Thursday, September 8, 2011

देश भर से आई आवाज़: मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना



राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार के ख़िला़फ अन्ना हजारे का आमरण अनशन किसी कुंभ से कम नहीं है. जिस तरह कुंभ किसी एक जगह पर न होकर प्रयाग से लेकर नासिक, उज्जैन और हरिद्वार में संपन्न होता है, उसी तरह आज़ादी की दूसरी लड़ाई का यह कुंभ स़िर्फ दिल्ली तकही सीमित नहीं रहा, बल्कि देश के कोने-कोने में फैल चुका है. जिसने भी इस कुंभ में डुबकी नहीं लगाई, वह हमेशा भ्रष्टाचार की गंगोत्री में गले तक डूबा रहेगा. यूं तो समय-समय पर जनता को जगाने के लिए हमेशा से ही रैलियां और आंदोलन होते रहे हैं, लेकिन हर आंदोलन और रैली के नसीब में जनता की इतनी बड़ी भागीदारी नहीं होती, लेकिन अन्ना के इस आंदोलन ने जनता का नसीब बदलने के निए न स़िर्फ उसे जगाया, बल्कि अंदर तक झकझोर कर रख दिया. आज देश के हर छोर से यही आवाज़ आ रही है कि मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना, अब तो सारा देश है अन्ना.

महाराष्‍ट्रः मी मराठी, मी अन्ना

अन्ना तो हैं ही मराठी, इसलिए महाराष्ट्र में अन्ना का आंदोलन पूरे उफान पर चल रहा है. चाहे बात उनके गांव राले सिद्धी की हो या पूरे महाराष्ट्र की, हर जगह स़िर्फ और स़िर्फ अन्ना की टोपी ही दिखाई दे रही है. हर कोई मी मराठी, मी अन्ना के नारे लगा रहा है. मुंबई, नागपुर, पुणे, औरंगाबाद और राज्य के लगभग हर शहर में अन्ना तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं के नारे गूंज रहे हैं. अन्ना का एक समर्थक तो उनके गांव से महाराष्ट्र तक का सफर बैलगाड़ी में स़िर्फ इसलिए पूरा करके आया, क्योंकि वह अन्ना के साथ है. लगभग यही नारा पूरे प्रदेश में आम है. राजनीतिक दलों की बात की जाए तो अन्ना की इस मुहिम में कई दलों के नेता, जो अब तक अपनी पार्टी की ज़ुबान बोल रहे थे, आज पार्टी की टोपी उतार कर अन्ना के सुर में गा रहे हैं. जहां संजय निरूपम अन्ना की टोपी पहन कर आंदोलन में शामिल हुए, वहीं उत्तर पश्चिम मुंबई की सांसद प्रिया दत्त ने भी अन्ना का खुलकर समर्थन किया. प्रिया ने अन्ना समर्थकों को भरोसा दिलाया कि वह इस मसले को संसद में उठाएंगी. इतना ही नहीं, अन्ना समर्थकों ने नवी मुंबई के सांसद संजीव नाईक के घर के सामने प्रदर्शन किया. मुंबई के सभी छह सांसदों के घरों पर प्रदर्शन हुआ. संजय और प्रिया के अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री गुरुदास कामत, संजय पाटिल, एकनाथ गायकवाड़ एवं मिलिंद देवड़ा के घरों के सामने भी अन्ना समर्थकों ने शांतिपूर्वक प्रदर्शन किया और उन्हें गुलाब का फूल एवं राष्ट्रध्वज भेंट किया. जो सांसद शहर से बाहर थे यानी अपना आवास छोड़कर दिल्ली दरबार में दुबक गए थे, आंदोलनकारियों ने मोमबत्ती जलाकर उनके घरों के सामने रखी और उन्हें सद्बुद्धि की कामना के साथ भजन-कीर्तन किया. उसे जन लोकपाल के समर्थन में संसद में आवाज़ बुलंद करने की अपील भी की गई. वहां पुलिस भी पहुंची. चूंकि इस कार्यक्रम की सूचना पुलिस को नहीं थी, इसीलिए वह सकते में आ गई. आंदोलनकारियों ने अचानक कार्यक्रम बनाया और सीधे सांसदों के घर पहुंच गए. अब जब भी सांसद वापस अपने घर आएंगे तो उन्हें जनता का सामना करना पड़ेगा. महाराष्ट्र में इस मुहिम में लोगों की भागीदारी बढ़ती जा रही है. ज़्यादातर महाराष्ट्रियन अन्ना के समर्थन और उनके दर्शन के लिए दिल्ली के रामलीला मैदान की ओर रवाना हो रहे हैं.


उत्तर प्रदेश- उत्तराखंडः किन्नर, महिला, बुजुर्ग और बच्चे

भ्रष्टाचार को देश से उखाड़ फेंकने के लिए संकल्पबद्ध उत्तर प्रदेश का तो नज़ारा ही अलग है. यहां एक तऱफ जहां बुज़ुर्ग गांधीवादी नेता, बच्चे, महिलाएं और युवा अन्ना हजारे के आंदोलन को समर्थन देने के लिए सड़कों पर उतर आए हैं, वहीं अब तक समाज की उपेक्षा के शिकार किन्नर भी इस आंदोलन में भागीदारी कर रहे हैं. राजधानी लखनऊ के अमीनाबाद, सदर बाजार और कुछ अन्य क्षेत्रों में किन्नरों ने सड़क पर उतर कर भ्रष्टाचार के ख़िला़फ अपने विशेष अंदाज़ में जमकर नारेबाज़ी की और हजारे के आंदोलन में शामिल होने का ऐलान किया. वे कहते हैं कि हम इस देश के नागरिक हैं और हमें भी अपने देश से प्यार है. लगभग पूरे प्रदेश में विभिन्न स्थानों पर अन्ना समर्थकों का अनशन, धरना-प्रदर्शन, जुलूस, पदयात्रा, जनसंवाद और हस्ताक्षर अभियान जारी है. एक और चौंकाने वाली बात सामने आ रही है कि जन लोकपाल बिल पारित होने के पहले ही अन्ना हजारे के अनशन और जनांदोलन के चलते सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार कम हो गया है. जिन महकमों को बेहद अच्छी कमाई वाला माना जाता है, वहां के अधिकारी-कर्मचारी रिश्वत लेने में हिचकने लगे हैं. तमाम कमाऊ विभागों के कर्मचारी अन्ना के आंदोलन में भागीदारी कर रहे हैं. यह अपने आप में एक सकारात्मक परिवर्तन है. हाल में कानपुर के पनकी बी ब्लाक में 3500 रुपये में मीटर में रिमोट ऑपरेटेड डिवाइस लगाने वाले कर्मचारी को उपभोक्ता ने रंगे हाथों पकड़वा दिया. लोगों का कहना है कि अन्ना के आंदोलन ने काफी हद तक लोगों को जागरूक किया है. उधर कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी, सांसद रेवती रमण सिंह, कपिल मुनि करवरिया, शैलेंद्र कुमार और प्रमोद तिवारी के घरों को भी अन्ना समर्थकों ने घेरा. स़िर्फ उत्तर प्रदेश में ही नहीं, इस ऊनशन की गूंज अब देश के आख़िरी गांव माणा में भी पहुंच गई है. उत्तराखंड के चमोली ज़िले के बद्रीनाथ धाम से तीन किलोमीटर दूर पहाड़ों पर स्थित माणा गांव के लोगों ने भी अन्ना हजारे के समर्थन में अपनी आवाज़ बुलंद की. चीन की सीमा पर स्थित देश के इस आख़िरी गांव के लोगों का मानना है कि हर हालत में भ्रष्टाचार का सफाया होना चाहिए.


मध्‍य प्रदेशः नवजात शिशु कहलायेंगे अन्ना

कहीं लोग अन्ना के आमरण अनशन के समर्थन में ख़ुद अनशन पर बैठे हैं तो कहीं आधी रात और तेज बरसात में रघुपति राघव राजा राम गा रहे हैं, लेकिन मध्य प्रदेश में अन्ना का जुनून कुछ इस कदर छाया हुआ है कि लोग अपनी भावी पीढ़ी को अन्ना हजारे जैसा बनाना चाहते हैं, इसीलिए नवजात शिशुओं का नाम अन्ना रखा जा रहा है. हर कोई अन्ना बनने को बेताब है. मध्य प्रदेश के दमोह ज़िले के ज़िला चिकित्सालय में हाल में जन्मे तीन नवजात शिशुओं के अभिभावकों ने उनका नाम अन्ना रख दिया है. भारत सिंह ने अपने बेटे का नाम स़िर्फ इसलिए अन्ना रखा, क्योंकि उनके परिवार में यह मेहमान तब आया है, जब देश में अन्ना हजारे का आंदोलन चल रहा है. वह चाहते हैं कि उनका बेटा भी अन्ना जैसा बने और देश के लिए कुछ करने के साथ-साथ उनका भी नाम रोशन करे. डॉक्टर कहते हैं कि यह पहला अवसर है, जब नवजात शिशुओं के अभिभावकों ने उनके एक जैसे नाम रखे. इसके अलावा भिंड ज़िले के एहतरार गांव में पूरा गांव ही अनशन पर बैठ गया है. इसमें हर वर्ग के लोग शामिल हैं. सागर ज़िले के बीना में लोग गीत-संगीत के माध्यम से इस मुहिम को घर-घर तक पहुंचा रहे हैं. प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी भी खुलकर अन्ना हजारे के समर्थन में आ गई है. अन्ना समर्थकों ने भोपाल में कैलाश जोशी एवं कांतिलाल भूरिया, छिंदवाड़ा में कमलनाथ, होशंगाबाद में राव उदय प्रताप सिंह, बैतूल में ज्योति धुर्वे, उज्जैन में प्रेमचंद गुड्डू का घेराव किया. इसके अलावा इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर, सतना, रीवा और सिवनी में भी आंदोलन किया गया. अन्ना के आंदोलन को लेकर मध्य प्रदेश में ज़बरदस्त उत्साह देखा जा रहा है.

बिहारः यहां भी है अन्ना की धूम

अन्ना हजारे की एक आवाज़ पर बिहार के चप्पे-चप्पे में इन दिनों धरना, प्रदर्शन, उपवास और कैंडल मार्च का नारा आम हो गया है. अलग-थलग पड़े पुराने संगठनों में जान आ गई है, कई नए संगठन भी खड़े हो गए हैं. बापू के भजन और देशभक्ति गीत बच्चों की ज़ुबान पर चढ़ गए हैं और नए-नए नारे गढ़े जा रहे हैं. अन्ना हजारे के अनशन और उसे मिले समर्थन ने उन लोगों को ताक़त दी है, जो स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार के ख़िला़फ लड़ते रहे हैं, तभी तो नालंदा ज़िले के परवलपुर में समाजसेवी नवल प्रसाद पिछले एक सप्ताह से ऊनशन पर हैं. वह आंगनवाड़ी केंद्रों में पोषाहार, मिड डे मील और जन वितरण प्रणाली में भ्रष्टाचार ख़त्म करने की मांग कर रहे हैं. सारण में पुराने आंदोलनकारी उमेश्वर सिंह उर्फ मुनि जी अपने कई साथियों के साथ अनशन पर हैं, पटना के कारगिल चौक पर जेपी आंदोलन में सक्रिय रहे अरुण दास और टी उपेंद्र अनशन पर बैठे हैं. इंडिया अगेंस्ट करप्शन से जुड़े राहुल राजन कहते हैं कि धरना, प्रदर्शन एवं उपवास के ज़रिए हम अन्ना हजारे को ताक़त दे रहे हैं. अन्ना विचार मंच, अन्ना संघ जैसे कई नए संगठन भी खड़े हो गए हैं. गोपालगंज में सेवानिवृत्त आईजी गिरीश नंदन सिंह ने भगवानपुर कैमूर में अन्ना हजारे की मूर्ति स्थापित करने की घोषणा की है. पूर्णियां में लोगों ने हनुमान मंदिर के सामने उपवास शुरू किया है, यहां भजन भी गाए जा रहे हैं. बापू का प्रिय भजन-रघुपति राघव राजाराम…भी लोगों की ज़ुबान पर है. राजधानी पटना में कोचिंग संस्थानों के छात्र भी अन्ना के समर्थन में उतर आए हैं. भौतिकविद् एच के वर्मा के नेतृत्व में छात्र-छात्राओं का बड़ा हुजूम पटना की सड़कों पर उतरा. वर्मा कहते हैं कि जन लोकपाल देश के हित में है, इसलिए हम लोग समर्थन में उतरे हैं. वर्मा की राय है कि अक्षर इस देश से भ्रष्टाचार ख़त्म हो जाए तो ज़्यादातर समस्याओं का समाधान हो सकता है. उन्होंने देशवासियों से अपील की कि वे अन्ना के आंदोलन को समर्थन दें. गणित विषय के शिक्षक पंकज ने कहा कि अन्ना हजारे सत्य के साथ हैं और जीवन के हर क्षेत्र में वही शख्स कामयाब होता है, जो सच के साथ होता है. दवा व्यापार से जुड़े अमरेंद्र सिंह कहते हैं कि अन्ना हजारे ने पूरे देश को एक रास्ता दिलाया है. उनके आंदोलन से यह साफ हो गया कि भ्रष्टाचार और उसके कारण बढ़ रही महंगाई से पूरा देश त्रस्त है. इसलिए इस समय देशवासियों का फर्ज़ है कि वे भ्रष्टाचार के ख़ात्मे के लिए शुरू हुए इस आंदोलन को अपना पूरा समर्थन दें.

- सरोज सिंह

Wednesday, August 31, 2011

हार का ठीकरा किसके सिर


अब टीम इंडिया इंग्लैंड के साथ अपने आख़िरी टेस्ट मैच का अंजाम चाहे जो भी देखे, लेकिन 3-0 की हार से हुआ आगाज़ यह बताने के लिए काफी है कि भारतीय क्रिकेट टीम की न तो लाज बची है और न ताज. ताज तो उसने अपने शर्मनाक प्रर्दशन के साथ ही गंवा दिया था, लेकिन लाज गंवाई उसने हार का ठीकरा बेमतलब की बातों पर फोड़कर. सीधे-सीधे अपने अति आत्मविश्वास और लचर प्रदर्शन को हार का ज़िम्मेदार न मानते हुए धोनी वही पुराने डायलाग्स दोहराते नज़र आए. कभी कहते हैं कि किसी भी टीम के लिए हर मैच जीतना आसान नहीं है और कभी कहते हैं कि हम लोगों ने काफी समय से इतना क्रिकेट खेला है कि आराम करने का मौक़ा ही नहीं मिला. वहीं कुछ लोग टीम की हार का ठीकरा कोच फ्लेचर के सिर फो़ड रहे हैं. ताज्जुब की बात है कि जब टीम कोई बड़ा मैच जीतती है तो कोच को जीत का उतना हिस्सेदार नहीं माना जाता, जितना हार का. ख़ैर, अगर हम धोनी की इन बातों को तार्किक भी ठहराएं तो यह बात समझ के बाहर है कि टीम इंडिया इतने बड़े अंतर से कैसे हार गई. नंबर एक की सीट पर काबिज टीम का प्रदर्शन इतना भी नहीं गिरता कि वह अपना सूपड़ा इस तरीक़े से साफ कराए. आस्ट्रेलिया का ही उदाहरण ले लीजिए. वह विश्व विजेता रह चुकी है और हारती भी है, लेकिन उसकी हार में टीम का ज़बरदस्त संघर्ष दिखाई देता है.

मैं समझ सकता हूं कि बीसीसीआई टेस्ट मैचों की शर्मनाक हार के कारणों का पता लगाना चाहता है. यह स्वागत योग्य क़दम है. मुझे उम्मीद है कि यह एकतरफा जांच नहीं होगी.

- वसीम अकरम



ग़ौर करने वाली बात है कि भारतीय टीम ने इंग्लैंड में छह पारियों में एक बार भी अपना स्कोर 300 के पार नहीं किया. इसके अलावा टीम की अधिकतर पारी 90 ओवर से कम में ही सिमट गई. मतलब टीम एक पूरे दिन भी मैदान पर टिकने में नाकाम रही. जिस टीम में सचिन, सहवाग, लक्ष्मण और द्रविड़ जैसे सूरमा हैं, वह अपनी बल्लेबाज़ी के लिए परेशान है. यह बात भी गले नहीं उतरती है. टेस्ट मैच में यह ज़रूरी होता है कि आप धैर्य के साथ पिच पर टिकें और कम से कम 90 ओवरों की बल्लेबाज़ी करें. तभी कोई टीम जीत की नींव रख पाती है. बर्मिंघम टेस्ट का ही उदाहरण लें तो एक ओर जहां भारत की पहली पारी 62.2 ओवरों तक टिकी, वहीं दूसरी पारी महज़ 55.3 ओवरों में ही सिमट गई. इसके विपरीत इंग्लैंड ने पहली ही पारी में 188 ओवर खेले. इंग्लैंड के हाथों तीसरे टेस्ट में एक पारी और 242 रनों की करारी हार के बाद भारत ने टेस्ट टीम में नंबर वन की हैसियत खो दी है. इसके  साथ ही आईसीसी टेस्ट रैंकिंग शुरू होने के बाद 32 वर्षों में इंग्लैंड पहली बार टेस्ट रैंकिंग में पहले नंबर पर पहुंचा है. लगभग 20 महीनों तक नंबर वन की रैंकिंग वाली महेंद्र सिंह धोनी की टीम एजबेस्टन टेस्ट में अपनी दूसरी पारी में भी 242 रनों पर धराशायी हो गई. जबकि खेल का एक दिन बाक़ी था. ज़रा सोचिए कि इंग्लैंड के एक खिला़डी कुक ने अकेले ही पूरी भारतीय टीम से ज़्यादा रन जोड़े. इस हार को हम हाल में किसी अन्य देश में भारत की सबसे बुरी हार के तौर पर शुमार कर सकते हैं. अगर क्रिकेट के इतिहास में थोड़ा पीछे जाकर देखें तो इससे पहले भारत को सबसे ख़राब हार का सामना वर्ष 1958 में करना पड़ा था, जब कोलकाता में वेस्टइंडीज़ ने उसे एक पारी और 336 रनों से हराया था, लेकिन उस दौरान भारतीय टीम क्रिकेट के खांचे में फिट होने की कोशिश कर रही थी, लेकिन आज के दौर में जब भारतीय क्रिकेट टीम ने दुनिया भर में कामयाबी का झंडा लहरा दिया है तो ऐसे में इतनी अपमानजनक हार क्रिकेट प्रेमी पचा नहीं पा रहे हैं.

हाल में बीसीसीआई की कार्यकारी समिति की बैठक में फैसला किया गया कि निवर्तमान अध्यक्ष शशांक मनोहर और भावी अध्यक्ष एन श्रीनिवासन हार के कारणों की जांच करेंगे. इस पर वसीम अकरम कहते हैं, मैं समझ सकता हूं कि बीसीसीआई टेस्ट मैचों की शर्मनाक हार के कारणों का पता लगाना चाहता है. यह स्वागत योग्य क़दम है. मुझे उम्मीद है कि यह एकतरफा जांच नहीं होगी. अकरम के मुताबिक़, मुझे एक बात ने चिंतित किया कि क्या भारत के पास तेंदुलकर, द्रविड़, लक्ष्मण और सहवाग जैसे खिलाड़ियों की जगह भरने के लिए कुशल खिलाड़ी हैं? रैना, कोहली और रोहित शर्मा जैसे खिलाड़ियों को अभी मीलों दूरी तय करनी है. चयनकर्ताओं के लिए यह बड़ा मुश्किल काम होगा. टीम में लगभग हर क्षेत्र में लापरवाही और कमज़ोरियां देखी गईं. चाहे वह बल्लेबाज़ी हो, क्षेत्ररक्षण, गेंदबाज़ी और मनोबल हो. इन सभी आयामों में टीम इंडिया पूरी तरह से चित्त रही. टीम की इस दुर्दशा के लिए कोच फ्लेचर भी कई मायनों में ज़िम्मेदार हैं. भारतीय क्रिकेट टीम में बतौर कोच जब गैरी क्रिस्टन शामिल थे, तब टीम अपने स्वर्णिम दौर से गुजर रही थी. जबसे कमान फ्लेचर ने संभाली है, टीम इंडिया का लचर प्रदर्शन दिखा है. यह संयोग भी हो सकता है, लेकिन कुछ तर्क ऐसे हैं, जिनके आधार पर फ्लेचर को टीम इंडिया की इस दुर्दशा का ज़िम्मेदार मान सकते हैं. मसलन उनका एक बयान, जिसमें उन्होंने टीम इंडिया की हार के लिए पिच को ज़िम्मेदार ठहराया. ग़ौरतलब है कि लॉर्ड्स और नॉटिंघम के बाद एजबेस्टन में भी भारतीय बल्लेबाज़ों के फ्लॉप शो के  बाद फ्लेचर ने कहा था कि इसके लिए इंग्लैंड की तेज पिचें ज़िम्मेदार हैं, लेकिन क्या वाकई में ऐसा है? इस बात से सभी वाक़ि़फ हैं कि फ्लेचर इंग्लैंड टीम के साथ आठ साल गुजार चुके हैं. अब किसी भी देश में इतना व़क्त बिताने के बाद अगर कोई कोच यह कहता है कि हम वहां की पिच और परिस्थितियों से वाक़ि़फ नहीं हैं तो थोड़ा ताज्जुब होता है. ऐसा नहीं था कि टीम ने ऐसी पिचें पहली बार देखी थीं. दक्षिण अफ्रीका में भी टीम को तेज उछाल वाली पिचें मिली थीं, लेकिन तब भारतीय टीम ने अपनी रणनीति में लगातार बदलाव कर सीरीज 1-1 से ड्रा खेली थी. हैरत की बात यह है कि ख़राब पिच की दुहाई वह कोच दे रहा है, जिसने आठ साल उसी देश में गुजारे हैं. फ्लेचर के पास ब्रिटिश नागरिकता भी है. ऐसे में फ्लेचर का वहां की परिस्थितियों से वाक़ि़फ न होना शक पैदा करता है.

सच तो यह है कि टीम इंडिया पिछले कुछ समय से इस कदर जीतती आ रही है कि उसने कभी अपनी कमज़ोरियों पर ध्यान देने की ज़रूरत ही नहीं समझी. क़िस्मत और कुछ खिलाड़ियों का प्रदर्शन साथ रहा तो जीतते गए और अगर उन्होंने साथ छोड़ा तो चारों खाने चित्त. कोच के मसले को दरकिनार करके अब बात करते हैं उस जूनियर चैंपियन टीम की, जो किसी भी बहाने में यक़ीन नहीं करती है. वह तो स़िर्फ प्रदर्शन करना जानती है. वहीं सीनियर टीम इंडिया कोच, पिच और थकान को अपनी हार में बतौर ढाल इस्तेमाल कर रही है. अभी हाल में ऑस्ट्रेलिया में संपन्न हुए इमर्जिंग प्लेयर्स टूर्नामेंट में शिखर धवन की अगुवाई में खेली इंडिया इमर्जिंग प्लेयर्स टीम ने टूर्नामेंट के दोनों फॉर्मेट टी-20 और तीन दिवसीय मैचों में जीत हासिल की. इस टीम ने सीनियर टीम इंडिया में लगातार फ्लॉप हो रहे खिलाड़ियों के लिए एक संकेत दिया है कि जीत का कोई विकल्प नहीं होता है. अगर वह ऑस्ट्रेलिया जैसे कठिन वेन्यू पर टूर्नामेंट जीतने का माद्दा रख सकती है तो सीनियर टीम इंडिया को उससे सबक लेने की ज़रूरत है.

Wednesday, August 17, 2011

हॉकी सिर्फ नाम का राष्ट्रीय खेल



कहते हैं जब कोई भी संस्थान या व्यक्ति अपने पतनके दौर से गुज़रता है तो एक दिन उसका उत्थान भी होता है, यानी उतार-च़ढाव की स्थिति सब पर लागू होती है. अगर नहीं लागू होती है तो वह है हमारी भारतीय हॉकी टीम. जी हां, दुनिया में हर बदहाल संस्था और टीम के दिन बहुर सकते हैं, लेकिन भारतीय हॉकी टीम के बारे में यही कह सकते हैं कि यह फिर से कामयाबी का सवेरा शायद ही कभी देख सके. बात स़िर्फ खिताबों के जीतने की ही नहीं, बल्कि हॉकी की संस्थात्मक स़डन से है.

 आज हॉकी के अंदर और बाहर का पूरा तंत्र इस क़दर स़ड चुका है कि जब भी हॉकी से जु़डी खबर आती है तो कुछ न कुछ ऐसा ज़रूर होता है जिससे हमारे राष्ट्रीय खेल की फज़ीहत हो जाती है. अंतरराष्ट्रीय मुक़ाबलों में शर्मनाक हार झेलना तो बहुत पुरानी बात हो चुकी है. अब हम अपने देश में ही आपसी ल़डाई देख रहे हैं. कभी कोच के सेक्स स्कैंडल हॉकी को शर्मसार करते हैं तो कभी खिला़डी खुद के मेहनताने को लेकर स़डक पर विरोध प्रदर्शन के लिए उतर आते हैं. इतना ही नहीं टीम के खिलाडि़यों के आपसी संबंधों पर भी विवाद होते रहते हैं. फिर डोपिंग में फंसे खिला़डी बची खुची कसर पूरी कर देते हैं. कुल मिलाकर हॉकी आज अपने निम्नतम दौर से गुज़र रही है, लेकिन मुश्किलें हैं कि फिर भी खत्म होने का नाम ही नहीं लेती हैं.

अभी ताज़ा मामला चैम्पियंस ट्रॉफी और ओलंपिक क्वालीफाइंग टूर्नामेंट की मेज़बानी को लेकर उठ रहा है. इस बात से तो सभी वाक़ि़फ हैं कि पिछले कुछ दिनों से अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ (एफआईएच), हॉकी इंडिया (एचआई) और भारतीय हॉकी महासंघ (आईएचएफ) के बीच हुए आपसी समझौते से नाराज़ चल रहा था. इस बात का अंदेशा लगाया जा रहा था कि अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ (एफआईएच) ज़रूर कोई न कोई ठोस क़दम उठाएगा, ऐसा ही हुआ. हॉकी इंडिया (एचआई) और भारतीय हॉकी महासंघ (आईएचएफ) के बीच हुए आपसी समझौते से नाराज़ अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ (एफआईएच) ने भारत से चैंपियंस ट्रॉफी और ओलंपिक क्वालीफाइंग टूर्नामेंट की मेज़बानी छीन ली है. उसके इस क़दम ने न स़िर्फ हॉकी संघ की फज़ीहत की है, बल्कि इससे देश की भी फज़ीहत होती है. दरअसल एफआईएच ने अपने बयान में कहा था कि एफआईएच भारतीय खेल मंत्रालय द्वारा एचआई और आईएचएफ के बीच कराए गए समझौते को लेकर बेहद चिंतित है.


 इसके लिए एफआईएच से सलाह लेने की भी ज़रूरत नहीं समझी गई. एचआई, आईएचएफ और खेल मंत्रालय के बीच हुए समझौते के मुताबिक़ दोनों संगठनों ने आपसी मतभेदों को भुलाकर भारतीय हॉकी के विकास के लिए साथ मिलकर काम करने फैसला किया था. ग़ौरतलब है कि एफआईएच इस बात को लेकर नाराज़ था कि एचआई ने उससे सलाह के बग़ैर आईएचएफ के साथ साझा तौर पर काम करने संबंधी समझौता किया. एफआईएच के मुताबिक़ एचआई और आईएचएफ के बीच हुआ समझौता ओलंपिक और उसके चार्टर के खिला़फ है और यही कारण है कि वह भारत से चैंपियंस ट्रॉफी और ओलंपिक  क्वालीफाइंग टूर्नामेंट की मेज़बानी छीन रहा है. ग़ौरतलब है कि दोनों आयोजन नई दिल्ली में इस वर्ष के अंत में और 2012 की शुरुआत में होने थे. ऐसा नहीं है कि यह अचानक हो गया हो. दरअसल एफआईएच ने अपने बयान में कहा था कि एफआईएच भारतीय खेल मंत्रालय द्वारा एचआई और आईएचएफ के बीच कराए गए समझौते को लेकर बेहद चिंतित है. इसके लिए एफआईएच से सलाह लेने की भी ज़रूरत नहीं समझी गई. एचआई, आईएचएफ और खेल मंत्रालय के बीच हुए समझौते के मुताबिक़ दोनों संगठनों ने आपसी मतभेदों को भुलाकर भारतीय हॉकी के विकास के लिए साथ मिलकर काम करने फैसला किया था. हालांकि घरेलू स्तर पर दोनों संगठन अलग-अलग काम करेंगे. घरेलू स्तर पर दोनों के लिए बराबर ज़िम्मेदारियां तय करने के लिए एक संयुक्त कार्यकारिणी और कार्यकारी समिति का गठन किया जाएगा. नए संगठन को राष्ट्रीय टीम के चयन, उसकी तैयारी, विदेशी आयोजनों के लिए टीमों को भेजने और राष्ट्रीय कैंप आयोजित करने का काम सौंपा जाएगा. फिलहाल यह व्यवस्था 2012 तक के लिए की गई है. इसके बाद इन संगठनों की ज़िम्मेदारियों पर फिर से विचार किया जाएगा. ज़ाहिर सी बात है कि इस फैसले से एफआईएच खुश नहीं था. उसने सा़फ कहा है कि भारत के दो हॉकी संगठनों के बीच हुआ यह समझौता उसे म़ंजूर नहीं है. एफआईएच अध्यक्ष लेनार्दो नेगरे ने खेल मंत्री अजय माकन को एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने इस बात का ज़िक्र किया कि इस मामले की गंभीरता को समझते हुए एचआई और भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्षों के बीच एक बैठक कराई जाए, जिसमें एफआईएच की चिंताओं को लेकर चर्चा होनी चाहिए.


 एफआईएच ने कहा कि उसके मुताबिक़ एचआई ही भारत में हॉकी का संचालन करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था है और इस नाते उसे ही भारतीय टीम के चयन और अंतरराष्ट्रीय आयोजनों की मेज़बानी का अधिकार मिलना चाहिए. एफआईएच किसी भी हाल में आईएचएफ को मान्यता नहीं दे सकता. एफआईएच ने वर्ष 2000 में आईएचएफ की मान्यता रद्द कर दी थी. अब हो सकता है कि इस मामले पर फिर कई बैठकें हों, पर इतना तो तय है कि हॉकी की जो फज़ीहत होनी थी, वह तो हो ही गई. समझने वाली बात यह है कि यहां पर हॉकी से ज़्यादा फज़ीहत भारत की हुई है. किसी भी देश के लिए ऎन व़क्त पर म़ेजबानी का छिनना बहुत ही शर्मिंदगी भरा होता है. खैर, जो होना था वह तो हो ही गया. लेकिन दिक्क़त तो इस बात को लेकर और ब़ढ जाती है कि ऐसे मौक़े पर जहां देश की अस्मिता के लिए टीम और प्रबंधन को एकजुट होकर देश को संदेश देना चाहिए था, उल्टा वे आपस में ही उलझे हुए हैं. पिछले दिनों कुछ खिलाडियों के अभ्यास शिविर छो़डकर विश्व श्रृंखला हॉकी के लिए भारतीय हॉकी महासंघ और नियो स्पोर्ट्स के मुंबई में हुए संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में शामिल होने की वजह से पनपा विवाद भी थमने का नाम नहीं ले रहा है. पूर्व भारतीय कप्तान धनराज पिल्लै ने हॉकी इंडिया से कारण बताओ नोटिस पाने वाले पांच वरिष्ठ खिलाड़ियों को सलाह दी है कि वे भारतीय हॉकी टीम में खेलने के लिए इस संस्था के  अधिकारियों के सामने गिड़गिड़ाए नहीं. इस बात से तो सभी वाक़ि़फ है कि हॉकी इंडिया ने कुछ दिनों पहले ही पांच वरिष्ठ खिलाड़ियों अर्जुन हलप्पा, संदीप सिंह, एड्रियन डिसूजा, सरदारा सिंह और प्रभजोत सिंह को बेंगलुरु में चल रहा अभ्यास शिविर छोड़कर विश्व श्रृंखला हॉकी के लिए भारतीय हॉकी महासंघ और नियो स्पोर्ट्स के मुंबई में हुए संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में शामिल होने की वजह से कारण बताओ नोटिस जारी किया था. हॉकी इंडिया की अनुशासन समिति के अध्यक्ष परगट सिंह ने इन पांचों खिलाड़ियों को नोटिस जारी किया था.


 बस विवाद यहीं से शुरू हो गया. इस विवाद को सुलझाने के बजाय धनराज इस मामले को एक तरह से तूल देते हुए यह बयान देते हैं कि इन खिलाड़ियों को अपने देश के लिए खेलने के लिए हॉकी इंडिया के अधिकारियों के सामने नाक नहीं रगड़नी चाहिए. हालांकि धनराज ने इसके अलावा जो सवाल उठाए हैं, वे कई मायनों में तार्किक हैं, मसलन पूर्व कप्तान ने इस निर्णय और हॉकी इंडिया में बड़ा पद ले चुके अपने पूर्व टीम साथी परगट पर टिप्पणी करते हुए कहा कि एक समय परगट भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष सुरेश कलमा़डी को माफिया कहा करते थे, लेकिन जब उन्हीं के बनाए हॉकी इंडिया में जब उनके सामने अच्छे पद की पेशकश की गई तो वह सबकुछ भूलकर पद की तऱफ लपक पड़े. धनराज ने विश्व श्रृंखला हॉकी की तऱफदारी करते हुए कहा कि यह भारतीय हॉकी खिलाड़ियों के हक़ और हित में है और इसीलिए मैं इसमें शामिल हूं.

अब इन हालात में कैसे कोई उम्मीद कर सकता है कि पहले से क़ब्र में पैर लटकाए हुए इस राष्ट्रीय खेल का भला कैसे होगा. एक बात तो बिल्कुल समझ में नहीं आती है कि किसी भी देश के लिए राष्ट्रीय खेल को परिभाषित करने के लिए क्या मापदंड होते हैं. इस बात को भी दरकिनार कर दिया जाए तो यह सवाल उठता है कि क्या राष्ट्रीय खेल की इस बदहाली का ज़िम्मेदार खेल मंत्रालय और प्रशासन नहीं है. अगर इस खेल की बदहाली यूं ही जारी रही तो बहुत दुख के साथ कहना प़ड सकता कि हॉकी स़िर्फ नाम का ही राष्ट्रीय खेल रह जाएगा.

Monday, August 1, 2011

क्रिकेट, विज्ञापन और फजीहत



जब खिलाड़ियों पर सफलता और पैसे का नशा चढ़ता है तो फिर सारी नैतिकता दांव पर लग जाती है. उस दौरान यह भी ध्यान नहीं रहता है कि क्या सही और क्या ग़लत. दिखाई देता है तो स़िर्फ पैसा. उसके लिए भले ही किसी को अपमानित करना पड़े या फिर किसी को गाली ही क्यों न देनी पड़े. हाल में दो शराब कंपनियों के विज्ञापन के बाद भारतीय टीम के दो खिलाड़ियों में उपजा विवाद कुछ यही कहानी बयान करता है. अभी तक टीम इंडिया के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और साथी खिलाड़ी हरभजन सिंह क़रीबी दोस्त के तौर जाने जाते थे लेकिन एक विज्ञापन ने इन दोनों के बीच खाई पैदा कर दी थी, जिसकी वजह से ये एक-दूसरे के खिला़फ क़ानूनी जंग पर उतर आए थे.

अब यह क़ानूनी विवाद भले ही खत्म हो गया हो, लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि खिलाड़ियों के बीच सामंजस्य का अभाव है. अगर इनमें ज़रा भी आपसी सद्भाव होता तो दोनों इस मामले को लेकर एकजुट होते और अगर ज़रूरी होता तो अनजाने में अथवा जानबूझ कर हुई इस ग़लती को सुधारने की कोशिश करते, लेकिन ये कंपनी के कर्मचारियों जैसा व्यवहार कर रहे हैं. इन्हें इस बात का ज़रा भी एहसास नहीं है कि खेल और खिलाड़ी ही इनका साथ हमेशा देंगे, न कि ये शराब बनाने वाली कंपनियां.

दरअसल, एक शराब कंपनी का विज्ञापन पिछले कुछ दिनों से टीवी पर प्रसारित हो रहा था. इसमें धोनी के अवतरित होने से पहले एक सिख युवक ब़डे-ब़डे गोले बना रहा होता है कि उसी बीच उसके पिता उसे थप्पड़ रसीद कर गाली देते हुए कहते हैं (कुछ गालियां बीप भी की जाती हैं) कि इतने ब़डे-ब़डे गोले क्यों बना रहा है तो जवाब में वह सिख युवक कहता है कि आई एम मेकिंग लार्ज…बस यहीं से धोनी कहते हैं कि ब़डा करने से कुछ नहीं होगा, कुछ अलग करो. इस बात से अब सभी वाक़ि़फ हो चुके हैं कि यह विज्ञापन हरभजन के ही विज्ञापन का स्पूफ था और थप्प़ड खाने वाला वह युवक हरभजन से मिलता-जुलता चरित्र. इस स्पूफ में मैक्डॉवेल के विज्ञापन में धोनी प्रतिद्वंद्वी कंपनी परनॉड रिकॉर्ड के ब्रांड रॉयल स्टैग के विज्ञापन में हरभजन की भूमिका का मजाक उड़ाते दिख रहे थे. बस जैसे ही यह विज्ञापन हरभजन और उनके परिवार ने देखा, उन्हें इस पर आपत्ति हो गई. हरभजन और उनके वकील देवानी एसोसिएट्स एंड कंसल्टेंट्स ने विजय माल्या की यूबी स्पिरिट्स को मैक्डॉवेल नंबर वन प्लेटिनम व्हिस्की के उस विज्ञापन के लिए नोटिस भेज दिया. इसमें कहा गया है कि मैक्डॉवेल नंबर वन का धोनी वाला विज्ञापन हरभजन, उनके परिवार और सिख समुदाय का मजाक है.

नोटिस की एक कॉपी ईटी के पास मौजूद है. इसमें सभी बड़े समाचारपत्रों और टीवी चैनलों में भज्जी के परिवार से बिना शर्त सार्वजनिक माफी मांगने के अलावा नोटिस मिलने के तीन दिन के अंदर विज्ञापन हटाने की मांग की गई थी. नोटिस में कहा गया कि यूबी अपनी प्रसारण/विज्ञापन एजेंसी को उक्त विज्ञापन का प्रसारण तुरंत रोकने का निर्देश दे. वकील श्याम देवानी के हस्ताक्षर वाले नोटिस में कहा गया था कि मेरे क्लाइंट ने आपको ग़लती मानने और संशोधन करने का मौक़ा देने के लिए नोटिस भेजा है. इसमें असफल रहने पर हमारे पास क़ानूनी कार्रवाई करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा. नोटिस खर्च के हर्जाने के तौर पर हरभजन के परिवार को एक लाख रुपये देने की भी मांग की गई है. नोटिस भज्जी की मां अवतार कौर ने भेजा था. इसमें कहा गया है कि भज्जी वाली विज्ञापन फिल्म सा़फ है, अच्छी है और इससे किसी की भावनाओं को ठेस नहीं लगती. जबकि दूसरा विज्ञापन उनके परिवार की प्रतिष्ठा और साख को नुकसान पहुंचाने वाला है.

हरभजन की ओर से भिजवाए गए क़ानूनी नोटिस के जवाब में विजय माल्या ने सा़फ कर दिया था कि वह किसी भी सूरत में विज्ञापन वापस नहीं लेंगे. माल्या ने हरभजन सिंह से किसी भी क़ीमत पर मा़फी मांगने से इंकार कर दिया था. माल्या ने कहा कि वह भज्जी के लीगल नोटिस का जवाब अब क़ानून से ही देंगे. उनका इरादा भज्जी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं था और उन्होंने अपने विज्ञापन में उनका कोई मज़ाक नहीं उड़ाया है. इसलिए वह अपना विज्ञापन वापस नहीं लेंगे. माल्या ने तर्क दिया था कि बहुत सारे न्यूज चैनलों में नेताओं-अभिनेताओं का मज़ाक उड़ाया जाता है तो क्या उन सभी को नोटिस भेज दिया जाता है. जब वहां वैसा नहीं होता तो विज्ञापन जगत में ऐसा कैसे हो सकता है. मेरे वकील भज्जी के नोटिस को पढ़ रहे हैं, जो उचित होगा, वह किया जाएगा. जबकि माल्या की प्रतिद्वंद्वी कंपनी के मुताबिक़ उसने हरभजन सिंह को क़ानूनी कार्रवाई की सलाह नहीं दी थी, लेकिन अब अगर भज्जी ने यह क़दम उठा लिया है तो वह उनका हर तरीक़े से सपोर्ट करेगी. लेकिन इसी बीच शायद विजय माल्या को इस बात का इल्म हो गया कि इस विज्ञापन से न स़िर्फ हरभजन के प्रशंसकों में उनकी साख गिरेगी बल्कि उनकी आईपीएल टीम का बिज़नेस भी प्रभावित हो सकता है. इसलिए उन्होंने इस विज्ञापन को वापस लेने का फैसला ले लिया. लेकिन माल्या के सुर बदलने के पीछे का सही कारण यह तो कतई नहीं है कि उन्हें अपनी इस करनी पर कोई अ़फसोस है. वह प्रोफेसनल बिज़नेसमैन हैं और उनको पब्लिसिटी बटोरना बहुत अच्छी तरह से आता है. अब इस विज्ञापन का प्रसारण भले ही बंद हो गया हो लेकिन इस बात से तो कोई इंकार नहीं कर सकता है कि जितने दिन भी यह विज्ञापन प्रसारित हुआ है, उससे हरभजन की छवि को जो नुक़सान होना था, वो हो चुका है. और साथ ही माल्या को एक विज्ञापन के माध्यम से जो चर्चा मिलनी थी, वो भी मिल गई, अब ऐसे में अब विज्ञापन के प्रसारण को रोकने का कोई विशेष औचित्य नहीं है.


इस बात से धोनी भी इंकार नहीं कर सकते कि उन्हें पता नहीं था कि इस विज्ञापन में हरभजन का मज़ाक उड़ाया जा रहा है. ज़ाहिर है, ऐसे में अगर धोनी में ज़रा भी नैतिकता होती तो टीम के प्रति सद्भावना दिखाते हुए वह इस तरह के विज्ञापन में काम करने से मना कर सकते थे. ऐसा तो है नहीं कि धोनी अगर इसमें काम करने से इंकार कर देते तो उनसे यह विज्ञापन ही छीन लिया जाता.

धोनी अगर वह हरभजन की भावनाओं का ख्याल करते हुए स्क्रिप्ट में बदलाव की मांग करते तो आज यह विवाद पैदा ही नहीं होता, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. इससे कई बातें स्पष्ट होती हैं. पहली बात तो यह कि धोनी को अपने साथी खिलाड़ियों की इज़्ज़त करनी नहीं आती है और दूसरी बात यह कि वह खेल से ज़्यादा पैसे और ग्लैमर को तवज्जो देते हैं. इस मसले में उन्हें सचिन तेंदुलकर से सीख लेनी चाहिए. ग़ौरतलब है कि धोनी इससे पहले भी शराब कंपनी को प्रमोट करने के चक्कर में कई शहरों में विरोध का सामना कर चुके हैं. यह तो खैर मनाइए कि टीम इंडिया आजकल सफलता के चरम पर है, ऐसे में इन खिलाड़ियों को मनमानी करने का मौक़ा मिल जाता है, वरना अब तक बोर्ड इनके खिला़फ अनुशासनसत्मक कार्यवाही कर चुका होता. ताज्जुब की बात यह है कि अभी तक धोनी ने औपचारिक तौर पर ही सही, इस मसले पर कोई टिप्पणी नहीं की है. इससे इतना तो सा़फ है कि कहीं न कहीं धोनी को एहसास हो गया है कि हरभजन सिंह के साथ ग़लत हुआ है.

अब यह क़ानूनी विवाद भले ही खत्म हो गया हो, लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि खिलाड़ियों के बीच सामंजस्य का अभाव है. अगर इनमें ज़रा भी आपसी सद्भाव होता तो दोनों इस मामले को लेकर एकजुट होते और अगर ज़रूरी होता तो अनजाने में अथवा जानबूझ कर हुई इस ग़लती को सुधारने की कोशिश करते, लेकिन ये कंपनी के कर्मचारियों जैसा व्यवहार कर रहे हैं. इन्हें इस बात का ज़रा भी एहसास नहीं है कि खेल और खिलाड़ी ही इनका साथ हमेशा देंगे, न कि ये शराब बनाने वाली कंपनियां. जिस दिन इनके सितारे बुलंदी पर नहीं होंगे तो सबसे पहले साथ छो़डने वालों में इन कंपनियों का ही नाम आएगा. राहुल द्रव़िड और गांगुली इस बात के जीते-जागते उदाहरण हैं. अगर इन खिलाड़ियों में ज़रा सी भी नैतिकता है तो इन्हें यह समझने में देर नहीं करनी चाहिए कि पैसा और ग्लैमर खेल और साथी खिलाड़ियों से बढ़कर नहीं है.

ब्रांड वॉर कोई नई बात नहीं

इससे पहले भी कई एड वॉर के चक्कर में सेलिब्रिटी और खिलाड़ी आपस में उलझ चुके हैं. कुछ दिनों पहले आमिर की फिल्म डेल्ही बैली में एक कार का कथित रूप से मज़ाक उड़ाए जाने पर विवाद खड़ा हो गया था. आरोप था कि फिल्म में जानबूझ कर उस कार का इस्तेमाल किया गया है, क्योंकि एक अन्य हीरो (शाहरु़ख खान) इस कंपनी की कार का प्रचार करते हैं. कंपनी अपनी कार को कथित तौर पर अनादरपूर्ण तरीक़े से दिखाए जाने के लिए डेल्ही बेली के निर्देशक एवं प्रोडक्शन हाउस के खिला़फ क़ानूनी कार्यवाही करने की सोच रही थी. इसके अलावा माइक्रोसॉफ्ट ने एक विज्ञापन अभियान भी शुरू किया, जिसमें एप्पल के आईफोन और गूगल के एंड्‌रॉयड सिस्टम की खिल्ली उड़ाई गई है. यूट्यूब पर डाले गए इस विज्ञापन में प्रतियोगियों का मज़ाक उड़ाते हुए दिखाया गया है कि कुछ फोन की डिजाइन खराब होने के कारण उपभोक्ताओं में खराब आचार-व्यवहार को बढ़ावा मिल रहा है. माइक्रोसॉफ्ट ने इस अभियान में लोकप्रिय टीवी कलाकार रॉब डायर्डेक और अभिनेत्री मिंका केली को शामिल किया है. ऐसा ही वाकया डिटर्जेंट कंपनियों के मामले में दिखाई दिया. जब हिंदुस्तान यूनीलीवर लिमिटेड (एचयूएल) के प्रोडक्ट रिन डिटर्जेंट और प्रॉक्टर एंड गैंबल (पी एंड जी) कंपनी के प्रोडक्ट टाइड डिटर्जेंट के विज्ञापन ने ब्रांड वॉर छेड़ दिया था. उस दौरान भी पी एंड जी ने एचयूएल के खिला़फ याचिका दायर कर दी थी. इस मामले में समीक्षा मार्केटिंग कंसल्टेंट्स के चीफ एक्जीक्यूटिव ऑफिसर जगदीप कपूर कहते हैं, मुझे लगता है कि इस तरह आपा नहीं खोना चाहिए. यह व़क्त ही ब्रांड वॉर का है, फिर इस तरह आगबबूला होने का कोई मतलब नहीं. यदि किसी ब्रांड पर ऐसे हमले हो रहे हैं तो उसे शांतिपूर्वक लेना चाहिए. इसे स्वस्थ प्रतियोगिता के नज़रिए से देखा जाए तो इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है.

Monday, July 25, 2011

टेस्ट सीरीज भारत–वेस्टइंडीज : जीते हैं पर शान से नहीं


वेस्टइंडीज दौरे पर टीम इंडिया ने सीरीज अपने नाम कर फतह तो हासिल कर ली, लेकिन कई मायने में इस जीत को का़फी फीकी कहा जा सकता है. फीकी इसलिए, क्योंकि जिस मुक़ाम और रैंकिंग पर टीम इंडिया आज ख़डी है, उस जगह पर इस टीम से कंप्रोमाइज करने की उम्मीद शायद किसी को नहीं थी. वेस्टइंडीज के आखिरी टेस्ट मैच में धोनी ने जिस तरह 90 गेंदों में 86 रन बनाने को ब़डी चुनौती मानते हुए मैच को ड्रा के अंजाम तक पहुंचाया, वह कहीं न कहीं इस बात की तऱफ इशारा करता है कि टीम इंडिया में अभी भी वर्ल्ड चैंपियन वाला कॉन्फिडेंस पैदा नहीं हुआ है. अजीब बात है, एक तऱफ हम वर्ल्ड चैंपियन होने का दावा करते हैं, वहीं दूसरी तऱफ हम इतना जोखिम भी नहीं ले सकते कि 90 गेंदों में 86 रन बनाने के लिए अपने खिलाडि़यों को मैदान पर उतारें. या फिर इसे यूं कहें कि धोनी को आधी से ज़्यादा टीम पर इतना भी भरोसा नहीं था कि वह इस लक्ष्य को पा सकेगी. इसलिए जल्दी-जल्दी में सीरीज अपने नाम करने के चक्कर में धोनी ने मैच ड्रा करा दिया.

टी-20 के दौर में अगर 15 ओवरों में 86 रन भी बनाने का माद्दा आपमें नहीं है तो फिर आपको किस आधार पर वर्ल्ड चैंपियन का खिताब हासिल है. निश्चित तौर पर धोनी के इस फैसले से क्रिकेट प्रेमियों को निराशा हुई होगी. आ़खिरी टेस्ट मैच में कोई भी इस बात से इत्ते़फाक़ नहीं रखता होगा कि केवल तीन विकेट खोने के बाद 90 गेंदों में 86 रनों का लक्ष्य पाने के लिए आपकी लगभग पूरी टीम ड्रेसिंग रूम में बैठी है और जीत के लिए आप आगे बढ़ने के बजाय ड्रा करने का फैसला कर लें. ड्रा करने का फैसला तो ज़्यादातर हारने वाली टीम लेती हैं. मैच के आ़खिरी दिन वेस्टइंडीज़ ने अपनी दूसरी पारी में छह विकेट पर 224 रनों से आगे खेलना शुरू किया था और चंद्रपाल ने अपना शतक पूरा किया, जिसके लिए उन्हें मैन ऑफ द मैच के खिताब से भी नवाज़ा गया, लेकिन अगर भारत ने पूरा मैच खेला होता तो मैन ऑफ द मैच का दावेदार भारत भी हो सकता था. इसके साथ ही जीत का स्वाद भी बढ़ सकता था, लेकिन धोनी को शायद अपने रिकॉर्ड की चिंता ज़्यादा थी. वह अपनी कप्तानी में जीत का औसत कम नहीं करना चाहते थे. वेस्टइंडीज ने पहली पारी में 204 रन बनाने के बाद दूसरी पारी में 322 रन बनाए थे. भारत की दूसरी पारी की शुरुआत अच्छी नहीं रही और अभिनव मुकुंद को पहली ही गेंद पर एडवर्डन ने पगबाधा आउट कर दिया. इसके बाद राहुल द्रविड़ और मुरली विजय ने पारी को संभाला. विजय ने 45 रन बनाए, वहीं द्रविड़ 34 बनाकर क्रीज पर डटे हुए थे. विजय के आउट होने के बाद रन गति तेज़ करने के लिए रैना को भेजा गया, लेकिन वह 8 रन बनाकर ही आउट हो गए.

 द्रविड़ और लक्ष्मण टिक कर खेल रहे थे, उसी दौरान मैच को ड्रा मान लेने का फ़ैसला किया गया. नतीजतन, भारत-वेस्टइंडीज के बीच खेला गया तीसरा और आखिरी टेस्ट मैच बिना किसी हार-जीत के समाप्त हो गया. अगर भारतीय गेंदबाज़ चाहते तो इस मैच का नतीजा निकल सकता था, लेकिन भारतीय कप्तान में जीत का वह जज्बा और आत्मविश्वास ही नहीं दिख रहा था, जिससे लगे कि वह सीरीज पर पूरी तरह क़ब्ज़ा करना चाहते हैं. वहीं वेस्टइंडीज की तऱफ से चंद्रपाल और क्रिक ने अपनी टीम को हार से बचा लिया. दोनों ने मिलकर चौथे विकेट के लिए 161 रनों की भागीदारी निभाई. भारत के तेज़ गेंदबाज़ ईशांत शर्मा को उनके ज़बर्दस्त प्रदर्शन के लिए मैन ऑफ द सीरीज चुना गया. ईशांत ने आ़खिरी टेस्ट में छह विकेट लिए, जबकि पूरी सीरीज़ में उन्होंने 23 विकेट लिए. कप्तान धोनी ड्रा करने के फ़ैसले को सही ठहराते हुए कह रहे थे कि खेलने का फैसला जोखिम वाला होता, क्योंकि अगर हम हारते तो पूरी सीरीज़ की जीत खतरे में पड़ जाती. इसलिए हमने ड्रा करने का फ़ैसला स्वीकार किया. अगर धोनी खुद क्रीज पर आते, उन्होंने द्रविड़ का साथ होता और उनके बाद भी कई बल्लेबाज़ अगर मान लिया जाए कि औसतन 10-15 रन भी बनाते तो क्या मैच जीता नहीं जा सकता था. इस बात पर धोनी को मंथन करने की ज़रूरत है, क्योंकि टेस्ट में जीत के ऐसे मौके कम ही आते हैं. ड्रा करना कोई शान की बात नहीं होती है और न ही ड्रा करने का तरीक़ा इतनी आसान परिस्थितियों में लिया जाता है.

ड्रा तो कप्तान को उस समय करना चाहिए, जब उसे लगे कि मैच जीतना अब नामुमकिन सा है. इस आ़खिरी टेस्ट मैच में कोई भी इस बात से इत्ते़फाक़ नहीं रखता होगा कि केवल तीन विकेट खोने के बाद 90 गेंदों में 86 रनों का लक्ष्य पाने के लिए आपकी लगभग पूरी टीम ड्रेसिंग रूम में बैठी है और जीत के लिए आप आगे बढ़ने के बजाय ड्रा करने का फैसला कर लें. ड्रा करने का फैसला तो ज़्यादातर हारने वाली टीम लेती हैं. इसका मतलब यह मान लेना चाहिए कि धोनी कहीं न कहीं हार के मानसिक दबाव में होंगे और उन्होंने जीतने की सोची ही नहीं. यहां पर धोनी को वर्ल्ड चैंपियन ऑस्ट्रेलिया से सबक़ लेना चाहिए. अगर आपको बादशाहत क़ायम रखनी है तो विपक्षी टीम को पूरी तरह से रौंदना होगा, लेकिन जो जीत धोनी ने वेस्टइंडीज पर हासिल की है, उसमें वह बात नहीं दिखाई देती. इस जीत के लिए तो यही कहा जा सकता है कि जीते तो मगर शान से नहीं. - See more at: http://www.chauthiduniya.com/2011/07/test-series-india-west-do-not-live-in-luxury-on.html#sthash.c67396Td.dpuf

टीम इंडियाः सब कुछ ठीक नहीं है


पिछले दिनों भारत ने जब विश्व कप जीता तो लगा कि टीम इंडिया अपने बेहतरीन दौर में चल रही है, लेकिन अब लगता है कि सब कुछ बदल गया है. इस वक़्त टीम इंडिया विवादों और संकटों के ऐसे दलदल से गुज़र रही है, जिसमें लगभग हर खिलाड़ी फंसा हुआ है. कुछ दिनों पहले ख़बर आई थी कि वेस्टइंडीज़ दौरे के लिए जाने वाली भारतीय टीम में वीरेंद्र सहवाग भाग नहीं लेंगे. उसके बाद ख़बर आई कि सांस की शिकायत को लेकर युवराज़ भी इस दौरे से छुट्टी चाहते हैं. यहां तक तक तो सब ठीक था, लेकिन उसके बाद ख़बर आती है कि सचिन तेंदुलकर ने अपने परिवार के साथ छुट्टी मनाने के लिए इस दौरे पर न जाने का फैसला किया है. पता चला कि धीरे-धीरे करके सभी दिग्गज इस दौरे से दूर होते जा रहे हैं. इतना सब होने के बाद गौतम गंभीर को कप्तान और सुरेश रैना को उप कप्तान बनाकर टीम इंडिया को वेस्टइंडीज़ के लिए रवाना करने की बात तय करके सभी अटकलों पर विराम लगाने की कोशिश की गई,
लेकिन असली धमाका होना अभी बाक़ी था. ठीक उसी वक़्त एक और बम फटा, जब वर्तमान कप्तान गौतम गंभीर ने अपने कंधे की चोट की दुहाई देते हुए इस दौरे से ख़ुद को दूर रखने की घोषणा कर दी. फिर क्या था, सीन यह बना कि एक-एक करके टीम इंडिया के सभी खिलाड़ियों ने वेस्टइंडीज़ दौरे से तौबा कर ली. धीरे-धीरे करके सभी दिग्गज इस दौरे से दूर होते जा रहे हैं. इतना सब होने के बाद गौतम गंभीर को कप्तान और सुरेश रैना को उप कप्तान बनाकर टीम इंडिया को वेस्टइंडीज़ के लिए रवाना करने की बात तय करके सभी अटकलों पर विराम लगाने की कोशिश की गई, लेकिन असली धमाका होना अभी बाक़ी था.
ठीक उसी वक़्त एक और बम फटा, जब वर्तमान कप्तान गौतम गंभीर ने अपने कंधे की चोट की दुहाई देते हुए इस दौरे से ख़ुद को दूर रखने की घोषणा कर दी. अब यह इतना बड़ा संयोग तो हो नहीं सकता कि सभी खिलाड़ी एक साथ कोई न कोई बहाना करके छुट्टी ले लें. जरूर कोई न कोई खिचड़ी पक रही है. कहीं ऐसा तो नहीं है कि टीम इंडिया के अंदर कोई नई कलह शुरू हो गई हो. वेस्टइंडीज़ दौरे से दूरी की दूसरी वजह यह भी हो सकती है, जो खिलाड़ियों के मुताबिक़ है, यह कि वे लगातार होने वाले क्रिकेट से इतने थक गए हैं कि इसके अलावा उनके पास कोई रास्ता ही नहीं बचता. अगर ऐसा है तो और भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं. मसलन, खिलाड़ी अगर ज़्यादा क्रिकेट से इतने थक गए हैं तो उन्होंने बोर्ड को इस बात की सूचना क्यों नहीं दी. दूसरी बात, अगर कोई खिलाड़ी चोटिल है तो फिर आईपीएल तक इस बात को छिपाकर रखने की क्या ज़रूरत थी. उससे पहले भी इलाज कराया जा सकता था. जैसा कि गंभीर के बारे में कहा जा रहा है. आलोचकों के मुताबिक़, आईपीएल में ज़्यादा से ज़्यादा पैसा कमाने के चक्कर में कई खिलाड़ियों ने अपनी चोटें छिपाईं, जिसका असर अब वेस्टइंडीज़ दौरे में दिखाई दे रहा है. अगर इन बातों में ज़रा भी सच्चाई है तो टीम इंडिया में सब कुछ ठीक नहीं है. दरअसल, यह सारा मामला तब प्रकाश में आया, जब यह घोषणा हुई कि इंडियन प्रीमियर लीग के तुरंत बाद वेस्टइंडीज में होने वाली एकदिवसीय और 20-20 सीरीज में सचिन तेंदुलकर, महेंद्र सिंह धोनी, युवराज सिंह, वीरेंद्र सहवाग, गौतम गंभीर और ज़हीर ख़ान नहीं खेलेंगे. ऐसा पहली बार हो रहा है कि बड़े खिलाड़ियों ने टीम इंडिया से इस तरह पल्ला झाड़ा है. इन हालात में अब टीम की कमान युवा खिलाड़ी सुरेश रैना के हाथ में होगी. वेस्टइंडीज़ जा रही भारतीय टीम इस बार पूरी तरह युवा है. मज़े की बात यह है कि इस टीम में हरभजन सिंह को छोड़कर एक भी वरिष्ठ खिलाड़ी नहीं है. चयन के बाद एकदिवसीय टीम में मनोज तिवारी और शिखर धवन को शामिल किया गया है. युवराज और गंभीर ने ऐसा क्यों किया वेस्टइंडीज़ दौरे पर गौतम गंभीर के खेलने के संशय को लेकर बीसीसीआई चिंतित थी कि अचानक युवराज सिंह ने भी उसे एक करारा झटका दे दिया. वेस्टइंडीज जाने वाली टीम इंडिया में हरफनमौला खिलाड़ी युवराज सिंह का नाम नदारद है, क्योंकि उन्होंने बीसीसीआई को सूचित किया है कि तबियत ख़राब होने के चलते वह दौरे पर टीम के  साथ नहीं जा सकते.
उन्होंने बीसीसीआई को बताया कि उनके फेफड़े में संक्रमण है. इससे उबरने के लिए कम से कम 15-20 दिनों का आराम चाहिए. युवराज सिंह ने 21 मई को दिल्ली डेयर डेविल्स के ख़िला़फआईपीएल में अंतिम मैच खेला था. उल्लेखनीय है कि दौरे के लिए गौतम गंभीर का चयन पहले से संदिग्ध है. गंभीर पर आरोप है कि वह चोट के बावजूद आईपीएल खेले. उन्हें कंधे में चोट के चलते आराम की ज़रूरत बताई गई है. अगर इन दोनों खिलाड़ियों की ग़ैर मौजूदगी रही तो तो टीम इंडिया के ज़्यादातर बड़े खिलाड़ी इस दौरे से बाहर ही रहेंगे. सचिन, धोनी, ज़हीर, नेहरा और सहवाग पहले ही वेस्टइंडीज़ जाने से मना कर चुके हैं. टीम इंडिया के चयन को लेकर बीसीसीआई की फज़ीहत हो गई है. पिछले दस सालों में यह पहला मौक़ा है, जब उसे टीम के चयन में इतनी माथापच्ची करनी पड़ी. टीम के चार खिलाड़ी पहले ही आराम करने के लिए दौरे से छुट्टी ले चुके हैं. बची हुई टीम के कप्तान बनाए गए गौतम गंभीर भी आईपीएल की भेंट चढ़ गए और चोट के चलते टीम से बाहर हो गए. अब युवराज सिंह भी फेफड़े में इंफेक्शन को वजह बताकर दौरे से बाहर हो गए हैं. युवराज के बारे में कहा जा रहा है कि वह इस बात से नाराज़ हैं कि धोनी की जगह पहले गौतम गंभीर को कप्तान बनाया गया और गंभीर के ज़ख्मी होने के बाद अब सुरेश रैना को कप्तानी दी जा रही है. युवराज सिंह को यह कतई मंजूर नहीं कि वर्ल्डकप में अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद उनकी अनदेखी की गई और रैना को कप्तान बनाया गया. ख़ुद से इतने जूनियर खिलाड़ी की कप्तानी में युवी नहीं खेलना चाहते, इसलिए उन्होंने दौरे पर न जाने का फैसला किया. वजह बताई फेफड़े में इंफेक्शन की, जिसके बारे में उन्हें और उनके फीजियो के अलावा शायद ही किसी को पता हो. हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि गंभीर को आईपीएल में कप्तानी के लिहाज़ से यह मौक़ा दिया गया था. विश्वकप में गौतम गंभीर का प्रदर्शन बेहतर और लाजवाब था, वहीं आईपीएल में केकेआर ने उनकी कप्तानी में जमकर धमाल मचाया. केकेआर ने उनकी कप्तानी में आईपीएल के 11 मैचों में से 7 में जीत दर्ज की है. केकेआर को आईपीएल में प्रबल दावेदार के रूप में देखा जा रहा है, जबकि वहीं युवी की पुणे वारियर्स लड़ाई से बाहर हो चुकी है. वैसे यह कोई पहला मौक़ा नहीं है कि जब गंभीर को भारत की कमान दी जा रही है. इससे पहले 2010 में न्यूजीलैंड के ख़िला़फ पांच मैचों की कप्तानी गंभीर ने की थी, जिसमें भारत ने जीत दर्ज की थी. उम्मीद थी कि इस बार भी वह ऐसा ही कुछ करेंगे, लेकिन जिस तरह कप्तानी की घोषणा होने के बाद गंभीर ने अपनी चोट का  हवाला देते हुए दौरे से ख़ुद को दूर किया है, उससे तो यही लगता है कि अच्छा होता कि कप्तानी की कमान युवराज को ही दी गई होती. आईपीएल में क्यों ख़ामोश थे इस पूरे मसले पर खिलाड़ियों सहित ज़्यादातर लोगों ने यही कहकर बचाव किया कि खिलाड़ियों के इस तरह अचानक छुट्टी लेने की वजह उनका लगातार क्रिकेट खेलना और व्यस्त कार्यक्रम है. लेकिन यहां पर यह सवाल भी उठता है कि अगर खिलाड़ी अपने व्यस्त कार्यक्रम से इतने परेशान थे तो इस पर उन्होंने पहले मुंह क्यों नहीं खोला. कहीं ऐसा तो नहीं था कि उस वक़्त उन्हें पैसे कमाने की सूझ रही थी और जब आईपीएल का सीजन ख़त्म हुआ तो सबकी बारी-बारी अपनी समस्याएं निकल आईं. इसके अलावा इस घटना का एक पहलू यह भी है कि जब खिलाड़ियों पर पैसे के लिए खेलने और राष्ट्र के लिए न खेलने का आरोप लग रहा था तो उस दौरान बोर्ड का ध्यान किधर था. इससे पहले बोर्ड को यह सोचना चाहिए कि ऐसी नौबत बार-बार क्यों आ रही है. वेस्टइंडीज़ के दौरे के बाद भारतीय टीम को इंग्लैंड के दौरे पर जाना है यानी सितंबर तक भारतीय टीम का कार्यक्रम बिना रुके चलता रहेगा. इस स्थिति में अगर पुराने और अनुभवी खिलाड़ी आराम की मांग कर रहे हैं तो उनकी बात में दम दिखता है.
इस मामले में कपिल देव खिलाड़ियों का बचाव करते हुए कहते हैं कि  खिलाड़ी भी एक आम आदमी होता है, उसकी भी इच्छाएं और पसंद होती है. इसलिए बेहतर होगा कि उसे ही निर्णय लेने दें कि उसे देश के लिए खेलना है या फिर देश के किसी क्लब के लिए. अतिरिक्त दबाव से केवल परेशानी ही पैदा होती है. इसलिए मैं गुजारिश करता हूं कि अपनी हां और ना का अधिकार खिलाड़ियों के ही हाथ में रहने दें. कपिल देव ने कहा कि हम एक स्वतंत्र देश में रहते हैं. यहां हर किसी को अपने फैसले लेने का हक़ है. इसलिए मेरी नज़र में यही बेहतर होगा कि खिलाड़ी ख़ुद तय कर लें कि उन्हें क्या करना है.
बोर्ड को इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए. कपिल देव ने ये बातें उस समय कहीं, जब उनसे पूछा गया कि क्या आपको लगता है कि खिलाड़ी देश के लिए नहीं, बल्कि अपने लिए खेलते हैं. हालांकि कपिल विवादों पर टिप्पणी करने से बचते रहे. कपिल देव को इन बातों पर भी ग़ौर करने की ज़रूरत है कि ये सभी वे खिलाड़ी हैं, जो लगातार आईपीएल खेल रहे थे, लेकिन जब दौरे की बात हुई तो सब बीमार हो गए. इसे मात्र संयोग तो नहीं कहा जा सकता. होना तो यह चाहिए था कि बोर्ड इस बहस में हिस्सा ले और भविष्य में ऐसे कार्यक्रम बनाए, जिससे आईपीएल और बाक़ी अंतरराष्ट्रीय मुक़ाबलों के बीच सामंजस्य स्थापित हो सके,

Thursday, July 21, 2011

डोपिंग का जाल : सिर्फ खिलाडी और कोच दोषी नहीं




भारत के ज़्यादातर खेल पहले से ही क्रिकेट के मायाजाल में फंसकर खुद के अस्तित्व के लिए तरस रहे हैं, ऐसे में डोपिंग के बढ़ते मामलों ने उन उभरते हुए खेलों और खिलाड़ियों को हाशिए पर डालने का काम किया है, जो किसी तरह क्रिकेट के बाज़ार के बीच अपने स्वर्ण पदकों की बदौलत अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे. जिस तरह स्वर्ण पदक विजेता खिलाड़ी डोपिंग टेस्ट में एक-एक करके  असफल होते जा रहे हैं, उससे न स़िर्फ इन खिलाड़ियों की प्रतिभा पर सवालिया निशान खड़े हुए हैं, बल्कि इससे देश और संबंधित खेलों पर भी एक बदनुमा दाग़ लग गया है.

हाल में जिस तरह 8 खिलाड़ियों को डोपिंग टेस्ट में पॉजिटिव पाया गया है, उससे इतना तो साबित हो गया कि यह सिलसिला अभी रुकने वाला नहीं है. राष्ट्रीय एंटी डोपिंग एजेंसी यानी नाडा के  टेस्ट के दौरान जिन 8 खिलाड़ियों के ए सैंपल में स्टेरॉयड पाए गए हैं, उनमें धाविका सिनी जोस, जौना मूर्मू, टियाना मैरी थॉमस, लंबी कूद के हरि कृष्णन और गोला फेंक की खिलाड़ी सोनिया आदि नाम प्रमुख रूप से शामिल हैं.

ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर इस डोपिंग के लिए ज़िम्मेदार कौन है? खिलाड़ियों से पूछिए तो वे बताएंगे कि हमें तो सप्लीमेंट हमारे कोच देते हैं और हम अनजाने में इस तरह की अवैध दवाओं के शिकार हो जाते हैं. अगर यही सवाल कोच से पूछा जाता है तो उनका जवाब और भी ग़ैर ज़िम्मेदाराना होता है. उनके मुताबिक़ वे तो सारे खिलाड़ियों को सही सप्लीमेंट देते हैं, पर व्यक्तिगत जीवन में उक्त खिलाड़ी बाहर का खाना और पेय इस्तेमाल करते हैं, जिससे उनके शरीर में कुछ तत्व ऐसे आ जाते हैं, जो डोपिंग टेस्ट को पॉजिटिव बना देते हैं. यही सवाल अगर खेल मंत्रालय और फेडरेशन से पूछा जाता है तो उनका जवाब यह होता है कि इसके लिए खिलाड़ियों के कोच और उनके मार्गदर्शक ज़िम्मेदार हैं. हो सकता है कि सबके तर्क अपनी-अपनी जगह पर सही हों, लेकिन ऐसा हो क्यों रहा है और कौन कर रहा है, इस बात पर किसी को भी कोई तर्क नहीं सूझता और न कोई इसे रोकने के ठोस समाधान पर बात करता है.

कोच ही खिलाड़ियों से कहता है कि अगर आप यह दवा लेंगे तो आपका प्रदर्शन अच्छा होगा, आप दूर तक गोला फेंक पाएंगे. खिलाड़ियों को इन दवाओं के बारे में पता ही नहीं होता. तभी मैं कहता हूं कि कोचों को सज़ा मिलनी चाहिए, ताकि आगे आने वाले कोचों को सबक मिले.

- मिल्खा सिंह

हाल में जिस तरह 8 खिलाड़ियों को डोपिंग टेस्ट में पॉजिटिव पाया गया है, उससे इतना तो साबित हो गया कि यह सिलसिला अभी रुकने वाला नहीं है. राष्ट्रीय एंटी डोपिंग एजेंसी यानी नाडा के टेस्ट के दौरान जिन 8 खिलाड़ियों के ए सैंपल में स्टेरॉयड पाए गए हैं, उनमें धाविका सिनी जोस, जौना मूर्मू, टियाना मैरी थॉमस, लंबी कूद के हरि कृष्णन और गोला फेंक की खिलाड़ी सोनिया आदि नाम प्रमुख रूप से शामिल हैं. ग़ौरतलब है कि सिनी जोस ने राष्ट्र मंडल और एशियाई खेलों की 4 गुना 400 मीटर रिले में पिछले वर्ष स्वर्ण पदक जीता था. सिनी, जौना, हरि कृष्णन और सोनिया के यूरिन सैंपल्स में मेथनडाइनोन पाया गया, जबकि टियाना के सैंपल में एपिमैथानडियॉल पाया गया. नतीजतन, इन सभी खिलाड़ियों को अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया गया है. नाडा अभी भी कई नमूनों की जांच कर रहा है. उम्मीद लगाई जा रही है कि इस टेस्ट में अभी कई खिलाडि़यों के नाम सामने आ सकते हैं. भले ही हम कुछ खिलाड़ियों पर अस्थायी निलंबन की कार्यवाही करें या फिर किसी विदेशी कोच को ब़र्खास्त कर दें.

ज़्यादातर खिलाडी़ बहुत ज़्यादा प़ढे-लिखे नहीं होते हैं, उनके कोच उन्हें जो भी देते हैं, वे उन पर विश्वास करके ले लेते हैं. इसलिए डोपिंग के लिए खिला़डियों को दोष देना सही नहीं है.  मैं ऐसे कई ला़डकियों को जानती हूं , जिन्होंने यह बात खुद मुझे बताई है.

- साइना नेहवाल



किसी विदेशी कोच को ब़र्खास्त करने और आगे से ऐसे किसी भी कोच की सेवा न लेने का फैसला का़फी हास्यास्पद है. क्या कोई इस बात की गारंटी ले सकता है कि देशी कोच की मौजूदगी में इस तरह के मामले सामने नहीं आएंगे? पिछले कुछ सालों से भारत में डोपिंग के मामलों में बढ़ोत्तरी को देखते हुए सरकार ने राष्ट्रीय एंटी डोपिंग एजेंसी यानी नाडा का गठन किया था. यह संस्था का़फी हद तक सफल भी रही. मई 2010 से लेकर अब तक यानी 11 महीनों के दौरान 122 खिलाड़ी डोपिंग टेस्ट में पॉजिटिव पाए गए. इनमें अधिकतर पहलवान और भारोत्तोलक हैं. इसके अलावा वर्ष 2010 में अगस्त तक नाडा ने 2047 एथलीटों के नमूने लिए थे, जिनमें 103 एथलीट विभिन्न प्रतिबंधित पदार्थ सेवन करने के दोषी पाए गए. इनमें कुछ जूनियर खिलाड़ी भी शामिल हैं. हाल में राष्ट्र मंडल खेलों की टीम में शामिल 18 खिलाड़ी भी डोपिंग के दोषी पाए गए, जिनमें 12 खिलाड़ी मिथाइलहेक्सानेमाइन के सेवन के दोषी पाए गए.

जिस तरह नाडा अपना काम कर रही थी, उसे देखकर तो ऐसा लग रहा था कि डोपिंग के शिकंजे से खिलाड़ियों को छुड़ाना अब आसान हो गया है, लेकिन इस वाक़िये ने एक बार फिर इस बात पर मुहर लगा दी है कि कहीं न कहीं कुछ तो ग़डब़ड है. मामलों को ब़ढता देख अब टेस्ट के अलावा ड्रग्स की धोखेबाज़ी को पकड़ने के लिए एनएडीए खिलाड़ियों के  घरों पर भी छापा मारने की बात कही जा रही है. असल में छापा मारने की कवायद नाडा ने एक ऑस्ट्रेलियाई मॉडल के आधार पर तय की है, जिसके तहत किसी भी खिलाड़ी के घर अचानक छापा मारा जा सकता है. ऑस्ट्रेलिया ने इस मुद्दे पर बहुत प्रभावी काम किया है, लेकिन इस बात की गारंटी कोई भी नहीं दे रहा है कि यह मॉडल नाडा से कितना बेहतर साबित होगा. कहीं ऐसा न हो कि छापेमारी चलती रहे और खिलाड़ियों के टेस्ट पॉजिटिव आते रहें. अगर फेडरेशन वाक़ई इस संकट से निजात चाहता है तो वह पहले खिलाड़ियों और उनके कोचों की दलीलों में न फंसकर गंभीरता से जांच करे कि खिलाड़ियों के भोजन, पेय और सप्लीमेंट तक आखिर ये प्रतिबंधित पदार्थ पहुंचते कहां से हैं? साथ ही वह खिलाड़ियों को यह संदेश भी दे कि वे अपना प्रदर्शन बेहतर बनाने के  लिए प्रदर्शन बढ़ाने वाली दवाइयों पर आश्रित होने के बजाय अभ्यास और कड़ी मेहनत पर ज़ोर दें. अन्यथा ये खिलाड़ी फिर किसी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए विदेश जाएंगे और प्रतिबंधित दवाओं के सेवन के आरोप में वापस भेज दिए जाएंगे. अभी मामला घर में है, यहीं सुलझा लिया जाए और इस डोपिंग के जिन्न के असली आक़ा को पकड़ा जाए तो बेहतर होगा.



डोपिंग के शिकार खिलाडी़

नाम                                       सज़ा                                        खेल
विली मेस                              20 साल आठ महीने                      बेसबॉल
मेल हॉल                              45 साल                                      बेसबॉल
ऐडी जॉन्सन                      आजीवन प्रतिबंध                      बास्केटबॉल
फ्लोड मेवेदर सी.                      5 साल                                       बॉक्सिंग
माइक टाइसन                      3 साल                                       बॉक्सिंग
मिसी जिवो                              6 महीने                                       साइक्लिंग
स्टीव डर्बानो                      7 साल                                       आइस हॉकी
इवेंजोलोस गाउसिस              20 साल                                       मार्शल आर्ट
वाइस ली                              12 साल                                       मोटर स्पोर्ट
जे एडम्स                              2 साल 6 महीने                      स्केटबोर्डिंग
सिलिवीनो फ्रेंसिस्को              3 साल                                      स्नूकर
क्रिस्टोस लैकोवोस              5 साल                                       भारोत्तोलन

इनके अलावा और कई ऐसे खिला़डी हैं जिन्हें बाद में डोपिंग टेस्ट में फेल पाए जाने पर उनके गोल्ड मेडल्स तक वापस छीन लिए गए हैं.