर हुए प्रवीण कुमार की वापसी हुई है, जबकि पिछले साल अगस्त में श्रीलंका के ख़िला़फ अपना अंतिम वन डे खेलने वाले ईशांत को भी मौक़ा मिला है. रोहित को इस साल जनवरी में साउथ अफ्रीका के ख़िला़फ वन डे सीरीज़ में मौक़ा मिला था. इस 24 वर्षीय बल्लेबाज़ ने अब तक 61 वन डे मैचों में 27.13 के औसत से 1248 रन बनाए हैं. वहीं सबसे बड़ा सरप्राइज पैकेज पार्थिव पटेल के नाम पर मिला है. टीम इंडिया से एक बार बाहर होने के बाद टीम में वापसी करना बेहद टेढ़ी खीर होता है, लेकिन विकेट कीपर बल्लेबाज़ पार्थिव पटेल ने यह कर दिखाया है. पहले वर्ल्डकप के संभावितों में और अब वेस्टइंडीज़ दौरे की वन डे सीरीज़ के लिए चयन ने पार्थिव के करियर को पुनर्जीवित कर दिया है. चयनकर्ताओं ने साहा और पार्थिव पटेल के रूप में दो विकेटकीपरोंको चुना है. धोनी की ग़ैर मौजूदगी में टीम की कमान गंभीर के हाथों में होगी, जिनकी अगुवाई में पिछले साल टीम इंडिया ने न्यूजीलैंड को 5-0 से रौंदा था. उम्मीद के मुताबिक़, ऑल राउंडर की भूमिका यूसुफ पठान निभाएंगे. वेस्टइंडीज दौरे के लिए टीम के चयन को लेकर भी कई सवाल खड़े होते हैं. मसलन, रोहित शर्मा को टीम में क्यों शामिल किया गया? क्या उनके पीछे कोई बड़ा हाथ है? रोबिन उथप्पा एवं अंबाती रायडू में से किसी एक को शामिल जाना चाहिए था, लेकिन उन्हें शामिल न करने के पीछे कोई ठोस कारण नहीं दिए गए. इऱफान पठान को भी टीम में शामिल किया जाना चाहिए था. कुछ लोगों का आरोप है कि चयन समिति जानबूझ कर इरफ़ान को नज़रअंदाज़ कर रही है और उनका भविष्य ख़राब कर रही है. ख़ैर जो भी हो, चयन को लेकर तो हमेशा सवाल उठते रहते हैं, पर टीम तो चयनित हो चुकी है.


ये तो रहे टीम के बदलाव. अब एक और बड़े बदलाव पर ग़ौर कीजिए. भारत की वर्ल्डकप विजेता टीम में बतौर कोच अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कोच यानी गुरु गैरी कर्स्टन इस बार नदारद रहेंगे. ग़ौरतलब है कि वर्ल्डकप के बाद उनका कार्यकाल ख़त्म हो गया था और अटकलें लगाई जा रही थीं कि उन्हें दोबारा कोच की भूमिका में देखा जा सकता है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं और उनकी जगह ली फ्लेचर ने. अगर फ्लेचर के बारे में बात की जाए तो उनसे भी काफी उम्मीदें रहेंगी. ग़ौरतलब है कि फ्लेचर ने इंग्लैंड को वेस्टइंडीज़ में 36 सालों बाद जीत दिलाई थी और फिर न्यूजीलैंड के विरुद्ध भी इंग्लैंड ने जीत का स्वाद चखा. इतना ही नहीं, उनके साथ इंग्लैंड ने दक्षिण अफ्रीका को भी 2-1 से हराया, मगर वन डे में इंग्लैंड के ख़राब फॉर्म के चलते उनकी आलोचना हुई और 2007 के विश्वकप से इंग्लैंड के बाहर होने के  बाद फ्लेचर ने इंग्लैंड के साथ आठ वर्ष का अपना कार्यकाल समाप्त किया. जबकि गैरी कर्स्टन के साथ भारतीय टीम टेस्ट में नंबर एक टीम बनी और उसने विश्वकप भी जीता. ऐसे में उनकी तुलना गैरी से होना स्वाभाविक है. साथ ही टेस्ट में भारत नंबर एक टीम है और फ्लेचर की चुनौती उसे वहां बरक़रार रखना होगा.

वन डे में भारतीय टीम मौजूदा विश्व चैंपियन है और रैंकिंग में दूसरे नंबर पर है. भारत को अब कई विदेशी दौरे करने हैं और उसका विदेशी धरती पर प्रदर्शन अपने यहां के मुक़ाबले कमज़ोर रहता आया है. ऐसे में फ्लेचर को वहां भारत के प्रदर्शनों पर पैनी निगाह रखनी होगी. भारत को वेस्टइंडीज दौरे के बाद इंग्लैंड जाना है और फिर वर्ष के  अंत में ऑस्ट्रेलियाई दौरा भी प्रस्तावित है यानी भारत की कड़ी परीक्षा आने वाली है. इसके अलावा भारत का पूरा कैलेंडर काफ़ी व्यस्त है, जिसकी वजह से दो सीरीज़ के बीच में उन्हें टीम के  साथ किसी तरह के  अभ्यास शिविर का भी कोई बड़ा मौक़ा शायद ही हाथ लगे. भारतीय टीम में कई बड़े खिलाड़ी हैं और गैरी कर्स्टन ने ख़ुद को पृष्ठभूमि में रखते हुए उन खिलाड़ियों के साथ काम किया. ऐसे में डंकन फ्लेचर का रुख़ देखने वाला होगा और गैरी कर्स्टन के साथ उनकी तुलना भी शायद होती ही रहेगी. कुल मिलाकर भारत जिस तरह इतना क्रिकेट खेल रहा है, उसकी थकान का असर वेस्टइंडीज दौरे में तो दिखाई देगा ही, साथ ही शुरुआती मैचों में दिग्गज खिलाड़ियों की कमी भी खलेगी, लेकिन क्रिकेट के प्रशंसकों का पूरा मनोरंजन होना तय है.


टीम

गौतम गंभीर (कप्तान), सुरेश रैना (उपकप्तान), पार्थिव पटेल एवं रिद्धिमान साहा (दोनों विकेट कीपर), विराट कोहली, युवराज सिंह, एस बद्रीनाथ, रोहित शर्मा, हरभजन सिंह, आर अश्विन, प्रवीण कुमार, ईशांत शर्मा, मुनाफ पटेल, आर विनय कुमार, यूसुफ पठान और अमित मिश्रा.

कार्यक्रम

20-20 सीरीज

4 जून-क्वींस पार्क ओवल, पोर्ट ऑफ स्पेन, त्रिनिदाद

वन डे सीरीज

पहला वन डे-6 जून-क्वींस पार्क ओवल, पोर्ट ऑफ स्पेन, त्रिनिदाद

दूसरा वन डे-8 जून-क्वींस पार्क ओवल, पोर्ट ऑफ स्पेन, त्रिनिदाद

तीसरा वन डे-11 जून-सर विवियन रिचर्ड्स, नॉर्थ साउंड, एंटीगुआ

चौथा वन डे-  जून-सर विवियन रिचड्‌र्स, नॉर्थ साउंड, एंटीगुआ

पांचवां वन डे-15 जून-सबीना पार्क, किंग्सटन, जमैका

टेस्ट सीरीज

पहला टेस्ट-20 से 24 जून-सबीना पार्क, किंग्सटन, जमैका

दूसरा टेस्ट-28 जून से 2 जुलाई-केंसिंग्टन ओवल, ब्रिज टाउन, बार्बादोस

तीसरा टेस्ट-10 से 14 जुलाई-विंडसोर पार्क, डोमिनिका

Friday, May 27, 2011

सिर्फ छह महीने में पता चल जाएगाः ममता सफल होंगी या असफल मुख्यमंत्री



जनता ने तो सत्ता का पोरिवर्तन कर दिया है, अब पोरिवर्तन करने की बारी ममता बनर्जी की है. अकेले दम पर लगभग दो तिहाई सीटें बटोरने के बाद भी अगर ममता बनर्जी कांग्रेस को सरकार में शामिल होने का न्योता देती हैं तो इसे सिर्फ उनकी भलमनसाहत या कहें कि गठबंधन धर्म निभाने की बात नहीं माना जाना चाहिए. वैसे भी राजनीति में भलमनसाहत जैसे शब्दों के लिए जगह नहीं होती. पश्चिम बंगाल में सालों तक विपक्ष की भूमिका निभाने वाली ममता बनर्जी को यह अच्छी तरह मालूम है कि जनता ने जो पोरिवर्तन किया है, वह महज 34 साल पुरानी सत्ता की वजह से ही नहीं किया है. जनता ने यह बदलाव इस आशा के साथ भी किया है कि ममता अब उनकी जिंदगी और पश्चिम बंगाल का पोरिवर्तन करेंगी. पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी लगभग 25 फीसदी से भी ज्यादा है, लेकिन उसकी सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक हालत क्या है, यह सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट देखकर पता चल जाता है. लेकिन अल्पसंख्यक समुदाय के हित से जुड़े सबसे अहम मुद्दे यानी रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट पर तृणमूल का रुख अब तक साफ नहीं हो सका है.

 यह रिपोर्ट, अल्पसंख्यक समुदाय में भी जो वंचित तबका है, उसे शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरी में आरक्षण देने की बात कहती है. जाहिर है, ममता के लिए यह भारी जीत एक भारी जिम्मेदारी भी साथ लेकर आई है. अपने प्रचार के दौरान तृणमूल ने वामपंथियों पर यह आरोप भी लगाया कि उनके 34 सालों के शासन में राज्य में 72 हज़ार छोटी-बड़ी औद्योगिक इकाइयां बंद हुईं. सिर्फ हावड़ा में 12 हज़ार कल-कारखाने बंद हो गए. नतीजतन, बेरोजगारी बढ़ी, लेकिन जब वाममोर्चा की सरकार ने नंदीग्राम और सिंगूर में उद्योग लगवाने की कोशिश की तो ममता बनर्जी ने इसका जमकर विरोध किया. इस मुद्दे पर कि किसानों से जबरन जमीन छीनी जा रही है. लेकिन अब ममता सत्ता में हैं और वामपंथी विपक्ष में. सवाल यह है कि अब ममता बंगाल में उद्योगपतियों को कैसे बुला पाएंगी, कैसे और किन नीतियों के आधार पर जमीन का अधिग्रहण करेंगी, क्या वह लगभग सवा सौ साल पुराने भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव करने के लिए यूपीए सरकार पर दबाव बनाएंगी? दूसरी ओर, नक्सलवाद को लेकर तृणमूल का जो रुख रहा है और जिस तरह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर नक्सलवादियों ने तृणमूल का समर्थन किया है, उसे देखते हुए ममता बनर्जी के समक्ष इस समस्या का समाधान निकालना एक बहुत बड़ी चुनौती है. जाहिर है, यह मुद्दा भी तृणमूल के लिए एक भारी टास्क साबित होने वाला है.

गौरतलब है कि जमीन पर अधिकार न होना और रोजगार के घटते अवसर जैसी वजहों ने भी नक्सल समस्या को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई. ऐसे हालात में बंगाल के औद्योगिक विकास का खाका तैयार करना ममता बनर्जी के लिए दोधारी तलवार पर चलने जैसा होगा, क्योंकि यह मामला सीधे-सीधे रोजगार और जमीन से जुड़ा है और जनता इनमें से किसी एक को पाने के लिए दूसरे को खोना नहीं चाहेगी. इसके अलावा पश्चिम बंगाल के युवाओं की एक बड़ी संख्या (करोड़ों में) ने इस चुनाव में तृणमूल का समर्थन किया है. बेरोजगारी से त्रस्त इस युवा ऊर्जा का इस्तेमाल ममता बनर्जी कैसे करेंगी, कहां और किस रचनात्मक कार्य में? इस चुनाव में पश्चिम बंगाल के अल्पसंख्यक समुदाय ने भी तृणमूल का आंख मूंदकर समर्थन किया है. यहां मुस्लिम आबादी लगभग 25 फीसदी से भी ज्यादा है, लेकिन उसकी सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक हालत क्या है, यह सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट देखकर पता चल जाता है. सरकारी नौकरी में इस समुदाय की हिस्सेदारी महज 2.1 फीसदी है. ममता बनर्जी ने वैसे तो अपने घोषणापत्र में अल्पसंख्यकों के लिए नए मदरसों और एक विश्वविद्यालय की स्थापना की  बात कही है, लेकिन अल्पसंख्यक समुदाय के हित से जुड़े सबसे अहम मुद्दे यानी रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट पर तृणमूल का रुख अब तक साफ नहीं हो सका है. यह रिपोर्ट, अल्पसंख्यक समुदाय में भी जो वंचित तबका है, उसे शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरी में आरक्षण देने की बात कहती है. यूपीए गठबंधन में शामिल तृणमूल कांग्रेस की ओर से अब तक इस रिपोर्ट की सिफारिशों को लागू कराने के लिए न तो कोई दबाव बनाया गया और न कोई पहल होती दिखी. जाहिर है, तृणमूल को इस मसले पर अपना पक्ष साफ करना चाहिए. न सिर्फ इतना, बल्कि इस रिपोर्ट की सिफारिशों को लागू कराने के लिए एक नई पहल भी करनी चाहिए. तृणमूल ने अपने घोषणापत्र में कहा था कि सत्ता में आने के सौ दिनों के भीतर पश्चिम बंगाल में शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली बदल दी जाएगी और लोगों को अंतर दिखने लगेगा.


इसके अलावा तृणमूल ने सत्ता मिलने के बाद अगले 200 दिनों का एजेंडा भी पहले से तय कर लिया था, जिसमें कोलकाता को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्र बनाने की योजना शामिल है. साथ ही नए मेडिकल कॉलेज, मदरसे, मुस्लिम विश्वविद्यालय, हिंदी स्कूल और 300 नए आईआईटी खोलने की बात है, दार्जिलिंग एवं जंगल महल के लिए विशेष विकास योजना बनाने की बात है, सार्वजनिक क्षेत्र के बंद कारखानों को फिर चालू करना और नए कारखाने खोलने की बात है, लेकिन सवाल उठता है कि क्या ममता बनर्जी ये सारे काम महज़ 200 दिनों के भीतर कर पाएंगी? क्योंकि विकास का जो खाका इस एजेंडे में दिख रहा है, उसके लिए एक बेहतर बुनियादी संरचना मसलन, बिजली, सड़क, बेहतर कानून-व्यवस्था की दरकार होगी. बिहार का उदाहरण बताता है कि नीतीश कुमार को सिर्फ सड़कों का जाल बिछाने में ही पांच साल लग गए. वह भी काम अभी अधूरा है. बिजली की स्थिति अभी भी बिहार में नहीं सुधर सकी है. कहने का मतलब यह कि एक बीमारू प्रदेश को फिर से पटरी पर लाने में काफी लंबा समय लगता है. ऐसे में ममता बनर्जी पर दबाव अधिक होगा.


 जाहिर है, ममता बनर्जी को अपने पास उपलब्ध संसाधनों और विकास का जो स्वप्न उन्होंने जनता को दिखाया है, के बीच के गहरे अंतर का अंदाजा है. यही वजह है कि जब बात सरकार गठन और उसमें शामिल होने के लिए कांग्रेस को निमंत्रण देने की आई, तो यह समझना मुश्किल नहीं था कि ममता ने यह कदम क्यों उठाया, क्योंकि वह उस अंतर को कम करने के लिए केंद्र सरकार यानी कांग्रेस की मदद भी चाहती हैं. बहरहाल, पश्चिम बंगाल की जनता को अब पोरिवर्तन का इंतजार है, जिसकी जिम्मेदारी ममता बनर्जी को निभानी है.

Thursday, May 19, 2011

सौरभ की वापसी के मायने



बंगाल टाइगर, दादा, बाबू मोशाय और सौरव गांगुली, ये सारे नाम उस शख्स के हैं, जिसका एक दौर में भारतीय क्रिकेट पर ऐसा दबदबा था कि लोग बोलते थे कि यह भारतीय क्रिकेट टीम का अब तक का सबसे सफल और शानदार कप्तान है. लेकिन यह उगता हुआ सूरज इतनी जल्दी अस्त होगा, ऐसा किसी ने सोचा नहीं था. अर्श से फर्श और फर्श से अर्श तक के स़फर के सही मायने दादा से बेहतर कोई और नहीं समझ सकता है.

 कप्तानी से हटने के बाद फर्श तक पहुंचना और कमेंट्री करने से लेकर आईपीएल 4 के अंतिम दौर में बतौर उपकप्तान वापसी करना, फिर से अर्श तक पहुंचने की जद्दोजहद की अजीब दास्तां है. कल तक युवराज जैसे कई युवा प्रतिभाओं को निखारने वाला यह खिलाड़ी आज उसी की कप्तानी में खेलने को मजबूर है. इसे मजबूरी कहें या सीमित विकल्प, लेकिन दादा खुद को किस किनारे स्थापित करना चाहते हैं, इस पर संशय बरक़रार है. कभी उनके लिए कहा जाता है कि दादा अब क्रिकेट को अलविदा कहने की पोजीशन में हैं तो कभी वह आईपीएल जैसी फटा़फट  श्रंख्ला में वापसी कर अपने अंदर बचे हुए हुनर को सबके सामने लाने की कोशिश करते दिखाई देते हैं, जैसे वह यह साबित करने की कोशिश कर रहे हों वह अभी तक चुके हुए साबित नहीं हुए हैं.

 इतने बड़े क्रिकेटर की वापसी क्या ऐसी होनी चाहिए थी. क्या सौरव अब इतने मजबूर हो गए हैं कि उन्हें किसी के रहमो-करम की ज़रूरत है. जब उन्हें शुरुआत में आईपीएल में शामिल करने के लायक़ नहीं समझा गया तो अब उन्हें शामिल नहीं होना चाहिए था. पुणे वारियर्स के टीम निदेशक अभिजीत सरकार ने कहा कि गांगुली को लेना कोई जुआ नहीं है. उन्होंने कहा कि भारत में गांगुली जैसा क्रिकेट का जानकार कोई और नहीं है और वह अपनी उपयोगिता साबित कर देंगे. अजीब बात है, अभिजीत सरकार को उनकी उपयोगिता इतनी जल्दी समझ में आ गई. लगता है, यह बात नेशनल टीम के चयनकर्ताओं को नहीं सूझी. जब वर्ल्ड कप के दौरान सौरव कमेंट्री कर रहे थे, उस व़क्त सब ठीक नहीं था, क्योंकि उससे पहले ही आईपीएल 4 के संभावित खिलाड़ियों की सूची में उनका नाम नहीं था. पहले और तीसरे सत्र में कोलकाता नाइट राइडर्स के कप्तान रहे गांगुली को 10 में से किसी फ्रेंचाइजी ने नीलामी में नहीं खरीदा था. फिर अचानक से सहारा पुणे वारियर्स उन्हें आईपीएल के अंतिम दौर में शामिल करता है. यहीं पर मामला अटक जाता है. आ़िखर उस प्लेयर का क़द इसी बात से मापा जा सकता है कि जिस पर किसी ने भी बोली न लगाई हो, उसे मजबूरी में कहें या फिर ज़रूरत पड़ने पर शामिल किया जाता है. क्या इस क़द में दादा फिट बैठते हैं.

हालांकि यहां पर इस बात पर ग़ौर कर सकते हैं कि दादा ने इस चयन पर खुद अपनी स्वीकृति दी है. अब दादा ने यह फैसला किस तरह लिया है, यह तो वह ही बता सकते हैं, लेकिन प्रशंसकों और उनके आलोचकों के लिए यह चर्चा का विषय ज़रूर हो सकता है कि क्या उन्हें क्रिकेट खेलने की चाह ने इस फैसले पर हांमी भरने को प्रेरित किया, या फिर आईपीएल में मिलने वाली रक़म ने. इतना तो तय है कि यह फैसला उन्होंने देश के लिए खेलने की खातिर तो लिया नहीं है, क्योंकि देश के लिए खेलने की चाहत को आईपीएल में खेलने से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता. हर खिलाड़ी का सपना होता है कि वह एक दिन देश के  लिए खेले. देश के  लिए खेलने की चाहत में कहीं न कहीं गर्व और देशभक्ति की भावना जुड़ी रहती है और ऐसे में यदि कोई फिट खिलाड़ी 40 की उम्र में भी राष्ट्रीय टीम में शामिल होने के  लिए कोशिश करता है तो तब उसकी भावनाओं को समझा जा सकता है. लेकिन यहां आईपीएल में गर्व और देशभक्ति जैसी कोई बात नहीं जुड़ी है. आप यहां एक शहर की किसी फ्रेंचाइजी के लिए खेलते हैं. और तो और कई खिलाड़ियों के जन्म स्थान और फ्रेंचाइजी टीम में कोई रिश्ता भी नहीं है. बहरहाल दादा ने युवराज की कप्तानी में उस टीम की ओर से खेलने का फैसला लिया जो पहले से ही प्वाइंट रैंकिंग में फिसड्डी बनी हुई है.


 पुणे की डूबती नैया को पार लगाने के लिए अब टीम में उन्हें शामिल किया गया है, लेकिन चोटी की टीम को मात देने के लिए टीम को हर दृष्टि से बेहतरीन प्रदर्शन करना होगा, जो वारियर्स के लिए इतना आसान नहीं होगा. इस टीम ने टूर्नामेंट में अब तक शुरुआती दो मैचों को छोड़कर लगभग सभी में हार का मुंह देखा है. हालांकि दादा मुंबई इंडियंस के  खिला़फ हुए मैच में मैदान पर नहीं उतरे. उस मैच में भी पुणे को मुंबई के हाथों पिटना पड़ा. युवराज सिंह की कप्तानी वाली पुणे वारियर्स लगातार छह मैच हारकर टूर्नामेंट से बाहर होने की कगार पर है. फ्रेंचाइजी को उम्मीद है कि अपार अनुभव रखने वाले गांगुली के आने से उनकी बल्लेबाज़ी मज़बूत होगी. पुणे वारियर्स के टीम निदेशक अभिजीत सरकार ने कहा कि गांगुली को लेना कोई जुआ नहीं है. उन्होंने कहा कि भारत में गांगुली जैसा क्रिकेट का जानकार कोई और नहीं है और वह अपनी उपयोगिता साबित कर देंगे. अजीब बात है, अभिजीत सरकार को उनकी उपयोगिता इतनी जल्दी समझ में आ गई. लगता है, यह बात नेशनल टीम के चयनकर्ताओं को नहीं सूझी. हालांकि यह पहला मौक़ा नहीं है जब दादा को इस तरह से दरकिनार कर टीम से बाहर किया गया हो. इससे पहले भी कप्तान सौरव गांगुली को अच्छे प्रदर्शन के बावजूद एक दिवसीय टीम से बाहर किया गया था. इस बात का दर्द उन्हें अब भी सालता है.

 एक दिवसीय टीम से बाहर किए जाने के बारे में यदि गांगुली से कोई पत्रकार ज़रा सा भी कुछ पूछता है तो उनके दिल का दर्द जैसे बाहर निकल आता है और वह अपने मन की बात दबा नहीं पाते हैं. गांगुली कहते थे किमैं नहीं जानता कि वनडे टीम में वापसी के लिए आ़िखर क्या करूं. वह यह भी कहते थे कि मुझे यह भी नहीं पता कि इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) में अच्छा प्रदर्शन करने पर क्या मुझे भारतीय वनडे टीम में जगह मिल पाएगी. उनका मानना था कि फॉर्म में होने के बावजूद उन्हें ऑस्ट्रेेलिया में हुई एक दिवसीय मैचों की कॉमनवेल्थ बैंक सीरीज के लिए चुनी गई भारतीय टीम से हटा दिया गया था. उन्होंने कहा कि एक साल में क़रीब 1300 रन बनाने के बावजूद मुझे टीम में जगह नहीं दी गई. यह बात तब की है जब दादा को बुरी तरह से घेरकर टीम से बाहर का रास्ता दिखाया गया था, लेकिन उसके बाद उनके जख्मों पर मलहम लगाते हुए शाहरु़ख ने अपनी कोलकाता नाइट राइडर्स में उन्हें बतौर कप्तान चुना. ऐसा लगा जैसे इस बार दादा ज़ोरदार वापसी करेंगे, लेकिन शुरुआत में सब ठीक चलने के बाद अचानक पता नहीं क्या हुआ कि चौथे सीजन से उनका पत्ता सा़फ हो गया. सबसे गंभीर बात तो यही थी कि किसी भी फे्रंचाइजी ने उन पर भरोसा नहीं जताया. सरकार कहते हैं कि वह पैसे के लिए आईपीएल नहीं खेल रहे हैं, बल्कि उन्हें कुछ साबित करना है. वह का़फी सम्मान के  हक़दार हैं, लेकिन उनके साथ अच्छा बर्ताव नहीं किया गया. वह यह भी कहते हैं कि उनकी टीम कई खिलाड़ियों की फिटनेस समस्या से जूझ रही है. लिहाज़ा उन्होंने गांगुली के बारे में सोचा.

टूर्नामेंट की शुरुआत में ही एंजेलो मैथ्यूज बाहर हो गए जो सर्वश्रेष्ठ ऑल राउंडर थे. आस्ट्रेलियाई टी 20 के उपकप्तान टिम पेन, दक्षिण अफ्रीकी कप्तान ग्रीम स्मिथ भी चोटिल हैं. आशीष नेहरा भी फिट नहीं है. हम नेहरा की फिटनेस रिपोर्ट का इंतज़ार कर रहे थे. टीम प्रबंधन का मानना है कि गांगुली सर्वश्रेष्ठ उपलब्ध विकल्प हैं. वह जुझारू हैं और वापसी के बादशाह भी. हमें यक़ीन है कि वह अपनी उपयोगिता साबित करेंगे. इससे पहले दादा को लेकर आईपीएल में अटकलों का बाज़ार का़फी गर्म था. कहा जा रहा था कि वह कोलकाता की टीम में बतौर कोच भी हिस्सेदारी ले सकते हैं, लेकिन इस बात से सभी वाक़ि़फ थे कि कल तक एक-दूसरे को गले लगाकर खेलबो लड़बो, जीतबो एंथम गाने वाले दादा और शाहरु़ख के बीच अब पहले जैसी बात नहीं रही है. दोनों की दोस्ती में दरार तभी पड़ गई थी जब दो बार कोलकाता नाइट राइडर्स की कप्तानी करने के बाद आईपीएल के चौथे संस्करण में शाहरु़ख ने दादा को अपनी टीम में शामिल करने के लायक़ ही नहीं समझा. आपको याद होगा कि इस बात पर बंगाल में दादा के प्रशंसकों ने शाहरु़ख के िखला़फ जमकर प्रदर्शन भी किया था. इसके अलावा एक खास तबक़े में भीदादा को दोबारा कोलकाता में न शामिल करने के कारण शाहरु़ख को का़फी लोगों की आलोचना सहनी पड़ी थी. हालांकि इसके बाद भी शाहरु़ख दुनिया भर में इस बात का ढोल पीटते रहे कि दादा आज भी उनके क़रीब हैं, लेकिन सच्चाई क्या है, यह सभी जानते हैं. कुछ वरिष्ठ खिलाड़ी सौरव के इस फैसले पर कुछ अलग ही राय रखते हैं.


कुछ लोगोंे का मानना है कि नीलामी में नहीं खरीदे जाने के बाद गांगुली ने खिलाड़ी के तौर पर इसे अपने क्रिकेट करियर का अंत मान लिया होगा, लेकिन उसके बाद जब अचानक उन्हें पुणे में शामिल होने का ऑफर मिला तो उन्होंने इसे एक मौक़े के तौर पर लिया होगा यानि उन्हें अब फिर नए सिरे से शुरुआत करनी होगी. उन्हें उस टीम की नैया पार लगाने की ज़िम्मेदारी दी गई है, जो लगभग डूबने की कगार पर है. फ्रेंचाइजी और गांगुली ने सोच समझ कर निर्णय लिया होगा, लेकिन इस फैसले ने मन में कई सवाल खड़े कर दिए हैं. अपना बेहतरीन क्रिकेट खेल चुकने और क्रिकेट से बहुत दिनों दूर रहने के  बाद वापस इससे जुड़ना क्या बद्धिमत्ता वाला निर्णय कहा जा सकता है? सौरव को बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड ने उनकी टीम के बल्लेबाज़ी कोच बनने का प्रस्ताव दिया है. बांग्लादेश बोर्ड ने इस खबर की पुष्टि भी कर दी है कि वह दादा को अपने साथ जोड़ना चाहते हैं. जल्द ही वह दादा को एक औपचारिक पत्र भेजेंगे. बांग्लादेश बोर्ड के चेयरमैन मोहम्मद जलाल यूनुस के मुताबिक़ वह दादा की क़ाबिलियत का लाभ उठाना चाहते हैं. इससे पहले क़यास लगाए जा रहे थे कि वह कोच्चि टीम की कप्तानी संभाल सकते हैं. उनका यह सपना सच भी हो जाता अगर श्रीलंका के खिलाड़ी वापस अपने देश लौट जाते. इस पूरे घटनाक्रम में स़िर्फ एक बात पोजिटिव यह रही कि अब दादा के प्रशंसक एक बार फिर से उन्हें मैदान में देख सकेंगे. आ़िखरकार लंबे समय से लग रहे सभी क़यासों पर विराम लगा है.

इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि सौरव के टीम में शामिल होने से पुणे टीम में अनुभव की कमी दूर हो सकती है, लेकिन ऐसा नहीं लगता कि सहारा को यह फैसला लेने में कुछ ज़्यादा ही व़क्त लग गया. इसके अलावा जिस तरह का रवैया दादा को लेकर अब तक अपनाया जाता रहा है, उसे देखते हुए तो दादा को इतनी जल्दी फैसला नहीं लेना चाहिए था, क्योंकि पता नहीं कब शाहरु़ख की तरह सहारा भी किसी सीजन में उनसे अपना पल्ला झाड़ ले, तब दादा कहां जाएंगे.