Wednesday, May 15, 2013

जैविक खेती - समय की जरूरत





क्या जैविक खेती से इतनी खाद्य सामग्री पैदा हो सकती है जिससे दुनिया भर का पेट भरा जा सके. जर्मनी में एक नई किताब फूड क्रैश- हम जैविक जीवनयापन कर पाएंगे या फिर बिल्कुल नहीं आई है, इसके लेखक फेलिक्स प्रिंस सू लौएवेनश्टाइन, जो जर्मन जैविक खाद्य संघ के प्रमुख हैं इस बात का समर्थन करते हैं. उनके मुताबिक जो खेती कीटनाशक और रसायनिक खादों से मुक्त हो, उस तकनीक से पैदा हाने वाली फसल  पूरी दुनिया का पेट भरा जा सकता है. यह बात सिर्फ जर्मनी में ही नहीं बल्कि बल्कि दुनिया के हर उस कोने में कही जा रही है. जो जैविक खेती अपना रहे हैं और इससे होने वाले फायदे देख रहे हैं. भारत के परिपेक्ष्य में भी यही बात लागू होती है. असल में खेती पहले भी होती थी पर तब रासायनिक खाद और जहरीले कीटनाशक उपलब्ध नहीं थे. तब गोबर किसानों के लिए बेहतर खाद का काम करता था. नीम और हल्दी उनके लिए प्रभावी कीटनाशक थी, लेकिन बाद में रासायनिक खाद और कीटनाषकों ने खेती को घाटे का सैदा बना दिया पर अब ऐसा नहीं है एक बार फिर से किसानों की समझ में आ गया है कि रासायनिक खाद और कीटनाशक का इस्तेमाल करने का नतीजा क्या होता है, और प्राकृतिक तरीके से बगैर किसी रासायनिक खाद, कीटनाशक और उर्वरक के इस्तेमाल के पैदा किए गए खाद्यान्न सेहत के लिए कितने लाभकारी हैं. षायद इसीलिए आज  भरत के गांवों में जैविक खेती के प्रति दिलचस्पी लगातार बढती जा रही है. अगर ये बढोतरी यो ही रही तो आने वाले दिनों में भारत विश्व स्तर पर जैविक खेती में निश्चित तौर पर नए आयाम स्थापित करेगा और एक बार फिर से कर अपने खेतों में हरा सोना पैदा करेगा.

जमीन और किसान दोनों के लिए सेहतमंद
जैविक खेती से अनाज के पैदावार में तो बढोेतरी हुई ही साथ में मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार से किसानों की परोक्ष आमदनी में भी इजाफज्ञ हुआ है. जैविक खेती के माध्यम से सूखे जैसी स्थितियों से भी निपटा जा सकता है, क्योंकि जैविक खेती में फसलों की सिंचाई के लिए पानी की ज्यादा जरूरत नहीं पड़ती. जैविक खेती से मिट्टी की पौष्टिकता बढ़ती है और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित रहती है.  इस तकनीक का इस्तेमाल करने वाले किसानों की संख्या भी लगातार बढ रही है, पिछले पांच सालों के मुकाबले में बाजार में यह आर्गेनिक फूड पहले की तुलना में कहीं ज्यादा मात्रा में उपलब्ध है.  जैविक खेती पैदावार, बचत और स्वास्थ्य के नजरिए से भी किसानों और जमीन दोनों के लिए लिए फायदेमंद है. लिहाजा किसान जैविक खेती की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं. इससे न सिर्फ पैदावार बढ़ती है, बल्कि उत्पादों की गुणवत्ता में भी बेतहाशा इजाफा होता है. इतना ही नहीं, जैविक खेती करने वाले किसानों की फसलों को अन्य फसलों की तुलना में कीमतें भी ज्यादा मिलती हैं, जिससे किसान आर्थिक रूप से भी संपन्न बनता है. फिलहाल देश खाद्यान्न की कमी से भी जूझ रहा है. खाद्य पदार्थों की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं. साथ ही हर साल खाद्यान्न की बर्बादी भी हो रही है. यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन जैविक खेती के जरिए इस बर्बादी को नियंत्रित किया जा सकता है. इसकी वजह यह है कि ऑर्गेनिक फूड लंबे समय तक खराब नहीं होते. उनके संरक्षण के लिए विशेष उपायों की आवश्यकता नहीं पड़ती.

देषी प्रजाति को बढावा
जैविक खेती से किसानो ंका भला तो ही रहा है लेकिन साथ में फसलो ंऔश्र देषी प्रजातियों की गुणवत्ता और पौश्टिकता को लेकर भी कई  ा सकारात्म्क परिणाम  देखने को मिले हैं. जैविक खेती का सबसे बडा फायदा तो यह हुआ है कि देशी प्रजाति के अनाज की खेती को बढावा मिला है. अब तक आम किसान संकर किस्म के बीजों का इस्तेमाल कर रहा था, लेकिन जैविक खेती करने वाले किसानों ने बेहतर परिणाम के लिए फिर से देशी किस्म के अनाजों का उत्पादन करना शुरु कर दिया. इसके अलावा, जैविक अनाज स्वास्थ्य की दृष्टि से भी काफी फायदेमंद होता है. अच्छा स्वास्थ्य पाने के लिए अब लोग मोटे अनाज की ओर आकर्षित हुए हैं. जैविक अनाज की शुद्धता और स्वाद का कोई जोड नहीं है और यह अनाज पेट के रोगों के लिए खासा कारगर साबित हुआ है. वैसे ही मधुमेह के रोगियों के लिए भी मोटा अनाज फायदेमंद साबित हुआ है.


पर्यावरण की सुरक्षा
इस बात ये तो इंकार नहीं किया जा सकता है कि हाल के दिनो ंमें बढती जनसंख्या और प्रदूशण ने पर्यावरण को दुनिया भर में चिंता का विशय बना दिया है.  आए दिन कोई न कोई बैठक अंतरराश्ट्रीय स्तर पर प्र्यावरण को बचाने के लिए होती रहती है. ग्लोबल वार्मिंग भी पूरी दुनिया के लिए चिंता का सबब है. वैसे तो लोग इन सब समस्याओं को हल करने के लिए वैज्ञानिक तरीकों पर निर्भर है पर कोई जमीनी कारणें की तरफ ध्यान नहीं दे रहा है. असल मंे जैविक खेती ही पर्यावरण के लिए काफी फायदेमंद है. जैविक तकनीक ही है जो खेती और फसल, सब्जियों और फलों को रसायनसे दूर रखकर जमीन को बंजर होने से बचा रही है. लोगों के पर्यावरण की तरफ बढते रुझान को देखत हुए केले के पेड या अलो विरा ग्वार के पटे से कपडे तैयार करने की विधियों को भी कारोबार के रूप में देखा जाने लगा है. 

विदेषी भी सीख रहे हैं गुर
भारत मंे जैविक खेती की तकनीकों से विदेषी भी प्रभवित हैं. नतीजनतन वे सात समुंदर पार कर भारत में जैविक खेती से जुडी तकनीको को भारतीय किसानो ंसे सीखने के लिए आ रहे है. हाल में सऊदी अरब के किसानों का एक दल राजस्थान आया था जैविक खेती के तौर तरीकों को सीखने. उन्होंने यहां पर न सिर्फ जैविक खेती से जुडी नई तकनीके सीखीं बल्कि इस बात से वाकिफ कराया कि किस तरह से पूरी दुनिया में भरत में होने वाली जैविक लेागों की दिलचस्पी की वजह बनी हुई है. इस काम में लगे एक गैर सरकारी संगठन मोरारका फाउंडेशन के मुकेश गुप्ता कहते हैं, दो तीन साल से हम देख रहे है, भारत ने इस क्षेत्र में बहुत प्रगति की है, भारत एक पॉवर हाउस के रूप में स्थापित हो सकता है. उनके मुताबिक जैविक चोती को अपनाने वाले किसानों के लिए खेती की लागत में कमी आई है. और भूमि के सूक्ष्म प्रबन्धन से खेती में पानी की 40 फीसद कमी आई है, इसीलिए किसानों को जैविक खेती काफी भा रही है. यही वजह है कि किसान इसके  जरिए आज विश्व बाजार से जुड़ रहे हैं ताकि  उन्हें उचित मूल्य मिल सके.बात अगर राजस्थान की करें तो यहां लगभग 70 हजार किसान जैविक खेती के इस अभियान में षामिल है. एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत के बाकी के राज्यों के मुकाबले राजस्थान में सबसे ज्यादा किसान इस खेती में हाथ बंटाते रहे हैं.

खेती के अलावा भी है उपयोगी
ऐसा नहीं है जैविक विधियो ंका इस्तेमाल सिर्फ खेती औश्र फस्ल उगाने में ही किया जा रहा है, असल में जैविक विधियां खेती के साथ साथ अन्य व्यवसायों के लिए भर बहुत फायदेमंइ बनकर उभर रही है. पिछले दिनों केले से कपडे का निर्माण करने वाली चेन्नई की एक कंपनी कोे फ्रांस, सिंगापुर, ब्रिटेन, और आस्ट्रेलिया जैसे बडे देशों के भी ऑर्डर मिल रहे हैं. ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने के लिए और कार्बन क्रेडिट को बढाने के लिए ये कंपनियां ऐसे और्डर देती हैं. गौश्रतलब है कि भारत दुनिया में सबसे ज्यादा केले उत्पादित करने वाले देशों में से एक है. ऐसे में कंपनी केले के बचे हुए कूडे का इस्तेमाल कपडे बनाने के लिए करती है। इसमें फाइबर को सुई की मदद से निकाला जाता है और इसे धागों में बदलने के लिए पूर्णतरू जैविक विधियों का ही प्रयोग किया जाता है. इसी तरह जैविक तकनीक कम्युनिटी आधारित आर्गेनाइज्ड फार्मिंग, रिसर्च , एग्रोप्रोसेसिंग, मार्केटिक और फार्म टूरिज्म जैसे आयामो ंमें अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है.


किसानों की जुबानी
मैं वाणिज्य में स्नातक हूं. पुश्तैनी खेत में पहले रासायनिक खाद का इस्तेमाल करते थे. इससे खाद उपज तो बढ जाती थी, लेकिन खर्च  में इजाफा हो रहा था. फिर मैंने अपनी जमीन पर जैविक खेती करने की ठानी. पहले साल उपज में दस फीसदी की कमी आई, लेकिन दूसरे साल से उपज बढ गई. अब, जब मैं अपना अनाज लेकर मंडी में जाता  हूं और सबाके बताता हूं कि हमारा अनाज जैविक विधि से उगाया गया है तो हमें प्रति क्विंटल दो सौ रुपये ज्यादा मिलते हैं.
 -शंकर लाल, बलवंतपुरा, झुंझुनू


हम तो गोबर और केंचुआ से खुद ही खाद ही खाद तैयार कर लेते हैं. नीम, हल्दी एवं लहसुन मिलाकर हर्बल स्प्रे बना लेते हैं. पिछले 4 सालों से हम इन्हीं सब चीजों का इस्तेमाल करके खेती कर रहे हैं.  इससे दो फायदे होते हैं. पहला तो यह कि जैविक विधि से खेती करने पर लागत कम हो जाती है, साथ ही उपज का मूल्य भी अधिक मिलता है. और दूसरा हमारी खेती की उर्वरकता भी बढती जाती है.                             -ओमप्रकाश, मझाओ, झुंझुनू

Tuesday, April 16, 2013

ट्रे कल्टीवेशन - किसानों के लिए नई सौगात



इस बात के इंकार नहीं किया जा सकता है कि आज देश में किसान और खेती दोनों ही खस्ताहाल में हैं. एक ओर जहां पानी के भूमिगत स्तर  आई तेजी से कमी ने खेती और किसान को संकट में डाल दिया है, वहीं दूसरी ओर खाद और सिंचाई साधनों की बढ़ती मंहगाई ने भी उनकी कमर तोड़कर रख दी है. षायद यही वजह है कि आज हमारे देश के किसाान जो कल तक देश में अन्नदाता माने जाते थे, भुखमरी की कगार पर आ गए हैं. बर्बाद होती फसलें, खेती के सीमित साधनों की वजह से ये किसान आए दिन आत्महत्याएं करने लगे हैं. फिर चाहे विदर्भ के किसान हों या बुंदेलखंड के. किसानों की यह समस्या इतनी जटिल होती जा रही है कि अब लोग यह तक कहने लगे हैं ऐसे में न सिर्फ सरकार को, बल्कि देश के वैज्ञानिकों को भी किसानों की इन समस्याओं से छुटाकरा दिलाने के लिए जरूरी उपाय ढूंढने होंगे. इस दिषा में कई प्रयास काफी वक्त से किए भी जा रहे हैं.

ट्रे कल्टीवेशन
इसी प्रक्रिया में कई नई तकनीकें ईजाद हुई है, जिनका इस्तेमाल किसानों के लिए नई उर्जा और उम्मीद लेकर आया है. ऐसी ही एक तकनीक है ट्रे कल्टीवेशन यानी ट्रे में खेती. दरअसल, इसे सरल भाशा में समझें तो ये एक ऐसी तकनीक है जिसमें कम पानी और कम मिट्टी में अधिक से अधिक सब्जियां उगाई जा सकती हैं. इस तकनीक में प्लास्टिक की ट्रे में मिट्टी रखकर सब्जियां उगाई जाती हैं. इससे कम लागत में उत्तम गुणवत्ता वाली सब्जियों का उत्पादन किया जा सकता है. इसके लिए सर्वप्रथम ट्रे में ग्रीन नेट एवं जूट बिछाकर उसमें वर्मी कंपोस्ट डाला जाता है, फिर उसमें उपचारित बीज या पौधे लगाते हैं. इसके बाद ट्रे में एग्री इनपुट्स एवं पोशक तत्वों का समय-समय पर छिड़काव किया जाता है. इस तकनीक से उस तरह की सब्जियां उगाने में बेहतर परिणाम मिलता है, जो हम अपने रोजमर्रा के भोजन में इस्तेमाल करते हैं. मसलन टमाटर, मिर्च, बैगन, भिंडी, करेला, ककड़ी, ग्वारफली का नाम प्रमुख रूप से लिया जा सकता है. इन तमाम सब्जियों को बड़ी आसानी से डेढ़ इंच मिट्टी में उगाया जा सकता है. इस विधि द्वारा एक किलो सब्जी उगाने में सिर्फ 30 से 70 लीटर पानी की आवश्यकता होती है.

किफायती और फायदेमंद 
इस तकनीक की विषेशता यही हैं कि इसमें पानी की बहुत बचत होती है यानी जिन किसानों को ंिसंचाई के साधनों का इंतजाम करने में दिक्कत पेश आती है या फिर जो आथर््िाक रूप से इतने कमजोर है कि सिंचाई क जल का खर्च वहन नहीं कर सकते, उनके लिए यह तकनीक किसी वरदान से कम नहीं है. इस तकनीक के इस्तेमाल से किसान बेहतर और अधिक उपज पैदा कर सकते हैं. इसकीं दूसरी सबसे अच्छी बात ये हैं यह उन किसानों के लिए ज्यादा फायदेमंद है जो पिछड़े होने के साथ साथ सूखे और भूमिहीन यानी जमीन की कमी से जूझ रहे हैं. इस तकीनीक की मदद से उन्हें उपज के लिए बहुत सारी जमीन की आवष्यकता नहीं पड़ती. ट्रे के कई स्तर बनाकर कम से कम जगह में खूब सारी उपज की जा सकती है. इसके अलावा इस इस विधि में फसल चक्र की भी आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि ट्रे के अंदर एक सब्जी तैयार होते ही आप उसमें कोई दूसरी सब्जी लगा सकते हैं.

कीटनाशकों से छुटकारा
केयर रेटिंग की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में कीटनाशकों के गलत प्रयोग से उत्पादकता में जबरदस्त गिरावत आई है. देश में हर साल कीटनाशकों के प्रयोग से न सिर्फ उपज की गुणवत्ता में कमी आती है बल्कि किसानों की जेबों पर भी अतिरिक्त भार पड़ता है. एक आंकड़े के मुताबिक भारत में कीटनाशकों के प्रयोग के कारण करीब 18 फीसदी फसल बर्बाद हो जाती है यानी इससे हर साल करीब 90 हजार करोड़ रुपये की फसल को नुकसान पहुंचता है. ट्रे कल्टीवेशन तकनीक से सबसे पहले किसानों को इसी समस्या से निजात मिलती है. जी हां, ट्रे कल्टीवेशन की तकनीक पर की गई उपज में कीटनाशक दवाइयों के छिड़काव की जरूरत नहीं पड़ती. ऐसा इसलिए क्योंकि ट्रे के ऊपर नेट लगा देने से कीड़े-मकोड़े सब्जियों को नुकसान नहीं पहुंचा पाते. जाहिर है जब फसल में कीट ही नहीं लगेंगे तो फिर कीटनाशकों की जरूरत ही नहीं पड़ेंगी. उपज की गुणवत्ता पर भी कोई दुश्प्रभाव नहीं पडे़गा. 


शहरों में भी ट्रे कल्टीवेशन
आमधारण होती है कि किसान और खेती का मतलब गांव. किसी हद तक ये धारणा सही भी होती है. क्योंकि भारत का कृशकवर्ग गावों में ही बसता है. लेकिन ट्रे कल्टीवेशन की तकनीक इस धारणा को काफी हद तक बदल देती है. इस तकनीक को शहरों भी कई लोग आजमा रहे हैं. आप आपने शहर में बने मकान के गार्डन में या फिर  किसी के कमरे में कोई स्थान, जो थोड़ा सा खुला हो या फिर छत पर ट्रे कल्टीवेशन के जरिए सब्जियां उागकर अपने हाथों सेे उगाई गई सब्जियों का मजा ले सकते हैं. इससे दो फायदे होंगे पहला, आप स्वादिश्ट, ताजी और पेस्टीसाइड से मुक्त भोजन पाएंगे और दूसरा सब्जी मंडी में बासी सब्जियों पर अधिक पैसे भी खर्च नहीं करने पडें़गे. आप कोट-पैंट, टाई लगाकर भी अपने घर की छत या बालकनी में इस विधि द्वारा सब्जियां उगा सकते हैं. किसानों की वेशभूशा में पानी और कीचड़ में उतरने की कोई आवष्यकता ही नहीं है. तो बन गए न आप मौडर्न किसान. 
राजस्थान के झुझुनूं जिले की शेखावाटी तहसील के कई किसान इस तकनीक से सब्जियां उगा रहे हें. मोरारका फाउंडेशन ने भी कुछ वर्श पहले दिल्ली में एक प्रदर्शनी लगाकर इस तकनीक को पेश किया था. मोरारका फाउंडेशन के कार्यकारी निदेशक मुकेश गुप्ता बताते हैं कि ट्रे कल्टीवेशन तकनीक खेती पैदावार, बचत और स्वास्थ्य के नजरिए से भी किसानों के लिए फायदेमंद है. लिहाजा किसान इस तकनीक की तरफ तेजी से रुख कर रहे हैं. आज यह तकनीक जहां भी पुहंचती है वहां के लोग इसे हाथोंहाथ लेते हैं. कम लागत पर ज्यादा सब्जियां उगाकर किसान अधिक से अधिक पैसे कमा रहे है. 




Tuesday, April 9, 2013

हेल्थ इंश्योरेंस - आपात समय की सुरक्षा


आज की आपाधापी और भागदौड़ भरी जिंदगी में सब से ज्यादा स्वास्थ्य हाशिए पर रहता है. काम का तनाव और अव्यवस्थित जीवन शैली के चलते देश  में हर दूसरा व्यक्ति किसी न किसी बीमारी से पीडि़त है. यह तो सब जानते हैं कि बीमारियां न तो समय व पता पूछ कर आती हैं और न ही जेब देखकर. हर बीमारी का सफर अस्पताल पर खत्म होता है. एक बार बीमार पड़ने का मतलब है अपनी सारी जमापूंजी दांव पर लगाना. इसलिए हेल्थ इंश्योरेंस  कराएं ताकि खुद या परिवार को कोई आदमी बीमार पड़े तो इलाज का सारा खर्च अपकी बीमा कंपनी उठाए और आप आर्थिक मोरचे पर निष्चिंत रहें. आज आपात समय में सुरक्षा बनकर उभर रहा है हैल्थ इंश्योरेंस.  
दिल्ली के व्यवसायी महेश अरोड़ा काफी समय से ब्ल्डप्रैशर और सुगर की समस्या से पीडि़त हैं. इसके चलते उन्हें इन बीमारियों का नियंत्रित रखने के लिए नियमित रूप्प से महंगे इलाज से गुजरना पड़ता है. चूंकि समय रहते उन्होंने अपनी हेल्थ इंश्योरेंस  नहीं कराया, और अब 55 साल की उम्र में स्वास्थ्य बीमा कराना कतई आसान नहीं है. उन्होंने इस अनुभव से सबक लेते हुए अपने युवा बेटे का सही समय पर हेल्थ इंश्योरेंस  करवा लिया. महेश  जी जानते हैं कि ये आनुवांशिक बीमारियां एक समय बाद उनके बेटे को भी होंगी. तब ये स्वास्थ्य बीमा उसके काम आएगा.

क्यों जरूरी है हेल्थ इंश्योरेंस
हेल्थ केयर फाउंडेश न औफ इंडिया के प्रैसीडेंट डाक्टर केके अग्रवाल कहते हैं कि इस देश  में बिना इंश्योरेंस  के कार या कोई और गाड़ी चलाना जुर्म माना जाता है जबकि दुर्भाग्वश  दुनिया के सबसे महंगे व्हीकल यानी मानव श रीर का इंश्योरेंस  आवष्यक हो, इस के लिए कोई कानून नहीं है. अगर हर किसी का हेल्थ इंश्योरेंस  हो तो स्वास्थ्य सेवाएं श हर क्या गांवों तक सुचारू रूप से पहुंच सकेंगी. आज भारत की जनसंख्या लगभग 1241491960 है. अगर हर व्यक्ति रोजाना 3 रुपये से कम बतौर प्रीमियम के हिसाब से साल का हजार रुपए देता है तो बीमा कंपनी के पास 124000 करोड़ की भारी धनराषि जमा होती है. जरा सोचिए इतने पैसों से देश  भर में कितने हेल्थ केयर सेंटर और अस्पताल खोले जा सकते हैं. और जो आदमी पैसे नहीं दे सकता उस का प्रीमियम सरकार को देना चाहिए. आज जब दवाओं और चिकित्सा के दाम आसमान छू रहे हैं. एक समय ऐसा भी आएगा जब बिना इंश्योरेंस  के चिकित्सा सुविधा पाना असंभव सा हो जाएगा. इसलिए हेल्थ इंश्योरेंस  सबके लिए बेहद जरूरी है. क्योंकि हेल्थ इंश्योरेंस  बीमाधारक या उस के आश्रित परिजनों को स्वास्थ्य समस्या, दुर्घटना या मृत्यु आदि की स्थिति में आर्थिक सहायता देता है.

हेल्थ इंश्योरेंस क्या है
हेल्थ इंश्योरेंस  यानी स्वास्थ्य बीमा को मेडिक्लेम भी कह सकते हैं. देश  की आबादी का एक बड़ा हिस्सा खासकर ग्रामीण हिस्सा तो हेल्थ इंश्योरेंस  के मायनों से वाकिफ तक नहीं है. आसान लहजे में समझें तो हेल्थ इंश्योरेंस  दो तरह का होता है. पहला इंडिविजुअल हेल्थ इंश्योरेंस यानी  व्यक्तिगत स्वास्थ्य बीमा और दूसरा फैमिली फ्लोटर बीमा यानी सामूहिक बीमा. इंडिविजुअल हेल्थ इंश्योरेंस के कवर क्षेत्र में सिर्फ बीमा स्वामी आता है. इस बीमा का षुल्क सामूहिक बीमा शुल्क की तुलना में अधिक होता है. जबकि फ्लोटर प्लान में बीमा करने वाला या प्रायोजक ही पौलिसी का स्वामी होता है और दूसरे पंजीकृत सदस्य भी पौलिसी में संलग्न होते हैं. उदाहरण के तौर पर अगर पिता ने अपने हेल्थ इंश्योरेंस  के प्लान में पत्नी और बच्चों को पंजीकृत कराया है तो जरूरत पड़ने पर उन को भी कवर किया जाता है. आमतौर पर फैमिली फ्लोटर प्लान को लोग तरजीह देते हैं. भारत में आजकई बीमा कंपनियां हैं जो अच्छी और सुलभ हेल्थ इंश्योरेंस  पौलिसी मुहैयया कराती हैं. हाल ही पंजाब नेश नल बैंक ने इस क्षेत्र में बढती आर्थिक संभावनाओं के चलते मेट लाइफ के साथ करार किया है. इसी तरह आईसीआईसीआई बैंक ने भी लोम्बार्ड कंपनी के साथ हेल्थ इंश्योरेंस  के क्षेत्र में करार किया है. 

यों तो सभी बीमा कंपनी बेहतर सुविधाओं और क्लेम का दावा करती हैं और देती भी हैं पर बीमा के मामाले में सबसे जरूरी बात यही होती है कि हम उससे जुड़े सभी नियमों, श र्तों को भलीभांति समझ लें. कुछ गंभीर रोगों के लिए बीमा कंपनिया कवर नहीं देती इसलिए यह अवश्य पता कर लेना चाहिये कि किन बीमारियों का बीमा होता है और किनका नहीं.

कैसे कैसे हेल्थ इंश्योरेंस  
बाजार में कई तरह की हेल्थ इंश्योरेंस  पौलिसी मौजूद हैं. सब कंपनियां प्रतिस्पर्धा के चलते कम राषि और बेहतरीन सुविधाओं से लैस आकर्शक प्लान दे रहीं हैं.उम्र और बीमारियों के आधार पर सबके लिए अलग अलग पौलिसी मुफीद हो सकती है. बाजार में मौजूदा कुछ हेल्थ प्लान की बात करें तो आईसीआईसीआई लोंबार्ड जनरल की कंप्लीट हेल्थ इंश्योरेंस, हेल्थ केयर प्लस, हेल्थ एडवांटेज प्लस, पर्सनल प्रोटेक्ट, क्रिटिकल केयर पौलिसी के अलावा अवीवा का अवीवा हेल्थ सिक्योर और आई लाइफ, बजाज अलायंज की इंडीविजुअल हेल्थ गार्ड, फैमिली फ्लोटर हेल्थ गार्ड व एक्स्ट्रा केयर, एगौन रेलीगेर का आई हेल्थ प्लान, कौम्प्रिहेंसिव हेल्थ प्लान आदि प्रमुख हैं.
इन ढेरों प्लान के तहत हर बीमा कंपनी की अलग अलग क्लेम राषि, प्रीमियम, सेवाएं, सुविधाएं और प्रोसेसिंग हैं. उदाहरण के तौर पर आईसीआईसीआई लोंबार्ड जनरल की कंपनलीट हेल्थ पौलिसी में 10 लाख तक का कवर मिलता है. इसके अंतर्गत 46 साल से कम उम्र वाले बीमा ग्राहक को मेडिकल टेस्ट की कोई जरूरत नहीं होती. अगर बात उम्र की करें तो इसे कोई भी ले सकता है. फिर भी कागजी तौर पर फैमिली फ्लोटर पौलिसी के लिए 3 महीने और इंडीविजुअल प्लान के लिए 6 साल है. इसके अलावा प्लान में पौलिसी लागू होने के 30 दिनों के अंदर किसी बीमारी पर क्लेम की सुविधा नहीं हैं सिवाए एक्सीडेंट की घटना के. इसी तरह क्लेम को लेकर और भी कई नियम होते हैं जो बीमा एजेंट पौलिसी देने से पहले ग्राहकों को बताते हैं. 
इसी कंपनी का एक और प्लान हेल्थ एडवांटेज प्लस ओपीडी के खर्च भी कवर करता है जबकि अन्य कई कंपनियां ऐसा नहीं करती. प्लान में 40 हजार से ज्यादा अस्पतालों का भारत भर में नेटवर्क हैं. आप अपने सुविधा से नजदीकी अस्पताल चुन सकते हैं. कुछ हेल्थ इंश्योरेंस  कंपनियां गंभीर बीमारियों जैसे कैंसर या हृदय संबंधी रोग से पीडि़त होने पर एक बार लाभ देते हैं. इसे एड औन हेल्थ कवर कहते हैं.
आईसीआईसीआई लोंबार्ड के अलावा इंडस इंड बैंक भी हेल्थ इंष्योंरेस देता है. यह अपनी विभिन्न हेल्थ पौलिसी के तहत भारत के 2200 से भी अधिक अस्पतालों में बिना नकदी दिए भर्ती रहने की सुविधा प्रदान करता है. यह भर्ती होने से पहले और अस्पताल से घर जाने के बाद के उपचार के दौरान हुए खर्च को भी भरता है. इनका दावा है कि चिकित्सा व्ययों का अस्पताल से निवृत्ति के 90 दिन तक भुगतान भी बीमा के तहत होता है. भारत की कोई भी अन्य हेल्थ इंश्योरेंस  पौलिसी इस सुविधा की बराबरी नहीं करती. ऐसी कई कंपनी हैं जो अलगअलग राषि के हेल्थ इंष्यारेंस पर कई लुभावनी सुविधाएं देती है. स्वास्थ्य बीमा कंपनी के सभी नियम व श र्तों का विवरिण यहां संभव नहीं. इसलिए जब भी स्वास्थ्य बीमा लें अपने बीमा फार्म को तसल्ली से पढें और एजेंट से सभी षंकाओं का समाधान कराएं.



इंश्योरेंस और राशि 
रही बात कीमत की तो इसकी इसके लिए कोई तय रकम नहीं है. हां, अपनी आय, स्वास्थ्य समस्याओं और जिम्मेदारियों के आधार पर बीमा तय करना फायदेमंद होता है. 21 से 25 साल की उम्र में आप 2 से 3 लाख रुपये का स्वास्थ्य कवर ले सकते हैं. बाद में इस कवर की राषि बढाई भी जा सकती है. वहीं अगर फैबिली मेंबर की आयु 28 से 35 के बीच है तो 3 से 5 लाख का फैमिली फ्लोटर प्लान लेकर बाद में आवष्यकताओं के अनुरूप राषि में इजाफा किया जा सकता है. हालांकि एक्पर्ट मानते हैं कि हेल्थ इंश्योरेंस  जितना जल्दी लिया जाए उतना ही फायदेमंद होता है. क्योंकि बाद में उम्र ज्यादा होने या किसी बीमारी का पता चलने पर या कई बीमा कंपनियां बीमा करने से इंकार कर देती हैं. और जो करती भी हैं उनका प्रीमियम बहुत ज्यादा होता है.
बीमारी, सुविधाएं और कवर
आमतौर पर 45 साल से कम उम्र के हैं तो पॉलिसी लेने से पहले किसी मेडिकल चेकअप की जरूरत नहीं होती. कुछ कंपनियों में यह उम्र 60 साल भी है. सामान्यत रक्तचाप, डाबिटीज, एसजीपीटी, कौलेस्ट्रोल, यूरीन रुटीन, ईसीजी, चेस्ट का एक्सरे, मोतियाबिंद और ग्लूकोमा आदि का मैडिकल टेस्ट करवाना पड़ता है. कुछ बीमारियां  मसलन एचआईवी, मनोरोग आदि कभी कवर नहीं होते. 
कुछ में प्लान ऐम्बुलेंस खर्च, हौस्पिटल का रोजाना का खर्च आदि भी कवर होते हैं. हालांकि मैटरनिटी का खर्च आमतौर पर कवर नहीं होता, लेकिन मैक्स बूपा और अपोलो म्यूनिख जैसी कुछ कंपनियां कुछ सीमा और शर्तों के साथ यह कवर दे देती हैं. हालांकि डाक्टर अग्रवाल का मनाना है कि ओपीडी भी इंश्योरेंस  के दायरे में आना चाहिए. इसके अलावा इंश्योरेंस  के लिए उम्र की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए और स्वास्थ्य बीमा जीवनपर्यंत चलना चाहिए.
गौरतलब है कि अब हेल्थ इंश्योरेंस सेक्टर में पोर्टेबिलिटी लागू हो चुकी है. इसलिए जब बीमा कंपनी पौलिसी के रिन्यूअल के दौरान प्रीमियम बढाए तो आप कंपनी बदल सकते हैं. हेल्थ इंश्योरेंस  पर टैक्स में भी छूट मिलती है. इसके अलावा समय और धन की बचत के लिए औनलाइन हैल्थ पौलिसी खरीदना एचित रहता है.
        
    गौर करने वाली कुछ बातें
  •    बीमा लेने के दौरान कंपनी को सही सूचनाएं दें अन्यथा क्लेम में मुष्किल होगी.
  •    बीमा की सभी शर्तों और सुविधाएं को अच्छे से समझें.
  •   बीमा लेने से पहले अन्य बीमाओं के दामों की जांच कर लें.
  •   फैमिली के लिए फैमिली फ्लोटर योजना को प्राथमिकता दें.
  •   बीमा एजेंट का लाइसेंस नम्बर अवष्य चेक करें.
  •   बीमा में क्या कवर होगा और क्या नहीं, जरूर पता करें.
  •   कंपनी से जुड़े अस्पतालों के नेटवर्क से अपनी सुलाभता जरूर देखें. 
  •   क्लेम के वक्त का सम एश्योर्ड और लिमिट के बारे में जानकारी लें.
  •  समय और धन की बचत के लिए औनलाइन पौलिसी खरीदें.
  •  हेल्थ इंश्योरेंस  करवाएं और टैक्स छूट का लाभ उठाएं.
  •  फार्म को तसल्ली से पढें और एजेंट से सभी षंकाओं का समाधान कराएं.


Monday, March 4, 2013

ताकि होली न हो बदरंग




पिछले साल की होली की बात है. होली के रंगों में पूरा देष सराबोर था. उसी दरम्यान खबर आई कि मुंबई के धारावी इलाके में लगभग 150 से ज्यादा बच्चों को रंग खेलते वक्त अचानक खुजली और उल्टी होने लगी. सभी को अस्तपाल लाया गया. पता चला कि होली में कैमिकलयुक्त रंगों के प्रयोग के चलते यह हादसा हुआ. इस हादसे के चलते मौजमस्ती और रंगों का उत्सव होली इन परिवारों के लिए मातम में तब्दील हो गया. कुछ ऐसा ही मेरठ की लड़की के साथ हुआ. किसी मनचले ने कैमिकल रंगों से भरा गुब्बारा उसके चेहरे पर मार दिया. रंग आंखों में चला गया वह टेम्पोरेरी ब्लाइंडनेस का षिकार हो गई.
अक्सर होली के दौरान इस तरह की घटनाएं प्रकाष में आती रहती हैं. इसके बावजूद न तो हम इन से सबक लेते हैं और न ही होली में कैमिकलयुक्त रंगों से तौबा करते हैं. लिहाजा रंगों के इस त्योहार में गाहेबेगाहे भंग पड़ती रहती है. होली आते ही बाजार रंगबिरंगे रंगों और गुलाल से सज जाते हैं. यों तो बाजार में नेचुरल कलर भी बिकते हैं और कैमिकल वाले भी. पर कैमिकल कलर्स की तुलना में नेचुरल कलर्स थोड़ा महंगे होते हैं. षायद यही कारण है लोग प्राकृतिक रंगों के बजाए कैमिकल कलर्स से होली खेलते हैं.
दरअसल रंग कई प्रकार के रसायनों से बने होते हैं जो मानव शरीर के लिए बेहद घातक साबित होते हैं. इन जहरीले रंगों के प्रयोग से किसी को स्किन इंफैक्शन होता है तो किसी की आंखे जख्मी हो जाती है. कई बार तो ये जहरीले रंग लोगों को अंधा तक कर देते हैं. बच्चों और गर्भवती महिलाओं पर इन कैमिकल्स का असर तो दोगुना होता है.
डाक्टर वीरेंद्र नाथ गर्ग के मुताबिक हर रंग में अलगअलग तरह के षरीर को नुकसान पहुंचाने वाले कैमिकल होते हैं. जैसे काला रंग. यह रंग लेड औक्साइड के मिश्रण से बनता है. इस के इस्तेमाल से किडनी प्रभावित होती है और लोग मंदबुद्धि के भी हो सकते हैं. इसलिए हमेषा रासायनिक रंगों के बजाए प्राकृतिक व सूखे रंगों मसलन गुलाल आदि से ही होली खेलनी चाहिए. क्योंकि होली का त्योहार खुषियां मनाने के लिए होता है, अस्पतालों के चक्कर काटने के लिए नहीं.
रासायनिक रंगों में लेड औक्साइड, एल्यूमिनियम ब्रोमाइड व लेट सल्फेट जैसे रसायन होते हैं, जिनका असर सीधे शरीर की त्वचा पर पड़ता है. कई रसायन तो इतने खतरनाक होते हैं कि इन से बच्चों को किडनी फेल, हार्ट अटैक, फेफडे का इंफेक्शन, कैंसर और अस्थमा जैसे घातक परिणाम भुगतने पड़ते हैं. इस के अलावा स्किन कैंसर, एग्जिमा या फिर फोड़ेफुंसी भी हो सकते हैं. स्वास्थ्य विभाग की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल लगभग 80 प्रतिशत लोगों को कैमिकल कलर्स के साइडइफेक्ट का षिकार होना पड़ता है.
रंगों के अलावा कई बार कुछ षरारती किस्म के लोग चमकीले पेंट या ग्रीस या कीचड़ से भी होली खेलते हैं. जबकि ये पदार्थ तो रासायनिक रंगों से भी ज्यादा खतरनाक होते हैं. डर्मेटोलोजिस्ट और चिकित्सकों की मानें तो रंगों में आजकल कैमिकल के अलावा रेत और डिटरजेंट पावडर भी मिलाया जा रहा है. जो त्वचा  आंखों, सांस की नली और बालों के लिए बेहद खतरनाक है. कई बार टेंपरेरी ब्लाइंडनेस का भी खतरा रहता है. इसलिए हम सबको हितायती तौर पर कैमिकल रंगों को छोड़ प्राकृतिक रंगों से होली खेलनी चाहिए. इससे त्योहार भी मजे से मनाया जा सकता है और विभिन्न  शारीरिक नुकसानों से भी बचा जा सकता है.


फिर भी अगर केमिकल रंग का प्रयोग करते हैं और इससे शरीर पर बुरा असर पड़ता है तो तुरंत चिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए ताकि प्रारंभिक दौर में ही बीमारी को रोका जा सके. लेकिन समझदारी तो इसी में हैं कि इस तरह के हादसों को कोई मौका ही न दिया जाए. अभिभावक बच्चों को होली खेलने के लिए सूखे रंग और गुलाल दें ताकि किसी की होली बदरंग न हो. गुलाल में रसायनों का प्रयोग नहीं किया जाता है. इसके अलावा ये ईको फ्रेंडली भी होता है. अगर आप भी अपने परिवार के साथ एक याादगार और हेल्दी होली खेलना चाहते हैं तो थोड़ी सी सावधानी बरतें ताकि होली खुषियों के रंगों से सराबोर हो.


   होली में क्या करें और क्या न करें

  • गीले रंगों से मुंह को बचाएं, रंग को मुंह के अंदर न जाने दें.
  • रंग खेलने से पहले नारियल तेल या जैतून का तेल लगाएं,
  • सरसों का तेल कतई न लगाएं.
  • षरीर को ढकने वाले कपड़े पहनकर होली खेलें
  • गुब्बारे में पानी भरकर किसी को न मारें.
  • सूखे रंग, गुलाल या हर्बल रंगों से ही होली खेलें.
  • रसायनिक रंगों का इस्तेमाल कतई न करें
  • चमकीले पेंट, कीचड़ या ग्रीस से होली ना खेलंे.
  • कान, मुंह और आखों में रंग जाने पर तुरंत साफ करें.
  • रंग साफ करने हेतु बेसन, दही आदि का इस्तेमाल करें.
  • रंग उतारने के लिए हार्ड साबुन, डिटरजंट या शैंपू का प्रयोग न करें.
  • रंग को धोने के लिए बेसन, दही आदि का इस्तेमाल करें.
  • त्चचा को रगड़े नहीं समय के साथ रंग फीका पड़ जाएगा.
  • रंग खेलते समय कौंटेक्ट लेंस न लगाएं,
  • अगर आंख में रंग चला जाए तो उसे तुरंत साफ पानी से धोएं.
  • होली खेलते समय जलन, उल्टी या खुजली हो तो तुरंत चिकित्सक से मिलें.

Tuesday, February 5, 2013

भ्रष्टाचार का चस्का और आम आदमी



सही मायनों में अपनी आवाज़ को सीधे संवाद के ज़रिये जन-जन तक पहुंचाने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम आज भी नाटक को ही माना जाता है. नाटक मंचन और इसी की एक विधा नुक्कड़ नाटकों के ज़रिये न स़िर्फ दर्शकों से सीधा संवाद होता है, बल्कि उसी व़क्त नाटक कीविषयवस्तु से संबंधित सारी जानकारी भी मिल जाती है. क़रीब दो साल पहले राजेश दुआ का हास्य नाटक दूल्हा बिकता है, देखा था. नाटक में हास्य के साथ-साथ समाज में फैली दहेज प्रथा जैसी कुरीतियों पर कटाक्ष किया गया था.

लगभग दो साल के बाद उनके द्वारा निर्देशित नाटक चस्का अच्छा नहीं, देखने का मौक़ा मिला. यह नाटक भी निर्देशक की छवि के अनुरूप व्यंग्य का पुट लिए सामाजिक सरोकारों की बात कह रहा था. लेकिन इस बार निर्देशक के तेवर और क़डे दिखाई दिए. इस नाटक की थीम सरकारी तंत्र में फैला भ्रष्टाचार थी. यह थीम खुद में कहीं न कहीं अन्ना आंदोलन का कलेवर भी ओ़ढे हुई थी. नाटक में चपरासी का किरदार मैं अन्ना हूं, लिखी की गांधीनुमा टोपी पहने दिखाई देता है.

हाल में दिल्ली के पीएसके (पूर्व सांस्कृतिक भवन) सभागार में नाट्य कला मंच के तत्वावधान में राजेश दुआ द्वारा निर्देशित एवं लिखित इस हास्य-व्यंग्य नाटक का मंचन किया गया. नाटक में विजय शर्मा, रंजन कुमार, संजय कुमार, जेसी मल्होत्रा, हरीश चौहान, फातिमा, गीतरेखा, रमेश कथूरिया, रजत भटनागर, ओपी शर्मा और अतिथि कलाकार अदीप सेतिया, देवेंद्र अकोत्रा जैसे वरिष्ठ कलाकारों ने भाग लिया. तकनीकी पहलुओं की बात करें तो प्रकाश की व्यवस्था एवं परिकल्पना बहुत उत्कृष्ट थी. प्रकाश व्यवस्था अजय की थी और परिकल्पना राजेश दुआ की. चस्का अच्छा नहीं, असल में चरित्र हनन, रिश्वत़खोरी और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ उठाता हास्य से भरपूर नाटक है. इस नाटक में सरकारी कार्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार को बहुत ही सरल तरीक़े से दर्शाने की कोशिश की गई है. एक अ़फसर किस तरह से हर काम के लिए रिश्वत वसूलने की कोशिश करता है. अनोखे लाल एक भ्रष्ट सरकारी बाबू है, जो अपने ऑफिस की हर फाइल को उसमें रखी नोटों की गड्डी के वज़न के हिसाब से तौलता है, यानी जिस फाइल में जितने ज़्यादा नोट, उस फाइल की उतनी ही तेज़ गति.



 अगर आपके पास पैसा नहीं है तो फिर प्रसिद्ध धारावाहिक (जिस पर चला मुसद्दी ऑफिस-ऑफिस नाम से फिल्म भी बन चुकी है) के किरदार मुसद्दीलाल की तरह आपको भी हर दूसरे हफ्ते आने के लिए कहा जाएगा. इस तरह से अनोखे लाल के साथ-साथ उसका पूरा स्टाफ उसी के नक्शे-क़दम पर चलता है. लेकिन एक दिन जब भ्रष्ट बाबुओं की इस प्रवृत्ति की शिकार जनता एकजुट होकर भ्रष्टाचार के खिला़फ आवाज़ बुलंद करती है, तब जाकर प्रशासन जागता है और फिर अचानक जांच एजेंसी का बाबू मामलों की जांच करता है. परत-दर-परत मामला खुलता है. तब अनोखे लाल उनकी पकड़ में आता है. जनता की हुंकार के बाद यह सरकारी बाबू किस तरह से भ्रष्टाचार से तौबा करते हैं, इसी को हास्य के पुट के साथ नाटक में दिखाया गया है. दरअसल, भ्रष्टाचार यानी रिश्वत़खोरी हमारे देश में हर जगह, हर कार्यालय में व्याप्त है.

लेखक ने एक काल्पनिक कहानी के ज़रिये भ्रष्टाचार के खिला़फ जनता को जागरूक करने की कोशिश की है. हमारे नेताओं, बिल्डरों एवं नौकरशाह का गठजो़ड इतना गहरा हो चुका है कि जब तक जनता एकजुट होकर विरोध नहीं करेगी, तब तक हमारा देश भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं हो सकता है. नाटक के कलाकारों ने अपने सफल अभिनय द्वारा यही सब दिखाने की कोशिश की है. नाटक के अंत में जिस तरह से सभी कलाकर एक साथ मंच पर जनता से भ्रष्टाचार के खिला़फ लड़ने का आह्वान करते हैं, वह एक बार फिर से सोचने पर मजबूर करता है कि जब तक आम आदमी अपनी लड़ाई खुद नहीं लड़ेगा, तब तक देश से भ्रष्टाचार का खात्मा मुमकिन नहीं है. कुल मिलाकर राजेश दुआ एक ज्वलंत विषय उठाकर एक सफल संदेशात्मक नाटक रचते हैं. 

Saturday, January 26, 2013

स्वतंत्रता सेनानी : आजादी के बाद हक की लड़ाई


आज हम खुद को सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहते हैं, लेकिन क्या कभी हमने सोचा कि जिन लोगों ने देश को आज़ादी दिलाई, उनके साथ हमारा बर्ताव कैसा है? स्वतंत्रता सेनानी आज सरकारी दफ़्तरों के बाहर ठोकरें खा रहे हैं. अस्पताल के बाहर घंटों लाइन में खड़े होकर इलाज कराने को मजबूर हैं. ज़िंदगी के आखिरी पड़ाव में हमने उन्हें अकेला छोड़ दिया है. स्वतंत्रता संग्राम के दीवानों को काग़जात देकर साबित करना पड़ रहा है कि उन्होंने अंग्रेजों के खिला़फ लड़ाई की थी. विदेशियों से लड़ना उनके लिए आसान था, अपनों से लड़ना उन्हें भारी पड़ रहा है.





ॠषिकेश की घटना है. एक दिन सड़क के किनारे एक महिला की लाश मिली. लाश आधी सड़ चुकी थी. लोग लाश को देखकर नाक बंद कर बगल से गुज़र जा रहे थे. किसी ने पुलिस को ख़बर दी. पुलिस आई और लाश को ले गई. इस लाश का क्या हुआ यह पता नहीं लेकिन ये लाश किसकी है, यह पता करने में पुलिस को एक महीने से ज़्यादा का व़क्त लग गया. पता चला कि ये लाश बीना भौमिक की है. आज शायद ही किसी को मालूम हो कि बीना भौमिक कौन है. यह नाम उस लड़की का है जिसे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अग्नि कन्या के नाम से जाना जाता था.  इस लड़की ने ही 1932 में कोलकाता यूनिवर्सिटी में बीए के कोनवोकेशन के दौरान गवर्नर स्टेनली जैक्सन पर जानलेवा हमला किया था. स्टेनली तो बच गया लेकिन इस घटना से पूरे देश में तहलका मच गया था कि एक लड़की ने गवर्नर पर हमला कर दिया. पहली बार लोगों को लगा कि नौजवानों के साथ-साथ लड़कियां भी स्वतंत्रता संग्राम में अपने साहस का परिचय दे रही हैं. गवर्नर पर हमला करने के लिए बीना भौमिक को 9 साल की सज़ा हुई. जेल से निकलने के  बाद वह क्रांतिकारी बन गई.

जुगांतर रेवोल्यूशनरी क्लब की सदस्य बन गईं. 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बीना भौमिक को फिर तीन साल जेल में रहना पड़ा. उस दौरान वह कोलकाता कांग्रेस कमेटी की सचिव थी. बीना भौमिक स्वतंत्रता संग्राम का जीता-जागता इतिहास थी, देश की धरोहर थी. हमने किसी अंजान शहर में इन धरोहरों को मरने छोड़ दिया है.

यही हमारा दुर्भाग्य है. यही आज़ाद भारत है, जिसके लिए बीना भौमिक जैसी हज़ारों नौजवानों और युवतियों ने अपना जीवन न्योछावर कर दिया था. उनका सपना तो न जाने कहां गुम हो गया लेकिन स्वतंत्रता के वे सेनानी, हमारे ब़ुजुर्ग, जो हमारे आस-पास हैं, जिंदा हैं, सांस ले रहे हैं, उन्हें हमने ज़िंदगी के आ़खिरी मोड़ पर अकेला छोड़ दिया है. स्वतंत्रता सेनानी बूढ़े हो गए हैं. हालात यह हैं कि समाज और सरकार की तऱफ से उन्हें कोई सहूलियत नहीं मिल रही है. ज़्यादातर सेनानियों को घर वालों ने भी छोड़ दिया है. बेटा साथ नहीं रहता है. समाज और सरकार ने उनका तिरस्कार कर दिया है. वे पैसे-पैसे के लिए मोहताज हो गए हैं. सरकार की तऱफ से उन्हें पेंशन मिलती है. शर्मनाक़ बात यह है कि पेंशन की राशि इतनी कम है कि बताने में भी शर्म आती है. आज़ादी की लड़ाई में शामिल होने वाले इन देशभक्तों को हम किसी फोर्थ क्लास कर्मचारी के वेतन से भी कम पैसे देते हैं.


आजादी के 63 सालों बाद भी हम देश के प्रति उनके त्याग और योगदान का महत्व समझ नहीं पा रहे हैं. हम उन्हें सम्मान देने और उनका हक़ दिलाने के बजाए उन्हें अपमानित कर रहे हैं. मई, 2010 में केंद्र सरकार द्वारा अदालत को बताया गया कि देश भर में क़रीब एक लाख सत्तर हज़ार स्वतंत्रता सेनानी हैं. हालांकि यह आंकड़ा सरकारी दस्तावेजों पर आधारित है. हर महीने यह संख्या बदलती रहती है, क्योंकि इन सेनानियों की उम्र्र इतनी हो चुकी है कि लगभग हर महीने कुछ की मौत हो जाती है. इनमें से क़रीब साठ हज़ार स्वतंत्रता सेनानियों को केंद्र सरकार द्वारा पेंशन मिल रही है, बाक़ी को राज्यों द्वारा पेंशन की व्यवस्था है. पेंशन वितरण के मामले में हर राज्य का अपना नियम है, पेंशन राशि भी अलग अलग है. केंद्र सरकार स्वतंत्रता सेनानियों को 12400 रुपये देती है. वह स्वतंत्रता सेनानी योजना के तहत कुल सात सौ पचासी करोड़ रुपये खर्च करती है. उधर हरियाणा के मुख्यमंत्री ने पिछले 15 अगस्त को स्वतंत्रता सेनानियों की पेंशन राशि छह हज़ार से बढ़ाकर ग्यारह हज़ार रुपये कर दी. इसी तरह कर्नाटक सरकार ने यह पेंशन तीन हज़ार से बढ़ाकर चार हज़ार रुपये कर दी है. दिल्ली में स्वतंत्रता सेनानियों की पेंशन साढ़े तीन हज़ार से बढ़ाकर साढ़े चार हज़ार रुपये कर दी गई है. हैरानी की बात यह है कि दिल्ली में 1998 से ही स्वतंत्रता सेनानियों को पेंशन देने की योजना शुरू की गई थी, लेकिन आज भी यहां पेंशन राशि अन्य राज्यों के मुक़ाबले का़फी कम है. तमिलनाडु में पिछले साल मुख्यमंत्री ने सेनानियों को मिलने वाली पेंशन चार हज़ार से बढ़ाकर पांच हज़ार रुपये कर दी. सरकार स्वतंत्रता सेनानियों की मदद के बड़े-बड़े दावे करती है. उन्हें आर्थिक सहायता के तौर पर पेंशन और विभिन्न क्षेत्रों में आरक्षण देने की बात करती है, लेकिन सच तो यह है कि न जाने कितने स्वतंत्रता सेनानी आज भी गुमनामी और ग़रीबी की ज़िंदगी जी रहे हैं. कई तो अपने हक़ की लड़ाई लड़ते-लड़ते इस दुनिया से ही विदा हो गए. सबसे ज़्यादा शर्मनाक़ बात तो यह है कि कई स्वतंत्रता सेनानियों ने खुद को स्वतंत्रता सेनानी साबित करने में अपनी शेष ज़िंदगी गुज़ार दी. अधिकारियों की मनमानी और व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार की वजह से कई फर्ज़ी लोग खुद को स्वतंत्रता सेनानी घोषित कर सरकारी सुविधाओं का फायदा उठा रहे हैं और असली स्वतंत्रता सेनानी दस्तावेजों में अपना नाम दर्ज कराने के लिए तरस रहे हैं. ताज्जुब की बात तो यह है कि फर्ज़ी लोगों में कई तो ऐसे हैं, जो आज़ादी के समय पैदा ही नहीं हुए थे या फिर उनकी उम्र चार-पांच साल के आसपास रही होगी. ऐसे मामलों में जो लोग पकड़े जाते हैं, उनकी पेंशन रोक दी जाती है. लेकिन सवाल यह खड़ा होता है कि जो अधिकारी बिना जांच-पड़ताल किए फर्ज़ी प्रमाणपत्र पर दस्तखत करके असली स्वतंत्रता सेनानियों का हक़ मारते हैं, उन्हें कोई सज़ा क्यों नहीं मिलती? सुप्रीम कोर्ट स्वतंत्रता सेनानियों की बदहाली पर अ़फसोस जताता है और इसके लिए सरकार की लालफीताशाही को ज़िम्मेदार बताता है, लेकिन क्या इतना का़फी है? ग़ौर करने वाली बात है कि पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि देश के ज़्यादातर स्वतंत्रता सेनानी ग़रीबी और भुखमरी की ज़िंदगी बिताने पर मजबूर हैं, सरकार की तरफ से दी जाने वाली पेंशन उनके लिए किसी खैरात से कम नहीं है. इस बात से साबित हो जाता है कि देश का सर्वोच्च न्यायालय भी जानता है कि सरकार स्वतंत्रता सेनानियों की अनदेखी कर रही है.

बात स़िर्फ पेंशन और आरक्षण की नहीं है, बात है उनके त्याग और संघर्ष के महत्व को समझने की. स्वतंत्रता संग्राम के जो सिपाही आज ज़िंदा हैं, उन्हें क्या वही भारत नज़र आता है, जिसके लिए वे लड़े थे?



जिस देश को आज़ाद कराने के लिए इन सिपाहियों ने लाठियां और गोलियां खाईं, वह देश आज गांधी, नेहरू और सुभाष चंद्र बोस को स़िर्फ उनके जन्मदिन पर याद करता है. नई पीढ़ी तो आज़ादी के दीवानों के बलिदान के साथ-साथ आज़ादी के मायने भी भूल चुकी है. जिन लोगों की वजह से आज हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं, उन्हें हमने सम्मानित करना तो दूर, बदहाली के दलदल में छोड़ दिया है. उनके अनुभव से सीखना तो दूर, समारोहों में उन्हें बोलने का भी मौक़ा नहीं दिया जाता. हम शायद भूल रहे हैं कि ये साधारण लोग नहीं हैं, जीते-जागते इतिहास हैं. लेकिन हम इतने निष्ठुर और संवेदनहीन हो गए हैं कि इनकी अहमियत को समझने की अक्ल हमारे अंदर नहीं बची. वरना हम इन्हें दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर न होने देते. जिन लोगों ने देश को आज़ाद कराने में अपनी जवानी लुटा दी, आज हालत यह है कि उन्हें सचिवालयों में प्रवेश के लिए घंटों लाइन में खड़े होकर पास बनवाना पड़ता है. सबसे बड़ी समस्या इलाज कराने की है. अब इनकी वो उम्र नहीं है कि अस्पतालों में लाइन लग कर अपना इलाज करवा सकें. जो स्वतंत्रता सेनानी गांव में रहते हैं उनकी हालत और भी खराब है. सरकार कम से कम इतना तो कर सकती थी कि डाक्टरों को उनके घर भेज कर उनका हालचाल पूछ सकती थी.


सरकार की तऱफ से स्वतंत्रता सेनानियों के लिए कई तरह की योजनाएं हैं. लेकिन ये योजना सबके लिए नहीं है. हर राज्यों के अलग नियम हैं. हैरानी की बात यह है कि उन्हें खुद को स्वतंत्रता सेनानी साबित करने के लिए कई तरह सबूत पेश करने पड़ते हैं. सरकार स़िर्फ उन्हें ही स्वतंत्रता सेनानी मानती है, जो आज़ादी की ल़डाई के दौरान जेल गए, छह महीने से ज़्यादा भूमिगत रहे या उन्हें छह महीने अथवा उससे ज़्यादा समय के लिए ज़िला बदर किया गया हो. स्वतंत्रता सेनानियों को पेंशन लेने के लिए यह भी साबित करना पड़ता है कि स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने की वजह से अंग्रेजी हुकूमत ने उनकी संपत्ति की कुर्की कर ली या फिर उनकी नौकरी चली गई या फिर उन्हें सज़ा मिली. जो स्वतंत्रता सेनानी इससे संबंधित पर्याप्त काग़जात उपलब्ध नहीं करा पाते, उन्हें सरकार स्वतंत्रता सेनानी नहीं मानती. अगर चंद्रशेखर आज़ाद जीवित होते तो सरकार उन्हें स्वतंत्रता सेनानी नहीं मानती, क्योंकि वह अंग्रेजों से ल़डे तो थे, लेकिन कभी जेल नहीं गए, कभी नौकरी से निकाले नहीं गए.



आंध्र प्रदेश के उदूपी के  एक स्वतंत्रता सेनानी बाबू मास्टर के बारे में आपको बताता हूं. चौरानवे साल के बाबू मास्टर ने आज़ादी की लडाई में बढ़-च़ढ कर हिस्सा लिया. स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वे कांग्रेस के जाने माने कार्यकर्ता रहे. गांधी की विचारधारा पर चलते हुए पूरा जीवन बिता दिया. स्वतंत्रता संग्राम के  दौरान वो पूरे ज़िले में घूम-घूम कर चरखा बांटते थे. नमक सत्याग्रह आंदोलन में हिस्सा लेने वे मैंगलोर गए. आज भी वो गांधी के बताए रास्ते पर चल रहे हैं. शायद यही उनकी बदकिस्मती रही. आज़ादी के बाद कुछ समय के लिए उन्हें पेंशन ज़रूर मिली लेकिन अचानक अधिकरियों ने कहा कि उनकी पेंशन बंद हो गई है. वजह बाबू मास्टर स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने के बावजूद कभी जेल नहीं गए. उनकी पेंशन रुक गई. बाबू मास्टर दाने-दाने के लिए तरस रहे हैं. उन्हें देखने वाला कोई नहीं है.

मिलने वाली सुविधाएं

हरियाणा सरकार 1980 से सरकारी सेवाओं में प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के पदों पर स्वतंत्रता सेनानियों के पुत्रों-पुत्रियों, पौत्रों- पौत्रियों को 2 प्रतिशत आरक्षण प्रदान कर रही है. 1985 से सीधी भर्तियों में भी आरक्षण की सुविधा दी जा रही है. तमिलनाडु, हिमाचल और कुछ अन्य राज्य सरकारें भी इनके आश्रितों को शिक्षण संस्थानों में आरक्षण देती हैं. आंध्र प्रदेश सरकार के नई दिल्ली स्थित आंध्रा भवन में स्वतंत्रता सेनानियों को रुकने की सुविधा है, हिमाचल सरकार भी नई दिल्ली स्थित हिमाचल भवन में यह सुविधा प्रदान करती है, लेकिन राजस्थान सरकार ने ऐसी कोई भी व्यवस्था नहीं की. कर्नाटक सरकार मैसूर लैंड रेवेन्यू रूल 1960 के अंतर्गत सरकारी भूमि के आवंटन में स्वतंत्रता सेनानियों को प्रथम वरीयता प्रदान करती है. यही नहीं, मध्य प्रदेश सरकार भी भूमि आवंटन में उन्हें प्रथम वरीयता प्रदान करती है.



जेल जाने वाले स्वतंत्रता सेनानी और जेल नहीं जाने वाले स्वतंत्रता सेनानी में सरकार इतना भेद क्यों करती है. अधिकारियों को यह समझ मेंक्यों नहीं आता है कि जो लोग जेल नहीं गए उन्होंने ज़्यादा कष्ट उठाए हैं. जो लोग स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जेल गए वे तो जेल के अंदर बी केटेगरी के बंदी बनकर रहते थे. लेकिन जो लोग जेल नहीं गए उन्हें घर परिवार छोड़ कर अंडरग्राउंड होकर आंदोलन का काम करना पड़ता था. स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कांग्रेस सारे लोगों को जेल जाने से मना करती थी, क्योंकि अगर सारे लोग जेल चले जाएंगे तो जनता के बीच आज़ादी के आंदोलन को कौन चलाएगा. ऐसे ही लोगों के कंधों पर आंदोलन को आगे बढ़ाने का काम होता था. ये छुप कर काम करते थे. उनके पास न रहने का ठिकाना था न ही खाने-पीने की व्यवस्था. उनके पीछे पुलिस लगी रहती थी. वे महीनों घर से बाहर दर दर की ठोकरें खाते थे.

खबरें आती हैं कि स्वतंत्रता सेनानी बदहाली से तंग आकर आत्महत्या कर रहे हैं और कुछ आशावान लोग कभी न खत्म होने वाले धरने पर बैठे हैं. इससे ज़्यादा बदतर हालात और क्या हो सकते हैं कि आज स्वतंत्रता सेनानी सार्वजनिक स्थानों पर खुद को स्वतंत्रता सेनानी बताने से भी सकुचाते हैं. अगर हमें उनकी हालत पर थोड़ी भी शर्म आती है और उनके लिए वास्तव में कुछ करने की इच्छा है तो हमें उनकी ओर एक बार फिर से ध्यान देना होगा. जिनके पास कृषि योग्य भूमि नहीं है, उन्हें सरकार विशेष दरों पर ज़मीन मुहैय्या कराए. व्यवसायिक तौर पर मज़बूत बनाने के लिए उन्हें गैस एजेंसियां और पेट्रोल पंप आदि आवंटित हों. लेकिन आज यह सब होता नहीं दिख रहा. अगर हालात ऐसे ही रहे तो अगले दस सालों में देशभक्तों की ये पीढ़ी खत्म हो जाएगी.

ये तो स्वंय इतिहास हैं. अगर हम इन्हें वो इज़्ज़त देते, जिसके वो हक़दार हैं. अगर इन्हें हर स्कूलों में बुलाया जाता, बच्चों से मिलवाया जाता तो देश के बच्चे-बच्चे की रगों में देशभक्ति का लहू बहता. वे स्वतंत्रता संग्राम से वाक़ि़फ होते. आज़ादी की लड़ाई में दिए गए बलिदान को जानता और आज़ादी के मायने को समझ पाता. अ़फसोस की बात यह है कि हमने हाशिए पर डाल दिया है, उन्हें हम समाज के एक वेस्टीजियल ऑर्गन की तरह ट्रीट करते हैं.



भारत का स्वतंत्रता संग्राम इतिहास का ऐसा पन्ना है, जो कई मायनों में बेमिसाल है. आज़ादी के सिपाहियों की बहादुरी और त्याग की वजह से ही आज हम आज़ाद भारत में सांस ले पा रहे हैं. 1857 से शुरू हुआ स्वतंत्रता संग्राम 1947 तक चला. इसमें कई पीढ़ियों का संघर्ष और बलिदान शामिल है. देश को आ?ज़ाद कराने के लिए इस लड़ाई में जिन लोगों ने हिस्सा लिया, वे आज खुद को कोस रहे हैं. आएदिन भ्रष्टाचार, किसानों द्वारा आत्महत्या, नक्सलियों का बढ़ता प्रभाव, ग़रीब और अमीर में बढ़ता फासला, सांप्रदायिक दंगे, हिंसा और नेताओं के नित नए फरेब देखकर उनका कलेजा बैठ जाता है. उन्होंने जिस आज़ादी के लिए अंग्रेजों से लड़ाई की, वह तो कहीं नज़र नहीं आती.


स्वतंत्रता सेनानियों की संख्या


आंध्र प्रदेश                          14,573

असम                                4,438

बिहार एवं झारखंड              24,870

गोवा                                  1,436

गुजरात                              3,596

हरियाणा                            1,685

हिमाचल प्रदेश                    624

जम्मू कश्मीर                     1,806

कर्नाटक                            10,084

केरल                                3,228

मध्य प्रदेश                        3,468

महाराष्ट्र                            17,732

मणिपुर                             62

मेघालय                            86

मिजोरम                           04

नागालैंड                           03

उड़ीसा                              4,189

पंजाब                               7,008

राजस्थान                          811

तमिलनाडु                          4,099

त्रिपुरा                                887

उत्तर प्रदेश                         17,990

पश्चिम बंगाल                     22,484

अंडमान निकोबार              03

चंडीगढ़                              89

दादर नगर हवेली               83

दमन और दीव                  33

दिल्ली                          2,044

पांडिचेरी                        317


Wednesday, January 23, 2013

ग्राम स्‍वराज की ओर बढ़ते कदम



कहते हैं कि जब सरकारी तंत्र पूरी तरह से सड़ने लगे और लोकतंत्र स़िर्फ नाम का ही रह जाए तो ऐसे में विकास का रास्ता ज़डों की ओर लौटने से ही मिलता है. किसी भी देश के विकास की इमारत में उस देश के गांव और किसान नींव का काम करते हैं. भारत के  परिप्रेक्ष्य में तो यह नींव और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि भारत कृषि प्रधान देश है. जब इस देश में शहर और गांव के फासले नहीं थे, तब भारत के गांव ही इस देश की तकदीर और तस्वीर हुआ करते थे. सत्ता के नाम पर गांव में पंचायतें और मुखिया थे. पंच यानी पंचायतें, परमेश्वर का रूप मानी जाती थीं. न्याय व्यवस्था इतनी पारदर्शी थी कि पंच गांव के हर आदमी की सलाह के बाद ही सारे फैसले लेता था. इसलिए तब भारत के गांवों की तस्वीर इतनी चमकती थी.

 समय बदला. देश आज़ाद हुआ और भारत में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र क़ायम हो गया. देश में विकास की आंधी आ गई. कई क्रांतियां हुईं. देश की तस्वीर बदलने लगी. कल तक का ग्रामीण भारत देखते-देखते इंडिया हो गया और भारत के किसान और ग्रामीण इंडिया के विकास की आंधी में कहीं खो से गए. नतीजतन, गांवों का विकास ठप्प हो गया और महाराष्ट्र के विदर्भ से लेकर बिहार और उत्तर प्रदेश के गावों की बदहाली प्रदर्शन और धरनों के रूप में सामने आने लगी. इसी बीच एक बार फिर स्वराज की अवधारणा पनपी. कुछ जागरूक लोग ग्राम स्वराज अभियान से जुड़े. उन्होंने ही स्वराज लाने का यानी कि ग्राम सभा सुचारू कराने का तथा गांव का हर फैसला ग्राम सभा में ही कराने का इरादा रखते हुए इस अभियान को चलाया. और इसी स्वराज की कोख से हिवरे बाज़ार का जन्म हुआ.

महाराष्ट्र के अहमद नगर ज़िले का गांव हिवरे बाज़ार, एक ऐसा गांव जहां के लोग रोज़गार के लिए पलायन नहीं करते. गांव में रोज़ाना स्कूल की कक्षा लगती है, आंगनबाड़ी रोज़ खुलती है. राशन की दुकान भी ग्राम सभा के निर्देशानुसार संचालित होती है, सड़कें इतनी सा़फ कि आप वहां कुछ फेंकने से शरमा जाएंगे, जल संरक्षण में अव्वल इस गांव की सत्ता दिल्ली में बैठी सरकार नहीं चलाती, बल्कि उसी गांव के लोग इसे संचालित करते हैं. एक शब्द में यह भी कहा जा सकता है कि हिवरे बाज़ार ग्राम स्वराज का प्रतिनिधित्व करता है. हिवरे बाजार की कहानी से प्रेरणा लेकर कुछ जागरूक लोग उत्तर प्रदेश में ग्राम स्वराज को लोगों तक पहुंचा रहे हैं. इसके लिए वे समूह बनाकर गांव-गांव जाकर लोगों को हिवरे बाज़ार की कहानी बता रहे हैं और साथ ही उन्हें प्रोत्साहित कर रहे हैं, एक ऐसा ही गांव बनाने के लिए. इसी क्रम में पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के बागपत ज़िले में गांव-गांव जाकर लोगों को हिवरे बाज़ार की फिल्म दिखाई गई और फिर स्वराज की बात रखने का प्रयोग किया गया. इस अभियान के तहत गांव-गांव जाकर उस गांव के सक्रिय और गंभीर लोगों के साथ चर्चा की जाती और फिर एक बड़ी बैठक का आयोजन किया जाता है.



 इस बैठक में लोगों के साथ गांव की ज़रूरतों और समस्याओं पर चर्चा की जाती. हर गांव की आम समस्याएं होती हैं. मसलन, एक किसान को अपनी ज़मीन की फरद निकलवानी है, तो उसे पटवारी से लेकर एसडीएम तक न जाने किस-किस से गुहार लगानी पड़ती है. ग़रीब आदमी को अगर आय, जाति, निवास का प्रमाण पत्र बनवाना हो तो उसे भी ग्राम सचिव से लेकर उपर तक के अधिकारियों के धक्के खाने पड़ते हैं, लेकिन रिश्वत दिए बिना फिर भी उसका काम नहीं होता है. किसी गांव में बिजली के तार टूटे पड़े हैं तो कहीं ट्रांसफॉर्मर ही नहीं है. कहीं लोगों ने कहा कि सबसे पहले लड़कियों का स्कूल बनना चाहिए तो किसी गांव के लोगों ने कहा कि शहर से जोड़ने वाली बस होनी चाहिए. किसी गांव में गांव के अंदर की सड़कें खराब हैं तो किसी को अपने गांव को शहर से जोड़ने वाली सड़क ठीक करवानी है. कुल मिलाकर हल्की सी बातचीत से ही समझ में आ जाता है कि गांव में लोगों को क्या चाहिए. हर गांव वाला जानता है कि उसके गांव की क्या ज़रूरते हैं और इसके लिए उन्हें विशेषज्ञ होने की ज़रूरत नहीं है. इन सबके बाद इस बात पर परिचर्चा होती है कि पिछले चार-पांच सालों में गांव में सरकार ने क्या काम कराए हैं. आम लोगों की बातों और शिकायतों से पता चलता है कि गांव में जो काम कराए गए हैं, उनमें से ज़्यादातर की तो गांव में आवश्यकता ही नहीं थी.

लोगों से बिना पूछे योजनाएं बनीं, उनका पैसा आया और चूंकि लोगों की ज़रूरत ही नहीं थी, अत: लोगों ने भी उस ओर ध्यान नहीं दिया और सारा पैसा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया. बैठक में मौजूद गांववालों के मुताबिक़ सरकारी योजनाओं के बारे में न तो उनसे पूछा जाता है कि आपको क्या चाहिए और न ही इन योजनाओं के अमल में लाने में उन्हें कोई भूमिका ही दी जाती है. जबकि सारी कर सारी योजनाएं तो उनके गांव के लिए होती है. इसका सही उपाय बताते हुए उन्हें हिवरे बाज़ार गांव के विकास की कहानी को फिल्म के रूप में दिखाया गया. उन्हें बताया गया कि अगर उनमें भी विकास की चाह हो तो उनके गांव भी हिवरे बाज़ार की कहानी को दोहरा सकते हैं. उन्हें बताया गया कि अगर उनके गांव में भी ग्राम सभाएं विधिवत तरीक़े से होने लगें तो सारी की सारी समस्या ही खत्म हो जाएगी. हां, इसमें ज़रूरत स़िर्फ इस बात की है कि इस बार के पंचायत चुनाव में किसी ऐसे व्यक्ति को प्रधान बनाया जाए जो कि ग्राम सभाएं करे, उनकी समस्याएं सुने. महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले का गांव हिवरे बाज़ार, एक ऐसा गांव है.

जहां के लोग रोज़गार के लिए पलायन नहीं करते. गांव में रोजाना स्कूल की कक्षा लगती है, आंगन वाड़ी रोज़ खुलती है, राशन की दुकान भी ग्राम सभा के निर्देशानुसार संचालित होती है, सड़कें इतनी सा़फ कि आप वहां कुछ फेंकने से शरमा जाएंगे, जल संरक्षण में अव्वल इस गांव की सत्ता दिल्ली में बैठी सरकार नहीं चलाती, बल्कि उसी गांव के लोग इसे संचालित करते हैं. एक शब्द में यह भी कहा जा सकता है कि हिवरे बाज़ार ग्राम स्वराज का प्रतिनिधित्व करता है. हिवरे बाज़ार की कहानी से प्रेरणा लेकर कुछ जागरूक लोग उत्तर प्रदेश में ग्राम स्वराज को लोगों तक पहुंचा रहे हैं. इस मुहिम को कई चरणों में पूरा किया गया. पहले चरण में इस तरह की बैठकें  लगभग सात गांवों में की गईं. इसके नतीजे भी का़फी सकारात्मक रहे. सभी गांवों में खासकर नौजवानों में यह उत्साह देखने को मिला कि वे अपने गांव के हालात सुधारने के लिए वाकई  कुछ करना चाहते हैं. स्वराज अभियान में उन्हें एक रास्ता दिखाई दे रहा है. वैसे तो यह अभियान प्रदेश में होने वाले पंचायत चुनावों को ध्यान में रख कर चलाया जाता है, लेकिन अब इसे पंचायत चुनाव के अलावा भी दिखाया जा रहा है. हिवरे बाज़ार की कहानी सुनकर लोग खुद आह भरते हुए बात करने लगते हैं कि काश! हमारा गांव भी ऐसा हो पाता. इस बातचीत को आगे बढ़ाते हुए नौजवान साथी अपने गांव में भी स्वराज लाने का यानी कि ग्राम सभा सुचारू कराने का तथा गांव का हर फैसला ग्राम सभा में ही कराने का इरादा रखते हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बागपत ज़िले में काम कर रहे उत्साही कार्यकर्ता मनोज आर्य अब तक अपने ज़िले के 30 प्रमुख गांवों में हिवरे बाज़ार की कहानी दिखा चुके हैं. उनका काम करने का तरीक़ा बड़ा सीधा-सादा है. वो फिल्म की दो-तीन सीडी लेकर गांवों में जाते हैं. इन गांवों में उनके पहले से कुछ पुराने मित्र हैं, जो इस काम में उनकी मदद करते हैं. इन्हीं मित्रों के जरिए वे गांव में प्रचारित करवा देते हैं कि फलां तारीख को गांव के बारे में एक फिल्म दिखाई जाएगी.



इसके  लिए आवश्यक सीडी प्लेयर, टीवी सेट और बैटरी या जेनरेटर का इंतजाम प्राय: गांव वाले ही कर देते हैं. अब तक जहां कहीं भी मनोज ने फिल्म दिखाई है, वहां ग्रामीणों की प्रतिक्रिया बड़ी सकारात्मक रही है. गांव के लोग पूरे ध्यान से फिल्म देखते हैं. फिल्म देखने के बाद कई युवा फिल्म के प्रचार-प्रसार के लिए काम करने में भी रुचि दिखाते हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तरह पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी हिवरे बाज़ार की सीडी जोर-शोर से दिखाई जा रही है. लोगों को स्वराज के प्रति जागरूक किया जा रहा है. इसी तरह फैज़ाबाद, आजमगढ़, सुल्तानपुर बस्ती आदि ज़िलों के कार्यकर्ता पीपुल्स एक्शन फॉर नेशनल इंटीग्रेशन (पानी संस्था) के कार्यक्रम में इकट्ठा हुए. सबने अपने अपने अनुभव बांटे. प्रतापगढ़ से आई सुशीला मिश्र ने जब एक गांव में महिलाओं के समूह को यह फिल्म दिखाई तो गांव की महिलाओं ने उन्हीं से आग्रह किया कि दीदी इस बार आप ही प्रधान बन जाओ. फिर हम भी अपने गांव को हिवरे बाज़ार की तरह बना लेंगे.

पानी संस्था से जुड़े शशि भूषण अब तक इस फिल्म को विभिन्न ज़िलों के 70-80 स्थानों पर दिखा चुके हैं. जहां-जहां उन्होंने सीडी दिखाई, वहां के लोगों में कुछ कर गुज़रने का जज्बा पैदा हुआ है. कुछ ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों की परिस्थितियां महाराष्ट्र से अलग हैं, इसलिए हिवरे बाज़ार का प्रयोग यहां पूरी तरह से स़फल नहीं हो सकता. हालांकि ऐसी नकारात्मक बात करने वाले कम ही मिले हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश में ही चंदौली, कुशीनगर आदि ज़िलों में भी यह अभियान चल रहा है. गांव वालों के प्रतिक्रिया से कम से कम इतना तो स्पष्ट है कि वह अपने गांव के विकास के लिए कितने उत्साहित है. बस उन्हें सही सहयोग की ज़रूरत है. साथ ही अगला  पंचायती राज चुनाव उनके गांव में स्वराज लाने का एक बेहतरीन मौक़ा लेकर आएगा. अगर लोग इस मौक़े को भुना पाए तो फिर हर गांव की कहानी हिवरे बाज़ार की कहानी बन जाएगी