Saturday, January 26, 2013

स्वतंत्रता सेनानी : आजादी के बाद हक की लड़ाई


आज हम खुद को सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहते हैं, लेकिन क्या कभी हमने सोचा कि जिन लोगों ने देश को आज़ादी दिलाई, उनके साथ हमारा बर्ताव कैसा है? स्वतंत्रता सेनानी आज सरकारी दफ़्तरों के बाहर ठोकरें खा रहे हैं. अस्पताल के बाहर घंटों लाइन में खड़े होकर इलाज कराने को मजबूर हैं. ज़िंदगी के आखिरी पड़ाव में हमने उन्हें अकेला छोड़ दिया है. स्वतंत्रता संग्राम के दीवानों को काग़जात देकर साबित करना पड़ रहा है कि उन्होंने अंग्रेजों के खिला़फ लड़ाई की थी. विदेशियों से लड़ना उनके लिए आसान था, अपनों से लड़ना उन्हें भारी पड़ रहा है.





ॠषिकेश की घटना है. एक दिन सड़क के किनारे एक महिला की लाश मिली. लाश आधी सड़ चुकी थी. लोग लाश को देखकर नाक बंद कर बगल से गुज़र जा रहे थे. किसी ने पुलिस को ख़बर दी. पुलिस आई और लाश को ले गई. इस लाश का क्या हुआ यह पता नहीं लेकिन ये लाश किसकी है, यह पता करने में पुलिस को एक महीने से ज़्यादा का व़क्त लग गया. पता चला कि ये लाश बीना भौमिक की है. आज शायद ही किसी को मालूम हो कि बीना भौमिक कौन है. यह नाम उस लड़की का है जिसे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अग्नि कन्या के नाम से जाना जाता था.  इस लड़की ने ही 1932 में कोलकाता यूनिवर्सिटी में बीए के कोनवोकेशन के दौरान गवर्नर स्टेनली जैक्सन पर जानलेवा हमला किया था. स्टेनली तो बच गया लेकिन इस घटना से पूरे देश में तहलका मच गया था कि एक लड़की ने गवर्नर पर हमला कर दिया. पहली बार लोगों को लगा कि नौजवानों के साथ-साथ लड़कियां भी स्वतंत्रता संग्राम में अपने साहस का परिचय दे रही हैं. गवर्नर पर हमला करने के लिए बीना भौमिक को 9 साल की सज़ा हुई. जेल से निकलने के  बाद वह क्रांतिकारी बन गई.

जुगांतर रेवोल्यूशनरी क्लब की सदस्य बन गईं. 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बीना भौमिक को फिर तीन साल जेल में रहना पड़ा. उस दौरान वह कोलकाता कांग्रेस कमेटी की सचिव थी. बीना भौमिक स्वतंत्रता संग्राम का जीता-जागता इतिहास थी, देश की धरोहर थी. हमने किसी अंजान शहर में इन धरोहरों को मरने छोड़ दिया है.

यही हमारा दुर्भाग्य है. यही आज़ाद भारत है, जिसके लिए बीना भौमिक जैसी हज़ारों नौजवानों और युवतियों ने अपना जीवन न्योछावर कर दिया था. उनका सपना तो न जाने कहां गुम हो गया लेकिन स्वतंत्रता के वे सेनानी, हमारे ब़ुजुर्ग, जो हमारे आस-पास हैं, जिंदा हैं, सांस ले रहे हैं, उन्हें हमने ज़िंदगी के आ़खिरी मोड़ पर अकेला छोड़ दिया है. स्वतंत्रता सेनानी बूढ़े हो गए हैं. हालात यह हैं कि समाज और सरकार की तऱफ से उन्हें कोई सहूलियत नहीं मिल रही है. ज़्यादातर सेनानियों को घर वालों ने भी छोड़ दिया है. बेटा साथ नहीं रहता है. समाज और सरकार ने उनका तिरस्कार कर दिया है. वे पैसे-पैसे के लिए मोहताज हो गए हैं. सरकार की तऱफ से उन्हें पेंशन मिलती है. शर्मनाक़ बात यह है कि पेंशन की राशि इतनी कम है कि बताने में भी शर्म आती है. आज़ादी की लड़ाई में शामिल होने वाले इन देशभक्तों को हम किसी फोर्थ क्लास कर्मचारी के वेतन से भी कम पैसे देते हैं.


आजादी के 63 सालों बाद भी हम देश के प्रति उनके त्याग और योगदान का महत्व समझ नहीं पा रहे हैं. हम उन्हें सम्मान देने और उनका हक़ दिलाने के बजाए उन्हें अपमानित कर रहे हैं. मई, 2010 में केंद्र सरकार द्वारा अदालत को बताया गया कि देश भर में क़रीब एक लाख सत्तर हज़ार स्वतंत्रता सेनानी हैं. हालांकि यह आंकड़ा सरकारी दस्तावेजों पर आधारित है. हर महीने यह संख्या बदलती रहती है, क्योंकि इन सेनानियों की उम्र्र इतनी हो चुकी है कि लगभग हर महीने कुछ की मौत हो जाती है. इनमें से क़रीब साठ हज़ार स्वतंत्रता सेनानियों को केंद्र सरकार द्वारा पेंशन मिल रही है, बाक़ी को राज्यों द्वारा पेंशन की व्यवस्था है. पेंशन वितरण के मामले में हर राज्य का अपना नियम है, पेंशन राशि भी अलग अलग है. केंद्र सरकार स्वतंत्रता सेनानियों को 12400 रुपये देती है. वह स्वतंत्रता सेनानी योजना के तहत कुल सात सौ पचासी करोड़ रुपये खर्च करती है. उधर हरियाणा के मुख्यमंत्री ने पिछले 15 अगस्त को स्वतंत्रता सेनानियों की पेंशन राशि छह हज़ार से बढ़ाकर ग्यारह हज़ार रुपये कर दी. इसी तरह कर्नाटक सरकार ने यह पेंशन तीन हज़ार से बढ़ाकर चार हज़ार रुपये कर दी है. दिल्ली में स्वतंत्रता सेनानियों की पेंशन साढ़े तीन हज़ार से बढ़ाकर साढ़े चार हज़ार रुपये कर दी गई है. हैरानी की बात यह है कि दिल्ली में 1998 से ही स्वतंत्रता सेनानियों को पेंशन देने की योजना शुरू की गई थी, लेकिन आज भी यहां पेंशन राशि अन्य राज्यों के मुक़ाबले का़फी कम है. तमिलनाडु में पिछले साल मुख्यमंत्री ने सेनानियों को मिलने वाली पेंशन चार हज़ार से बढ़ाकर पांच हज़ार रुपये कर दी. सरकार स्वतंत्रता सेनानियों की मदद के बड़े-बड़े दावे करती है. उन्हें आर्थिक सहायता के तौर पर पेंशन और विभिन्न क्षेत्रों में आरक्षण देने की बात करती है, लेकिन सच तो यह है कि न जाने कितने स्वतंत्रता सेनानी आज भी गुमनामी और ग़रीबी की ज़िंदगी जी रहे हैं. कई तो अपने हक़ की लड़ाई लड़ते-लड़ते इस दुनिया से ही विदा हो गए. सबसे ज़्यादा शर्मनाक़ बात तो यह है कि कई स्वतंत्रता सेनानियों ने खुद को स्वतंत्रता सेनानी साबित करने में अपनी शेष ज़िंदगी गुज़ार दी. अधिकारियों की मनमानी और व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार की वजह से कई फर्ज़ी लोग खुद को स्वतंत्रता सेनानी घोषित कर सरकारी सुविधाओं का फायदा उठा रहे हैं और असली स्वतंत्रता सेनानी दस्तावेजों में अपना नाम दर्ज कराने के लिए तरस रहे हैं. ताज्जुब की बात तो यह है कि फर्ज़ी लोगों में कई तो ऐसे हैं, जो आज़ादी के समय पैदा ही नहीं हुए थे या फिर उनकी उम्र चार-पांच साल के आसपास रही होगी. ऐसे मामलों में जो लोग पकड़े जाते हैं, उनकी पेंशन रोक दी जाती है. लेकिन सवाल यह खड़ा होता है कि जो अधिकारी बिना जांच-पड़ताल किए फर्ज़ी प्रमाणपत्र पर दस्तखत करके असली स्वतंत्रता सेनानियों का हक़ मारते हैं, उन्हें कोई सज़ा क्यों नहीं मिलती? सुप्रीम कोर्ट स्वतंत्रता सेनानियों की बदहाली पर अ़फसोस जताता है और इसके लिए सरकार की लालफीताशाही को ज़िम्मेदार बताता है, लेकिन क्या इतना का़फी है? ग़ौर करने वाली बात है कि पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि देश के ज़्यादातर स्वतंत्रता सेनानी ग़रीबी और भुखमरी की ज़िंदगी बिताने पर मजबूर हैं, सरकार की तरफ से दी जाने वाली पेंशन उनके लिए किसी खैरात से कम नहीं है. इस बात से साबित हो जाता है कि देश का सर्वोच्च न्यायालय भी जानता है कि सरकार स्वतंत्रता सेनानियों की अनदेखी कर रही है.

बात स़िर्फ पेंशन और आरक्षण की नहीं है, बात है उनके त्याग और संघर्ष के महत्व को समझने की. स्वतंत्रता संग्राम के जो सिपाही आज ज़िंदा हैं, उन्हें क्या वही भारत नज़र आता है, जिसके लिए वे लड़े थे?



जिस देश को आज़ाद कराने के लिए इन सिपाहियों ने लाठियां और गोलियां खाईं, वह देश आज गांधी, नेहरू और सुभाष चंद्र बोस को स़िर्फ उनके जन्मदिन पर याद करता है. नई पीढ़ी तो आज़ादी के दीवानों के बलिदान के साथ-साथ आज़ादी के मायने भी भूल चुकी है. जिन लोगों की वजह से आज हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं, उन्हें हमने सम्मानित करना तो दूर, बदहाली के दलदल में छोड़ दिया है. उनके अनुभव से सीखना तो दूर, समारोहों में उन्हें बोलने का भी मौक़ा नहीं दिया जाता. हम शायद भूल रहे हैं कि ये साधारण लोग नहीं हैं, जीते-जागते इतिहास हैं. लेकिन हम इतने निष्ठुर और संवेदनहीन हो गए हैं कि इनकी अहमियत को समझने की अक्ल हमारे अंदर नहीं बची. वरना हम इन्हें दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर न होने देते. जिन लोगों ने देश को आज़ाद कराने में अपनी जवानी लुटा दी, आज हालत यह है कि उन्हें सचिवालयों में प्रवेश के लिए घंटों लाइन में खड़े होकर पास बनवाना पड़ता है. सबसे बड़ी समस्या इलाज कराने की है. अब इनकी वो उम्र नहीं है कि अस्पतालों में लाइन लग कर अपना इलाज करवा सकें. जो स्वतंत्रता सेनानी गांव में रहते हैं उनकी हालत और भी खराब है. सरकार कम से कम इतना तो कर सकती थी कि डाक्टरों को उनके घर भेज कर उनका हालचाल पूछ सकती थी.


सरकार की तऱफ से स्वतंत्रता सेनानियों के लिए कई तरह की योजनाएं हैं. लेकिन ये योजना सबके लिए नहीं है. हर राज्यों के अलग नियम हैं. हैरानी की बात यह है कि उन्हें खुद को स्वतंत्रता सेनानी साबित करने के लिए कई तरह सबूत पेश करने पड़ते हैं. सरकार स़िर्फ उन्हें ही स्वतंत्रता सेनानी मानती है, जो आज़ादी की ल़डाई के दौरान जेल गए, छह महीने से ज़्यादा भूमिगत रहे या उन्हें छह महीने अथवा उससे ज़्यादा समय के लिए ज़िला बदर किया गया हो. स्वतंत्रता सेनानियों को पेंशन लेने के लिए यह भी साबित करना पड़ता है कि स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने की वजह से अंग्रेजी हुकूमत ने उनकी संपत्ति की कुर्की कर ली या फिर उनकी नौकरी चली गई या फिर उन्हें सज़ा मिली. जो स्वतंत्रता सेनानी इससे संबंधित पर्याप्त काग़जात उपलब्ध नहीं करा पाते, उन्हें सरकार स्वतंत्रता सेनानी नहीं मानती. अगर चंद्रशेखर आज़ाद जीवित होते तो सरकार उन्हें स्वतंत्रता सेनानी नहीं मानती, क्योंकि वह अंग्रेजों से ल़डे तो थे, लेकिन कभी जेल नहीं गए, कभी नौकरी से निकाले नहीं गए.



आंध्र प्रदेश के उदूपी के  एक स्वतंत्रता सेनानी बाबू मास्टर के बारे में आपको बताता हूं. चौरानवे साल के बाबू मास्टर ने आज़ादी की लडाई में बढ़-च़ढ कर हिस्सा लिया. स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वे कांग्रेस के जाने माने कार्यकर्ता रहे. गांधी की विचारधारा पर चलते हुए पूरा जीवन बिता दिया. स्वतंत्रता संग्राम के  दौरान वो पूरे ज़िले में घूम-घूम कर चरखा बांटते थे. नमक सत्याग्रह आंदोलन में हिस्सा लेने वे मैंगलोर गए. आज भी वो गांधी के बताए रास्ते पर चल रहे हैं. शायद यही उनकी बदकिस्मती रही. आज़ादी के बाद कुछ समय के लिए उन्हें पेंशन ज़रूर मिली लेकिन अचानक अधिकरियों ने कहा कि उनकी पेंशन बंद हो गई है. वजह बाबू मास्टर स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने के बावजूद कभी जेल नहीं गए. उनकी पेंशन रुक गई. बाबू मास्टर दाने-दाने के लिए तरस रहे हैं. उन्हें देखने वाला कोई नहीं है.

मिलने वाली सुविधाएं

हरियाणा सरकार 1980 से सरकारी सेवाओं में प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के पदों पर स्वतंत्रता सेनानियों के पुत्रों-पुत्रियों, पौत्रों- पौत्रियों को 2 प्रतिशत आरक्षण प्रदान कर रही है. 1985 से सीधी भर्तियों में भी आरक्षण की सुविधा दी जा रही है. तमिलनाडु, हिमाचल और कुछ अन्य राज्य सरकारें भी इनके आश्रितों को शिक्षण संस्थानों में आरक्षण देती हैं. आंध्र प्रदेश सरकार के नई दिल्ली स्थित आंध्रा भवन में स्वतंत्रता सेनानियों को रुकने की सुविधा है, हिमाचल सरकार भी नई दिल्ली स्थित हिमाचल भवन में यह सुविधा प्रदान करती है, लेकिन राजस्थान सरकार ने ऐसी कोई भी व्यवस्था नहीं की. कर्नाटक सरकार मैसूर लैंड रेवेन्यू रूल 1960 के अंतर्गत सरकारी भूमि के आवंटन में स्वतंत्रता सेनानियों को प्रथम वरीयता प्रदान करती है. यही नहीं, मध्य प्रदेश सरकार भी भूमि आवंटन में उन्हें प्रथम वरीयता प्रदान करती है.



जेल जाने वाले स्वतंत्रता सेनानी और जेल नहीं जाने वाले स्वतंत्रता सेनानी में सरकार इतना भेद क्यों करती है. अधिकारियों को यह समझ मेंक्यों नहीं आता है कि जो लोग जेल नहीं गए उन्होंने ज़्यादा कष्ट उठाए हैं. जो लोग स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जेल गए वे तो जेल के अंदर बी केटेगरी के बंदी बनकर रहते थे. लेकिन जो लोग जेल नहीं गए उन्हें घर परिवार छोड़ कर अंडरग्राउंड होकर आंदोलन का काम करना पड़ता था. स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कांग्रेस सारे लोगों को जेल जाने से मना करती थी, क्योंकि अगर सारे लोग जेल चले जाएंगे तो जनता के बीच आज़ादी के आंदोलन को कौन चलाएगा. ऐसे ही लोगों के कंधों पर आंदोलन को आगे बढ़ाने का काम होता था. ये छुप कर काम करते थे. उनके पास न रहने का ठिकाना था न ही खाने-पीने की व्यवस्था. उनके पीछे पुलिस लगी रहती थी. वे महीनों घर से बाहर दर दर की ठोकरें खाते थे.

खबरें आती हैं कि स्वतंत्रता सेनानी बदहाली से तंग आकर आत्महत्या कर रहे हैं और कुछ आशावान लोग कभी न खत्म होने वाले धरने पर बैठे हैं. इससे ज़्यादा बदतर हालात और क्या हो सकते हैं कि आज स्वतंत्रता सेनानी सार्वजनिक स्थानों पर खुद को स्वतंत्रता सेनानी बताने से भी सकुचाते हैं. अगर हमें उनकी हालत पर थोड़ी भी शर्म आती है और उनके लिए वास्तव में कुछ करने की इच्छा है तो हमें उनकी ओर एक बार फिर से ध्यान देना होगा. जिनके पास कृषि योग्य भूमि नहीं है, उन्हें सरकार विशेष दरों पर ज़मीन मुहैय्या कराए. व्यवसायिक तौर पर मज़बूत बनाने के लिए उन्हें गैस एजेंसियां और पेट्रोल पंप आदि आवंटित हों. लेकिन आज यह सब होता नहीं दिख रहा. अगर हालात ऐसे ही रहे तो अगले दस सालों में देशभक्तों की ये पीढ़ी खत्म हो जाएगी.

ये तो स्वंय इतिहास हैं. अगर हम इन्हें वो इज़्ज़त देते, जिसके वो हक़दार हैं. अगर इन्हें हर स्कूलों में बुलाया जाता, बच्चों से मिलवाया जाता तो देश के बच्चे-बच्चे की रगों में देशभक्ति का लहू बहता. वे स्वतंत्रता संग्राम से वाक़ि़फ होते. आज़ादी की लड़ाई में दिए गए बलिदान को जानता और आज़ादी के मायने को समझ पाता. अ़फसोस की बात यह है कि हमने हाशिए पर डाल दिया है, उन्हें हम समाज के एक वेस्टीजियल ऑर्गन की तरह ट्रीट करते हैं.



भारत का स्वतंत्रता संग्राम इतिहास का ऐसा पन्ना है, जो कई मायनों में बेमिसाल है. आज़ादी के सिपाहियों की बहादुरी और त्याग की वजह से ही आज हम आज़ाद भारत में सांस ले पा रहे हैं. 1857 से शुरू हुआ स्वतंत्रता संग्राम 1947 तक चला. इसमें कई पीढ़ियों का संघर्ष और बलिदान शामिल है. देश को आ?ज़ाद कराने के लिए इस लड़ाई में जिन लोगों ने हिस्सा लिया, वे आज खुद को कोस रहे हैं. आएदिन भ्रष्टाचार, किसानों द्वारा आत्महत्या, नक्सलियों का बढ़ता प्रभाव, ग़रीब और अमीर में बढ़ता फासला, सांप्रदायिक दंगे, हिंसा और नेताओं के नित नए फरेब देखकर उनका कलेजा बैठ जाता है. उन्होंने जिस आज़ादी के लिए अंग्रेजों से लड़ाई की, वह तो कहीं नज़र नहीं आती.


स्वतंत्रता सेनानियों की संख्या


आंध्र प्रदेश                          14,573

असम                                4,438

बिहार एवं झारखंड              24,870

गोवा                                  1,436

गुजरात                              3,596

हरियाणा                            1,685

हिमाचल प्रदेश                    624

जम्मू कश्मीर                     1,806

कर्नाटक                            10,084

केरल                                3,228

मध्य प्रदेश                        3,468

महाराष्ट्र                            17,732

मणिपुर                             62

मेघालय                            86

मिजोरम                           04

नागालैंड                           03

उड़ीसा                              4,189

पंजाब                               7,008

राजस्थान                          811

तमिलनाडु                          4,099

त्रिपुरा                                887

उत्तर प्रदेश                         17,990

पश्चिम बंगाल                     22,484

अंडमान निकोबार              03

चंडीगढ़                              89

दादर नगर हवेली               83

दमन और दीव                  33

दिल्ली                          2,044

पांडिचेरी                        317


Wednesday, January 23, 2013

ग्राम स्‍वराज की ओर बढ़ते कदम



कहते हैं कि जब सरकारी तंत्र पूरी तरह से सड़ने लगे और लोकतंत्र स़िर्फ नाम का ही रह जाए तो ऐसे में विकास का रास्ता ज़डों की ओर लौटने से ही मिलता है. किसी भी देश के विकास की इमारत में उस देश के गांव और किसान नींव का काम करते हैं. भारत के  परिप्रेक्ष्य में तो यह नींव और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि भारत कृषि प्रधान देश है. जब इस देश में शहर और गांव के फासले नहीं थे, तब भारत के गांव ही इस देश की तकदीर और तस्वीर हुआ करते थे. सत्ता के नाम पर गांव में पंचायतें और मुखिया थे. पंच यानी पंचायतें, परमेश्वर का रूप मानी जाती थीं. न्याय व्यवस्था इतनी पारदर्शी थी कि पंच गांव के हर आदमी की सलाह के बाद ही सारे फैसले लेता था. इसलिए तब भारत के गांवों की तस्वीर इतनी चमकती थी.

 समय बदला. देश आज़ाद हुआ और भारत में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र क़ायम हो गया. देश में विकास की आंधी आ गई. कई क्रांतियां हुईं. देश की तस्वीर बदलने लगी. कल तक का ग्रामीण भारत देखते-देखते इंडिया हो गया और भारत के किसान और ग्रामीण इंडिया के विकास की आंधी में कहीं खो से गए. नतीजतन, गांवों का विकास ठप्प हो गया और महाराष्ट्र के विदर्भ से लेकर बिहार और उत्तर प्रदेश के गावों की बदहाली प्रदर्शन और धरनों के रूप में सामने आने लगी. इसी बीच एक बार फिर स्वराज की अवधारणा पनपी. कुछ जागरूक लोग ग्राम स्वराज अभियान से जुड़े. उन्होंने ही स्वराज लाने का यानी कि ग्राम सभा सुचारू कराने का तथा गांव का हर फैसला ग्राम सभा में ही कराने का इरादा रखते हुए इस अभियान को चलाया. और इसी स्वराज की कोख से हिवरे बाज़ार का जन्म हुआ.

महाराष्ट्र के अहमद नगर ज़िले का गांव हिवरे बाज़ार, एक ऐसा गांव जहां के लोग रोज़गार के लिए पलायन नहीं करते. गांव में रोज़ाना स्कूल की कक्षा लगती है, आंगनबाड़ी रोज़ खुलती है. राशन की दुकान भी ग्राम सभा के निर्देशानुसार संचालित होती है, सड़कें इतनी सा़फ कि आप वहां कुछ फेंकने से शरमा जाएंगे, जल संरक्षण में अव्वल इस गांव की सत्ता दिल्ली में बैठी सरकार नहीं चलाती, बल्कि उसी गांव के लोग इसे संचालित करते हैं. एक शब्द में यह भी कहा जा सकता है कि हिवरे बाज़ार ग्राम स्वराज का प्रतिनिधित्व करता है. हिवरे बाजार की कहानी से प्रेरणा लेकर कुछ जागरूक लोग उत्तर प्रदेश में ग्राम स्वराज को लोगों तक पहुंचा रहे हैं. इसके लिए वे समूह बनाकर गांव-गांव जाकर लोगों को हिवरे बाज़ार की कहानी बता रहे हैं और साथ ही उन्हें प्रोत्साहित कर रहे हैं, एक ऐसा ही गांव बनाने के लिए. इसी क्रम में पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के बागपत ज़िले में गांव-गांव जाकर लोगों को हिवरे बाज़ार की फिल्म दिखाई गई और फिर स्वराज की बात रखने का प्रयोग किया गया. इस अभियान के तहत गांव-गांव जाकर उस गांव के सक्रिय और गंभीर लोगों के साथ चर्चा की जाती और फिर एक बड़ी बैठक का आयोजन किया जाता है.



 इस बैठक में लोगों के साथ गांव की ज़रूरतों और समस्याओं पर चर्चा की जाती. हर गांव की आम समस्याएं होती हैं. मसलन, एक किसान को अपनी ज़मीन की फरद निकलवानी है, तो उसे पटवारी से लेकर एसडीएम तक न जाने किस-किस से गुहार लगानी पड़ती है. ग़रीब आदमी को अगर आय, जाति, निवास का प्रमाण पत्र बनवाना हो तो उसे भी ग्राम सचिव से लेकर उपर तक के अधिकारियों के धक्के खाने पड़ते हैं, लेकिन रिश्वत दिए बिना फिर भी उसका काम नहीं होता है. किसी गांव में बिजली के तार टूटे पड़े हैं तो कहीं ट्रांसफॉर्मर ही नहीं है. कहीं लोगों ने कहा कि सबसे पहले लड़कियों का स्कूल बनना चाहिए तो किसी गांव के लोगों ने कहा कि शहर से जोड़ने वाली बस होनी चाहिए. किसी गांव में गांव के अंदर की सड़कें खराब हैं तो किसी को अपने गांव को शहर से जोड़ने वाली सड़क ठीक करवानी है. कुल मिलाकर हल्की सी बातचीत से ही समझ में आ जाता है कि गांव में लोगों को क्या चाहिए. हर गांव वाला जानता है कि उसके गांव की क्या ज़रूरते हैं और इसके लिए उन्हें विशेषज्ञ होने की ज़रूरत नहीं है. इन सबके बाद इस बात पर परिचर्चा होती है कि पिछले चार-पांच सालों में गांव में सरकार ने क्या काम कराए हैं. आम लोगों की बातों और शिकायतों से पता चलता है कि गांव में जो काम कराए गए हैं, उनमें से ज़्यादातर की तो गांव में आवश्यकता ही नहीं थी.

लोगों से बिना पूछे योजनाएं बनीं, उनका पैसा आया और चूंकि लोगों की ज़रूरत ही नहीं थी, अत: लोगों ने भी उस ओर ध्यान नहीं दिया और सारा पैसा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया. बैठक में मौजूद गांववालों के मुताबिक़ सरकारी योजनाओं के बारे में न तो उनसे पूछा जाता है कि आपको क्या चाहिए और न ही इन योजनाओं के अमल में लाने में उन्हें कोई भूमिका ही दी जाती है. जबकि सारी कर सारी योजनाएं तो उनके गांव के लिए होती है. इसका सही उपाय बताते हुए उन्हें हिवरे बाज़ार गांव के विकास की कहानी को फिल्म के रूप में दिखाया गया. उन्हें बताया गया कि अगर उनमें भी विकास की चाह हो तो उनके गांव भी हिवरे बाज़ार की कहानी को दोहरा सकते हैं. उन्हें बताया गया कि अगर उनके गांव में भी ग्राम सभाएं विधिवत तरीक़े से होने लगें तो सारी की सारी समस्या ही खत्म हो जाएगी. हां, इसमें ज़रूरत स़िर्फ इस बात की है कि इस बार के पंचायत चुनाव में किसी ऐसे व्यक्ति को प्रधान बनाया जाए जो कि ग्राम सभाएं करे, उनकी समस्याएं सुने. महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले का गांव हिवरे बाज़ार, एक ऐसा गांव है.

जहां के लोग रोज़गार के लिए पलायन नहीं करते. गांव में रोजाना स्कूल की कक्षा लगती है, आंगन वाड़ी रोज़ खुलती है, राशन की दुकान भी ग्राम सभा के निर्देशानुसार संचालित होती है, सड़कें इतनी सा़फ कि आप वहां कुछ फेंकने से शरमा जाएंगे, जल संरक्षण में अव्वल इस गांव की सत्ता दिल्ली में बैठी सरकार नहीं चलाती, बल्कि उसी गांव के लोग इसे संचालित करते हैं. एक शब्द में यह भी कहा जा सकता है कि हिवरे बाज़ार ग्राम स्वराज का प्रतिनिधित्व करता है. हिवरे बाज़ार की कहानी से प्रेरणा लेकर कुछ जागरूक लोग उत्तर प्रदेश में ग्राम स्वराज को लोगों तक पहुंचा रहे हैं. इस मुहिम को कई चरणों में पूरा किया गया. पहले चरण में इस तरह की बैठकें  लगभग सात गांवों में की गईं. इसके नतीजे भी का़फी सकारात्मक रहे. सभी गांवों में खासकर नौजवानों में यह उत्साह देखने को मिला कि वे अपने गांव के हालात सुधारने के लिए वाकई  कुछ करना चाहते हैं. स्वराज अभियान में उन्हें एक रास्ता दिखाई दे रहा है. वैसे तो यह अभियान प्रदेश में होने वाले पंचायत चुनावों को ध्यान में रख कर चलाया जाता है, लेकिन अब इसे पंचायत चुनाव के अलावा भी दिखाया जा रहा है. हिवरे बाज़ार की कहानी सुनकर लोग खुद आह भरते हुए बात करने लगते हैं कि काश! हमारा गांव भी ऐसा हो पाता. इस बातचीत को आगे बढ़ाते हुए नौजवान साथी अपने गांव में भी स्वराज लाने का यानी कि ग्राम सभा सुचारू कराने का तथा गांव का हर फैसला ग्राम सभा में ही कराने का इरादा रखते हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बागपत ज़िले में काम कर रहे उत्साही कार्यकर्ता मनोज आर्य अब तक अपने ज़िले के 30 प्रमुख गांवों में हिवरे बाज़ार की कहानी दिखा चुके हैं. उनका काम करने का तरीक़ा बड़ा सीधा-सादा है. वो फिल्म की दो-तीन सीडी लेकर गांवों में जाते हैं. इन गांवों में उनके पहले से कुछ पुराने मित्र हैं, जो इस काम में उनकी मदद करते हैं. इन्हीं मित्रों के जरिए वे गांव में प्रचारित करवा देते हैं कि फलां तारीख को गांव के बारे में एक फिल्म दिखाई जाएगी.



इसके  लिए आवश्यक सीडी प्लेयर, टीवी सेट और बैटरी या जेनरेटर का इंतजाम प्राय: गांव वाले ही कर देते हैं. अब तक जहां कहीं भी मनोज ने फिल्म दिखाई है, वहां ग्रामीणों की प्रतिक्रिया बड़ी सकारात्मक रही है. गांव के लोग पूरे ध्यान से फिल्म देखते हैं. फिल्म देखने के बाद कई युवा फिल्म के प्रचार-प्रसार के लिए काम करने में भी रुचि दिखाते हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तरह पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी हिवरे बाज़ार की सीडी जोर-शोर से दिखाई जा रही है. लोगों को स्वराज के प्रति जागरूक किया जा रहा है. इसी तरह फैज़ाबाद, आजमगढ़, सुल्तानपुर बस्ती आदि ज़िलों के कार्यकर्ता पीपुल्स एक्शन फॉर नेशनल इंटीग्रेशन (पानी संस्था) के कार्यक्रम में इकट्ठा हुए. सबने अपने अपने अनुभव बांटे. प्रतापगढ़ से आई सुशीला मिश्र ने जब एक गांव में महिलाओं के समूह को यह फिल्म दिखाई तो गांव की महिलाओं ने उन्हीं से आग्रह किया कि दीदी इस बार आप ही प्रधान बन जाओ. फिर हम भी अपने गांव को हिवरे बाज़ार की तरह बना लेंगे.

पानी संस्था से जुड़े शशि भूषण अब तक इस फिल्म को विभिन्न ज़िलों के 70-80 स्थानों पर दिखा चुके हैं. जहां-जहां उन्होंने सीडी दिखाई, वहां के लोगों में कुछ कर गुज़रने का जज्बा पैदा हुआ है. कुछ ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों की परिस्थितियां महाराष्ट्र से अलग हैं, इसलिए हिवरे बाज़ार का प्रयोग यहां पूरी तरह से स़फल नहीं हो सकता. हालांकि ऐसी नकारात्मक बात करने वाले कम ही मिले हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश में ही चंदौली, कुशीनगर आदि ज़िलों में भी यह अभियान चल रहा है. गांव वालों के प्रतिक्रिया से कम से कम इतना तो स्पष्ट है कि वह अपने गांव के विकास के लिए कितने उत्साहित है. बस उन्हें सही सहयोग की ज़रूरत है. साथ ही अगला  पंचायती राज चुनाव उनके गांव में स्वराज लाने का एक बेहतरीन मौक़ा लेकर आएगा. अगर लोग इस मौक़े को भुना पाए तो फिर हर गांव की कहानी हिवरे बाज़ार की कहानी बन जाएगी

Thursday, December 20, 2012

यह आक्रोश गलीगली जाए और सालोंसाल रहे



सफदरगंज से सिंगापुर तक के सफर में भले ही गैंगरेप की शिकार लड़की ने दम तोड़ दिया हो पर मर तो उसी दिन गई थी जब 16 दिसंबर की रात चलती बस में उस पर दरिंदगी कहर बनकर टूटी थी. अब प्रायश्चित और शर्मसार होने के अलावा एक यही रास्ता है कि आज का युवा बलात्कार जैसे वीभत्स कृत्य के खिलाफ उबले इस आक्रोश को गलीगली तक ले जाए और उसे सालोंसाल अपने अंदर पालें. ताकि फिर कोई दामिनी हैवानियत और हवस की आग में न झुलसे. उस के प्रति यही हमारी सच्ची श्रद्धांजली होगी.

उठो जवानों तुम्हे जगाने क्रांति द्वार पर आई है, 70 के दश क में जेपी आंदोलन के दौरान जब यह नारा गूंजता था तो देश भर का युवा तत्कालीन सरकार के भ्रष्टचार और तानाशाही के खिलाफ स्कूलों और कालेजों से निकलकर सड़कों पर उमड़ पड़ता था. उस दौरान युवाशक्ति की इस गोलबंदी के आगे सरकार की हताशा और बेबसी कुछ ऐसी थी, जैसी दिल्ली गैंगरेप के खिलाफ युवाओं के फूटे आक्रोश के सामने है. 
रायसीना हिल्स, जंतरमंतर, प्रगति मैदान और इंडिया गेट पर उमड़ा जनसैलाब यह बताने के लिए काफी है कि इतिहास खुद को दोहराता है. एक मासूम लड़की के बलात्कार और उस की मौत तक सरकार का जो शर्मनाक रवैया पूरी जनता के सामने दिखा, उसी से मजबूर होकर युवाओं ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला है. और इतिहास गवाह है कि जब जब युवाओं ने क्रांति की मसाल अपने हाथों में थामी है, व्यवस्था हिलती दिखी है.
गैंगरेप कांड के खिलाफ गुस्से से भरे युवाओं ने न सिर्फ दिल्ली सरकार को बल्कि पूरी दुनिया को बता दिया है कि अगर गुस्सा जायज हो तो किसी लीडर या अगुआ के बगैर भी इतना बड़ा आंदोलन खड़ा किया जा सकता है. बगैर किसी नेता का पहला आंदोलन और बलात्कार जैसे जघन्य वारदात के मसले पर सरकार को झकझोरने के लिए युवा बधाई के पात्र हैं.
पर मन में एक डर भी है. डर इस बात का कि कहीं यह आंदोलन भी बाकी बड़े तथाकथित ऐतिहासिक आंदोलनों की तरह चार दिन की चांदनी, मीडिया का टीआरपी बेस्ड विजुअल प्रेजेंटेंशन, चंद फिल्मों की देखादेखी षुरू हुआ कैंडिल मार्च का ट्रेडिशन या फिर किसी सियासी दल, नेता, पंडेपुजारियों या योगगुरुओं द्वारा हाइजैक किया हुआ आंदोलन तो नहीं बन जाएगा.
यह डर इस बार किसी भी हालत में सही साबित नहीं होना चाहिए क्योंकि युवाओं को यह स्वर्णिम अवसर पहली बार मिला है जब उन के इस आंदोलन के सामने सियासी मलाई जीमने वाला कोई नेता नहीं है. वह खुद नेता है और खुद जनता. अब यह आंदोलन कुंद नहीं होना चाहिए. इस के अलावा सरकार ;यहां सरकार से मतलब मनमोहन या सोनिया गांधी ही नहीं बल्कि विपक्षी दलों समेत हर उस प्रश सनिक या राजनीतिक इकाई है, जो किसी न किसी रूप में जनता का प्र्रतिनिधित्व करती है.द्ध जैसे आज की परिस्थितियों में इस हद तक लाचार, बेबस, असहाय और घुटने टेके खडी है, वैसे पहले कभी नही खडी होती थी.  अब अगर तानाषाही मानसिकता की वर्तमान सरकार युवाओं के आक्रोश  से डरी सहमी है तो उन चंद बलात्कारियों की बिसात ही क्या है. इसलिए बहुत जरूरी है कि हमारा यह गुस्सा और आंदोलन सिर्फ जंतर मंतर, रायसीना हिल्स या इंडिया गेट पर ही न चले बल्कि यह हर उस गली महल्ले बस, मेट्रो स्टेशन, मंदिर, मौल, बाजार और हर उस परिवार तक चले जहां महिलाओं को भोगने की वस्तु समझकर उनका षारीरिक या मानसिक शोषण करने वाले लोग दिखते या पलते हैं.
हर युवा जानता और देखता है कि जब वह अपनी गलीमहल्ले से निकलकर बस या मेट्रो के जरिए अपनेअपने अपने काम की जगह पुहंचता है तो उसे हर नुक्कड़, चैराहे और बसों में लड़कियों से छेड़छाड़ या कमेंट करने वाले तत्व मिलते हैं. याद रखिए जो नुक्कड़ चैराहे पर दिनदहाड़े किसी लड़की या महिला को छेड़ने की हिम्मत कर सकता है वह मौका पाकर रेप जैसा कदम कभी भी उठा सकता है. असल में बलात्कारी तत्व इन्हीं जगहों पर पनपते हैं. इसलिए अगर हम इंडिया गेट या रायसीना हिल्स पर सांप के गुजरने के बाद की लकीर पीटने के बजाए उन गली महल्लों में सरेआम घूमने वालों सापों पर धावा बोलेंगे तब जाकर इन भेडियों के मन में भी वहीं खैफ पैदा होगा जो अभी सरकार के कंपकपाते बयानों में दिखता है. 
यह सब कुछ दिनों के शोरशराबे, कैंडल मार्च या सरकार की घेराबंदी से नहीं होगा बल्कि तब होगा जब युवाओं के मन में उबल रहा यह आक्रोश  उन के अंतर्मन में भी रोज उबलेगा. साथ ही इस उग्र आंदोलन को गली गली तक ले जाना होगा. समाज में कुकुतमुत्तों की तरह पनप रहे इन असामाजिक तत्वों को सरेआम एक्सपोज करना होगा., तब जाकर समाज इस तरह की कलंकित वारदातों से मुक्त हो सकेगा. 
युवा इस बात को अच्छे से समझ लें कि बैनरों और तख्तियों पर बचकाने स्लोगन ओर नारे लिखकर, कड़े कानून और त्वरित कार्यवाही की मांग कर सिर्फ इस लडकी के साथ बलात्कार और उस की हत्या करने वाले को सजा दिलवा सकते हैं पर दूेश  भर में फैले हर बलात्कारी के मन में ऐसा डर नहीं पैदा कर सकते कि वह इस तरह का कदम उठाने से पहले दस बार सोचे. 


अगर कड़े कानून बनाने या रेपिस्ट को फांसी देने से बलात्कार की घटनाए बंद होतीं तो दुनिया भर के उन देषों में कभी बलात्कार नहीं होता जहां रेप की इतनी वीभत्स और दिल दहला देने वाले पनिशमेंट हैं कि सोचकर ही दिल बैठ जाए. और हां, अगर दिल्ली गैंग रेप के आरोपियों को फांसी की सजा की हम मांग करते हैं तो सांसद, विधायक, मुखिया, जिला परिश द सदस्यों को भी फांसी की सजा मिलनी चाहिए, जिन पर बलात्कार के केस चल रहे हैं. एक साथ मामले का ट्रायल किया जाए. शुरूआत करनी है तो ढंग से की जाए.
रोश , आक्रोश, गुस्सा, नाराजगी सब अपनी जगह है और यह दिखना भी चाहिए लेकिन इस के नाम पर पुलिस के साथ लड़ने से कुछ हल नहीं होने वाला है. क्योंकि आप भी जानते हैं कि बलात्कारी इंडिया गेट पर नहीं बैठे हैं. वो तो देश  की रग रग में हैं. हर गली और हर चैराहे पर हैं. इसलिए जरूरी है कि सही बीमारी को ढूढा जाए और फिर से जड से खत्म किया जाए क्योंकि हमें बीमार को नही बल्कि बीमारी को खत्म करना है बीमारी तभी खत्म होती है जब हम उसके सिम्टम्स यानी लक्षणों और उन स्रोतो का पता लगा लें जहां ये तत्व पैदा होते हैं. हम सब जानते हैं कि इस बीमारी के लक्षणों से रोजाना हमारा सामना होता है. बस अब तक हम इन्हें हंसकर या डरकर टालते आ रहे हैं.
दरअसल, पुलिस और कानून ब्यवस्था के खिलाफ हमारे अंदर का गुस्सा तभी उबाल लेता है जब इस तरह की कोई ताजा वारदात हो. जैसेजैसे मामला मीडिया की सुर्खियों और नेताओं की बयानबाजियों से ठंडा पड़ने लगता है वैसवैसे ही हमारे गुस्से का उबाल भी ठंडा पडने लगता है. 
आज देश  का युवा आज संकल्प ले कि उसे बीमार को नहीं बल्कि बीमारी को जड़ को खत्म करना है. यह काम सिर्फ  और युवा ही कर सकते हैं. युवा श ब्द को उल्टा लिखने पर वह वायु बन जाता है. वायु जब आक्रोश  मंे बहती है तो दुनिया में बवंडर ला देती है. तख्ते पलट देती है. युवाश क्ति भी कुछ ऐसी ही है. बस उसे जरूरत होती है सही दिषा की. इस मामले ने उन्हें यह दिषा भी दे दी है. जब भी देश दुनिया में बड़े आंदोलन और परिवर्तन हुए हैं उन में युवाओं की महती भूमिका रही है. कहा भी गया है कि किसी भी देश  की विकास की रीढ युवा होते हैं. भारत भी युवा शक्ति से लबरेज है. 
जाहिर है इस समय जड बलात्कारी नहीं बल्कि बलात्कार की मानसिकता है. और मानसिकता तभी बदलेगी जब यह युवा आक्रोश  देश  की हर गलियों से गुजरता हुआ सालों साल हमारे अंदर सुलगता रहेगा और जिंदा रहेगा. अगर हर युवा ऐसा करने में सफल रहा तो यह निष्चित है कि हम में किसी की भी मां, बेटी, बहन, पत्नी और औरत का दामिनी जैसा हश्र नहीं होगा. 

                                    


Monday, December 17, 2012

शोहरत की बिसात का शालीन मोहरा - विश्वनाथन आनंद



कहते हैं कि जब कामयाबी का नशा चढकर बोलता है तो अर्ष से फर्ष तक का सफर बहुत लंबा नहीं रह जाता. कामयाब और विश्वविजेता होने का भ्रम पाले अक्सर खिलाडी अपनी आधी अधूरी कामयाबी लोकप्रियता के नषे में चूर होकर अपने खेल की गरिमा को ही दांव पर लगा देते हैं. बहुत से उदाहरण क्रिकेट समेत कई क्षेत्रों की प्रसिद्ध षख्सियतों के बरतावों से लगाया जा सकता है. भद्रजनों का खेल कहे जाने वाले क्रिकेट में ऐसे कई नाम हैं जो जरा सी कामयाबी पर इतना उछल जाते हैं कि जब गिरते हैं तो कामयाबी की अंधरे से बाहर ही नहंीं आ पाते.
       कम ही सही पर कुछ खिलाडी ऐसे भी होते हैं जो सिर्फ खिलाडी ही बने रहकर न सिर्फ दुनिया में अपना नाम रोषन करते हैं बल्कि अपनी शालीनता से लोगों के दिल में अपना मुकाम भी बना लेते हैं. न किसी विवाद से कोई लेना देना और न ही कभी सफलता के घोडों पर सवार होकर खुद को बादशाह समझना. ये असल में खामोषी से सिर्फं अपना काम करते हैं और बेहतरीन प्रदर्षन के बल पर दुनिया जीत लेते है. ऐसी ही एक षख्सियत है भारत के विश्वानाथन आनंद. विश्वानाथन आनंद ने मॉस्को में इसराइल के बोरिस गेलफैंड को टाईब्रेकर में हरा कर पांचवीं बार वर्ल्ड चेस चैंपियनशिप पर कब्जा कर लिया है. मॉस्को में चल रही शतरंज की विश्व चैंपियनशिप में उतार चढ़ाव वाले मैच में आनंद ने गेलफैंड का हरा दिया. 42 वर्षीय आनंद ने वर्ल्ड चेस चैंपियनशिप लगातार तीसरी बार जीती है. जबकि ये उनका लगातार चैथा खिताब है.
अक्सर खिलाडी जीत के बाद का जष्न कुछ यांे मनाते हैं लगता है कि पूरी दुनिया ही उनकी मुटठी में आ गई हो. कोई रात भर पार्टी करता है तो कोई षैंपेन की बोतलों को हवा में लहराता है. कोई मीडिया के जरिए बडेबडे दावे ठोंकता है तो कोई जीत की खुषी में किसी से भिड ही बैठता है. लेकिन आपको सुनकर ताज्जुब होगा कि पांचवीं बार वर्ल्ड चेस चैंपियन बनने के बाद विश्वानाथन आनंद ने क्या कहा होगा और जीत का जयष्न कैसे मनाया होगा. दरअसल जीत के बाद उनका कहना था कि अभी तो मैं इतने तनाव में हूं कि खुश नहीं हुआ जा सकता लेकिन मैं राहत महसूस कर रहा हूं. इतना शालीन जष्न शायद ही किसी विजेता ने मनाया हो. जमीन में रहने वाला से सितारा न जाने कब से अपनी चमक बरकरार रखे हुए है. इसने कभी भी कामयाबी के आकाष में अपनी उपस्थ्तिि दर्ज कराने के लिए अपनी चमक का बेजा इस्तेमाल नहीं किया. नहीं तो आईपीए की जीत का नजारा देख लीजिए. अंतर खुद ब खुद समझ में आ जाएगा.
 अपनी इस जीत के बाद विश्वनाथन आनंद में प्रेसवार्ता में कहा कि मैच सचमुच तनावपूर्ण रहा. उनके मुताबिक जब सुबह वे सोकर उठे तो उन्हें लगा कि अब तो कोई परिणाम निकलना ही है. उनका कहना था कि मैच जिस तरह से बराबरी पर चल रहा था यह कहना मुश्किल था कि उसका परिणाम क्या निकलेगा.
इस बुलंदी पर आने के बाद भी विश्वनाथन आनंद बेड ही प्यार से उसका जिक्र करना नहीं भूलते जिसे उन्हें न हरा पाने का मलाल रहता है. दरअसल यह कोई वैसा मुकाबला नहीं था फिर भी शतरंज के विश्व चैंपियन विश्वनाथन आनंद एक 14 साल के बच्चे को हरा नहीं पाए. दरअसल, हैदराबाद में चल रही अंतरराष्ट्रीय गणित कांग्रेस में आनंद ने एक साथ 40 लोगों के साथ शतरंज खेली थी. उन्होंने 39 लोगों को तो हरा दिया था लेकिन 14 साल के छात्र सिरकर वरदराज के साथ उनकी मुकाबला बराबरी पर खत्म हुआ.
विश्वनाथन आनंद, शतरंज की दुनिया का एक ऐसा नाम जिसे सारी दुनिया सम्मान की नजरों से देखती है और जिसकी उपलब्धियों से हर भारतीय गौरवान्वित महसूस करता है. लेकिन ताज्जुब की बात तो यह है कि देश के मानव संसाधन विकास मंत्रालय को भारतीय होने का भी सुबूत चाहिए थे. हालांकि बाद में विश्वनाथन आनंद की राष्ट्रीयता और उन्हें प्रस्तावित डॉक्ट्रेट की मानद उपाधि को लेकर उठे विवाद के बाद मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने खुद इस पूरे विवाद पर आनंद से माफी मांगी थी पर इस पूर मामले पर वो शांत और संयम की मूर्ति बने रहे. न किसी प्रेसवार्ता के जरिए मामले को हवा दी और न ही कोई बयानबाजी का सहारा लिया. डॉक्ट्रेट की मानद उपाधि लेते समय विश्वनाथन हमेशा ही की तरह शांत थे और मुस्कुरा रहे थे लेकिन यह बात किसी से छुपी नहीं थी की वह उन के साथ हुए सरकारी दुर्व्यवहार से खुश नहीं थे. फिर भी उन्होंने अपनी शालीनता बरकरार रखी. उनकी जगह कोई और खिलाडी होता तो शायद ही चुप बैठता. उसे तो पब्लिसिटी पाने का एक और बहाना मिल जाता.
11 दिसंबर, 1969 को तमिलनाडु के मायिलादुथुरै में जन्में विश्वनाथन आनंद को शतरंज उनकी मां ने खेलना सिखाया. छह साल की उम्र से ही विश्वनाथन आनंद अपनी मां के साथ शतरंज की बिसात पर चालें चला करते थे. चेन्नई के डॉन बॉस्को मैट्रिकुलेशन हायर सेकेंडरी स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करके उन्होंने लॉयोला कॉलेज  से कॉमर्स में स्नातक की डिग्री हासिल की. निजी जिंदगी में विश्वनाथन आनंद हमेशा शांत और मीडिया से दूर रहने वाले व्यक्ति हैं. यह व्यक्तित्व उन्हें एक बेहतरीन स्पोर्ट्समैन बनाता है. शायद यही वजह है कि जहां अन्य खिलाडी भारत रत्न को पाने का सपना देखते हैं वहीं एक नेता खूद अपनी तरफ से उन्हें भारत रत्न का दावेदार बताता है. और ताज्ज्ुाब की बात तो यह है कि वो इसके समर्थन में कुछ भी नहीं बोलते. उन्हें तो सिर्फ अपने नैसर्गिक खेल से मतलब है. हाल ही में जब सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न देने की मांग उठी थी तब केंद्रीय खेल मंत्री अजय माकन ने विश्व शतरंज चैम्पियन विश्वनाथन आनंद भारत रत्न का हकदार बताते हुए उन्हें उस पुरस्कार से नवाजे जाने की बात कही. हालांकि इसका फैसला प्रधानमंत्री करेंगे कि देश का यह सर्वोच्च सम्मान किसे मिलेगा.
गौरतलब है कि विश्वानाथन आनंद इससे पहले 2000, 2007, 2008 और 2010 में विश्व विजता रह चुके हैं. विश्वनाथन आनंद ने 2007 में टूर्नामेंट में आठ खिलाडि़यों के बीच खिताब जीता था. 2008 और 2010 में उन्होंने रूस के व्लादीमीर क्रामनिक और बल्गारिया के वेसेलीन टोपालोव को हराया था. तब टूर्नामेंट का फार्मेट बदल गया था और अब नियमानुसार मौजूदा चैंपियन को चुनौती देने वाले खिलाड़ी के साथ खेलना होता है. विश्वनाथन आनंद का कॅरियर बहुत तेजी से और अचानक शुरू हुआ. 14 साल की उम्र में नेशनल सब-जूनियर लेवल पर जीत के साथ शुरू हुआ उनका सफर आगे बढ़ता ही रहा. साल 1984 में 16 साल की उम्र में उन्होंने नेशनल चैंपियनशिप जीतकर सबको चैंका दिया और उन्होंने ऐसा लगातार दो साल किया. 1987 में वर्ल्ड जूनियर चेस चैंपियनशिप जीतने वाले वह पहले भारतीय बने और साल 1988 में वह 18 साल की उम्र में ही ग्रैंडमास्टर बन गए.
      शतरंज की बिसात पर जीत हासिल करने के लिए दिमाग की बहुत जरूरत होती है. जरा सी चूक आपको खेल से बाहर का रास्ता दिखा देती है. लेकिन इस खेल में अगर कोई लंबे समय से विश्व में टॉप पोजीशन पर कायम हो तो उसे असाधारण ही कहेंगे. ग्रैंडमास्टर विश्वनाथन आनंद भारतीय शतरंज जगत के ऐसे ष्तरंज की इस बिसात पर शान से बादशाह की कुर्सी पर जमे बैठे हैं पर किसी शारेषराबे के साथ नहीं बल्कि शालीनता से.


खास उपलब्धियां और रिकॉर्ड


आनंद उन छह खिलाडि़यों में से एक हैं जिन्होंने एफआईडीई विश्व शतरंज चैंपियनशिप में 2800 रेटिंग अंकों से ज्यादा अंक हासिल किए हैं. साल 2007 में वह विश्व शतरंज में नंबर एक तक पहुंचे. साल 2007 से लेकर 2008 तक वह छह में से पांच बार नंबर वन पर बने रहे. हालांकि साल 2008 में वह नंबर वन से हट गए पर दुबारा साल 2010 में उन्होंने अपना नंबर एक का स्थान पक्का कर लिया. विश्वनाथन आनंद 1987 में भारत के पहले ग्रैंडमास्टर बने. साल 1985 में उन्हें खेल के क्षेत्र में बेहतरीन योगदान देने के लिए  अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया गया था. साल 1991-92 में वह पहले ऐसे खिलाड़ी बने जिन्हें राजीव गांधी खेल रत्न से सम्मानित किया गया. साल 1987 में पद्मश्री, राष्ट्रीय नागरिक पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार से भी आनंद को नवाजा गया था. साल 2007 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया. 1997, 1998, 2003, 2004, 2007 और 2008 में उन्होंने शतरंज ऑस्कर जीता.

Wednesday, November 7, 2012

शिक्षक की शक्ल में ठग



राजधानी दिल्ली में आजकल ठगों के कारनामों की चर्चा है. ये ठग कहीं पैसा दोगुना करने की स्कीम के नाम पर भोलेभाले लोगों को ठग रहे हैं तो कहीं औनलाइन पैसा कमाने का झांसा देकर. लेकिन हाल में नगर निगम षिक्षक की नौकरी दिलावाने के नाम पर कुछ षातिर ठगों का जो फर्जीवाडा सामने आया आया है, उससे एक बात तो साफ हो जाती है कि राजधानी में आजकल ठगी के सरताजों का बोलबाला है.
कल तक राजधानी में ठगी का षिकार ज्यादातर अनपढ किस्म के लोग ही होते थे. लेकिन अब तो पढेलिखे लोगों के ठगे जाने की खबरें भी गाहे बगाहे  देखने सुनने में आ ही जाती हैं. अब इसे बेरोजगारी की मार झेल रहे लोगों की मजबूरी कहें या फिर हर काम को रिष्वत देकर काम कराने की प्रवृत्ति, जिस कारण पढेलिखे लोग भी नौकरी हासिल करने की तमन्ना में ठगों के हाथों फंसकर न सिर्फ अपनी मेहनत की कमाई लुटा देते हैं, बल्कि अपने कैरियर के साथ भी खिलावाड कर लेते हैं. ताजा घटनाक्रम तो इसी बात की तस्दीक कर रहा है. घटना 28 फरवरी 2012 की है. इस दिन जहांगीरपुरी पुलिस ने एक ऐसे रैकेट का भंडाफोड किया, जो कान्ट्रेक्ट पर निगम के स्कूलों में षिक्षक बनाने का झांसा  देकर कई लोगों का ठगी का षिकार बनाते थे. ये ठग न सिर्फ बेरोजगारों को नौकरी दिलाने के झूठा सपना दिखाते थे बल्कि उनके इस के ऐवज में अच्छी खासी रकम भी वसूलते थे. पुलिस के गिरफत में सात लोग आए हैं. इस ठगी के खेल में षामिल 7 लोगों की पहचान संजीव, सुरेष, अषोक, सुनील, सचिन, संतोश और आफताब आदि के रूप में हुई है. इन सभी ठगों से जब पुलिस ने कडाई से पूछताछ की कई बाते सामने आईं. जिनसे यह पता चलता गिरफ्तार सातों अभियुक्तों में ज्यादातर पढे लिखे युवक थे. इनमें से तीन तो फर्जी निगम षिक्षक के तौर पर बाकायदा नौकरी भी करते थे. अब इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये ठग बतौर षिक्षक बच्चों को किस तरह की षिक्षा देते होंगे. इस गिरोह को अषोक चलाता था, जो वजीराबाद स्थित निगम स्कूल में कान्ट्रेक्ट पर षिक्षक के तौर पर काम कर रहा था. बाद में अषोक ने ठगी के इस खेल में अन्य साथियों को भी षामिल कर लिया. अपने इस कारनामे को अंजाम देने के लिए इनके पास कई ऐसे दस्तावेज थे, जिनके आधार पर यह किसी को अहसास नहीं होने देते थे कि वो जो भी कर रहे हैं वह सिर्फ फर्जीवाडे के अलावा और कुछ नहीं है. असल में इनके पास कान्ट्रेक्ट पर षिक्षक की नियुक्ति के फर्जी पत्र थे. इनके उपर वह उप निरीक्षक कवंर सिंह के फर्जी हस्ताक्षर कर अपनी ठगी के धन्धे को अंजाम देते थे.यह गिरोह दो से चार लाख रूपये लेकर नौकरी दिलाने का दावा करता था. गिरफ्तारी के दौरान इनके पास से फर्जी नियुक्ति पत्र, डिप्टी डायरेक्टर की फर्जी सील और 75,000 रुपए नगद बरामद हुए. यह मामला तब खुला, जब जहांगीरपुरी पुलिस को सिविल लाइन क्षेत्र में षिक्षा विभाग के उपनिदेषक कवंर सिंह की ये षिकायत मिली कि निगम स्कूल में संविदा पर षिक्षकों के तीन नियुक्ती पत्र फर्जी पाये गये हैं. मामले को गंम्भीरता से लेते हुए एसआई षैलेन्द्र कुमार और कृश्णा की टीम तीनो आरोपियों को धर दबोचा.
  जब इस बाबत नगर निगम की षिक्षक समिति के अध्यक्ष डा. महेंद्र नागपाल हमने बात की तो उनका कहना था कि मामले की जांच चल रही है और इस जांच में षिक्षा विभाग भी मुस्तैदी से माामले की छानबीन कर रहा है. साथ ही यह भी पता लगाने की कोषिष की जा रही है कि फर्जी प्रमाण पत्र बनाने वाले इस गिरोह की सांठगांठ कहीं विभाग के निगम कर्मियों से तो नहीं है. इसके अलावा उनका यह भी कहना था कि अब  वो हाल ही में कांट्रेक्ट पर भर्ती हुए षिक्षकों को कागजों का बारीकी से वेरीफिकेषन कर रहे हैं.
बहरहाल, इस पूरे मामले में यह बात भी सामने आई है ठगी का षिकार ज्यादातर वो लोग हुए हैं, जो षिक्षक के पद की योग्यता खरे नहीं उतरते थे. यानी अनैतिक तरीके से रोजगार हासिल करके के चक्कर में वे इन ठगों के चंगुल में फंस जाते थे. ये ठग न जाने कितनों दिनांे से कई बेरोजगारों का नौकरी का झांसा देकर अपना उल्लू सीधा कर रहे थे. हालांकि, पुलिस की यह जांच अभी षुरुआती दौर में है. अभी तो कई और तथ्य सामने आने बाकी हैं. मसलन हो सकता है कि फर्जी षिक्षक के तौर पर काम कर रहे और भी ठग अभी भी पुलिस की गिरफत से बाहर हों. इन ठगो ंके अलावा यह दन बेरोजगारों के लिए भी एक सबक है जो कुछ भी हासिल करनेके लिए षार्टकट और पैसों पर ही भरोसा करके ऐसे तत्वों को बढावा देते हैं. इससे पहले कि दिल्ली के ये ठग किसी और की कमाई और भविश्य से खिलवाड करें, इन्हें जल्द से जल्द सलाखों के पीछे पहुंचाना कानून का काम है.



 दिल्ली के ठगों के ताजा कारनामें

राजधानी में ठगी का यह कोई पहला मामला नहीं है. इससे पहले राजधानी कई ठगों का षिकार बन चुकी है. हालिया मामला 5 फरवरी 2012 का है. इसी दिन पुलिस ने एक ऐसी ठग महिला को गिरफतार किया था जो टीटीई की नौकरी दिलाने के नाम पर लोगों को नियुक्ति पत्र लेने के लिए लखनऊ भेज देती थी. बाद में ठगी के षिकार लोगों को पता चलता था कि जो पता ठग पिंकी षुक्ला नवयुवकों को देती थी, वो असल में गलत होता था. इसी तरह 1 फरवरी 2012 को पुलिस ने ललित और अमरजीत नाम के दो ठगों को धर दबोचा था, जो केवल 12वीं तक पढे थे लेकिन बहुराश्ट्रीय कंपनियों में नौकरी दिलाने के झांसा देकर अब तक 50 से अधिक ख्ुवाओं का अपना षिकार बना चुके थे. सरोजनी नगर पुलिस को भी 28 जनवरी 2012 को उदयवरी और अमित मलिक को कहरासत में लिया. ये दोनों षख्स डीटीसी में बतौर कंडक्टर काम करते थे और लोगों को कांट्रेक्ट पर कंडक्टर बनाने का सपना दिखाकर अपना उल्लू सीधा करते थे. इस तरह दिल्ली में बेरोजगारों को रोजगार दिलाने का सपना दिखाकर ये ठग अपना रोजगार खूब अच्छी तरह से चला रहे हैं.



Wednesday, September 12, 2012

खबरों के समंदर में नई लहर



उत्तर प्रदेश में जब भी सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन की बात आती है तो ज़ेहन में सबसे पहले बुदेलखंड का नाम आता है. बुंदेलखंड के ज़्यादातर इलाक़े भुखमरी और सूखे का सालों से सामना करते आ रहे हैं. इस वजह से ही यह इलाक़ा विकास की रफ्तार में सबसे पीछे छूट गया है. बहुत कम होता है जब किसी अच्छी खबर के लिए बुंदेलखंड का ज़िक्र हुआ हो. लेकिन यहां पर दो बड़ी खबरों का ज़िक्र कर रहे हैं.

पहली खबर इलाहाबाद के एक किशोर की. 12 साल की छोटी उम्र का उत्कर्ष त्रिपाठी एक अ़खबार निकाल रहा है. इस अखबार का संपादक है, संवाददाता, प्रकाशक और वितरक (हॉकर) वही है. इलाहाबाद के चांदपुर सलोरी इला़के की काटजू कॉलोनी में रहने वाला उत्कर्ष त्रिपाठी पिछले एक साल से हाथ से लिखकर जागृति नामसे चार पृष्ठों का एक साप्ताहिक अ़खबार निकाल रहा है. हाल-फिलहाल में इसके क़रीब 150 पाठक हैं. अपने अ़खबार में उत्कर्ष भ्रूणहत्या, पर्यावरण जैसे सामाजिक मुद्दों पर लिखता है. इसमें कोई खर्चा नहीं है, वह पूरा अखबार अपने हाथों से लिखकर और उसकी फोटो कॉपी करवाकर लोगों तक पहुंचाता है.

दूसरी खबर है उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा से लगे चित्रकूट ज़िले के कर्वी गांव की. इस गांव से निकलने वाले अ़खबार खबर लहरिया को संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने साक्षरता सम्मान के लिए चुना है. यह उपलब्धि शायद ही किसी मीडिया हाउस को नसीब हुई हो. इन दोनों खबरों के दो महत्वपूर्ण सकारात्मक पहलू हैं. पहला तो यह कि बुंदेलखंड जैसे इलाक़े में इस तरह का क्रांतिकारी विकासात्मक परिवर्तन एक नई उम्मीद जगाता है और दूसरे पहलू का फलक थोड़ा बड़ा है. बड़ा इसलिए कि जब पूरे देश में वीर सांघवी और बरखा दत्त जैसे तथाकथित बड़े पत्रकार मीडिया को दलाली के व्यवसाय में तब्दील करे रहे हों तो ऐसे में इस तरह के रूरल जर्नलिज्म का जन्म सुकून भरा है.

 ऐसा सुकून जिसमें एक बड़ी क्रांति के बीज छिपे हुए हैं. किसी भी देश या राज्य के बहुआयामी विकास में जनसंचार माध्यमों की भूमिका अहम हो जाती है. इसी के माध्यम से सरकारी योजनाओं और नीतियों की जानकारी लोगों तक पहुंच पाती है. लेकिन पिछले कुछ समय से मीडिया की भूमिका एक व्यवसायिक कंपनी की तरह हो गई है, जो कि स़िर्फ मुना़फा देने वाले ग्राहकों के हितों का ही ध्यान रखते हैं. इसी तरह हमारी राष्ट्रीय मीडिया में भी स़िर्फ महानगरों और उन लोगों के मुद्दे उठाए जाते हैं, जिनसे उन्हें प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर फायदा पहुंचता है. इसी वजह से गांव में एक तरह से संचार का खालीपन पैदा हो गया है.




 गांव और किसानों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने वाला मीडिया जब अपने ही फर्ज़ से दूर हो रहा है, ऐसे में आंचलिक पत्रकारिता का सहारा बचता है. और इस काम को खबर लहरिया और जागृति ने ब़खूबी संभाला है. ज़रूरत है तो इन्हें भरपूर सहयोग और ब़ढावा देने की. अगर उन्हें उचित सहयोग और प्रोत्साहन मिलता रहे तो संचार के इस खालीपन को इस वैकल्पिक मीडिया के द्वारा भरा जा सकता है. अंचलों से निकलने वाली पत्र-पत्रिकाएं समाचार-पत्र उस क्षेत्र-विशेष की भाषा और ज़रूरत को समझते हैं तथा स्थानीय लोग भी ऐसे माध्यमों से जुड़ाव महसूस करते हैं. ग़ौरतलब है कि चमेली देवी पुरस्कार से सम्मानित खबर लहरिया नौ नवसाक्षर महिलाओं ने लगभग चार साल पहले शुरू किया था. इस अ़खबार को निकालने वालों में से किसी ने भी पत्रकारिता का विधिवत प्रशिक्षण नहीं लिया है. यह अ़खबार महिला सशक्तीकरण का अद्‌भुत उदाहरण है. ऐसा सशक्तीकरण जो सरकारी योजनाओं के सहारे न होकर गांव की पिछड़ी और दलित महिलाओं के बलबूते हुआ है. हिंदी की उपबोली बुंदेली में प्रकाशित यह आंचलिक समाचार पत्र को दलित ग्रामीण महिलाओं द्वारा निरंतर नामक अशासकीय संस्था के प्रोत्साहन से निकाला जाता है.

इस अखबार को इला़के की बेहद ग़रीब, आदिवासी और कम-पढ़ी लिखी महिलाओं की मदद से निकाला जा रहा है. अ़खबार में सभी क्षेत्रों से जु़डी खबरें होती हैं, लेकिन पंचायत, महिला सशक्तीकरण, ग्रामीण विकास की खबरों को ज़्यादा महत्व दिया जाता है. दो रुपए की क़ीमत वाले इस अ़खबार की संपादक मीरा के मुताबिक़ उनका अ़खबार बुंदेलखंड की आदिवासी कोल महिलाओं में शिक्षा की भूख जगाने में मदद कर रहा है. इतना ही नहीं इस अ़खबार के तहत महिलाओं को पत्रकारिता का भी प्रशिक्षण दिया जाता है. इस कोर्स को रूरल जर्नलिज्म कोर्स कहते हैं. 20,000 से अधिक पाठकों वाले इस अ़खबार की बदौलत कई विकास कार्य मसलन गांव की सड़कें बनी हैं. नहर खुदी हैं और स्कूल खुले हैं.



हालांकि क़ाग़जों में यह काम पहले ही हो चुके थे पर हक़ीक़त में तब हुए जब खबर लहरिया ने इन्हें अपने बेबाक़ अंदाज़ में प्रकाशित किया. तमाम सरकारी योजनाओं की घोषणा की खबरें समय-समय पर इस अ़खबार में छपती रहती हैं और इन सूचनाओं को ही ताक़त बनाकर गांव का आदमी अपने हक़ की लड़ाई लड़ने लगा है. इसे ही इस वैकल्पिक मीडिया की शक्ति कह सकते हैं. इसमें विज्ञापन और पेज-थ्री का ग्लैमर नहीं है और न ही गला काट प्रतियोगिता. यहां स़िर्फ सामाजिक सरोकार और जनहित से जुड़े मसले उठते हैं. इनमें प्रशासन के खिला़फ आवाज़ उठाने का माद्दा है. सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस आंचलिक पत्रकारिता पर अभी तक कॉरपोरेट और दलालों की छाया नहीं पड़ी है. उम्मीद की जानी चाहिए कि बुंदेलखंड की तर्ज़ पर अन्य राज्यों के पिछड़े इलाक़ों में भी सच की आवाज़ बनने वाले इस वैकल्पिक मीडिया को ब़ढावा मिलेगा.

Friday, September 7, 2012

टीम इंडियाः चारों खाने चित्त


अभी कुछ ही दिनों पहले भारत के ख़िला़फ दूसरे टेस्ट में जीत दर्ज करने के बाद इंग्लैंड की तऱफ से दो ऐसे अप्रत्याशित वाकए सामने आए, जो भारतीय मीडिया और कुछ वरिष्ठ खिलाड़ियों को नागवार गुजरे. पहली बार जब इंग्लैंड टीम ने एक प्रेस कांफ्रेंस में यह दावा किया था कि हम पूरी सीरीज में भारत का सूपड़ा साफ कर देंगे. दूसरी घटना, जब लंदन के मीडिया ने भारतीय टीम पर अपमानजनक और आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए यह कहा था कि भारतीय टीम उस कुत्ते की तरह है, जिससे अगर डरा न जाए तो वह ख़ुद ही डर कर भाग जाता है. दोनों ही मामलों में भारत के पास जवाब देने के लिए दो टेस्ट बाक़ी थे.

जैसा कि कहते हैं कि इस जेंटलमैन गेम में हर बात का मुंह तोड़ जवाब अपने प्रदर्शन से दिया जाता है, टीम इंडिया भी बचे हुए दोनों टेस्टों में इंग्लैंड को धूल चटाकर यह साबित कर सकती थी कि लंबे समय बाद इंग्लैंड क्रिकेट टीम की जीत के बाद वहां का मीडिया पगला और बौखला गया है और फिर इंग्लैंड की गीदड़ भभकी दुनिया के सामने जगज़ाहिर हो जाती. अब इस पर जल्दी विश्वास नहीं होता कि यह वही टीम इंडिया है, जिसने विश्व विजेता ऑस्ट्रेलिया के विजय रथ को रोका था, टी-20, आईपीएल और वर्ल्डकप की हैट्रिक लगाई थी. आम तौर पर ऐसा होता है कि जो टीम सिलसिलेवार जीतती जाती है, उससे अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं. क्रिकेट प्रेमियों की हर अपेक्षा पर खरा उतरना आसान भी नहीं है, लेकिन जिस तरीक़े से इस सीरीज में टीम इंडिया चारों खाने चित्त रही, यह उम्मीद तो हम किसी नई नवेली टीम से ही कर सकते हैं. लेकिन हुआ क्या?

 आख़िरकार वही, जिसके आसार बहुत पहले से  दिख रहे थे. भारत पूरी सीरीज में हर क्षेत्र में चारों खाने चित्त दिखा. अपने दावों को इंग्लैंड ने सही साबित किया और टीम इंडिया की आख़िरी हार एक पारी और आठ रनों से हुई. इसके साथ ही भारत इंग्लैंड से टेस्ट सीरीज 0-4 से हार गया. इस हार के बाद भारतीय टीम आईसीसी की टेस्ट टीमों के वरीयता क्रम में तीसरे स्थान पर पहुंच गई है. नंबर वन पर इंग्लैंड और दूसरे नंबर पर दक्षिण अफ्रीका पहुंच गया है. कल तक टीम इंडिया के लिए मिस्टर लकी के नाम से मशहूर महेंद्र सिंह धोनी का लक कब बैडलक में बदल गया, किसी को भी पता नहीं चला. अभी तक धोनी की कप्तानी में टीम इंडिया हारी नहीं थी और अब हारी है तो ऐसी कि किसी को मुंह दिखाते नहीं बन रहा है. धोनी की कप्तानी में यह पहला मौक़ा है, जब भारत कोई टेस्ट सीरीज हारा है. आपको बता दें कि पिछले चालीस सालों में भारत की यह सबसे बड़ी और शर्मनाक हार है. धोनी कहते हैं कि इस हार के पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि हमारे खिलाड़ी चोटिल रहे और हम अपनी क्षमता के अनुरूप अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाए. धोनी ने इसके लिए अपर्याप्त अभ्यास को भी दोषी ठहराया. लेकिन जब टीम इंडिया जीत रही थी, तब धोनी ने यह मसला क्यों नहीं उठाया. इस हार के बाद टीम इंडिया की चारों ओर आलोचना हो रही है. मैच के  पांचवें दिन फॉलोऑन खेलते हुए केवल वह 283 रन ही बना पाई. ग़ौरतलब है कि भारत ने पहली पारी में इंग्लैंड के  छह विकेट पर 591 रनों के जवाब में 300 रन बनाए थे. हालांकि सचिन तेंदुलकर और अमित मिश्रा ने आख़िरी दिन कुछ अच्छा खेल दिखाने की कोशिश की, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और भारत के हाथ से सफलता बहुत दूर निकल चुकी थी. भारत इस सीरीज में एक ओर शर्मनाक तरीक़े से हारा ही, ऊपर से जिन लोगों ने ओवल में सचिन के शतक की आस लगा रखी थी, वे भी नर्वस नाइंटी के शिकार होकर लौट गए यानी हार तो हार भारत को सचिन का सौंवा शतक देखने का भी मौक़ा नहीं मिला. सचिन 91 रन बनाकर एलबीडब्ल्यू हो गए. लॉर्ड्स में हुए पहले टेस्ट से लेकर ओवल में हुए आख़िरी टेस्ट तक भारत की कमान एक थके हुए खिलाड़ी महेंद्र सिंह धोनी के पास थी. उनके चयन पर भी अब सवाल उठाए जा सकते हैं. खिलाड़ियों के अलावा मैदान में फिल्डिंग सजाने से लेकर सही समय पर सही गेंदबाज़ों को मोर्चे पर न लगाने में भी उनकी असफलता साफ दिखाई दी. धोनी को इन सब खामियों के जवाब खोजने होंगे, लेकिन भारतीय टीम का नुक़सान स़िर्फ इस सीरीज तक सीमित नहीं है, टीम को इस सीरीज से ऐसे जख्म मिले हैं, जो उसे आने वाले महत्वपूर्ण मैचों में भी दिखाई देंगे. सीरीज में जहां भारत ने क्रिकेट प्रेमियों का दिल तोड़ा है, वहीं टीम के कई खिलाड़ियों की हड्डी भी टूटी है.

 जी हां, इंग्लैंड के ख़िला़फ सीरीज ने टीम इंडिया के खिलाड़ियों की फिटनेस पर सवालिया निशान लगा दिए हैं. आधी टीम इंडिया चोटिल होकर बाहर बैठी है. चोटिल खिलाड़ियों की सूची में विस्फोटक सलामी बल्लेबाज़ वीरेंद्र सहवाग और तेज गेंदबाज़ ईशांत शर्मा का नाम जुड़ गया है. इसके अलावा इस सूची में ज़हीर ख़ान, युवराज सिंह एवं हरभजन सिंह पहले ही सीरीज से बाहर हो चुके थे. टीम इंडिया इस दौरे पर चोटों से ही जूझती रही है. लॉड्‌र्स के पहले टेस्ट मैच में ही ज़हीर ख़ान चोटिल होकर बाहर हो गए. उसी मैच में गौतम गंभीर भी चोटिल होकर बाहर हो गए. उनकी ग़ैर मौजूदगी में राहुल द्रविड़ को सलामी बल्लेबाज़ की भूमिका निभानी पड़ी. इसके बाद भी टीम इंडिया के खिलाड़ियों की चोटों का सिलसिला थमा नहीं. काफी लंबे समय बाद टीम में वापसी करने वाले युवराज सिंह और फिरकी गेंदबाज़ हरभजन सिंह भी इस मैच में चोटिल होकर बाहर हो गए. टीम इंडिया सीरीज में चोटों की वजह से 2-0 से पिछड़ गई थी. इसके बाद अपनी पुरानी चोट से उभरे वीरेंद्र सहवाग ने सीरीज में वापसी की. इसके अलावा गौतम गंभीर और ज़हीर ख़ान भी इस मैच में वापस आए. ज़हीर ख़ान मैच की पहली पारी के दौरान ही चोटिल होकर पूरी सीरीज से बाहर हो गए. इसके अलावा प्रवीण कुमार भी दूसरी पारी में बल्लेबाज़ी के दौरान अपना अंगूठा चोटिल करा बैठे थे. गंभीर और सहवाग भी पूरी तरह से फिट नहीं थे. सहवाग इस वजह से दोनों पारियों में खाता तक नहीं खोल पाए. लिहाज़ा नतीजा यह हुआ कि टीम इंडिया यह मैच भी बुरी तरह चौथे दिन ही हार गई. चौथे टेस्ट तक आते-आते गौतम गंभीर और सहवाग दोनों चोटिल हो गए थे. गंभीर इस मैच में भी पारी की शुरुआत करने नहीं उतर पाए थे. सहवाग भी दूसरी पारी में चोटिल हो गए. इससे पहले ईशांत शर्मा भी गेंदबाज़ी के दौरान अपने बाएं हाथ की उंगली में चोट खा बैठे थे. सहवाग की जगह मुंबई के  सलामी बल्लेबाज़ अजंकया रेहाणे और ईशांत की जगह तेज गेंदबाज़ वरुण अरोड़ा को मौक़ा दिया गया. लेकिन क्या ऐसा संभव है कि अचानक टीम के इतने सारे खिलाड़ी एक साथ चोटिल हो जाएं. असल में पिछले साल से लगातार मुना़फा और क्रिकेट मैच में मिलने वाली कमाई के लोभ में फंसे खिलाड़ी अपनी चोटें छिपाते हैं. गौतम गंभीर का वाकया तो सबको याद होगा. इसके अलावा आईपीएल के दौरान ही सहवाग भी घायल हुए थे, लेकिन उस व़क्त शायद सहवाग ने अपना इलाज कराना ज़रूरी नहीं समझा और इसी का खामियाजा इंग्लैंड में मिली शर्मनाक हार के रूप में भुगतना पड़ा. अब इस पर जल्दी विश्वास नहीं होता कि यह वही टीम इंडिया है, जिसने विश्व विजेता ऑस्ट्रेलिया के विजय रथ को रोका था, टी-20, आईपीएल और वर्ल्डकप की हैट्रिक लगाई थी. आम तौर पर ऐसा होता है कि जो टीम सिलसिलेवार जीतती जाती है, उससे अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं. क्रिकेट प्रेमियों की हर अपेक्षा पर खरा उतरना आसान भी नहीं है, लेकिन जिस तरीक़े से इस सीरीज में टीम इंडिया चारों खाने चित्त रही, यह उम्मीद तो हम किसी नई नवेली टीम से ही कर सकते हैं. अब व़क्त है धोनी और उन सभी खिलाड़ियों के लिए कि वे इस हार पर गहन चिंतन-मनन ज़रूर करें. - See more at: http://www.chauthiduniya.com/2011/09/team-india-defeated-all-around.html#sthash.DShpXJbC.dpuf