Thursday, July 4, 2013

ये खेल नहीं आसान

                                                  अंडर वॉटर हॉकी



भारत में स्पोट्‌र्स का जिक्र अमूमन क्रिकेट पर ही आकर ख़त्म हो जाता है. नाम के लिए भले ही हॉकी राष्ट्रीय खेल है, लेकिन सबसे ज़्यादा शर्मिंदगी देश को इसी खेल में उठानी प़डती है. रही बात फुटबॉल, बॉक्सिंग, कबड्डी, टेनिस और शतरंज जैसे खेलों की, तो इनकी बात स़िर्फ ओलंपिक और कॉमनवेल्थ जैसे आयोजनों तक सीमित रहती है. बाक़ी पूरा देश तो स़िर्फ क्रिकेट से ही टाइम पास करता है. जब भारत में पहली बार फॉर्मूला रेस हुई तो ज़्यादातर लोगों को इस खेल की तकनीकी जानकारी नहीं थी, सिवाय इसके कि इसका टिकट महंगा है और इसमें कारें दौड़ती हैं. जब तक लोग इसे समझते, तब तक यह ख़त्म हो चुका था. स्पोट्‌र्स ऑफ द वीक नामक इस कॉलम में हम हर हफ्ते दुनिया के कुछ प्रेरणादायक, अनोखे, रोचक और अजीबोग़रीब खेलों से रूबरू कराएंगे, जो भारतीय खेलप्रेमियों की नज़रों से अभी भी अछूते हैं. इस हफ्ते का स्पोट्‌र्स ऑफ द वीक है अंडर वॉटर हॉकी यानी पानी के अंदर हॉकी. अंडर वॉटर हॉकी को ऑक्टोपुश भी कहा जाता है. पानी के अंदर खेला जाने वाला यह खेल दुनिया भर में लोकप्रिय और दिलचस्प है. इस खेल की शुरुआत इंग्लैंड में 1954 में हुई थी. स्वीमिंग पूल के भीतर खेला जाने वाला यह खेल सामान्य हॉकी से न केवल कई मायनों में दिलचस्प है, बल्कि इसकी रूपरेखा और नियम-क़ानून भी काफी अलग हैं. इसके ऑक्टोपुश नाम के संबोधन के पीछे की कहानी कुछ यूं है. यह ऑक्टोपुश शब्द दो शब्दों ऑक्टो यानी आठ और पुश यानी धक्का देना से मिलकर बना है. चूंकि पहले इस खेल में एक टीम में आठ खिलाड़ी भाग लेते थे और इसकी बॉल यानी पक को धक्का दिया जाता है. इसीलिए ऑक्टो और पुश को मिलाकर इसे ऑक्टोपुश या ऑक्टोपश नाम दिया गया. हालांकि अब इसमें दस-दस खिलाड़ियों की दो टीमें भाग लेती हैं. मैच में प्रत्येक टीम के छह खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं. बाकी खिलाड़ियों को रिजर्व के तौर पर रखा जाता है. खेल की शुरुआत से पहले पक यानी बॉल को पूल की सतह के बीचोबीच रख दिया जाता है. जैसे ही बजर (एक प्रकार का अलार्म साउंड) बजता है, खिलाड़ी अपनी-अपनी स्टिक के साथ पानी की सतह पर जाकर प्रतिद्वंद्वी टीम पर गोल दागना शुरू कर देते हैं. मजे की बात तो यह है कि इसमें रेफरी को भी पानी के अंदर जाकर खिलाड़ियों पर ध्यान देना पड़ता है. दोनों टीमों की तऱफ की दीवारों को ही गोल प्वाइंट माना जाता है. एक बार पानी के अंदर जाने पर खिलाड़ी या तो तब बाहर आते है, जब सामने वाली टीम पर गोल हो जाए या रेफरी को लगे कि कहीं पर नियमों का उल्लंघन हुआ है. ज़रूरत पड़ने पर वह कई तरह की पेनाल्टियां भी देता है. पानी में जाने से पहले सभी खिलाड़ियों को ड्राइविंग मास्क, स्विमफिन, ग्लोव्स आदि पहनने के लिए दिए जाते हैं. अंडर वॉटर हॉकी के लिए हॉकी स्टिक काफी छोटी होती है. ताजा नियमों के अनुसार, यह  350 मिमी से ज़्यादा लंबी नहीं होनी चाहिए. इसका रंग काला और सफेद होता है. वहीं पक का आकार आइस हॉकी की बॉल के आकार जितना होता है. यह बॉल लेड या इसी प्रकार के अन्य किसी मैटेरियल से तैयार की जाती है, जिस पर प्लास्टिक कवर रहता है. मैच शुरू करते समय इस गेंद को पूल की सतह पर बीच में रखा जाता है. हर दो साल में ऑक्टोपुश की वर्ल्ड चैंपियनशिप का आयोजन होता है. चूंकि यह पानी के भीतर खेला जाने वाला खेल है, इसलिए इसके दर्शकों की संख्या कम ही रहती है. फिर भी इसे दुनिया के मजेदार और दिलचस्प खेलों में गिना जाता है. अगले सप्ताह बात होगी किसी और मजेदार खेल पर.

                                                              टो रेसलिंग




इस बार का स्पोट्‌र्स ऑफ द वीक है टो रेसलिंग. रेसलिंग के बारे में तो सभी जानते हैं, लेकिन यह खेल आम रेसलिंग से काफी अलग है. मसलन जिस तरह रेसलिंग में दो प्रतिद्वंद्वी आमने-सामने आकर अपने पूरे शरीर का दम-खम दिखाते हैं, इस खेल में खिलाड़ियों को वैसा नहीं करना पड़ता. यहां न तो खिलाड़ी एक-दूसरे को रिंग में पटखनी देते हैं और न अखाड़े में धोबी पछाड़. इस खेल को खेलने के लिए न तो किसी बहुत बड़े मैदान का इस्तेमाल होता है और न कोई बहुत भव्य ऑडिटोरियम. इस बार का स्पोर्ट ऑफ द वीक इस अजूबे खेल के बारे में, जिसमें हमें आदमी के पैरों के अंगूठे का दम दिखाई देता है. इस खेल में खिलाड़ी अपने पैर के अंगूठे को प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी के पैर के अंगूठे से दो-दो हाथ यानी दो-दो पैर कराता है. वैसे तो रेसलिंग यानी कुश्ती का खेल काफी पुराना है, लेकिन इस तरह की रेसलिंग कम से कम भारत के लिए तो विचित्र और अनूठी है. हालांकि अभी हमारे यहां भी यानी भारत में बहुत से बच्चे आपस में पंजा लड़ाते हुए, बाजुओं का जोर दिखाते हुए मिल जाते हैं, लेकिन बाकायदा नियमों के मुताबिक़ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर टो रेसलिंग की वर्ल्ड चैंपियनशिप कहीं नहीं होती. टो रेसलिंग असल में यूके में पॉपुलर होना शुरू हुआ. इसके बाद यह खेल धीरे-धीरे कई अन्य देशों में पॉपुलर हो गया. आज कई बड़े देशों में इसका आयोजन होता है. इसकी लोकप्रियता का ही नतीजा था कि इसकी वर्ल्ड चैंपियनशिप आज से कई सालों पहले 1970 में वेट्टन में कराई गई. अगर आप इस बात को जानने के इच्छुक हैं कि टो रेसलिंग पहली बार कब और कहां खेला गया तो इसकी भी जानकारी है. माना जाता है कि वर्ष 1970 से काफी पहले यह खेल स्टैफोर्डशायर, यूके के ओल्डे रोयाल ओक में पहली बार खेला गया. हर वर्ष स्टैफोर्डशायर में ही वर्ल्ड टो रेसलिंग चैंपियनशिप आयोजित होती है. इसमें महिला और पुरुष दोनों भाग ले सकते हैं. हाल के दिनों में ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे देशों को भी इस खेल ने खास तौर पर आकर्षित किया है. मतलब साफ है, न केवल यूके, बल्कि दुनिया भर में टो रेसलिंग की लोकप्रियता ब़ढ रही है. इस खेल के नियम काफी मजेदार होते हैं. इसे खेलने के लिए दोनों खिलाड़ियों को अपने जूते-मोजे उतारने पड़ते हैं. मजे की बात यह है कि इस नियम का पालन खिलाड़ी आदर स्वरूप एक-दूसरे के जूते-मोजे उतार कर करते हैं. फिर इसके बाद वन टू थ्री और कहीं-कहीं आई डिक्लेयर टो वॉर यानी मैं टो वॉर की घोषणा करता हूं, जैसे वाक्यों से यह दिलचस्प खेल शुरू हो जाता है. इस खेल प्रतियोगिता में प्रतियोगी अपने-अपने पांव के अंगूठे को आपस में भ़िडाते हैं और प्रतिद्वंद्वी के अंगूठे को पटखनी देने की कोशिश करते हैं. जो पीनिंग में सफल हो जाता है, वही विनर बनता है. अब आप सोच रहे होंगे कि पीनिंग का क्या मतलब होता है तो हम आपको बता दें कि यह दरअसल उस समय अंतराल का संकेत होता है, जिस दौरान खिलाड़ी अपने प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी के पैर के अंगूठे को दबाकर रखता है. यह समय अंतराल तीन सेकेंड के लिए दूसरे प्रतियोगी के पैर पर पैर रखने का होता है. वैसे देखा जाए तो यह खेल ऑर्म रेसलिंग और थम्ब रेसलिंग से काफी मिलता-जुलता है. यह दिलचस्प खेल आप भी ट्राई कीजिए. अगले हफ्ते बात होगी किसी और खेल पर.

                                                वाइफ कैरिंग (भारयस्यमीथम)



इस बार के स्पोर्टस ऑफ द वीक का नाम है वाइफ कैरिंग. यानी अपनी बीबी को अपने कंधों में उठाना. स़िर्फ उठाना ही नहीं उसे अपने कंधों पर सवार करके एक रेस भी लगानी होती है इस खेल में. यह खेल दुनिया भर के खेलों में काफी दिलचस्प माना जाता है. मूलरूप से फिनलैंड में जन्मे इस खेल की लोकप्रियता दिनोंदिन बढ़ती जा रही है. आज यह स्पोर्ट कई विदेशी मुल्कों से निकलकर भारत में भी पहुंच चुका है. हांगकांग में भी हर साल आयोजित होने वाले वाइफ कैरिंग कांपिटिशन में पतियों का जोश देखकर तो ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि शादी के बाद पति के मन में पत्नी के लिए प्यार कम हो जाता है. यह खेल देखिए, आपको मालूम हो जाएगा कि किस तरह से हसबैंड अपनी कमर की बिना परवाह किए भारी भरकम बीबियों को उठाकर रेस में भाग लेते हैं और विजेताओं को सम्मानित किया जाता है. सीटी बजते ही औरतें अपने अपने पतियों के  कंधे पर सवार हो जाती हैं और क़रीब 250 मीटर की दौड़ शुरू हो जाती है. फिनलैंड के सोनकाजावरी शहर में हर साल यह प्रतियोगिता होती है और दुनिया भर के पति पत्नी 50 यूरो की फीस देकर शामिल होते हैं. वहीं नॉर्थ अमेरिका में यह खेल कोलंबस डे के दिन यानी अक्टूबर के वीकेंड में न्यूरी मताइन में खेला जाता है. इसके अलावा यूएसए और हांग कॉन्ग समेत कई देशों में भी यह ज़बरदस्त पॉपुलर है. इसी पॉपुलरिटी ने इसे गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड में भी दर्ज कर दिया है. अगर आप सोच रहे हैं कि स़िर्फ पत्नी को कंधे में उठाकर भागने से ही आप इस रेस के चैंपियन बन जाएंगे तो एक बार और सोचिए. यह इतना आसान नहीं है. रास्ते में बाधा भी है और पानी भी. तैर कर निकलना है और छलांग भी लगानी है. पत्नी कंधे से गिर गईं तो आउट. और बाद में पति का क्या हश्र होगा, कोई गारंटी नहीं.. इसलिए पहले ही कह दिया जाता है कि प्रतियोगी अपनी सुरक्षा का ज़िम्मा ख़ुद उठाएं और ज़रूरत समझें तो बीमा करा कर आएं. पता नहीं इसमें पत्नी से पिटाई का क्लेम मिलेगा या नहीं. कभी कभी जानलेवा भी.. अगर इस स्पेार्ट के नियमों की बात करें तो वज़न का ख्याल रखना है, पत्नी 49 किलो से कम की नहीं होनी चाहिए. अगर हो तो फिर बाक़ी का वजन किसी तरह पूरा करना होगा. जीत गए तो पत्नी के वज़न के बराबर की बीयर मिलेगी और हार गए तो. ख़ुद ही सोचिए. 14 साल से चली आ रही प्रतियोगिता हर साल लोकप्रिय होती भारत के केरला के तिरुअनंतपुरम तक आ पहुंची है. तिरुअनंतपुरम में यह प्रतियोगिता पिछले साल यानी 2011 को 1 जनवरी के दिन एकॉर्न इंडिया ने आयोजित करवाई थी. यह संस्था पर्यावरण जागरूकता अभियान से जुड़ी है. यह संस्था भारत के विभिन्न इलाक़ों में इस प्रतियोगिता को ऑर्गेनाइस कराने का दावा भी करती है. अगर केरल की बात करें तो यह इस खेल को मलयाली भाषा में भारयस्यमीथम के नाम से जाना जाता है. वहीं एशियन कंट्री में इसे मटुकिनीना भी कहते हैं. अगर इसके इतिहास की बात करे तो फिनलैंड में इस खेल की शुरुआत को लेकर कई किस्से हैं. मसलन हेरको रेसवो नाम के एक चोर को इस खेल का आविष्कारक कह सकते हैं. दरअसल यह चोर 1880 के आसपास अपने गैंग के साथ गांवों में चोरी के साथ वहां की औरतों को चुराकर ले जाते थे. इसके लिए उसके गैंग के लोग औरतों को अपने कंधों पर उठाकर भागते थे. इस तरह से यह काम एक मज़बूत दमखम और मस्कुलर पॉवर वाला माना गया है. ग़ौरतलब है किसी भी खेल में मस्कुलर एक्टिविटी ही देखी जाती हैं. सो धीरे धीरे इसने एक विधिवत खेल की शक्ल लेली. और चोरी की जगह लोग अपनी पत्नियों को उठाए इस खेल में काम जाकर लेने लगे. है न मजेदार कहानी. अगले हफ्ते बात होगी किसी और दिलचस्प खेल पर.

                                                    स्नोबॉल फाइटिंग



इस बार का स्पोट्‌र्स ऑफ द वीक है स्नोबॉल फाइटिंग. जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर होता है कि यह एक फाइटिंग गेम है. एक ऐसा फाइटिंग गेम, जिसमें न तो मुक्कों से लड़ाई होती है और न हथियारों से. स्नोबॉल फाइटिंग में बर्फ को हथियार बनाया जाता है. इसमें दो टीमें एक-दूसरे पर बर्फ के गोलों की बौछार करती हैं और फिर होता है स्नोबॉल में बर्फ और खेल का दोहरा मज़ा. वैसे आप लोगों ने बचपन में कई बार पिलो फाइट यानी तकियों की लड़ाई वाला खेल ज़रूर खेला होगा. स्नोबॉल फाइटिंग भी काफी हद तक पिलो फाइट से मिलता जुलता है. अंतर इतना है कि पिलो फाइट घर के अंदर यानी इंडोर गेम है, जबकि स्नोबॉल फाइटिंग घर के बाहर यानी उस जगह पर खेला जाता है, जहां पर्याप्त मात्रा में बर्फ की उपलब्धता हो. अरे भाई, बर्फ के गोले बनाने के लिए बर्फ की ज़रूरत तो पड़ेगी न! 10 फरवरी, 2006 को मिशीगन टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी के लगभग 3749 छात्रों ने मिलकर यह खेल खेला था. इतनी बड़ी संख्या में स्नोबॉल फाइटिंग प्रतियोगिता में शामिल होने पर इसे एक वर्ल्ड रिकॉर्ड के तौर पर माना गया. इसके अलावा जापान में हर साल स्नोबॉल फाइटिंग प्रतियोगिता यूकिगासेन आयोजित की जाती है. जापानी में यूकिगासेन का अर्थ होता है हिम युद्ध. जर्मनी में बाकायदा इसकी वर्ल्ड चैंपियनशिप आयोजित की जाती है. वैसे अब यह खेल कई देशों में खेला जाने लगा है. मसलन पेससिंलवेनिया, बेल्जियम, वाशिंगटन डीसी, नॉर्थ अमेरिका, वर्जीनिया और उन तमाम मुल्कों में, जिन्हें बर्फीली जलवायु वाला देश माना जाता है. कहा जाता है कि क़रीब बीस साल पहले जापान के माउंट शोवा-शिनज़ैन रिसॉर्ट ने ठंड के मौसम में पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए यह खेल ईजाद किया था. यह खेल शतरंज, पेंटबॉल और बैकयार्ड ब्रावलिंग का मिश्रण है. इसे 44 बाई 12 गज के मैदान में खेला जाता है. हॉकी के मैदान जैसी लाल और नीले रंग की लकीरों से मैदान को बांटा जाता है. मैच में तीन मिनट के तीन भाग होते हैं. जो टीम दो भाग जीत लेती है, वह विजेता होती है. हर भाग में जिस टीम के अधिक खिलाड़ी खड़े पाए जाते हैं, वह जीत जाती है. इसके अलावा बर्फ के गोलों से बचते हुए जो दूसरी टीम का झंडा छीन लेता है, उसकी टीम जीत जाती है. फिलहाल जापान में यूकिगासेन की दो हज़ार से ज़्यादा टीमें हैं. पिछले साल अमेरिका में भी इसकी कई प्रतियोगिताएं हुई थीं. ऐसा भी नहीं है कि इस खेल में हमेशा मज़ा ही आता है, कभी-कभी यह मजेदार खेल कई प्रतियोगियों पर भारी भी पड़ जाता है. उदाहरण के तौर पर 9 दिसंबर, 2009 की घटना को ले लीजिए. इस दिन लगभग 4000 छात्रों ने बॉसकाम हिल पर स्नोबॉल फाइटिंग प्रतियोगिता में भाग लिया, लेकिन इस दौरान कई प्रतियोगियों को काफी चोटें आईं. कई लोगों की नाक टूटी तो कई लोगों ने अपनी कुहनियां तुड़वाईं. यहां तक तो ठीक था, लेकिन मामला तब बिगड़ गया, जब भीड़ ने बेकाबू होकर लूटपाट शुरू कर दी और सार्वजनिक संपत्ति को नुक़सान पहुंचाया. जिस रिकॉर्ड  को तोड़ने के लिए इसका आयोजन किया गया था, वह तो नहीं टूटा, कई लोग अपना अंग भंग ज़रूर करा बैठे.

                                                           वुड चॉपिंग



इस बार का स्पोट्‌र्स ऑफ द वीक है वुड चॉपिंग. वुड चॉपिंग यानी लकड़ियों की कटाई. पहले पहल तो इस खेल को देखकर लगता है कि शायद यह मज़दूरों का खेल है या फिर शहरों से दूर बसी उस आबादी का, जिसे लकड़ियों में खाना बनाना होता है. लेकिन जैसे ही अमेरिका और आस्ट्रेलिया में होने वाली वुड चॉपिंग चैंपियनशिप में शामिल होते हैं तो आप जान जाते हैं कि यह शौक़ीन मिज़ाज लोगों का एक अजूबा खेल है. आपने कालिदास की कहानी तो ज़रूर सुनी होगी. कालिदास पेड़ की जिस शाख पर बैठे थे, उसे ही काट रहे थे. जब उन्होंने ऐसा काम किया था, तब उन्हें दुनिया का सबसे बड़ा मूर्ख समझा गया था और आज भी लोग उस घटना को चट़खारे भरे अंदाज़ में एक-दूसरे पर फब्तियां कसने के लिए सुनाते रहते हैं, लेकिन कालिदास की अब उसी घटना को दुनिया के कई देश वुड चॉपिंग खेल के ज़रिए दोहरा रहे हैं. अब उन्हें कालिदास की तरह मूर्ख तो क़तई नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इस खेल में भाग लेने वाले प्रतियोगियों को बाक़ायदा ईनाम मिलता है. अब लकड़ी के मोटे लट्ठे को काटना खेल बन गया है. इस लट्ठे पर खड़े होकर तेज़ धार कुल्हाड़ी से इसे काटना होता है. जिसने जल्दी इसे दो टुकड़ों में काट दिया, वह जीत गया. इसके अलावा कई देशों में कुल्हाड़ी की जगह आरी का भी इस्तेमाल होता है. जर्मनी सहित कई यूरोपीय देशों, ऑस्ट्रेलिया, नार्वे, स्विट्‌ज़रलैंड, इंग्लैंड, कनाडा, स्लोवेनिया, स्पेन, फ्रांस, न्यूजीलैंड एवं अमेरिका में यह खेल खेला जाता है और टेलीविज़न चैनलों पर इसका सीधा प्रसारण होता है. अगर इस खेल की शुरुआत पर ग़ौर करें तो कहा जाता है कि यह खेल 1870 के आसपास तस्मानिया में पहली बार खेला गया था. इसकी शुरुआत भी बड़ी दिलचस्प थी. असल में तस्मानिया में 1870 के आसपास दो कुल्हाड़ी धारियों ने एक लकड़ी को सबसे पहले काटने के लिए क़रीब 50 डॉलरों की शर्त रखी थी. इसी शर्त ने वुड चॉपिंग को खेल का रूप दे दिया. हालांकि यह खेल उन्हीं देशों में खेला जाता है, जहां जंगल बहुत हैं और जहां की अर्थव्यवस्था का़फी हद तक लकड़ियों के व्यापार पर निर्भर करती है. वुड चॉपिंग की पहली वर्ल्ड चैंपियनशिप 1891 में लैटरोब में हुई थी. मोटे तौर पर इस खेल में कोई खास नियम तो नहीं होता. हां, किसी देश में कुल्हाड़ी तो किसी देश में विभिन्न प्रकार की आरियां इस्तेमाल होती हैं. कहीं पर लकड़ी का गट्ठा चॉप किया जाता है तो कहीं बाक़ायदा पूरा पेड़ काट दिया जाता है. प्रतियोगिता इस बात की होती है कि कौन सा चॉपर पेड़ को सबसे पहले काटकर गिराता है. वुड चॉपिंग के खेल में दुनिया के दो चैंपियन न्यूजीलैंड से आते हैं. जेसन व्यानयाड और डेविड बोल्सटैड नामक इन दो चैंपियनों की वजह से न्यूजीलैंड वुड चॉपिंग का टॉप लीडिंग कंट्री माना जाता है. इनमें से डेविड बोल्सटैड का गत नवंबर माह में निधन हो गया. न्यूजीलैंड के बाद ऑस्ट्रेलिया और यूके ऐसे देश हैं, जहां से वुड चॉपिंग के बेस्ट एक्समैन आते हैं. कुल मिलाकर लकड़ी काटने का यह फनी और मेहनत वाला खेल भले ही भारत में औपचारिक तौर पर न खेला जा हो, लेकिन हमारे गांवों में इस खेल के बादशाह सदियों से जंगलों में लकड़ियां काट रहे हैं.

Tuesday, July 2, 2013

कहीं बूंदबूंद को न तरसे जिंदगी




हम जीवन के मूल आधार जल को लेकर कितने संवेदनहीन और गैरजिम्मेदार हैं, यह तो देश में विकराल होते जल संकट से आसानी से समझा जा सकता है. लेकिन हाल ही में संवेदनहीनता की हद पार करते हुए कुछ नामी लोग जलसंकट की समस्या का मजाक उड़ाते भी दिखे.
गौरतलब है कि महाराश्ट्र के कई इलाके सूखे की चपेट में हैं, जिस के चलते कई किसानी अपनी फसल और जानवरों के लिए पानी उपलब्ध न कर पाने के चक्कर में प्रशासन से खुदकुषी तक की गुहार लगा चुके हैं. इसी बीच हमारे कर्मठ नेता महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री और एनसीपी चीफ शरद पवार के भतीजे अजित पवार बड़ी ही बेशर्मी से प्रैस के सामने कहते दिखते हैं कि जब बांध में पानी है ही नहीं तो क्या पेशाब करके दें पानी?
नेता के बाद हमारे तथाकथित धर्मगुरू आसाराम बापू तो इन से भी दो कदम आगे निकलते हुए महाराश्ट्रª में ही होली के नाम पर सरेआम लाखों टन पानी बहा देते हैं. महात्मा और नेता अगर इतने महान हैं तो हमारे अभिनेता भी भला पीछे रहने वाले हैं. लिहाजा शाहरुख खान अपनी होम प्रोडक्षन की फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस की शूटिंग के डैम से खरीदकर पानी को सिर्फ इसलिए बरबाद करते हैं क्योंकि उन्हें फिल्म के एक एक्षन सीन के लिए मोटरसाइकिल कीचड़ में दौड़ानी हैं.
जिस देश में आम आदमी पानी की एक बूंद के लिए तरस रहा है वहां साधु, नेता और अभिनेता पानी की बरबादी सिर्फ इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इन्होंने अपने जीवन में कभी पानी की किल्लत नहीं देखी. कभी सरकारी नलों या हैंडपंपों में लाइन नहीं लगाई और कभी पानी के लिए मारामारी नहीं की. लेकिन भविश्य में जब पानी जमीन से पूरी तरह खत्म हो जाएगा तब शायद इन्हें अंदाजा होगा कि इन्होंने कितना बड़ा अपराध किया है. बहरहाल अभी इन लोगों का जल संरक्षण से सरोकार नहीं है. राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक तौर पर जल को बचाने के लिए कोई गंभीर नहीं दिखता यह तो समझ में आता है पर आम आदमी यानी हम इस दिशा में कोई कदम क्यों नही उठाते, यह चिंता की बात है.

हम हैं जिम्मेदार
दरअसल विकास और लालच ने हमें स्वार्थी बना दिया है. नतीजतन अधिकांश नदियों, तालाबों, झील, पोखरों का अस्तित्व मिट गया. एक समय ये सभी माध्यम जल के मुख्य सोर्स हुआ करते थे. लेकिन आज हम इतने लापरवाह हो गए हैं कि हमें भविष्य के खतरे की आहट ही नहीं सुनाई पड़ रही है. वाटर क्राइसेस सर्वे से जुड़ी रिपोर्ट बताती हैं कि भारत में विश्व की लगभग 16 प्रतिशत आबादी निवास करती है, लेकिन उसके लिए मात्र तीन प्रतिशत पानी ही उपलब्य है. आंकड़े बताते हैं कि विश्व के लगभग 88 करोड लोगों को पीने का शुद्ध पानी नही मिल रहा है. मुंबई और चैन्नई जैसे महानगरों में तो पाइप लाइनों के वौल्व की खराबी के कारण रोज 17 से 44 प्रतिशत पानी बेकार बह जाता है. इस के अलावा हम घरों में ब्रश करते समय, नहाते और कपड़ागाड़ी धोने में बहुत जल बरबाद करते हैं. यदि पानी की एक बाल्टी से काम किया जा सकता है वहां दो बाल्टी पानी का उपयोग होता है. अधिकतर लोगों की यही सोच रहती है कि एक दो बाल्टी ओर खर्च हो जाए तो क्या है? लेकिन वे यह नहीं जानते कि जब एकएक बाल्टी करोड़ों लोग बरबार करते हैं तो कितनी मात्रा में पानी बरबाद होता है.
दरअसल भारत में पानी के प्रबंधन को लेकर कोई जागरूकता नहीं दिखती. बरसात के पानी को संरक्षित करने की दिशा में हम कोई ठोस कदम नहीं उठाते. इसलिए जलवर्शा की हार्वेस्टिंग भी कहींकहीं हो पा रही है. हम पीने वाले पानी और इस्तेमाल करने वाले पानी में अंतर नहीं समझते. कहा जाता है कि एक दौर में तेल को लेकर जंग होती थी अब पानी को लेकर होगी. इस में कोई दोराय नहीं है कि पानी को लेकर छिटपुट लड़ाइयां तो अभी से शुरु हो चुकी हैं. ऐसे में अगर तीसरे विष्वयुद्ध के पानी को लेकर होने की बात कही जाती है तो कोई आष्चर्य नहीं होना चाहिए.


पानी बचाएं ऐसे
आधुनिकता की दौड़ में हम जल के महत्व को सही मायनों में महसूस नहीं कर पा रहे हैं. जबकि जल को बचाए रखना नई पीढ़ी की जिम्मेदारी है. प्रत्येक नागरिक को व्यक्तिगत स्तर पर पानी का दुरुपयोग न कर बचत भी करनी चाहिए. समय आ गया है जल संरक्षण और पानी की बचत की दिशा में गंभीर होने का. आवष्यक हो तो पानी का दुरुपयोग रोकने के लिये विदेशों की तर्ज पर कड़े कानून बनाने चाहिए.
आज जरूरत है कि पर्यावरण संरक्षण के साथसाथ निरंतर घटते जल स्तर को बढ़ाया जाए. अंधाधुंध वृक्षों को काटने के बजाए हमें नए पेड़पौधे रोपने होंगे. इस से बारिश होगी और जमीन का गिरता जलस्तर सुधरेगा. बरसात के पानी का संरक्षण भी बेहद जरूरी है. यह पानी जानवरों का पिलाने, फसल की सिंचाई से लेकर कई जरूरी कामों में इस्तेमाल हो सकता है. अगर शुरुआत खुद से की जाए तो दूसरों को भी इसके लिए शिक्षित और प्रेरित किया जा सकता है.
प्रत्येक नागरिक का दायित्व है कि कोई जल का दुरुपयोग कर रहा हो तो उसे उसके दुष्परिणाम बताते हुए ऐसा करने से रोकें. विषेशज्ञ मानते हैं कि जल संकट से नजात पाने के लिए कई कारगर हल हो सकते हैं, जैसे सरकार द्वारा पानी पर टैक्स लगाना या नदियों को समुद्र में मिलने से रोकना. हालांकि यह उपाय सरकार पर आश्रित है. इस के साथ ही किसानों को समझाया जा सकता है कि फसलों को  इस तरीके से लगायें जिससे पानी का न्यूनतम उपयोग हो. सरकार और आम लोग मिलकर ही इस समस्या से नजात पा सकते हैं.
जल का अंधाधुंध और विवेकहीन प्रयोग ही जलसंकट का बससे बड़ा कारण है. यहां कुछ आम तरीके बताएं जा रहे हैं जिन पर यदि हर आदमी अमल करे तो काफी हद तक इस समस्या का समाधान मिल सकता है.

  • टूथब्रश करते समय नल खुला न छोड़ें.
  • टब या शावर के बजाएबाल्टी में नहाने से काफी पानी बचता है.
  • किसी भी पाइप या नल में से पानी टपक रहा है तो उसको ठीक करवाएं.
  • रोज कपड़े धोने से ज्यादा पानी खर्च होता है इसलिए इकठ्ठा कपड़े धोएं.
  • वाशिंग मशीन पर एक साथ जमा कपड़े धोएं बारबार कपड़े धोने से पानी बरबाद होता है.
  • टौयलेट में पानी की टंकी को आधा दबाएं.
  • टौयलेट में लगी फ्लश की टंकी में प्लास्टिक की बोतल में रेत भरकर रख देने से हर बार एक लीटर जल बचता है.
  • पानी को तरीके से गिलास में डालकर ही पीएं.
  • सब्जी, बरतन आदि धोने के बाद जमा पानी को पौधों में डाल दें, या फिर पोंछा, फर्श की धुलाई, कार धोने या टौयलेट आदि में प्रयोग करें.
  • एक सप्ताह में पौधों को पानी दें रोज देने से पौधों की जड़ें कमजोर हो सकती हैं.
  • अपने पालतू जानवरों को गार्डन में नहलाएं, ताकि पानी घास व पौधों को मिल सके.
  • बरसात का पानी जमा करें. इस का पानी कई जरूरी कामों में इस्तेमाल किसा जा सकता है.
  • ग्रामीण इलाकों में धरती में गढ़्डे आदि खोदकर उसमें बरसात का जल जमा किया जा सकता है.
  • गाड़ी धोने के लिए पाइप के बजाए बाल्टी का पानी ही इस्तेमाल करें.
  • नाली को साफ रखें वरना सफाई में बहुत पानी व्यर्थ जाएगा.
  • पानी की समस्या को हल करने में रीसाइकलिंग एक बेहतर विकल्प है.
  • पेंट, थर्मामीटर, कीटनाशक और पारे को नदी, नाले और सीवर में नहीं डालें इससे पानी को रसाइकिल करने में कठिनाई होती है.
  • तकनीक के जरिए खारे जल को शुद्ध कर इस्तेमाल कर सकते हैं.



Monday, July 1, 2013

जब प्रपोज करने का अंदाज हो खास तभी बनेगी बात




आंखों ही आंखों में इशारा होता है फिर रूठनेमनाने का सिलसिला षुरू होता और फिर दिल की बीत जुंबा पा लाने का वक्त आता है. तब बारी आती है अपने दिल के सबसे करीब शख्स को हमेषा हमेषा के लिए अपना बनाने का. यानी उसे प्रपोज करने का. अक्सर पहली मुलाकात में आंखे ही जुबां बनकर दिल का काम कर देती हैं पर जब उसे अपना जीवन साथी बनाने की बारी आती है तब तो जरूरत होती है एक एक ऐसे यादगार प्रपोजल की जिससे न सिर्फ बात बन जाए बल्कि ताउम्र दोनों को उस खूबसूरत प्रपोजल की यादें प्रम के कच्चो धागे से जोडें रखें. लेकिन यह इतना आसान नहीं है. प्यार करना भले ही आसान लगे पर प्यार का इजहार करना यानी  प्रपोज करमे तक्च अच्छे अच्छे लडखडा जाते हैं. कई लोग तो प्रपोज करने की कला को ही नहंी समझते. नहीं तो बनी बनाई बात के बिगडने का अंदेशा बना रहता है.
इसलिए बेस्ट प्रपोजल ही आपको अपी प्रेयसी का जीवन भर का साथ देता है. एक पे्रमी ने जब अपनी प्रेमिका को अपने पैर की हड्डी से बनी रिंग पहनाकर प्रपोज किया तो उसकी प्रेमिका उाके प्रपोज करने के अंदाज वर कुछ इस करद फिदा हुई कि उसने उसे फौरन खुषी खुषी अपना हाथ दे दिया. माइक पेरेत भारत में एक दुर्घटना में अपना पैर गंवा बैठे और फिर उन्होंने अपने पिंडली की हड्डी से एक रिंग तैयार कराई. एक रात डिनर के दौरान जब माइक ने मेलिटा को यह रिंग सौंपी तो वह प्रोपोज करने के इस तरीके से खिल उठीं. कुछ ऐसा ही षानदार और यूनीक तरीका अपनाकर ही प्रपोजल को सफल बनाया जा सकता है. 
यह सच है कि किसी से प्यार होने पर आपकी जिंदगी के मायने ही बदल जाते हैं. अपने आप में एक आत्मविश्वास पैदा होता है. पर जब प्रपोज करने की बात आती है तो  अक्सर लेाग गलती कर बैठते हैं. हम आपको बताते हैं कि कैसे अपनी गर्लफ्रेंड को खूबसूरत और यादगार प्रपोजल से हमेषा के लिए अपने दिल के करीब किया जा सकता है.

सस्ती नहीं स्पेशल रिंग
प्रपोजल के दौरान ज्यादातर युवा एक ही गलती करते हैं और वो है रिंग यानी अंगूठी का चुनाव. एक यही रस्म होती है जो आपकी प्रयेसी को प्रपोजल के दौश्रान सबसे ज्यादा भाती है. जब आप उसकी खूबसूरत उुगलियों में एक प्यारी और स्पेशल रिंग डालकर उसे अपना बनाने के लिए प्रपोज करते है। उसी वक्त वो अपनी उंगली के साथ आपना हाथ आपके हाथों में हमेषा के लिए दे देती है. इसलिए सही रिंग का सेलेक्षन बहुत इंर्पोटेंट रोल प्ले करता है. अक्सर लोग या तो बहुत सस्ती रिंग से प्रपोज करते  हैं या फिर वे महंगी रिंग तो खरीद लेते हैं पर उसका डिजायन उनके मनमाफिक नहीं ले पाते. जबकि लडकियां ज्वैलरी के मामले में बहुत चूजी होती हैं इसलिए रिंग के माामले आप किसी नजदीकी महिला मित्र या किसी औश्र की मदद ले सकते हैं.

राइट टाइम और मैनर्स
अपनी प्रेमिका को प्रपोज करते समय यह जानना बहुत जरूरी है कि वो भी इसके लिए मानसिक रूप से तैयार है या नहीं. अगर नहीं तो फिर सही समय का इंतजार करें नहीं तो बनी बनाई बात बिगड भी सकती है. अपने लव को प्रपोज करते समय अपनी आवाज को कंट्रोल में रखें. जोश में आकर जोर-जोर से न बोलने लगें और न ही इतना धीमे बात करें कि आपके पार्टनर को ही सुनाई न दे. 
क्रिएटिव अल्फाज और तरीके
 याद रखे कि आपका यह प्रपोजल आप दोनो ंकी जिंदगी की षुरुआत का बेहतद अहम पहले है. यही पल आपको ताउम्र एक दूसरे के करीब रखता है इसलिए इस पल को जितना ज्यादा यादगार बना सकें उतना अच्छा. इसके लिए थोडा क्रिएटिव होकर कोई प्यार सी गजल, कविता, तोहफा, पार्टी या क्रिएटिव सरप्राइजिंग प्रपोजल के जरिए अपने प्यार को अपना बनाया जा सकता है.

रिजेक्शन से डरें नहीं
आम तौर पर  हम अपने लव से प्यार तो कर लेते हैं उसके साथ वक्त भी बिता लेते हैं पर जब प्रपोज करने का समय आता है तो जुबां पर ताला लग जाता है. इसकी कइ्र वजहें होती हैं जिसमें कोई नर्वस हो जाता है तो कोई झिझकने लगता है औश्र किसी को प्रपोजल के रिजेक्ट होने का भय सताता है.  इसलिए जब भी आप तय कर लें कि अग प्रपोज करना है पेरे आत्मविष्वास के साथ उसे प्रपोज करें. मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि इस समस्या से निजात पाने के लिए झिझक को तोड़ना जरूरी है.  रजौरी गार्डन की मुक्ता कहती हैं कि आज मेरी मेरी शादी को 15 साल होने वाले हैं. मैं और मेरे पति कौलेज के जमाने से ही एक दूसरे से प्रेम करते थे पर इन्होंने मुझे प्रोपोज किया था तो वह सामने खड़े होकर बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाए. बाद में उन्होंने मुझे प्रेम पत्र लिख कर प्रोपोज किया. खैर यहां  तो मुक्ता थीं जो मान गईं पर कई ये झिझक आपे से आपका सबसे प्यारा साथ्ी दूर कर देती है.

रहें कान्फीडेंट और फ्रेश
अगर आप कहीं दूर ले जाकर प्रपोज करना चाह रहे हों तो जाने से पहले सबसे पहली बात ध्यान में रखें कि आप ज्यादा थके हुए न हों. इससे बचने के लिए भरपूर नींद लें. यदि कहीं लांग ड्राइव पर जा रहे हैं तो पूरी तरह से पैक होकर जाएं. ध्यान रखें कि ज्यादा लंबी दूरी तक ड्राइव न करना पड़े नहीं तो आप थक जाएंगे. जहां तक हो सके कपड़ों के चयन में सावधानी बरतें. ऐसा कुछ न पहनें जिससे आपको परेशानी हो, न ही ऐसा कुछ पहनें जिससे आपको शर्मिदगी उठानी पड़े. साथ ही कपड़ों के रंग का चयन करते समय ये ध्यान रखें कि आपके पार्टनर को कौनसा रंग पसंद है. निश्चित ही ये बहुत छोटी सी बात है लेकिन इसे आप खुद ही महसूस करेंगे, जब उनका पसंदीदा रंग पहनकर उनसे मिलेंगे. फिर सही मूड और जगह देखकर आप प्यार से उसे प्रपोज कर सकते हैं.


जो न हो उनको पसंद
प्रेमिका को प्रपोज करने से पहले अपने लव की पसंद के बारे में जानना बहुत ही जरुरी है. इससे संबंध मजबूत होते हैं और एकदूसरे को समझने में भी मदद मिलती है. इसलिए जब भी आप अपने लव को  प्रपोज करें उनका पसंदीदा रंग, पसंदीदा फूल, उन्हें आपसे क्या सुनना पसंद है, पसंदीदा गीत,पसंदीदा रेस्टोरेंट, भोजन, आइसक्रीम, स्नेक्स, चॉकलेट, उनका शौक, ऐसा पसंदीदा स्थान जहां वो एकांत में समय बिताना चाहती हों, मनपसंद परफ्यूम और मेकअप ब्रांड, सैर-सपाटा के लिए मनपसंद जगह, मनपसंद ड्रेस आदि के बारे में जानकर उसी हिसाब से प्रपोज करें.यदि आपकी गर्लफ्रेंड को रोमांच भरे खेल पसंद हैं तो रौक क्लाइंबिंग के बाद पहाड़ी के सबसे ऊपरी चोटी पर पहुंच कर उसे वहीं से प्रपोजकर सकते हैं. अगर उसे पानी पसंद है तो समुद्र की गहराई में मछलियों के बीच प्रपोज करना उसे लुभा सकता है पर अगर उसे पानी पसंद नहीं है तो फिर ये आइडिया उल्टा भी पड सकता है. इसलिए जरूरी है कि जब भी आप अपनी प्रेमिका को प्रपोज कर रहे हों तो उसके बारे में पूरी तरह से समझ जरूर लें.
सही लोकेशन है जरूरी
प्रपोज करने की जगह चुनते वक्त बहुत जरूरी है कि ऐसी जगह चुना जाए जां आपके पार्टनर के मुताबिक सही हो. नहीं तो बात गिड भी सकती है. इसलिए  स्थान का विशेश ध्यान रखना बेहद जरूरी है. किसी भी ऐसी जगह न जाएं जो वीरान हो और न ही किसी ऐसे सार्वजनिक स्थल का चयन करें, जहां परिवार के लोग आते हों क्योंकि इससे बार-बार उनकी नजरें तो आपको भेदेंगी ही आप भी उनकी  उसे सही तरह से प्रपोज नहीं कर पाएंगे.

यादगार तोहफा
उपहार वो जरिया हैं जिनसे आप अपने प्यार को और भी अच्छी तरह से जता सकते हैं. अगर आन अपने लव को प्रोज कर रहे हैं तो कोई ऐसा खूबसूरत तोहफा देस कते हैं उसके दिल के सबसे करीब हो बस बात बन जाएगी. फिश्र चाहे वो उसके बचपन के खूबसूरत लम्हों को कैद किए  फोटोग्राफस हो, फेवरेट ड्रेस, कहीं ट्रिप का टिकट या फिर कोई खूबसूरत सी रिंग. हालांकि ये जरूरी नहीं कि प्रपोजक रते समय  उपहार ही दिया जाए.

कुछ बेस्ट प्रपोजल

  • ख्ूाबसूरत सी रिंग देकर प्रपोज करें जो कभी उसने खरीदने की ख्वाहिश की हो.
  • अपनी गर्लफ्रेंड के साथ फिल्म देखने का प्लान करें और फिल्म के बीच में ंनरदे पर अपने प्यारे से प्रपोजल की रिकार्डिंग प्ले करवाएं.
  • फ्लाइट में अगर साथ जा रहे हां तो वहां के इंटरकॉम से भी उसको प्रोपोज कर सकते हैं.
  • उनकी किसी पसंदीदा चीज पर विल यू मैरी मी? का प्यार सा काई लगाकर छेाड सकते  हैं जब अकेले में वो उसे देखंेगी तो उसे आपका यह अंदाज जरूर भाएगा.
  • अगर उन्हें बारिश पसंद हो तो गर्लफ्रेंड को रिमझिम बारिश में एक लांग ड्राइव पर ले जाएं. और उस रोमांटिक माहौल में उसे शादी के लिए प्रपोज करें.



आज की लाइफ बहुत ज्यादा फास्ट है बावजूद इसके इश्क और प्रेम की परिभाषा को वक्त बदल नहीं पाया है इसलिए प्यार के इजहार को खूबसूरत और यादगार बनाकर ही अपने साथी को जीवनसाथी बनाया जा सकता है.
                                                     

Saturday, June 29, 2013

बीडी मजदूर : जीवन में खुशहाली कब आएगी




किसी भी देश की आर्थिक उन्नति उसके औद्योगिक विकास पर निर्भर करती है. अगर वह किसी विकासशील देश की बात हो तो वहां के लघु उद्योग ही उसके आर्थिक विकास की रीढ़ होते हैं. भारत भी एक विकासशील देश है. ज़ाहिर है, भारत के विकास की कहानी के पीछे भी इन्हीं उद्योगों का योगदान है, लेकिन अब भारत धीरे-धीरे विकासशील देशों की कतार में का़फी आगे आ चुका है. यहां ब़डी-ब़डी मल्टीनेशनल कंपनियां पैसा लगा रही हैं. अरबपतियों की लिस्ट में भारत ठीकठाक पायदान पर अपनी जगह बना रहा है. हम कह सकते हैं कि भारत में औद्योगिक क्रांति अपनी सफलता के चर्मोत्कर्ष पर है, लेकिन इस सबके बीच शायद हम उन उद्योगों और उनमें काम करने वाले लोगों को भूल गए हैं, जिन्होंने भारत के आर्थिक विकास में न स़िर्फ महती भूमिका निभाई, बल्कि आज भी जब भारत पर आर्थिक संकट मंडराता है तो इन्हीं उद्योगों की बदौलत देश का आर्थिक तंत्र टिक पाता है.

वर्तमान में अगर बीड़ी उद्योग के स्वरूप की बात की जाए तो भारत में क़रीब 300 बड़े काऱखाने बीड़ी बनाने के काम में लगे हैं और कई हज़ार अन्य छोटे काऱखाने हैं. यह उद्योग क़रीब 44 लाख लोगों को सीधे तौर पर रोज़गार देता है और क़रीब 40 लाख लोग बीड़ी से संबंधित अन्य कामों में लगे हुए हैं.




यही हाल अस्तित्व के संकट से जूझ रहे बीड़ी उद्योग का है. एक दौर था, जब भारतीय बाज़ार में सिगरेट कंपनियां इस क़दर नहीं छाई हुई थीं, उस वक़्त भारत का बीड़ी कारोबार ज़ोरों पर था. उस वक़्त सिगरेट बहुत खास तबक़ा ही पिया करता था. उस दौरान बी़डी के कारोबार से जु़डे व्यवसायी और उत्पादन प्रक्रिया में शमिल मज़दूर अपने-अपने रोज़गार से खुश थे. समय बदला, सिगरेट की खपत ब़ढ गई और बी़डी कारोबारियों का मुना़फा कम होने लगा. लेकिन जैसा कहते हैं कि व्यापारी तो अपना ऩफा कहीं न कहीं से निकाल ही लेता है, सो बीड़ी व्यापारी भी उन राज्यों की तऱफ अपना व्यापार ब़ढाने लगे, जहां बीड़ी की खपत ज़्यादा होती है. इन इलाक़ों में मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों का नाम लिया जा सकता है. इस क़दम से बी़डी का उत्पादन ब़ढ गया और व्यापारी भी मुना़फे  में आ गए, लेकिन इस बदलाव की सबसे ब़डी मार जिन पर प़डी, वे थे बी़डी मज़दूर. वे कहीं के नहीं रहे. वे दैनिक मज़दूर की तरह दिहा़डी पर ही सिमट कर रह गए. वर्तमान में अगर बीड़ी उद्योग के स्वरूप की बात की जाए तो भारत में क़रीब 300 बड़े काऱखाने बीड़ी बनाने के काम में लगे हैं और कई हज़ार अन्य छोटे काऱखाने हैं. यह उद्योग क़रीब 44 लाख लोगों को सीधे तौर पर रोज़गार देता है और क़रीब 40 लाख लोग बीड़ी से संबंधित अन्य कामों में लगे हुए हैं. अब अगर आप सोच रहे हों कि इस धंधे से जुड़े मज़दूरों का मेहनताना क्या है तो आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि राज्य सरकारों द्वारा बीड़ी लपेटने के काम में लगे लोगों के लिए जो मज़दूरी निर्धारित की गई है, वह प्रति 1000 बीड़ी लपेटने पर उत्तर प्रदेश में 29 रुपये और गुजरात में 66.8 रुपये है. अब आप सोच सकते हैं कि इतनी दिहा़डी में कोई अपने के लिए रोटी का इंतज़ाम कैसे करता होगा, परिवार का पेट पालने की बात तो बहुत दूर है. ऐसा नहीं है कि इस व्यापार में मुना़फा नहीं है. असल में मुना़फा तो बहुत है, लेकिन मज़दूरों का शोषण जानबूझ कर किया जाता है. एक रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत के बीड़ी उद्योग ने वर्ष 1999 में क़रीब 16.5 अरब उत्पाद कर और 20 अरब विदेशी विनिमय राजस्व भारत सरकार के लिए एकत्रित किया. इन आंक़डों से इतना तो समझा जा सकता है कि सरकार और इससे जु़डे व्यवसायी इन मज़दूरों के  विकास के  प्रति कितने उदासीन हैं. इनकी तुलना अगर सिगरेट कंपनियों के मज़दूरों से की जाए तो देखेंगे कि उनके  लिए न स़िर्फ अच्छे मेहनताने का इंतज़ाम है, बल्कि काऱखाने में उनको स्वास्थ्य संबंधी कई सुविधाएं भी मुहैया कराई जाती हैं. लेकिन बी़डी मज़दूरों के लिए न तो कोई काऱखाना होता है और न उनकी सुरक्षा का कोई इंतज़ाम. इसलिए वे बेचारे अपने घरों में ही बैठकर बी़डी बनाते हैं और न्यूनतम दिहा़डी में मालिकों को सप्लाई करते हैं. असली मुना़फा मालिक खाता है.

यह तो रही मेहनताने की बात और ज़रा बी़डी मज़दूरों के स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों और स्वास्थ्य के नाम पर मिलने वाली सुविधाओं पर नज़र डालते हैं. इस बात से तो सभी वाक़ि़फ हैं कि बीड़ी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है. यह हानि स़िर्फ पीने वालों को ही नहीं, बल्कि उन्हें भी होती है, जो इसके निर्माण कार्य से जुड़े होते हैं. इन मज़दूरों को टीबी, अस्थमा, फेफड़े के रोग और चर्म रोग होने का खतरा बना रहता है. जो महिलाएं अपने शिशुओं को काम पर ले जाती हैं, उन शिशुओं को नन्हीं सी उम्र में ही तंबा़कू  की धूल और धुंआ झेलना पड़ता है. जो बाल मज़दूर इस काम में लगे हैं, उन्हें श्वास और चर्म रोग होना आम बात है. बीड़ी लपेटने के दौरान मज़दूर किसी भी तरह के दस्ताने और मास्क आदि का प्रयोग नहीं करते, जिससे उनके शरीर में तंबा़कू आदि के कण प्रवेश कर जाते हैं. शोध बताते हैं कि जो लोग बीड़ी के पत्ते की कटाई के काम में लगे हुए हैं, उनके पेशाब में निकोटिन की मात्रा पाई गई है. 45 साल की उम्र आते-आते बीड़ी मज़दूरों के हाथों की उंगलियों की ऊपरी सतह की खालें मर जाती हैं और वे काम करना बंद कर देती हैं. इस परिस्थिति में वे लोग जो बी़डी बनाने का काम नहीं कर पाते, भीख मांगना शुरू कर देते हैं. आश्चर्य की बात यह है कि इन मज़दूरों के स्वास्थ्य से संबंधित उक्त सारी जानकारियां सरकारी सर्वे में ही सामने आती हैं और इसके बावजूद सरकार स़िर्फ काऱखाना मालिकों के हितों का ही ध्यान रखती है.


कहने के लिए सरकार बी़डी मज़दूर कल्याणकारी फंड के तहत उन्हें शिक्षा, चिकित्सा, बीमा योजना, घर का किराया आदि प्रदान करने की बात करती है. इसके अलावा काम के  दौरान बी़डी मज़दूर को यदि किसी प्रकार की समस्या आती है तो उसे बीमा योजना के  अंतर्गत आर्थिक सहायता प्रदान किए जाने की बात कही जाती है, लेकिन ये सारी सुविधाएं कितने मज़दूरों को मिलती हैं, इसका आंक़डा किसी के पास नहीं है. पिछले दिनों सरकार ने चिकित्सा स्मार्ट कार्ड के ज़रिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना का लाभ बी़डी मज़दूरों को भी देने की मंज़ूरी दे दी है. इस योजना के तहत बी़डी मज़दूरों के परिवारों को तीस हज़ार रुपये वार्षिक सहायता दी जाएगी. इससे अधिक की राशि कल्याण आयुक्त द्वारा मौजूदा नियमों के अनुसार पैनल में रखे गए अस्पतालों को सीधे दी जाएगी. अब इस योजना का लाभ पाकर कितने बीड़ी मज़दूरों का जीवन संवरता है, देखने वाली बात होगी. इस तरह ये मज़दूर आर्थिक और सामाजिक स्तर पर इस क़दर पिछ़ड जाते हैं कि फिर इनका पूरा परिवार सज़ा के तौर पर इसी व्यसाय का ग़ुलाम बनकर रह जाता है. दरअसल इस तरह धंधे में ज़्यादातर वही लोग काम करते हैं, जो समाज के उस तबक़े से संबंधित हैं, जहां न तो शिक्षा है और न रोज़गार के अवसर. नतीजतन, पी़ढी दर पी़ढी लोग बीड़ी के धुएं में उड़ जाते हैं.

ऐसा नहीं है कि लोग इस व्यवसाय से छुटकारा नहीं पा सकते. ये लोग चाहें तो जबलपुर के अंसार नगर के बी़डी मज़दूरों से बहुत कुछ सीख सकते हैं. कुछ साल पहले इस इलाक़े के कुछ युवाओं ने ठान लिया कि वे बी़डी नहीं बनाएंगे. उन्होंने एम्ब्रोडरी और सिलाई की ट्रेनिंग ली और घर पर ही काम शुरू किया. आज 30 लाख की आबादी वाले इस इलाक़े में आधे से अधिक घरों में यह काम हो रहा है. इन लोगों को चाहिए कि ये संगठित होकर सरकार से अपने हक़ की मांग करें और सभी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ हासिल करें या फिर अंसार नगर के मज़दूरों की तरह बी़डी के इस जाल से आज़ाद होकर एक नई शुरुआत करें.



सरकार को वास्तविकता की जानकारी नहीं

झारखंड में असंगठित मज़दूरों की संख्या लाखों में है. इसमें बीड़ी मज़दूरों का एक बड़ा तबक़ा शामिल है. इनका दुर्भाग्य यह है कि इनकी वास्तविक संख्या राज्य सरकार के पास नहीं है. राज्य सरकार बीड़ी उद्योग से जुड़े मज़दूरों की हालत से नावाक़ि़फ है. इन परिस्थितियों में राज्य या केंद्र सरकार द्वारा बीड़ी मज़दूरों के लिए बनाई गईं योजनाएं कितनी उपयोगी होंगी, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है. सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, राज्य सरकार के श्रम नियोजन एवं प्रशिक्षण विभाग की जानकारी में पाकुड़ ज़िले में मात्र 2589 मज़दूर हैं, पर वास्तविकता यह है कि इस ज़िले में बीड़ी मज़दूरों की संख्या 25 हज़ार से भी अधिक है. हैरत की बात तो यह है कि पाकुड़ स्थित भारत सरकार के श्रमिक औषधालय में भी मज़दूरों की सही संख्या दर्ज नहीं है. इस औषधालय में निबंधित मज़दूरों की संख्या 4457 है. इसका मतलब यह है कि पाकुड़ ज़िले के मज़दूरों की वास्तविक संख्या न तो राज्य सरकार के पास है और न पाकु़ड स्थित श्रम औषधालय में. कमोबेश यही स्थिति चतरा ज़िले की है. राज्य सरकार के श्रम नियोजन एवं प्रशिक्षण विभाग से मिले आंकड़ों के अनुसार, देवघर में बीड़ी मज़दूरों की संख्या 4897, साहबगंज में 251, दुमका में 892, गोड्डा में 867, हज़ारीबाग में 600, पूर्वी सिंहभूम में 6500 और पलामू में 384 है. इनमें से कोई भी आंकड़ा वास्तविक आंकड़ों से मेल नहीं खाता है. वास्तविकता यह है कि अकेले साहबगंज, पूर्वी सिंहभूम और देवघर में ही लाखों की संख्या में बीड़ी मज़दूर काम करते हैं. इन आंकड़ों से बीड़ी मज़दूरों की उपेक्षा का अंदाज़ा सहज लगाया जा सकता है. सरकार के अलावा बी़डी बनाने वाली कंपनियों के पास भी बीड़ी मज़दूरों की वास्तविक संख्या नहीं है. सच पूछा जाए तो बीड़ी कंपनियां जानबूझ कर मज़दूरों की वास्तविक संख्या ज़ाहिर नहीं करना चाहती हैं. वे नहीं चाहतीं कि मज़दूरों का संगठन मज़बूत हो और वह उनके लिए परेशानी का सबब बने. दरअसल, झारखंड में बीड़ी उद्योग चलाने वाली लगभग सभी कंपनियां बाहर की हैं. ये कंपनियां बिचौलियों और दलालों के माध्यम से झारखंड में बीड़ी का कारोबार चलाती हैं. इसके कारण कंपनियों का मज़दूरों से सीधे तौर पर कोई सरोकार नहीं होता. कंपनियां यह चाहती भी नहीं हैं. यही वजह है कि मज़दूरों को मिलने वाला लाभ इस धंधे में लगे बिचौलिए और दलाल गटक लेते हैं. दुर्भाग्य की बात यह है कि झारखंड राज्य गठन के 11 साल बाद भी बीड़ी मज़दूरों की समस्या किसी राजनीतिक पार्टी का एजेंडा नहीं बनी. बीड़ी मज़दूरों की तमाम समस्याओं की जड़ उनका असंगठित होना है.

- आलोका

Thursday, June 27, 2013

मार्शल आर्ट - हम भी किसी से कम नहीं




फिल्मों मे हीरो और विलेन के बीच होने वाली ढिशुमढिशुम किशोरों का बहुत पसंद आती है, इसी फिल्मी फाइट को देखकर अक्सर स्कूल और घर में किशोर भी इसे आजमाने की कोषिश किया करते हैं. कोई चोरसिपाही का खेल खेलता है तो कोई रेसलिंग. कुछ साल पहले धारावाहिक शक्तिमान को देखकर कई किशोर कुछ स्ंटट सीन दोहराने के चक्क्र में चोटिल हो गए थे. ऐसा इसलिए हुआ था क्योंकि तब इन्होंने फार्मल ट्रेनिंग नहीं ली थी, पर अब समय बदल गया है. किषोर पहले की बजाए एडवांस हो गए हैं अब वो फिल्मी फाइट के बजाए मार्शल आर्ट के गुर सीख रहे हैं. जी हां, अब किशोर मार्शल आर्ट के जरिए फन के साथसाथ आत्मनिर्भरता का दोहरा मजा ले रहे हैं. हाल के दिनों में टीनेजर्स में मार्शल आर्ट सीखने का जबरदस्त के्रज देखा गया है. जब भी मार्शल आर्ट की चर्चा होती हैं तो ब्रूस ली, जैकी चैन और अक्षय कुमार का नाम सबसे वहले आता है. इन्हीं लोगों नें किशोरों में मार्शल आर्ट के प्रति उत्सुकता और इस कला को सीखने का प्रोत्साहन जगाया है. अब आप भी अक्षय की तरह मार्शल आर्ट के सबसे बडे खिलाड़ी बन सकते हैं. अगर आप भी स्कूल में अपने फ्रंेडस को मार्शल आर्ट से इंप्रेस करना चाहते हैं तो इसे सीखने में देर कैसी. सिर्फ कुछ ही महीने की ट्रेनिंग की बात है और आप बन जाएंगे मार्शल आर्ट एक्सपर्ट.

जोश और जुनून की हौबी
मार्शल आर्ट एक हौबी और आर्ट होने के साथ साथ किशोरों में एक नया जोश, जुनून और आत्मविष्वास भरता है. इसके जरिए किषोर मुष्किल समय में न केवल अपनी सुरक्षा खुद कर सकते हैं बल्कि  अपने फ्रेंडसग्रुप में सबके चहेते बन जाते हैं. कोई आपको बिन वजह तंग करे तो आपके पास उसे सबक सिखाने का बेहतरीन विकल्प है मार्शल आर्ट. इसे सीखने के कई फायदे हैं. सबसे पहले तो इसे सीखने वाले किशोर चुस्तदुरूस्त होने के साथ अनुषासित और मजबूत इच्छाशक्ति वाले होते हैं. यह एक जबरदस्त कैलीबर का स्पोर्ट है.
गुड़गाव में संषिकन कराटे इंडिया नाम का इंस्टीटयूट चलाने वाले यशपाल सिंह कलसी कई सालों अपने संस्थान के जरिए मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग दे रहे हैं. उनके मुताबिक, हमारे ज्यदातर मार्शल आअ सीखने वाले स्टूडेंट किषोर होते हैं और पिछले कुछ समय में इस आर्ट को सीखने के लिए लडकियों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है. इसे एक अच्छा संकेत माना जा सकता है. क्योंकि आजकल छेड़छाड़ की बढ़ती घटनाओं की वजह से लड़कियों को अपनी सुरक्षा कई बार खुद करनी पड़ती है. ऐसे में मार्शल आर्ट का प्रषिक्षण इनके लिए बहुत कारगर साबित होता है.
सबसे पहले तो यह जानना जरूरी है कि आखिर मार्शल आर्ट है क्या. तकनीकी भाषा में कहें तो बिना किसी हथियार का प्रयोग किए हाथ, पैर, घुटने, और सिर आदि के द्वारा आत्मरक्षा की कला को मार्शल आर्ट कहा जाता है. पर असल में इसे एक तरह की फिजिकल एक्सरसाइज कहा जा सकता है, एक ऐसी एक्सरसाइज जिससे शरीर में स्फूर्ति और ताजगी रहती है. मार्शल आर्ट से किषारों में आत्मविश्वास और आत्मरक्षा की भावना का विकास होता है. यह शारीरिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक क्षमता को विकसित करती है.


कहां और कैसे सीखें मार्शल आर्ट
वैसे तो किसी भी उम्र में मार्शल आर्ट सीखी जा सकती है लेकिन किषोर यदि मार्शल-आर्ट सीख लेते हैं, तो उन्हें आगे चलकर इसे बतौर करियर अपनाने में भी मदद मिल सकती है. मार्शल आर्ट में प्रशिक्षित सेना, अर्धसैनिक बलों, पुलिस बल तथा सुरक्षा एजेंसियों में रोजगार के अलावा जिम, फिटनेस सेंटर, कॉलेज और विभिन्न संस्थानों में इंस्ट्रक्टर के रूप में भविष्य संवारा जा सकता है. मार्शल-आर्ट की टे्रनिंग में कई पड़ाव आते हैं. शुरू में आपको  फिजिकल ट्रेनिंग, हाथ-पैर चलाने की कला और उछलकूद ही सिखाया जाता है, लेकिन अंतिम दौर में दांव-पेंच, स्टाइल और आघात पहुंचाने की कला सिखाई जाती है, जिसे ब्लैक बेल्ट कहते हैं. मार्शल आर्ट के अंतर्गत आने वाले जूडो कराटे को प्रथम चरण से लेकर ब्लैक बेल्ट तक पहुंचने में 3 से 4 साल लग जाते हैं. इसे सीखने के लिए संयम, अनुशासन, सहयोग की भावना और स्वस्थ शरीर होना आवश्यक है. कुल मिलाकर मार्शल आर्ट सीखने के लिए व्यक्ति में बुलंद हौसला और जुनून होना चाहिए. मार्शल आर्ट के कोर्स मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ के प्रमुख शहरों के स्टेडियमों, जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम, नई दिल्ली छत्रसाल स्टेडियम, नई दिल्ली आदि में उपलब्ध हैं.

इतिहास के आइने में
मार्शल आर्ट एक प्रचीनतम युद्ध कला है जो बिना हथियारों के लड़ी जाती है. मार्शल आर्ट का एक उदाहरण जापान ने प्रथम विश्वयुद्ध में रुस जैसे शक्तिशाली देश को पराजित करके साबित कर दिया कि मार्शल आर्ट एक ऐसी कला है जिसमें एक व्यक्ति अनेक व्यक्तियों से अपना बचाव करते हुए उन्हें मात देकर आत्मरक्षा कर सकता है. वर्तमान समय में यह कला कई देशों जैसे भारत, चीन, जापान व कोरिया में चल रही है.



Wednesday, June 19, 2013

शादी की शोपिंग हो शानदार




शादी हर कपल के लिए जीवन का सबसे यादगार लम्हा होता है. यह मौका एक बार आता है. इस दिन से जुड़े हर पहलू ताउम्र यादों के आइनों में जीवनभर सामने आते रहते हैं.  उस दिन क्या पहना था, क्या खाया था और कौन कौन शरीक हुआ था, तमाम बातें तसवीरों के जरिए उन बेहतरीन लम्हों की याद दिलाती रहती हैं.  सामान्य तौर पर शादी की तारीखें निर्धारित होते ही दूल्हादुल्हन के करीबी लोग शादी की तैयारियों और शोपिंग में जुट जाते हैं लेकिन जब कपल्स अपना बैंड बाजा बारात खुद बजा रहे हों तो भावी दूल्हादुल्हन खुद ही शादी की पूरी शोपिंग करने की चाहत रखते हैंें.
इसके दो कारण हैं. पहला तो यह कि कपल एक नए शहर में शादी करने की प्लानिंग कर अपने गार्जियन को इनवाइट करते हैं और दूसरा यह कि नई जेनरेशन अपने लिए आकर्षक परिधानों और फैशन से जुड़े हर चीज का चयन स्वयं करना चाहती है. असल में दोनों की यही इच्छा यही रहती है इस खास और शुभ दिन पर उनकी चमक खास अंदाज में सबके सामने आए. जाहिर है इस दिन हर लड़की सबसे खूबसूरत दिखना चाहती है जिससे सबकी नजरें उसी पर टिकी रहें. वहीं लडका भी सबसे हैंडसम दिखने की ख्वाहिश रखता है. वह भी शोपिंग में कोई कसर नहीं छोड़ता. इस लिहाज से दोनों के लिए शौपिंग के दौरान स्मार्टनेंस दिखानी जरूरी हो जाती है. यों तो शोपिंग के अलावा भावी दूल्हा दुल्हन ही वेडिंग प्लैनर, वेडिंग डेकोरेटर, फ्लोरिस्ट, कैटरर, मेहंदी आर्टिस्ट, ब्यूटीशियन और फैशन डिजाइनर हायर करते हें पर अभी बात शादी की षौंपिंग की.

शॉपिंग लिस्ट बनाएं
शादी की शोपिंग करना आसान नहीं होता वो भी कम समय में. ऐसे में काम आता है अपनेे जानकार व अनुभवी रिष्तेदारों का साथ जो इस तरह की शोपिंग पहले भी कर चुके होते हैं. इनके मार्गदर्शन से यह काम फट से हो जाता है. इनका परामर्श हमेशा फायदेमंद साबित होता है. जरूरत हो तो इन्हें साथ भी लेकर जाएं. सबसे पहले बाजार या मौल जाने से पहले आप शादी के सामान की सूची बनाएं. आमतौर पर लडकियां शोपिंग में ज्यादा माहिर होती हैं इसलिए उनकी मदद से से लिस्ट जल्दी बनाई जा सकती है. बरहाल इस में बहन, दोस्त से लेकर मां या मौसी किसी की भी मदद ली जा सकती है. चूंकि शोपिंग में कपड़ों, गहनों, ऐसेसीरीज, फुटवियर, मेकअप किट से लेकर हर तरह का सामान शामिल होता इसलिए लिस्ट बनाकर चलने से बाजार में समय की काफी बचत होती है. और खरीददारी के लिए कोई सामान छूटता भी नहीं है.

सस्ती और अच्छी शॉपिंग के ठिकाने
अक्सर लोग शादी में दिखावे की मानसिकता के तहत बेवजह की फिजूलखर्ची में पड़ जाते हैं. ऐसा बिलकुल नहीं है कि जो चीज मंहगी है वह अच्छी भी होगी और सस्ती खराब. अगर बाजार की सही समझ और शोपिंग की स्मार्टनेस हो तोे शादी के लिए लिमिटेड बजट में अच्छी शोपिंग की जा सकती है. हां, स्मार्ट और सस्ती शोपिंग के लिए अहम बात यह है कि आपको शोपिंग के सही ठिकाने पता हों. यो तो हर बड़े शहर में मौल और होल सेल मार्केट मौजूद हैं. फिर भी अगर दिल्ली की बात करें तों यहां हर मिजाज और बजट के शोपिंग डेस्टीनेशन हैं. मसलन सदर बाजार, चांदनी चैंक, लाजपत नगर, सरोजनी नगर, करोल बाग, रजोरी गार्डन, कमला नगर आदि. इन तमाम जगहों पर हर रेंज ओर स्टाइल की शादी शोपिंग संभव है.
शादी की खरीदारी के लिए दिल्ली में चांदनी चैक का नाम अव्वल है. यहां से ब्राइड के लिए लहंगे, साड़ी, ऐसेसीरीज और फुटवियर से लेकर दूल्हे के लिए सूट, शेरवानी, जूतियां और सेहरा सब आसानी से वाजिब दाम पर मिल जाता है. यहां की स्पेषिसलिटी यह है कि यहां ट्रेडिशनल और मौडर्न फैशन, दोनों तरह का सामान मिलता है. सूट और बाकी कपड़ों के लिए नील, नवाब, खुशहाल और नया कटरा आदि ऐसे कई कटरे और गलियां हैं, जहां 2000 रुपये से 30 हजार तक का सूट मिल जाएगा. अप्सरा, मीना बाजार, ओमप्रकाश जवाहर लाल आदि ऐसी मशहूर दुकानें हैं, जहां आपको एक से बढ़कर एक डिजाइनर साडि़यां मिल जाएंगी.
बसुधा अरोड़ा जिन्होंने अपनी शादी की शो पिंग खुद की बताती है कि इस तरह की चीजों के लिए चांदनी चैक सबसे मुफीद जगह है. यहां 150  से 1000 रूपए तक अच्छी साड़ी मिल जाती हैं जो रिष्तेदारी में लेनदेन के काम आ सकती हैं. इसी तरह 10 हजार से 12 हजार के बीच में वेंडिंग लहंगा भी यहां आसानी से मिल जाता हे जबकि इसी तरह का लहंगा किसी मोल या षोरूम में कम से कम 50 हजार का पड़ता है. यही हाल सूट और षेरवानी का भी है. इसके अलावा जो सूट मौल से 2 हजार से 5 हजार का मिलता है वही यहां पर 500 से 1 हजार का मिल जाता है. इसी तरी कौस्मेटिक 120 से 200 तक मिल जाएगा. वहीं आर्टिफिषियल ज्वैलरी भी 250 से 2500 तक बेहतरीन डिजाइन में मिलती हैं. इसके अलावा फुटवेयर्स, बैग, बेल्ट और अन्य सामान के लिए करोलबाग बड़ा बाजार है. यहां जूते और सैंडल अच्छी रेंज में आसानी से कम कीमत में मिलते है.
कमलानगर बाजार में हर किसी के बजट के मुताबिक सामान मिल जाता है. लाजपत नगर, साउथ एक्सटेंशन  में भी शादी की खरीदारी के लिए विशिष्ट बाजार हैं. हां ब्रांडेड स्टोर्स के लिए सीपी और साउथ एक्सटेंशन बेहतर रहेंगे. वहीं बार्गेनिंग के लिए जनपथ, लाजपत नगर, सरोजनी नगर मुफीद हैं.
तो अगर आप भी शादी के सामानों की खरीदारी की अपनी लिस्ट तैयार कर चुके हैं तो इन जगहों अपनी रुचि व पसंद के हिसाब से शानदार और यादगार शो पिंग कर सकते हैं. यहां न तो आपका बजट बिगड़ेगा और न ही किसी भी तरह की दिक्कत होगी. गौर करने वाली बात यह है कि खुल बाजारों और होल सेल मार्केट में किसी भी तरह की बारगेनिंग करने में बिलकुल भी संकोच न करें बल्कि खुलकर मोलभाव करें.


सेल में करें सस्ती शॉपिंग
शादी की षांपिंग अगर फेस्टिव सीजन के दौरान कर रहे हैं तो मौजा ही मौजा. इन दिनों बाजारों में सेल की बहार होती है. चूंकि शादी के दौरान कई रिष्तेदारों के  लिए भी ढेर सारा सामान खरीदना पड़ता है,  ऐसे में  सेल में 2 के साथ 3 मुफत वाली स्कीम बहुत कारगर होती हे. सेल पीरियड में कई ब्रांडेड स्टोर्स ग्राहकों को  लुभाने के लिए लुभावनी सेल स्कीम्स अनाउंस करते हैं. आप भी ब्रैंडेड ड्रेसेज डिस्काउंट या औफर में लेना चाहते हैं, तो इसका फायदा जरूर उठाएं. फिलहाल  दिल्ली के कई मौल्स में सूट, षेरवानी, टीशर्ट, जींस, शर्ट, जूते और लड़कियों के लिए साड़ी, लहंगे, मेकअप किट, स्कर्ट के अलावा बैग, कैप, बेल्ट औ फुटवियर्स वगैरह भी 30 से 40 प्रतिशत तक के डिस्काउंट पर आसानी से मिल जाएंगे.
किराये पर भी ले सकते हैं
मेरा व्यक्तिगत अनुभव है, मैंने अपनी शादी के मौके पर परिधानों की खूब मंहगी खरीदारी की. 10000 हजार के सूट तो 2 से 5 हजार के महंगे जूते भी खरीदे. इसी तरह मेरी पत्नी ने भी महंगे लहंे, सूट और चांदनी चैक से 20 हजार की कीमत वाली साडि़यां खरीदीं.  वर वे कपड़े अब सिर्फ अलमारियों में धूल खा रहे हैं. कहने का मतलब यह हैं कि शादी के बाद वे किसी काम के नहीं रहे. 10000 का सूट, 15000 की षेरवानी और 38000 का लंगहा ड्राई क्लीनिंग के बाद अलमारियों में सजा भर है. शादी को एक साल पूरा होने को है पर अभी तक उन में से एक भी परिधान को दोबारा पहनने का मौका नहीं मिला. सिर्फ एक दिन के लिए पहनने वाले कपड़ों पर इतना खर्च करना अब मुझे नागवार गुजर रहा है. असल में शादी के कपड़े कुछ इस तरह के डिजाइन किए होते हैं कि उन्हें अन्य फंक्षनों में पहना ही नहीं जाता. मुझसे से सबक लेते हुए अगर अगर आप अपना बजट नहीं बिगाड़ना चाहते तो तो किराये पर भी अपना मनपसंद ड्रेस ले सकते हैं. अमूमन लोग दो दिन के लिए लहंगा शेरवानी किराये पर लेते हैं जिसमें कुल खर्च 5 से 10000 हजार रुपए तक खर्च आता है. जबकि वही 15 से 25 हजार रुपए के प्राइज टैग वाली साड़ी के किराये के रूप में दो से चार हजार रुपये का भुगतान करना पड़ता है.  किराए पर ड्रेसेज देने वालों की दुकानें दिल्ली में कई जगहों पर हैं मसलन वेस्ट पटेल नगर, चांदनी चैक, पीतमपुरा और राजौरी गार्डन में किराए पर ये परिधान लिए जा सकते हैं.

औनलाइन हो सस्ती शॉपिंग
मेट्रो सिटी में शादी की शो पिंग के ढेरों विकल्प मौजूद हैं. होल सेल, ओपेन मार्केट व मौल्स के अलावा औनलाइन शो पिंग औप्षन का चलन भी आजकल जोरांे पर है.घर बैठे सपरिवार मिलकर हरके की पंसद के अनुसार ईपोर्टल पर सामान चुनांे और और्डर कर दो. कुड ही दिनों में होम डिलीवरी के जरिए सारा सामान आपके घर पर होगा. शो पिंग का इतना आसान तरीका और न भागदौड़ की जरूरत. इससे समय और पैसे दोनांे की बचत होती है. यो तो औनलाइन शो पिंग कंपनियां साल भर सस्ते औफर देती हैं पर त्योहारों में डिस्कांउट और बढ जाते हैं. महंगे और ब्रांडेड सामानों पर सामान्य तौर पर 15 से 25 फीसदी तक की छूट असानी से मिल ही जाती है. कंपटीशन को दखते हुए आजकर औनलाइन शो पिंग वैबसाइट खूब छूट देती हैं. फ्लपकार्ट, स्नैपडील, 99 लेबल्स डौट कौम, फैशन एंड यू डौट कौम, एक्सक्लूसिवली डौट इन, मिंत्रा डौट कौम, नापतौल डौट कौम, होम शो प 18 और स्टार सीजे लाइव आदि कुछ प्रमुख वेबसाइट हैं जहां से  शदी की बेहतरीन खरीददारी की जा सकती है. जिस रंग का सूट या फैबरिक चाहिए या फिर मेकअप किट सब यहां उपलब्ध हैैं. कपड़ों के अलावा बेल्ट, बैग, परफ्यूम और घड़ी जैसे सामानों पर औनलाइन पोटर्ल 50 फीसदी की छूट मिल जाती है. इनके पास देशीविदेशी कई ब्रांड मौजूद हैं, बस एक क्लिक की जरूरत है.
इस तरह से आप एक स्मार्ट शो पिंग के जरिए अपना बैंड बाजा और बारात बड़े धूमधाम से बजा सकती हैं.
                                                 

Tuesday, June 4, 2013

खेल खेल में गार्डनिंग का मजा



रोहित पिछली बार अपनी नानी के यहां छुटिटयां मनाने गया तो वहां उसने ढेर सारी मस्ती के साथसाथ नानी के बगीचे और टेरिस में बागवानी का भी भरपूर मजा लिया. दरअसल नानी ने जिस तरह से घर को रंग बिरंगे फूलों और पौधों से सजाया था, वो रोहित कोे बहुत अच्छा लगा. उसने भी नानी से कहां कि वे उसे बागवानी कराना सिखाएं जाकि  घर जाकर वह  भी अपने घर को हरियाली और फूलों की खुशबू से भर दे. छुटिटयां खत्म होते ही रोहित ने नानी के बताए टिप्स को जमकर आजमाया और घर की टेरिस, विंडों और छत को कई तरह के फूलों, बेलों और पौधों से सजा डाला. नानी की टिप्स की बदौलत रोहित ने अपने घर को तो महकाया है साथ ही पूरी सोसाइटी का चहेता भी बन गया है. इस तरह रोहित ने खेलखेल में बागवानी को हौबी के साथ साथ लर्न एंड फन का बेहतरीन माध्यम बना लिया.  अब उसके सारे दोस्त उससे बागवानी की टिप्स लेने आते हैं.  वह भी अपने दोस्तों व रिश्तेदारों से अपनी नानी की गार्डनिंग टिप्स शेयर करता है. आप भी ऐसा कर सकते हैं.
टीनेजर्स की उनके स्वाभाव के हिसाब से अलग अलग हौबी होती हैं. किसी को किताबों का तो किसी को डांस की हौबी होती है लेकिन कुछ हौबी ऐसी भी होती हैं जो षौक के साथ खेलने का मजा भी देती है. ऐसी ही हौबी है गाईनिंग यानी बागवानी. हम देखते हैं कि मेट्रो सिटीज में हरियाली बेहद ही मुश्किल से दिखाई देती है. जबकि किषारों का तो फेवरेट स्पौट हरा भरा पार्क ही होता है. जो किषोर अपने घर को ही पार्क जैसा हरा भरा बनाना चाहते हैं उनके लिए बागवानी के कुछ ऐसे तरीके हैं जो आपको आपको पर्फेक्ट गार्डनर और घर को ही पार्क और बगीचे जैसा बना देंगे.  सबसे पहले तो घर में ऐसी जगह ढूढे जहां छोटा सा गार्डन बनाया जा सके. अगर स्पेस की समस्या हो तो आप विंडो बॉक्स, बालकनी और टेरेस का इस्तेमाल कर सकते हैं. फिर घर में बेकार पड़ी बोतलों और बाल्टियांे को गमले की तरह प्रयोग में लाने के लिए उनमें मिटटी भरें, इससे घर का वेस्ट मैटेरियल भी काम में आ जाएगा और रंग बिरंगी बोतल और बाल्टियों में पौधे भी बड़े अच्छे लगेंगे. अगर ये सब न मिले तो बाजार से छोटेछोटे प्लास्टिक के पौट या गमले खरीद लें. फिर उनमें मिटटी भरकर उनमें अपने पसंद की क्यारियां बनाएं. अपने हाथों से मिटटी से क्यारी बनाना और उनमें पाननी से स्पे्र करनो का मजा ही अलग होता है. इसके बाद उसमें अपने पसंद के रग बिरंगे फूलों के पौध लगाएं. वेजिटेबल्स, फ्रूट्स, हर्ब्स भी लगा सकते हैं. इसके लिए घर के किसी बड़े सदस्य की मदद लें. क्यारिष्यों लगाने के बाद उनमें समय समय पर पानी और जरूरी खद डालते रहें ताकि पौधों को बढने में कम समय लगे. हां, पौधों को हमेषा अंधेरे से दूर यानी धूप में ही. याद रखें पौधों को पानी और धूप की बहुत जरूरत होती है. नहीं तो ये मुरझा जाते हैं. इअसे तरह से आपे जो खेल खेल में फले उगाएं हैं उनका  इस्तेमाल आप घर को सजाने के अलावा पार्टी में खास एरिया को डेकोरेट करने में भ्सर कर सकते हैं. यानी आप डिजाइनर एंड डेकोरटर भी बन गए. कुल मिलाकर गार्डनिंग से आपको घर बैठे ही एक बडे़ पार्क में खेलने के मजे के साथसाथ  अपना षौक तो पूरा करते हैं और घर हरियाली से महकेगा अगल से. गार्डनिंग करने से किषारों की कैलरीज भी बर्न होती हैं और रात में अच्छी नींद आती है. तो हुआ ना दोहरा फायदा. हौबी की हौबी और हेल्थ को भी फायदा.

पर्फेक्ट गार्डनर बनने के लिए
जिनका मन गार्डनिंग में कुछ ज्यादा ही रमता है तो इसे बतौर करियर भी आजमा सकते हैं. इसके लिए बाकायदा कोर्स होते हैं. इन शॉट टर्म कोर्सो को करने के लिए किसी भी डिग्री की आवश्यकता नहीं होती. विद्यार्थी का बारहवीं पास होना ही काफी होता है. अगर गार्डनिंग आपकी हॉबी है तो छुट्टियों के खाली दिनों में इस कोर्स को चुना जा सकता है. इससे आप पर्फेक्ट गार्डनर बन सकते हैं.


जरूरी टिप्स

  • बेकार पड़ वेस्ट मैटेरियल को इस्तेमाल करें
  • पौधों को स्वस्थ रखने के लिए सनलाइट, वाटरिंग और खाद की व्यवस्था
  • रंग बिरेंगे और खुशबूदार फूलों का चुनें
  • कैक्टस और ओरनामेंटल ग्रास जैसे पौधे खूबसूरत होते हैं
  • जगह के हिसाब से पौधों का चयन करें.
  • पत्तियों को टेलकम पाउडर, हेयर स्पे्र से बचाकर रखें.
  • पौधों को अंधेरे से दूर बालकनी में धूप में रखें
  • कैक्टस के गमलों में मिट्टी ढीली रखें.
  • मिटटी में काम करने के बाद खुद को अच्छे से साफ करें