Friday, April 15, 2011

भारत में जापान से ज्यादा खतरनाक भूकंप आ सकते हैं






जापान में सुनामी से हुई तबाही पूरी दुनिया ने देखी. कुछ लोगों ने टेलीविज़न पर तो कुछ लोगों ने अपनी आंखों से. भारत में इस तरह के भयंकर मंज़र अभी तक देखे नहीं गए हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में इस तरह की तबाही नहीं आ सकती है. दरअसल हम लोग ग़फलत में जी रहे हैं. बिना किसी तैयारी के इस बात से बे़फिक्र हैं कि भारत में इस तरह के प्रलंयकारी भूकंप और सुनामी आ ही नहीं सकते. सच्चाई तो यह है कि भारत में जापान से भयानक तबाही आ सकती है. जापान तो खैर इस तरह की परिस्थितियों से निपटने में माहिर हो चुका है, लेकिन भारत में तो इस तरह की आपातकाल स्थितियों से निपटने के लिए पुख्ता इंतज़ाम भी नहीं हैं. जिस तरह से भारत में भूकंप जोन के इलाक़े ब़ढते जा रहे हैं, उससे तो सा़फ हो जाता है कि भारत किसी भी व़क्तजापान जैसी हालात से रूबरू हो सकता है. भारत के भूकंपीय जोन ऩक्शे में भी देखे जा सकते हैं. इसकी गंभीरता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस मसले पर पिछले साल शिमला में हुई बैठक में एक वरिष्ठ अधिकारी के साथ मीटिंग में उन्होंने कहा कि हम एक टाइम बम पर बैठे हैं. हम बार-बार भले ही इस बात की दलील दें कि हमारी जापान से तुलना सही नहीं है, लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञ और भूमंडलीय प्लेटों की स्थितियां यही बताती हैं कि हमारा देश कभी भी किसी बड़े भूकंप की चपेट में आ सकता है.

भारत भूकंप के लिहाज़ से लगातार ज़्यादा संवेदनशील इसलिए भी होता जा रहा है, क्योंकि इसकी सब-कॉन्टिनेंटल प्लेट एशिया के अंदर घुसती चली जा रही है. इससे जब भी सब-कॉन्टिनेंटल प्लेट का दबाव ऐशियन प्लेट पर ब़ढेगा तो नतीजा एक बड़े सैलाब के तौर पर दिखाई देगा. धरती की जो प्लेट्स या परतें जहां-जहां मिलती हैं वहां के आसपास के समुद्र में सुनामी का ख़तरा ज़्यादा होता है.


जोन 1: पश्चिमी मध्य प्रदेश, पूर्वी महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और उड़ीसा के हिस्से आते हैं. यहां भूकंप का सबसे कम ख़तरा है.

जोन 2: तमिलनाडु, राजस्थान और मध्य प्रदेश का कुछ हिस्सा, पश्चिम बंगाल और हरियाणा. यहां भूकंप की संभावना रहती है.

जोन 3: केरल, बिहार, पंजाब, महाराष्ट्र, पश्चिमी राजस्थान, पूर्वी गुजरात,  उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का कुछ हिस्सा आता है. इस ज़ोन में भूकंप के झटके आते रहते हैं.

जोन 4: मुंबई, दिल्ली जैसे महानगर, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पश्चिमी गुजरात, उत्तरांचल, उत्तर प्रदेश के पहाड़ी इलाक़े और बिहार-नेपाल सीमा के इलाक़े शामिल हैं. यहां भूकंप का ख़तरा लगातार बना रहता है और रुक-रुककर भूकंप आते रहते हैं.

जोन 5: भूकंप के लिहाज़ से यह सबसे ख़तरनाक इलाक़ा है. इसमें गुजरात का कच्छ इलाक़ा, उत्तराखंड का एक हिस्सा और पूर्वोत्तर के ज़्यादातर राज्य शामिल हैं.

भूकंप की आशंका के आधार पर देश को पांच जोन में बांटा गया है. नार्थ-ईस्ट के सभी राज्य, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड तथा हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्से जोन-5 में आते हैं. यह हिस्सा सबसे ज़्यादा संवेदनशील कहा जा सकता है. उत्तराखंड के कम ऊंचाई वाले हिस्सों से लेकर उत्तर प्रदेश के ज़्यादातर हिस्से और दिल्ली जोन-4 में आते हैं. इन्हें भी कम संवेदनशील नहीं कहा जा सकता है.

मध्य भारत अपेक्षाकृत कम खतरे वाले हिस्से जोन-3 में आता है, जबकि दक्षिण के ज़्यादातर हिस्से सीमित खतरे वाले जोन-2 में आते हैं, लेकिन यह एक मोटा वर्गीकरण है. दिल्ली में कुछ इला़के हैं, जो जोन-5 की तरह खतरे वाले हो सकते हैं. इस प्रकार दक्षिण राज्यों में कई स्थान ऐसे हो सकते हैं जो ज़ोन-4 या ज़ोन-5 जैसे खतरे वाले हो सकते हैं. दूसरे ज़ोन-5 में भी कुछ इला़के हो सकते हैं, जहां भूकंप का खतरा बहुत कम हो और वे ज़ोन-2 की तरह कम खतरे वाले हों. इस मामले में बिहार ही एक ऐसा राज्य है, जहां लगभग सभी भूकंपीय ज़ोन आते हैं. इसकी जांच के लिए भूकंपीय माइक्रोजोनेशन की ज़रूरत होती है. माइक्रोजोनेशन वह प्रक्रिया है, जिसमें भवनों के पास की मिट्टी को लेकर परीक्षण किया जाता है और इसका पता लगाया जाता है कि वहां भूकंप का खतरा कितना है.

हालांकि, भारत में तबाही लाने के लिए स़िर्फ सब-कॉन्टिनेंटल प्लेट ही ज़िम्मेदार नहीं हैं, बल्कि भारत की परमाणु इकाइयां भी भारत को राख के ढेर में तब्दील करने के लिए का़फी हैं. अब ज़रा भारत की 20 परमाणु इकाइयों के बारे में भी सोचें. अगर भारत में तबाही का कारण ये परमाणु इकाइयां होती हैं तो इससे होने वाली तबाही दुनिया में किसी भी दूसरी जगह आई आपदा से ज़्यादा विनाशकारी होगी. भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो हिंदूकश क्षेत्र में भूकंप का सबसे ज़्यादा खतरा कश्मीर को होता है. हिंदूकश क्षेत्र में आए भूकंप का खतरा भले ही गुज़र गया हो, लेकिन इस महीने में एक के बाद एक आ रहे भूकंप चिंता का विषय हैं. मौसम विज्ञान केंद्र के अनुसार मार्च महीने के 21 दिनों में अब तक भूकंप के 55 झटके लग चुके हैं, जबकि प्रतिमाह 25-30 भूकंप ही आते हैं.


भारत के 10 बड़े भूकंप

1.         शिलॉन्ग (1897)

2.         कांगड़ा (1905)

3.         बिहार-नेपाल सीमा (1934)

4.         पूर्वोत्तर असम (1950)

5.         सतपुड़ा (1938)

6.         अंजार (1956)

7.         कोयना (1967)

8.         किल्लारी (1993)

9.         जबलपुर (1997)

10.       कच्छ (2001)

मौसम विज्ञान केंद्र के भूकंप वैज्ञानिक डॉ. ए. के. शुक्ला के अनुसार इसकी वजह जापान में आया बड़ा भूकंप है. जब भी कोई बड़ा भूकंप आता है तो उसके बाद छोटे भूकंप आते हैं. भूकंप विज्ञान केंद्र में पूरी दुनिया में आने वाले भूकंप रिकॉर्ड किए जाते हैं. इस महीने आए 55 भूकंपों में सबसे ज़्यादा 11 मार्च को 22 झटके लगे हैं. इसी दिन जापान में 8.9 तीव्रता का भूकंप भी आया था. जहां तक भारत का प्रश्न है 19 मार्च को अंडमान निकोबार क्षेत्र में 4.8 तीव्रता का तथा इससे पहले 14 मार्च को चमोली में 3.3 तीव्रता का भूकंप आया था. डॉ. शुक्ला के अनुसार भारत के लिए अंडमान, कच्छ, पूर्वोत्तर, उत्तराखंड तथा कुछ हद तक हिंदूकश क्षेत्रों में आने वाले भूकंप संवेदनशील होते हैं. वैसे अगर हम भूकंप के कारणों की बात करें तो वैज्ञानिकों बताते हैं कि धरती या समुद्र के अंदर होने वाली विभिन्न रासायनिक क्रियाओं के कारण ये भूकंप आते हैं. अधिकांश भूकंपों की उत्पत्ति धरती की सतह से 30 से 100 किलोमीटर अंदर होती है. सतह के नीचे धरती की परत ठंडी होने और कम दबाव के कारण कमज़ोर होती है.

सुनामी जापान बनाम भारत

मार्च में जापान में आए भूकंप और सुनामी में मरने वालों की आधिकारिक संख्या अब 10 हज़ार से ऊपर हो गई है. पुलिस के रिकॉर्ड में अब भी 17,440 लोग लापता और 2,775 घायल हैं. 2004 में आए सुनामी के बाद तटीय इलाक़ों में का़फी कम तादाद में लोग बचे हैं. ज्यादातर लोगों को ऊंचाई वाली जगहों पर बसा दिया गया है. 2004 में भारत में भी सुनामी ने अपना क़हर बरसाया था. 2004 में आए भूकंप के बाद सुनामी आई थी. उस समय भूकंप की तीव्रता 9.15 थी. उस सुनामी में तेरह देशों के क़रीब सवा दो लाख लोग मारे गए थे. इस लिहाज़ से भारत में सुनामी जापान से कम प्रलंयकारी नहीं थी.

ऐसी स्थिति में जब अचानक चट्टानें दरकती हैं तो भूकंप आता है. एक अन्य प्रकार के भूकंप सतह से 100 से 650 किलोमीटर नीचे आते हैं. इतनी गहराई में धरती इतनी गर्म होती है कि एक तरह से द्रव रूप में होती हैं. हालांकि वहां किसी झटके या टक्कर की संभावना नहीं होती, लेकिन ये चट्टानें भारी दबाव में होती हैं. यदि इतनी गहराई में भूकंप आता है तो भारी मात्रा में ऊर्जा बाहर निकलती है. धरती की सतह से काफ़ी गहराई में उत्पन्न अब तक का सबसे बड़ा भूकंप 1994 में बोलीविया में रिकॉर्ड किया गया था. सतह से 600 किलोमीटर भीतर दर्ज इस भूकंप की तीव्रता रिएक्टर पैमाने पर 8.3 मापी गई थी, लेकिन वैज्ञानिकों ने पाया है कि भारतीय उपमहाद्वीप में भूकंप का ख़तरा बढ़ रहा है.


दुनिया के अब तक के खतरनाक भूकंप

11 मार्च 2011, जापान के उत्तरी पूर्वी तट पर 9.0 की तीव्रता के भूकंप से सुनामी, 10,000 से अधिक लोगों की मौत.
9 मई 2010, इंडोनेशिया में 7.2 की तीव्रता का भूकंप, सैकड़ों की मौत.
13 अप्रैल 2010, चीन में 6.9 की तीव्रता का भूकंप, 2500 की मौत.
12 जनवरी 2010, हैती में 7.0 की तीव्रता का भूकंप, 2 लाख लोगों की मौत.
30 सितंबर, 2009, इंडोनेशिया, सुमात्रा में 7.6 की तीव्रता का भूकंप, 1100 की मौत.
29 सितंबर 2009, सैमोन द्वीप में 8.3 की तीव्रता का भूकंप, सैकड़ों की मौत.
10 अगस्त 2009, अंडमान निकोबार में 7.6 की तीव्रता का भूकंप, कोई हताहत नहीं.
6 अप्रैल, 2009, इटली के लैकिला शहर में 6.3 की तीव्रता का भूकंप, सैकड़ों की मौत.
छह मार्च, 2007, इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप में 6.3 तीव्रता का भूकंप, 70 लोगों की मौत.
10. 27 मई, 2006, इंडोनेशिया के जकार्ता में भूकंप, छह हज़ार लोग मारे गए.

11. आठ अक्टूबर, 2005, पाकिस्तान में 7.6 तीव्रता वाला भूकंप, क़रीब 75 हज़ार लोग मारे गए.

12. 28 मार्च, 2005, इंडोनेशिया में 8.7 तीव्रता वाला भूकंप, लगभग 1300 लोग मारे गए.

13. 22 फ़रवरी, 2005, ईरान के केरमान प्रांत में लगभग 6.4 तीव्रता के आए भूकंप में लगभग 100 लोग मारे गए थे.

14. 26 दिसंबर,2004, 8.9 की तीव्रता वाले भूकंप के कारण उत्पन्न सूनामी ने एशिया में हज़ारों लोगों की जान गई.

15. 24 फ़रवरी, 2004, मोरक्को के तटीय इलाक़े में आए भूकंप ने 500 लोगों की जान ले ली थी.

16. 26 दिसंबर, 2003, दक्षिणी ईरान में आए भूकंप में 26 हज़ार से अधिक लोगों की मौत हो गई थी.

17. 21 मई 2003, अल्जीरिया में भूकंप आया, दो हज़ार लोगों की मौत

18. 24 फरवरी 2003, पश्चिमी चीन में भूकंप, 260 लोग मारे गए और 10 हज़ार से अधिक लोग बेघर.

19. 21 नवंबर 2002, पाकिस्तान के उत्तरी दियामीर ज़िले में भूकंप में 20 लोगों की मौत.

20. 25 मार्च 2002, अफ़ग़ानिस्तान के उत्तरी इलाक़े में 6 की तीव्रता का भूकंप, 800 से ज़्यादा लोग मरे.

21. 26 जनवरी 2001, गुजरात में 7.9 तीव्रता का भूकंप, तीस हज़ार लोग मारे गए.

22. 13 जनवरी 2001, अल साल्वाडोर में 7.6 तीव्रता का भूकंप, 700 से भी अधिक लोग मारे गए.

23. 6 अक्टूबर 2000, जापान में 7.1 तीव्रता का एक भूकंप, 30 लोग घायल हुए और कई लापता.

24. 21 सितंबर 1999, ताईवान में 7.6 तीव्रता का भूकंप, ढाई हज़ार लोग मारे गए.

25. 17 अगस्त 1999, तुर्की के इमिट और इंस्ताबूल शहरों में 7.4 तीव्रता का भूकंप, 17000 लोग मारे गए.

26. 29 मार्च 1999,  उत्तर प्रदेश राज्य के उत्तरकाशी और चमोली में दो भूकंप. 100 से अधिक लोग मारे गए.

27. 25 जनवरी 1999, कोलंबिया के आर्मेनिया शहर में 6.0 तीव्रता का भूकंप. क़रीब एक हज़ार लोग मारे गए.

28. 17 जुलाई 1998, न्यू पापुआ गिनी के उत्तरी-पश्चिमी तट पर समुद्र के अंदर आया भूकंप, एक हज़ार से अधिक मरे.

29. 26 जून 1998, तुर्की के दक्षिण-पश्चिम में अदना में 6.3 तीव्रता का भूकंप, 144 लोग मारे गए.

30. 30 मई 1998, उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान में एक बड़ा भूकंप, चार हज़ार लोग मारे गए.

31. फ़रवरी 1997, उत्तर-पश्चिमी ईरान में 5.5 तीव्रता का एक भूकंप, एक हज़ार लोग मारे गए.

32. 27 मई 1995, रूस के  पूर्वी द्वीप सखालीन में 7.5 तीव्रता का भूकंप, दो हज़ार लोग मरे.

33. 17 जनवरी 1995, जापान के कोबे शहर में भूकंप, छह हज़ार चार सौ तीस लोग मारे गए.

34. 6 जून 1994, कोलंबिया में आया भूकंप, क़रीब एक हज़ार लोग मारे गए.

35. 30 सितंबर 1993, भारत के पश्चिमी और दक्षिणी हिस्सों में आए भूकंप से क़रीब दस हज़ार लोगों की मौत.

36. 21 जून 1990, ईरान के उत्तरी राज्य गिलान में भूकंप, चालीस हज़ार से भी अधिक लोगों की मौत.

37. 17 अक्टूबर 1989, कैलिफ़ोर्निया में भूकंप, 68 लोग मारे गए.

38. 7 दिसंबर 1988, उत्तर-पश्चिमी आर्मेनिया में 6.9 तीव्रता का भूकंप, पच्चीस हज़ार लोगों की मौत.

39. 19 सितंबर 1985, मैक्सिको में भूकंप, दस हज़ार से अधिक लोग मारे गए.

40. 28 जुलाई 1976, चीन का तांगशान शहर में भूकंप, पांच लाख से अधिक लोग मारे गए.

41. 22 मार्च 1960, दुनिया का सबसे शक्तिशाली भूकंप चिली में आया. इसकी तीव्रता 9.5 दर्ज की गई.

42. 28 जून 1948, पश्चिमी जापान में पूर्वी चीनी समुद्र को केंद्र बनाकर भूकंप आया, तीन हज़ार से ज़्यादा लोग मरे.

43. 31 मई, 1935, क्वेटा और उसके आसपास के इलाक़ों में भूकंप, लगभग 35 हज़ार लोगों की जानें गईं.

44. 1 सितंबर 1923, जापान की राजधानी टोक्यो में आया ग्रेट कांटो भूकंप, 142,800 लोगों की मौत

45. 18 अप्रैल 1906, सैन फ्रांसिस्को में कई मिनट तक भूकंप के झटके आते रहे. तीन हज़ार लोग मारे गए.

46. 1 नवंबर 1755 पुर्तगाल में 8.7 की तीव्रता का भूकंप, 70,000 की मौत

47. 17 अगस्त 1668 टर्की में 8.0 की तीव्रता का  भूकंप, 8000 की मौत

48. 23 जनवरी 1556 में चीन में 8.0 की तीव्रता का भूकंप, 830, 000 की मौत

49. 9 अगस्त 1138, सीरिया में 230,000 की मौत

50. 22 दिसंबर 0856 में, ईरान के दमगान में 200,000 की मौत.



वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत और तिब्बत एक-दूसरे की तरफ़ प्रति वर्ष दो सेंटीमीटर की गति से सरक रहे हैं. इस प्रक्रिया से हिमालय क्षेत्र पर दबाव बढ़ रहा है. यही वजह है कि पिछले 200 वर्षों में हिमालय क्षेत्र में छह बड़े भूकंप आ चुके हैं. इनके मुताबिक़ इस दबाव को कम करने का प्रकृति के पास सिर्फ़ एक ही तरीक़ा है और वह है भूकंप. इसलिए भूकंपों  को रोकना तो किसी के बस की बात नहीं है, हां इतना ज़रूर है कि इनसे सावधान होकर जानमाल के नुक़सान को कम ज़रूर किया जा सकता है. हालांकि इस मामले मेंसबसे ज़्यादा दुर्भाग्यशाली भारत में है. उपरोक्त हालात से इस बात की पुष्टि तो हो ही जाती है कि हम भी जापान की तरह भूकंप के बारूदी ढेर में बैठे हैं. लेकिन जापान और हममें स़िर्फ इतना ही अंतर है कि जापान इस तरह की परिस्थितियों से जूझने के लिए लिए तैयार है और हम नहीं. समय चेतने का है, नहीं तो हम भी प्रकृति की इस विनाशलीला का शिकार कभी हो सकते हैं.

जिनके लिए यह आख़िरी मौक़ा है



भारत में क्रिकेट अगर धर्म है तो विश्वकप भी महाकुंभ के आयोजन से कम नहीं होता. यह बात स़िर्फ भारत में ही नहीं, दुनिया के लगभग हर देश पर लागू होती है. यही वजह है कि हर चार साल बाद जब विश्वकप का आयोजन होता है तो उसकी मेजबानी को लेकर देशों में और टीम में जगह पक्की करने के लिए खिलाड़ियों में उत्साह देखते ही बनता है. कुछ खिलाड़ियों की किस्मत इतनी अच्छी होती है कि उन्हें न सिर्फ विश्वकप में खेलने का मौका मिलता है, बल्कि वे विश्वकप विजेता टीम का हिस्सा भी बनते हैं. वहीं दूसरी ओर इंग्लैंड जैसी टीम भी है, जो आज तक विश्वकप ट्राफी से वंचित है.

इन सबके बीच एक चीज जो आम है, वह यह कि हर खिलाड़ी का सपना होता है कि उसे अपने पूरे करियर के दौरान कम से कम एक बार विश्वकप में खेलने का मौका अवश्य मिले. लेकिन इस अंक में हम उन खिलाड़ियों की बात कर रहे हैं, जिनके लिए विश्वकप 2011 उनका आखिरी विश्वकप होगा. उन पर दोहरा दबाव है, विश्वकप जीतने का और अपने आखिरी मौके को अच्छी तरह भुनाने का, क्योंकि पता नहीं, इसके बाद हो सकता है कि उनका करियर रिकॉर्ड यहीं पर थम जाए. शुरुआत मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर से ही करते हैं. खेल प्रेमियों के लिए वह दिन मातम का होगा, जब सचिन क्रिकेट को अलविदा कहेंगे. विश्वकप 2011 सचिन का आखिरी विश्वकप होगा. इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि सचिन की मौजूदगी में भारत ने अभी तक कोई विश्वकप नहीं जीता है. हालांकि इस बात से पूरी दुनिया वाकिफ है कि सचिन अपने समय के हर तरह से सबसे पूर्ण क्रिकेटर हैं और क्रिकेट इतिहास के सबसे ज़्यादा रन बनाने वाले खिलाड़ी हैं.

सचिन निस्संदेह दुनिया के सबसे लोकप्रिय क्रिकेटर हैं. बल्लेबाज़ी का शायद ही कोई ऐसा रिकॉर्ड हो, जो उनकी क्षमता से बाहर हो. धैर्य, संयम, आक्रमण, सही गेंद का चुनाव, गेंद का प्लेसमेंट, गैप निकालना और सबसे बढ़कर क्रिकेट के प्रति समर्पण उन्हें एक बेमिसाल खिलाड़ी बनाता है. उनका लंबा अनुभव और किसी भी परिस्थिति से निपटने का हौसला भारत के लिए एक वरदान है. उनके पास वनडे और टेस्ट, दोनों में सबसे ज़्यादा शतक हैं, सबसे ज़्यादा रन हैं. दुनिया का कोई भी गेंदबाज़ उनका विकेट लेने की ख्वाहिश रखता है. दो विश्वकपों में वह सबसे ज़्यादा रन बनाने वाले खिलाड़ी रहे. वर्ष 2000 में वह पहले ऐसे खिलाड़ी बने, जिसने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 50 शतक लगाए हों और इस विश्वकप में उनसे यह उम्मीद की जा रही है कि वह अपना 100वां अंतरराष्ट्रीय शतक लगाएंगे. तेंदुलकर आईपीएल में मुंबई इंडियंस के कप्तान हैं, लेकिन उन्होंने भारत की ओर से टी-20 न खेलने का फ़ैसला किया है. जब तक सचिन खेल रहेे हैं, तब तक आप किसी भी करिश्मे की उम्मीद कर सकते हैं. उसके बाद क्या होगा, कोई नहीं जानता. सचिन के अलावा भारत की ओर से आशीष नेहरा भी ऐसे खिलाड़ी होंगे, जिनका यह आखिरी विश्वकप है. गौरतलब है कि आशीष नेहरा ने अंतरराष्ट्रीय वनडे क्रिकेट में 2000-01 में क़दम रखा था और उसके साथ यह भी बता दिया कि उनमें बाएं हाथ के क्लासिक तेज़ गेंदबाज़ की सारी विशेषताएं मौजूद हैं.

नेहरा ने 1999 में अपना पहला टेस्ट खेला था. नेहरा को उनकी चोट ने काफ़ी परेशान किया और जब वह अपने चरम पर थे, तभी परेशानियों ने आ घेरा और फिर गति एवं दिशा पर उनका नियंत्रण जाता रहा. नेहरा ने ज़िम्बॉब्वे के  ख़िलाफ़ ही अपनी पहली पूरी सीरीज़ खेली थी और 2005 में उन्हें ज़िम्बॉब्वे के दौरे को बीच में ही छोड़ना पड़ा था. टेस्ट में उन्हें दोबारा तो नहीं बुलाया जा सका, लेकिन आईपीएल के दूसरे संस्करण में अच्छा प्रदर्शन करने के नतीजे में उन्हें वेस्टइंडीज़ के विरुद्ध 2009 में वनडे टीम में वापस बुलाया गया. नेहरा ने पाकिस्तान और इंग्लैंड के विरुद्ध ख़ास तौर से अच्छा प्रदर्शन किया है. उन्होंने वनडे में इंग्लैंड के विरुद्ध अपना बेहतरीन प्रदर्शन दिखाया, जब उन्होंने 23 रन देकर छह विकेट झटके. कुल मिलाकर इस विश्वकप के बाद आशीष नेहरा को क्रिकेट की और क्रिकेट प्रेमियों को नेहरा की कमी जरूर खलेगी. अब बात करते हैं उस खिलाड़ी की, जिसने अभी से ही अपने संन्यास की घोषणा कर दी है. कभी अपने प्रदर्शन तो कभी विवादों से लोगों को अक्सर चौंकाने वाले पाकिस्तानी तेज गेंदबाज शोएब अख्तर का यह आखिरी मौका है. अधिकतर समय विवादों से घिरे रहने वाले और रावलपिंडी एक्सप्रेस के नाम से मशहूर शोएब की सनसनाती गेंदों से बल्लेबाजों के होश फाख्ता हो जाते थे. ब्रायन लारा ने जब पहली बार शोएब की सनसनाती गेंदों का सामना किया था तो वह काफी असहज नजर आए थे. शोएब के नाम सबसे तेज गेंद फेंकने का रिकॉर्ड 100.2 मील (161.3 किमी) प्रति घंटा है, जो उन्होंने 2003 के विश्वकप में इंग्लैंड के विरुद्ध दर्ज कराया था. इस प्रतिभाशाली खिलाड़ी की तेज रफ्तार और आक्रामकता ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी निकली. चोट और अपने गुस्सैल व्यवहार की वजह से अत्यंत प्रतिभाशाली होते हुए भी उन्हें टीम में कभी स्थायी जगह मिली ही नहीं. जानकार आज भी मानते हैं कि अगर थोड़ा सा धैर्य और अनुशासन शोएब में होता तो इस खिलाड़ी को महानतम बनने से कोई नहीं रोक सकता था. 2006 में शोएब को डोपिंग का दोषी पाया गया था. वर्ष 2007 में मोहम्मद आसिफ से मारपीट के कारण उन पर 13 वनडे मैचों की पाबंदी लगाई गई थी. 2008 में पाकिस्तानी क्रिकेट बोर्ड की आलोचना करने पर उन पर 18 महीने का प्रतिबंध और 70 लाख रुपये का जुर्माना हुआ था. अब शोएब का शबाब उतार पर है और उनकी गेंदों में वह तेजी भी नहीं रही, जिससे दुनिया के बेहतरीन बल्लेबाज भी खौफ खाते थे. फिर भी उनकी अपनी शैली की वजह से रावलपिंडी एक्सप्रेस को हमेशा याद रखा जाएगा. मालूम हो कि शोएब अख्तर ने अपने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट करियर की शुरुआत वर्ष 1997 में की थी और उन्होंने 46 टेस्ट मैचों में 178 विकेट लिए. उन्होंने अपना आख़िरी टेस्ट मैच वर्ष 2007 में भारत के ख़िलाफ़ बंगलुरू में खेला था.

 अभी तक शोएब 163 एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैच खेल चुके हैं और उन्होंने 247 विकेट भी लिए. शोएब की छवि के ठीक विपरीत जैक्स कालिस भी उन खिलाड़ियों में से हैं, जो आखिरी बार विश्वकप में हिस्सा ले रहे हैं. दक्षिण अफ्रीका टीम के  सर्वश्रेष्ठ हरफनमौला खिलाड़ी जैक्स कालिस टीम के सबसे अनुभवी खिलाड़ियों में शुमार हैं. कालिस बल्लेबाजी में अपनी क्लास के लिए जाने जाते हैं. जबरदस्त बल्लेबाज होने के साथ-साथ वह मध्यम-तेज गेंदबाजी भी करते हैं. 1995-96 में इंग्लैंड के खिलाफ इस खिलाड़ी ने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर का सफर शुरू किया. कालिस की ़खासियत है कि वह क्रिकेट के तीनों प्रारूपों में बेहतर प्रदर्शन करते हैं. 1998 से 2002 के बीच कालिस दुनिया के सर्वश्रेष्ठ हरफनमौला खिलाड़ी के तौर पर उभरे. 1998 में चैंपियंस ट्राफी में दक्षिण अफ्रीका को खिताब दिलाने में उनकी अहम भूमिका थी. कालिस इस टूर्नामेंट में दो बार मैन ऑफ द मैच, जबकि पूरी सीरीज के लिए मैन ऑफ द सीरीज भी चुने गए. टेस्ट इतिहास के कालिस मात्र चौथे खिलाड़ी हैं, जिन्होंने लगातार पांच मैचों में शतक जड़ा हो. चोटों से जूझने के बाद भी इस खिलाड़ी ने जीवट खेल दिखाया है. 2011 में भारत के ़िखला़फ निर्णायक टेस्ट मैच में कमर में बहुत दर्द के बाद भी कालिस मैदान पर डटे रहे और शतक जड़कर उन्होंने दक्षिण अफ्रीका को हार से बचाया. इसके अलावा वह 2005 में आईसीसी द्वारा प्लेयर आफ द ईयर चुने जा चुके हैं. उनके  शानदार करियर ग्राफ में एक नगीना लगना अभी बाकी है. क्रिकेट जगत के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपाधि यानी आईसीसी क्रिकेट विश्वकप को जीतना. वैसे तो कई बड़े खिलाड़ी हैं, जो अगले विश्वकप में नहीं दिखाई देंगे, लेकिन शायद सभी के नाम उतने यादगार नहीं रहेंगे, जितना आस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पोंटिंग का रहेगा. जानकार आज भी मानते हैं कि सचिन का रिकॉर्ड अगर कोई तोड़ सकता है तो वह पोंटिंग ही हैं. आस्ट्रेलिया की कई सालों तक कप्तानी करने वाले रिकी पोंटिंग ने एलन बोर्डर का रिकार्ड तोड़कर आस्ट्रेलिया की तरफ से टेस्ट मैचों में सर्वाधिक रन बनाने का रिकॉर्ड अपने नाम किया. वह अब टेस्ट क्रिकेट में सर्वाधिक रन बनाने वाले शीर्ष तीन बल्लेबाजों में शामिल हैं. पोंटिंग के नाम अब 134 टेस्ट मैचों की 225 पारियों में 11,188 रन दर्ज हैं, जिसमें 38 शतक और 46 अर्धशतक शामिल हैं. टेस्ट क्रिकेट में पोंटिंग से अधिक रन भारत के सचिन तेंदुलकर और वेस्टइंडीज के ब्रायन लारा ने बनाए हैं. अगर सब कुछ ठीक रहा तो कोई आश्चर्य नहीं कि रिकी जाते-जाते कोई नया करिश्मा कर जाएं. हालांकि उनके लिए आखिरी विश्वकप का मलाल इसलिए नहीं होगा, क्योंकि वह इससे पहले अपनी टीम को विश्वकप जिता चुके हैं. फिर भी आस्ट्रेलियाई टीम के लिए उनके जैसे कप्तान और खिलाड़ी की जगह भरना आसान नहीं होगा. अब जब उम्र के इस पड़ाव पर आकर इन खिलाड़ियों के सामने क्रिकेट को अलविदा कहने का मौका करीब आ गया है तो फिर इन्हें जाते-जाते क्रिकेट और क्रिकेट प्रेमियों को ऐसा तोहफा जरूर देना होगा, जिससे इनकी विदाई शानदार मानी जाए. 

Wednesday, March 16, 2011

विश्वकप और कुछ खट्टी-मीठी यादें



भारत में क्रिकेट को वह दर्जा हासिल है, जो किसी भी देश के राष्ट्रीय खेल को हासिल नहीं होता. जब बात विश्वकप की हो तो यह किसी महाकुंभ से कम नहीं होता. एक ऐसा महाकुंभ, जिसमें दुनिया भर की टीमें ज़रूर शामिल होती हैं, लेकिन जो क्रेज़ भारतीय दर्शकों में दिखाई देता है, वह कहीं और नहीं. ज़ाहिर है, इतने बड़े महाकुंभ के आगाज़ से लेकर अंजाम तक कई दिलचस्प बातें हमें देखने-सुनने को मिलती हैं, लेकिन कुछ यादें ऐसी भी होती हैं, जो क्रिकेट प्रेमियों के जेहन में ऐसे निशान छोड़ जाती हैं, जो शायद ही कभी मिटते हों. कुछ यादें गुदगुदाती हैं तो कुछ चेहरे पर शिकन छोड़ जाती हैं. इस अंक में हम आपको अब तक हुए सभी विश्वकप की कुछ ऐसी ही रोचक और कड़वी यादों से रूबरू करा रहे हैं.

बहरहाल पाकिस्तानी खिलाड़ियों को इस मामले में क्लीन चिट दे दी गई और जमैका पुलिस ने यह कहकर मामला बंद कर दिया कि बॉब वूल्मर की मौत सामान्य थी और उनकी हत्या नहीं की गई थी. तरह-तरह की अफ़वाहें फैलीं और पूरे उपमहाद्वीप की दिलचस्पी क्रिकेट विश्वकप में कम हो गई, क्योंकि पसंद की टीमें तो बाहर ही हो चुकी थीं. फिर भी जब कभी 2007 के विश्वकप की बात होगी, लोगों के मन में यह सवाल ज़रूर उभरेगा कि भारत और पाकिस्तान की टीमों ने कहीं मैच तो नहीं फ़िक्स किया था.

आपको जानकर ताज्जुब होगा कि लॉयड ने मैच जीतने के लिए कैच छोड़ा था.  वेस्टइंडीज़ ने इंग्लैंड के सामने 293 रनों का लक्ष्य रखा था. रिचर्ड्स ने आख़िरी गेंद पर छक्का लगाया था. इंग्लैंड ने जवाब में धीमी शुरुआत की और बॉयकॉट ने दोहरे अंक तक पहुंचने के लिए 17 ओवर ले लिए. एक बार वह रिचर्ड्स की गेंद पर शॉट लगाने के लिए बाहर निकले तो ग़लत खेल गए और कप्तान लॉयड ने उस आसान से कैच को छोड़ दिया. उससे पहले दूसरी तरफ़ खेल रहे ब्रियरली का कैच भी वह छोड़ चुके थे. रिचर्ड्स को लॉयड ने जब बताया कि उन्होंने जानबूझ कर कैच छोड़ा था तो उन्हें चैन मिला. लॉयड के मुताबिक़, हम दिन भर उन दोनों को खेलते देख सकते थे, क्योंकि जितने ओवर वे खेल रहे थे, उतनी कीलें उनके ताबूत में लग रही थीं. बहरहाल लॉयड ने बाद में कहा कि उन्होंने जानबूझ कर कैच नहीं छोड़ा था, क्योंकि यह मैच जीतने की एक ख़राब तकनीक थी.

ऐसी ही एक और दिलचस्प घटना पहले विश्वकप की है. पाकिस्तान और वेस्टइंडीज़ के बीच मैच था. पाकिस्तान ने सात विकेट पर 266 रन बनाए थे. माजिद ख़ान, मुश्ताक़ मोहम्मद और वसीम राजा ने अर्द्ध शतक लगाए थे. जब वेस्टइंडीज़ की पारी शुरू हुई तो सरफ़राज़ नवाज़ की तूफ़ानी गेंदबाज़ी के सामने वेस्टइंडीज़ का कोई खिलाड़ी जमकर नहीं खेल सका. 166 रनों पर वेस्टइंडीज़ का आठवां विकेट गिर चुका था. वेस्टइंडीज़ लगभग मैच हार चुकी थी. अपील पर अपील जारी थी कि 203 रनों पर नवां विकेट गिर गया और होल्डर का विकेट भी सरफ़राज़ ने ले लिया. सातवें नंबर पर बल्लेबाज़ी करने आए डेरेक मरे सिर्फ़ टिके  हुए थे और उनका साथ दे रहे थे एंडी रॉबर्ट्स और दोनों ने मिलकर आख़िरी विकेट के लिए 64 रनों की नाबाद पारी खेली. इस तरह से पाकिस्तान सेमी फ़ाइनल में प्रवेश करने से रह गया और वेस्टइंडीज़ ने आगे चलकर विश्वकप में ख़िताबी जीत हासिल की. डेरेक मरे की वह पारी वनडे में उनकी बेहतरीन पारी रही और दसवें विकेट की वह विश्वकप की सबसे बड़ी साझेदारी रही, लेकिन पाकिस्तान को दो गेंद रहते इस मैच का हारना बहुत दिनों तक सालता रहा.


1992 के विश्वकप में पहली बार दक्षिण अफ्रीका की टीम प्रतिबंध के बाद उतरी थी, जिससे क्रिकेट जगत में एक नया उत्साह था और दूसरी टीमों में एक तरह का संकोच भी था कि न जाने उनकी टीम कैसी है. दक्षिण अफ्रीका ने धमाकेदार खेल दिखाया और सेमी फ़ाइनल में प्रवेश किया. विवाद की कोई गुंजाइश नज़र नहीं आ रही थी, लेकिन ऑस्ट्रेलिया के मौसम और क्रिकेट के डकवर्थ लुइस नियम ने दक्षिण अफ्रीका को जो नुक़सान पहुंचाया, उसे कोई नहीं भूला. इंग्लैंड और दक्षिण अफ्रीका का मैच था. खेल 10 मिनट देर से शुरू हुआ और लंच में से यह समय काट लिया गया, लेकिन कोई ओवर नहीं काटा गया. उसके बाद स्थानीय समयानुसार जब इंग्लैंड की पारी 6.10 तक ख़त्म नहीं हो सकी तो उसकी पारी में से ओवर कम कर दिए गए और मैच हो गया 45 ओवरों का, जिसमें इंग्लैंड ने 252 रन बनाए. दक्षिण अफ्रीका ने खेल शुरू किया और वह 42.5 ओवरों में छह विकेट के नुक़सान पर 231 रनों पर पहुंच गया. लेकिन फिर डकवर्थ लुइस नियम लागू हुआ और जब दोबारा खेल शुरू हुआ तो दक्षिण अफ्रीका को एक गेंद पर 21 रन बनाने थे और स्कोर बोर्ड पर जब यह लिखा आया तो पता चला कि दक्षिण अफ्रीका मैच हार चुका है, बस औपचारिकता ही बची है. दक्षिण अफ्रीका इतिहास रचने से वंचित हो चुका था.

एक और घटना. जावेद मियांदाद और विवाद एक-दूसरे के पर्याय बन चुके थे. बात है 1992 के विश्वकप में भारत-पाकिस्तान मैच की. यह एक तथ्य है कि विश्वकप में पाकिस्तान भारत से कभी नहीं जीता, हालांकि ज़्यादा मैच जीतने का रिकार्ड पाकिस्तान के नाम है. जब इन दोनों देशों के बीच मैच हो रहा होता है तो खिलाड़ी ज़बरदस्त दबाव में रहते हैं. यहां तक कि दर्शकों में भी यह दबाव महसूस किया जाता है. यह विश्वकप का 16वां मैच था. भारत ने 49 ओवरों में सात विकेट पर 216 रन बनाए थे और पाकिस्तान के लिए लक्ष्य हासिल करना ज़्यादा मुश्किल नहीं था. आमिर सुहैल और जावेद मियांदाद ने पाकिस्तान का स्कोर दो विकेटों के नुक़सान पर 100 के पार पहुंचा दिया था, फिर अचानक पाकिस्तान के विकेट गिरने शुरू हो गए. मोरे विकेट के पीछे बार-बार उछल-उछल कर अपील कर रहे थे. मियांदाद पर दबाव बढ़ता जा रहा था और उसे ख़त्म करने के लिए अचानक मियांदाद ने मोरे से कुछ कहा और फिर मोरे की तरह कूद कर नक़ल उतारने लगे. ऐसा दृश्य पहले किसी ने नहीं देखा था. पश्चिमी मीडिया ने दूसरे दिन जंपिंग जावेद के नाम से ख़बर छापी. 1996 का विश्वकप भी कई मायनों में विवादों भरा रहा, क्योंकि ऑस्ट्रेलिया ने सुरक्षा कारणों से श्रीलंका जाने से इंकार कर दिया और श्रीलंका को बिना मैच खेले ही विजयी घोषित कर दिया गया. बहरहाल श्रीलंका और ऑस्ट्रेलिया की फ़ाइनल में लाहौर में भिड़ंत हुई और श्रीलंका ने आसानी के साथ विश्वकप जीत लिया.

बात 1999 के विश्वकप की. दक्षिण अफ्रीका ने भारत के विरुद्ध अपने पहले मैच में रेडियो सिस्टम का प्रयोग किया. उसके कप्तान और तेज़ गेंदबाज़ एलन डोनाल्ड के पास माइक्रोफ़ोन थे और वह पवेलियन में मौजूद अपने कोच बॉब वूल्मर के साथ जुड़े हुए थे. बॉब उन दोनों को ड्रेसिंग रूम से ही गाइड कर रहे थे. पानी के लिए हुए ब्रेक में मैच रेफ़री बीच में आया और बाद में आईसीसी ने उस तरीक़े को अपनाने का विरोध कर उससे खड़े विवाद को ख़त्म कर दिया. 2007 का विश्वकप क्रिकेट की सबसे दुखद घटना का साक्षी है. पाकिस्तान के दक्षिण अफ्रीकी कोच बॉब वूल्मर होटल में अपने कमरे में मृत पाए गए और वह भी पाकिस्तान की शर्मनाक हार और विश्वकप से विदाई की रात को. इससे पहले ही पाकिस्तान पर मैच फ़िक्सिंग का आरोप था और कई खिलाड़ियों को सज़ा भी दी गई थी. जमैका पुलिस ने हत्या का संदेह ज़ाहिर किया, पाकिस्तानी खिलाड़ियों के मैच फ़िक्सिंग में फंसे होने की आशंका जताई जाने लगी और उनसे


अलग-अलग पूछताछ होने लगी. दूसरी ओर भारत भी बांग्लादेश से मैच हारकर विश्वकप के पहले दौर से ही बाहर हो गया और वह भी ऐसे समय में, जबकि उसे विश्वकप का दावेदार माना जा रहा था. बहरहाल पाकिस्तानी खिलाड़ियों को इस मामले में क्लीन चिट दे दी गई और जमैका पुलिस ने यह कहकर मामला बंद कर दिया कि बॉब वूल्मर की मौत सामान्य थी और उनकी हत्या नहीं की गई थी. तरह-तरह की अफ़वाहें फैलीं और पूरे उपमहाद्वीप की दिलचस्पी क्रिकेट विश्वकप में कम हो गई, क्योंकि पसंद की टीमें तो बाहर ही हो चुकी थीं. फिर भी जब कभी 2007 के विश्वकप की बात होगी, लोगों के मन में यह सवाल ज़रूर उभरेगा कि भारत और पाकिस्तान की टीमों ने कहीं मैच तो नहीं फ़िक्स किया था.


टॉप टेन फ्लैशबैक


1. विश्वकप की शानदार पारियों में से एक 1983 में कपिल देव की 175 रनों की नाबाद पारी की न वीडियो रिकॉर्डिंग मौजूद है और न ऑडियो कमेंट्री. बताते हैं कि कैमरामैन हड़ताल पर थे.

2. विश्वकप में सबसे स्लो स्पीड से रन बनाने का रिकॉर्ड सुनील गावस्कर के नाम है. उन्होंने वर्ष 1975 के पहले विश्वकप में इंग्लैंड के ख़िलाफ़ 174 गेंदों का सामना करते हुए सिर्फ़ 36 रन बनाए थे. इसमें उनका सिर्फ़ एक चौका शामिल था. उस समय 60-60 ओवरों का मैच होता था.

3. एक ही विश्वकप में सबसे ज़्यादा शून्य पर आउट होने का (चार बार) रिकॉर्ड एबी डीवेलियर्स (दक्षिण अफ्रीका) के नाम है.

4. पहले तीनों विश्वकप इंग्लैंड में आयोजित हुए थे.

5. विवियन रिचर्ड्स ऐसे अकेले क्रिकेटर हैं, जिन्होंने विश्वकप क्रिकेट के साथ-साथ विश्वकप फुटबॉल में भी हिस्सा लिया. वह विश्वकप फुटबॉल में एंटिगा की ओर से खेले थे.

6. 1996 के विश्वकप में ऑस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज़ ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए श्रीलंका में खेलने से इंकार कर दिया. ये दोनों मैच श्रीलंका के हक़ में गए. इसी विश्वकप के सेमी फ़ाइनल में भारत और श्रीलंका के बीच मुक़ाबला हुआ, लेकिन दर्शकों के ख़राब व्यवहार के कारण यह मैच भी श्रीलंका की झोली में गया. हालांकि श्रीलंका का उस समय जीतना तय था.

7. एंडरसन कमिंस ने वर्ष 1992 में वेस्टइंडीज़ और वर्ष 2007 में कनाडा की ओर से विश्वकप खेला. उनसे पहले कैपलर वेसल्स ने वर्ष 1983 में ऑस्ट्रेलिया और 1992 में दक्षिण अफ्रीका की ओर से विश्वकप के मैच खेले.

8. किसी भी विश्वकप में सबसे ज़्यादा बार शून्य पर आउट होने का रिकॉर्ड न्यूज़ीलैंड के  नाथन एस्टल और एजाज़ अहमद के नाम दर्ज है. दोनों खिलाड़ी पांच-पांच बार शून्य पर आउट हो चुके हैं.

9. दक्षिण अफ्रीका के हर्शेल गिब्स विश्वकप के एक मैच में एक ओवर में छह छक्के मारने वाले एकमात्र खिलाड़ी हैं. यह कारनामा उन्होंने 2007 के विश्वकप में नीदरलैंड के ख़िलाफ़ किया था.

10. इतिहास में सबसे कम स्कोर वाला विश्वकप वर्ष 1979 का था. इसमें सिर्फ़ दो शतक लगे थे.

Tuesday, March 15, 2011

क्रिकेट वर्ल्डकप: जाने कहां गुम हो जाती हैं ये टीमे





वर्ल्डकप 2011 अब तक अपने रोमांचक दौर पर है. जैसा कि हर बार होता है, इस बार भी कई उलटफेर हुए और आगे भी होंगे. जिन टीमों को फिसड्डी माना जाता है या यूं कहें कि जिन्हें स़िर्फ ग्रुप की लिस्ट लंबी करने के लिए शामिल किया जाता है, वही टीमें शुरुआती दौर में बड़ी-बड़ी टीमों को हराकर या उन्हें कांटे की टक्कर देते हुए रोमांचक मोड़ पर लाकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं. इन टीमों में आयरलैंड, नीदरलैंड, ज़िम्बाब्वे, कनाडा और बांग्लादेश का नाम लिया जा सकता है.

 इन सभी टीमों में एक चीज कॉमन है, वह यह कि इन सभी टीमों के नाम अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में स़िर्फ तब सुनाई देते हैं, जब वर्ल्डकप का आयोजन होता है. उसके बाद पता नहीं, ये सारी टीमें कहां ग़ायब हो जाती हैं. हालांकि इस मामले में कुछ हद तक बांग्लादेश को अपवाद माना जा सकता है. यह टीम कभी-कभी एशियाई देशों में होने वाली क्रिकेट प्रतिस्पर्धाओं में खेलती हुई ऩजर आ जाती है, लेकिन प्रदर्शन वही ढाक के तीन पात वाला ही रहता है. अपनी पिचों और 35,000 लोगों के बीच किसी भी टीम का हौसला बढ़ सकता है. ऐसे में वह कोई बड़ा चमत्कार करे तो कोई आश्चर्य नहीं. इसके अलावा एक महत्वपूर्ण कारण यह है कि इस तरह की टीमों के पास खोने के लिए कुछ खास नहीं होता. ऐसे में उन पर जीतने का कोई खास दबाव नहीं होता है और उस दबाव मुक्त माहौल में वे बेहतरीन प्रदर्शन कर जाती हैं.

फिर भी यह यक्ष प्रश्न तो अभी भी क़ायम है कि आ़खिर इन टीमों का अस्तित्व वर्ल्डकप से कभी बाहर निकलेगा या फिर ये सिर्फ ग्रुप लिस्ट बढ़ाती ही ऩजर आएंगी. कुल मिलाकर कहने का मतलब यह है कि विश्वकप में अपने उलटफेर प्रदर्शन से बड़ी-बड़ी टीमों के छक्के छुड़ाने वाली इन नई नवेली टीमों का आ़खिर बाद में क्या होता है. इस प्रतिस्पर्धा के खत्म होने के बाद ये कहां गायब हो जाती हैं. बाद में जब भी कोई बड़ी क्रिकेट प्रतियोगिता होती है तो इन्हें उसमें शामिल क्यों नहीं किया जाता है. अगर इनका प्रदर्शन इतना ही खराब होता तो फिर ये उलटफेर क्यों करतीं, जैसा कि इस बार इंग्लैंड और का़फी हद तक पाकिस्तान के साथ हो चुका है. अगर इस पर यह तर्क दिया जाए कि ये उलटफेर स़िर्फ तुक्के के बल पर हुए हैं तो इसका मतलब ये टीमें अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भाग लेने लायक हैं ही नहीं. आ़खिर कब तक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में वहीं गिने-चुने देशों के नाम सुनाई देते रहेंगे? क्या कभी ऐसा भी होगा, जब टॉप रैंकिंग में इन नई नवेली टीमों को भी जगह मिलेगी? इसके पीछे की असल वजह क्या है, इस पर जानकारों की अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन इतना तो तय है कि पिछले कई सालों से हम इस तरह की टीमों को स़िर्फ लिस्ट भरने के तौर पर ही देखते आ रहे हैं और शायद आगे भी यही देखते रहेंगे. इसका मतलब तो यही हुआ कि दूसरे देशों की टीमों को कभी नया मुकाम हासिल ही नहीं होगा. अगर ऐसा है तो यह बहुत सारे देशों की प्रतिभाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ होगा. हर बार कोई कमज़ोर सी टीम दिग्गज को पटक देती है और फिर पूरे वर्ल्डकप का समीकरण ही बदल जाता है. आयरलैंड ने इंग्लैंड को हराकर ऐसा ही किया है. हालांकि आयरलैंड की जीत के पीछे इंग्लैंड की दिशाहीन गेंदबाजी और घटिया क्षेत्ररक्षण की भी अहम भूमिका रही. इंग्लिश टीम को अपनी इन ग़लतियों का खामियाजा उलटफेर का शिकार होकर भुगतना पड़ा.

 इसके बावजूद आयरलैंड की मेहनत कम नहीं हो जाती. पिछले विश्वकप में भी पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसी टीमों को उलटफेर का शिकार बनाकर सनसनी फैलाने वाले आयरलैंड का नाम बीच में किसी प्रतिस्पर्धा में नहीं सुना गया. आयरलैंड के अलावा और भी कई टीमें हैं, मसलन हॉलैंड, कनाडा और नीदरलैंड, जो किसी भी मैच में खेल का रु़ख बदलने का माद्दा रखती हैं. बांग्लादेश का पूरा करियर ही उलटफेर की कहानी पर टिका हुआ है. इतने सालों के दौरान बांग्लादेश का नाम कभी भी टॉप रैंकिंग में नहीं आया. इस बार बांग्लादेश पहली बार वर्ल्डकप की मेजबानी कर रहा है. बांग्लादेश ने यह तो दिखा दिया कि अब वह भी ऐसे आयोजनों की मेजबानी करने में सक्षम है, लेकिन क्या वह आगे होने वाले मैचों में यह दिखा पाएगा कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उसका प्रदर्शन विश्वसनीय है. बांग्लादेश के लिए सबसे अच्छा वर्ल्डकप 2007 का था, जहां उसने पहले चरण में भारत को हराकर सुपर आठ में प्रवेश किया. सुपर आठ में भी उसने दक्षिण अफ्रीका को हराया. हालांकि इसके बाद वह सभी मैच हार गया, लेकिन इन दो ज़बरदस्त उलटफेरों ने उसे अचानक लाइम लाइट में ला दिया. उसके बाद से यह टीम आज तक छोटे-मोटे उलटफेरों के दम पर ही टिकी हुई है. इसने कभी भी यह साबित नहीं किया कि यह ए लिस्ट की रैंकिंग में शामिल होने लायक है. पिछले दो सालों में बांग्लादेश की टीम में बहुत परिवर्तन आया है. जहां उसने विदेशी धरती पर जाकर अच्छा प्रदर्शन किया है, वहीं घरेलू पिच पर भी बांग्लादेश ने पहले न्यूज़ीलैंड और फिर ज़िम्बाब्वे को एक दिवसीय सीरीज़ में हराया. अतः हम कह सकते हैं कि बांग्लादेश कुछ भी करने में सक्षम है. भारत के अलावा पाकिस्तान भी इस तरह के उलटफेरों का शिकार हो चुका है.



याद कीजिए 1999 का वर्ल्डकप, बांग्लादेश ने क्रिकेट वर्ल्डकप में पहली बार भाग लिया था. उस बार उसने लीग मैच में उलटफेर करते हुए पाकिस्तान को हराया था, लेकिन दूसरे मैचों में उसका प्रदर्शन खराब रहा. अतः उसे पहले दौर में ही बाहर होना पड़ा. ऐसा कोई नियम नहीं है कि इस तरह के उलटफेर करने वाली टीमें ए ग्रेड में नहीं आ सकती हैं. याद कीजिए 1983 का वर्ल्डकप, भारतीय टीम बेहद कमज़ोर मानी जाती थी. फिर भी किसी तरह वह वर्ल्डकप के फाइनल तक पहुंच गई. कुछ ने इसे तुक्का तो कुछ ने तक़दीर का खेल बताया. फाइनल में पहले बल्लेबाजी करते हुए टीम मात्र 183 रनों पर आउट हो गई. ज़्यादातर लोगों ने यह पक्का कर दिया कि यहां से भारत स़िर्फ उपविजेता ही बन सकता है, लेकिन बाद में मोहिंदर अमरनाथ की जादुई गेंदबाजी और कपिलदेव के करिश्माई कैच ने भारत को विश्व चैंपियन बना दिया. निश्चित तौर पर यह वर्ल्डकप का अब तक का सबसे बड़ा उलटफेर है. इसके दम पर चैंपियन बनने वाली उस व़क्त की कमज़ोर भारतीय टीम आज नंबर वन की पोजीशन में है. इससे यह तो साबित होता है कि पहली बार खेलना इस बात का ठप्पा नहीं हैं कि आप आगे भी न खेल पाओ. इसके अलावा कुछ और बड़े उलटफेरों पर ग़ौर फरमाइए. 2007 में आयरलैंड बनाम पाकिस्तान का मैच. भला उस मैच को कोई कैसे भूल सकता है. पिछले वर्ल्डकप में पाकिस्तान की टीम आयरलैंड की कमज़ोर टीम के सामने 132 रनों पर ऑल आउट हो गई थी. इसके बाद खुद आयरलैंड के सात विकेट 113 रनों पर गिर गए. उसी दौरान ट्रेंट जॉनटन ने छक्का मारकर अपनी टीम को ऐतिहासिक जीत दिला दी. उस रात पाकिस्तान के कोच बॉब वूल्मर को दिल का ऐसा दौरा पड़ा कि वह कभी उठ नहीं पाए. पाकिस्तान वर्ल्डकप से बाहर हो गया. पिछले वर्ल्डकप में अगर आयरलैंड ने पाकिस्तान को बाहर किया तो पिद्दी समझे जाने वाले बांग्लादेश ने भारत को. टीम इंडिया ने 191 रनों का कमज़ोर स्कोर बनाया, जिसे बांग्लादेश की टीम ने आसानी से पार कर लिया. इसी हार के बाद भारत को बाहर जाना पड़ा. इसी तरह 1983 में एक तरफ बॉर्डर, मार्श लिली और थॉमसन जैसे क्रिकेटरों से सजी ऑस्ट्रेलिया की टीम थी तो दूसरी तऱफ क्रिकेट की दुनिया में पहला क़दम रख रही जिम्बाब्वे. पर डंकन फ्लेचर की जादुई पारी के साथ जिम्बाब्वे ने 239 रन बना डाले, नतीजतन आस्ट्रेलिया हार गया.

2003 के वर्ल्डकप में केन्या ने भारतीय क्रिकेटर संदीप पाटिल की कोचिंग में ज़बरदस्त प्रदर्शन किया और विश्व विजेता रह चुकी श्रीलंका की टीम को परास्त करते हुए सेमी फाइनल तक जगह बना ली. हालांकि विशेषज्ञ कुछ और कारणों का ज़िक्र करते हैं. उनका मानना है कि इस तरह की टीमें उलटफेर कुछ खास कारणों से कर पाती हैं. मसलन वर्ल्डकप में बांग्लादेश के पास सबसे बड़ा लाभ यह है कि वह मैच अपने घर में खेल रहा है. अपनी पिचों और 35,000 लोगों के बीच किसी भी टीम का हौसला बढ़ सकता है. ऐसे में वह कोई बड़ा चमत्कार करे तो कोई आश्चर्य नहीं. इसके अलावा एक महत्वपूर्ण कारण यह है कि इस तरह की टीमों के पास खोने के लिए कुछ खास नहीं होता. ऐसे में उन पर जीतने का कोई खास दबाव नहीं होता है और उस दबाव मुक्त माहौल में वे बेहतरीन प्रदर्शन कर जाती हैं. फिर भी यह यक्ष प्रश्न तो अभी भी क़ायम है कि आ़खिर इन टीमों का अस्तित्व वर्ल्डकप से कभी बाहर निकलेगा या फिर ये सिर्फ ग्रुप लिस्ट बढ़ाती ही ऩजर आएंगी.

Tuesday, March 8, 2011

करे कोई भरे कोई

हमारे देश में क्रिकेट के अलावा लगभग सभी खेलों की स्थिति एक जैसी है यानी बदहाल और उपेक्षित. भले ही वे क्षेत्रीय स्तर पर होने वाले खेल हों या फिर राज्य स्तर पर. जब भी इन खेलों का आयोजन होता है, कभी मेज़बानी को लेकर समस्या पैदा हो जाती है तो कभी प्रायोजकों की भागीदारी को लेकर. अगर भूले-भटके उक्त दोनों समस्याओं से निजात मिल भी जाए तो असुविधा और बदइंतज़ामी मार जाती है.


इन सभी समस्याओं से इतर भी एक समस्या है, जिस पर शायद ही किसी का ध्यान जाता हो. यह समस्या है उन प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की, जो इन बदइंतज़ामियों के शिकार हो जाते हैं. उनका करियर शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाता है. कई सालों के अथक परिश्रम और प्रशिक्षण के बाद वे इस तरह की प्रतिस्पर्धाओं के लिए तैयार होते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि कब ये खेल राजनीति या फिक्सिंग के शिकार होकर उनका करियर चौपट कर देंगे. इस बात पर किसी का भी ध्यान नहीं जाता कि अगर एक बार म़ेजबानी छिन जाए तो कितना नुक़सान होता है. प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को नुक़सान तो होता ही है, साथ ही राज्य को आर्थिक क्षति भी होती है. उदाहरण के लिए आयोजन के पहले विज्ञापन हेतु लाखों रुपये खर्च हो जाते हैं.

कई समितियां बनाई जाती हैं, जिन पर मोटा खर्च आता है. इसके अलावा जो बदनामी होती है, वह अलग. 33वें राष्ट्रीय खेलों की स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी. वर्ष 2003-2004 में उसके आयोजन के लिए हरी झंडी भी मिल गई थी, लेकिन आज तक पता नहीं चल पाया कि उस आयोजन के रद्द होने के पीछे क्या कारण थे. ऐसा नहीं है कि इन खेलों का आयोजन एक बार ही रद्द हुआ हो, चार बार राष्ट्रीय खेलों के आयोजन रद्द हो चुके हैं. अब जाकर ये खेल संपन्न हुए हैं. लोग जश्न मना रहे हैं. कई प्रतिस्पर्धाओं में झारखंड के खिलाड़ियों ने कई पदक भी अपने नाम किए हैं, लेकिन इस बार प्रतिस्पर्धा में शामिल होने वाले खिलाड़ी नए थे. इनमें वे खिलाड़ी नहीं थे, जो पिछले आयोजन को लेकर तैयार थे. पुराने खिलाड़ी अपनी प्रतिभा दिखाने से वंचित रह गए. अगर ये राष्ट्रीय खेल सही समय पर होते तो इनकी तस्वीर कुछ और ही होती. खेल संघ को शायद इस बात का अंदाजा नहीं है कि इस दौरान खिलाड़ियों का कितनाक़ीमती वक्त बर्बाद हुआ. उन्हें सही समय पर अपनी प्रतिभा दिखाने का मौक़ा नहीं मिला. ग़ौरतलब है कि हर बार राष्ट्रीय खेलों के ज़रिए खिलाड़ियों की एक नई पीढ़ी उभर कर सामने आती है, लेकिन अगर एक बार प्रतिस्पर्धा रद्द हो जाए या मेज़बानी छिन जाए तो न जाने कितनी प्रतिभाएं गुमनामी में खो जाती हैं.जिन खिलाड़ियों को पिछली बार अवसर नहीं मिला, उनमें से कुछ खिलाड़ी इस बार की प्रतिस्पर्धा में शामिल तो हुए, पर उम्र ज्यादा होने या अन्य कारणों से भाग लेने से वंचित रह गए.

 झारखंड में खेलों की बदहाली के पीछे के कारणों को समझना जरूरी है. दरअसल जब भी इस तरह के आयोजन होते हैं तो सभी राज्यों को मेज़बानी के लिए दावेदारी करनी होती है. यह दावेदारी राज्यों द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली बेहतरीन सुविधा के आधार पर मजबूत होती है. बस इसी मामले में झारखंड की हालत ढीली हो जाती है. इस बात पर किसी का भी ध्यान नहीं जाता कि अगर एक बार म़ेजबानी छिन जाए तो कितना नुक़सान होता है. प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को नुक़सान तो होता ही है, साथ ही राज्य को आर्थिक क्षति भी होती है. उदाहरण के लिए आयोजन के पहले विज्ञापन हेतु लाखों रुपये खर्च हो जाते हैं. कई समितियां बनाई जाती हैं, जिन पर मोटा खर्च आता है. इसके अलावा जो बदनामी होती है, वह अलग. इस सबके बावजूद झारखंड ने महेंद्र सिंह धोनी के अलावा हॉकी, तीरंदाज़ी, एथलेटिक्स और अन्य खेलों में कई बेहतरीन खिलाड़ी दिए हैं. सोचने वाली बात यह है कि अगर इस सुविधाविहीन माहौल में इतनी प्रतिभाएं पैदा हो सकती हैं तो फिर अगर सब कुछ सही समय पर और सुविधाओं के साथ हो तो खेलों और खिलाड़ियों का भविष्य कितना उज्ज्वल होगा. 

विश्‍वकप- 2011: आगाज खूबसूरत है अंजाम क्‍या होगा




ढाका के ऐतिहासिक बंग बंधु स्टेडियम में विश्वकप का आ़गा़ज एक भव्य समारोह के साथ हो गया. समारोह में दुनिया भर के सुप्रसिद्ध कलाकारों के साथ-साथ विश्वकप में भाग लेने वाली 14 टीमों के कप्तानों ने भी अपने जलवे दिखाए. उद्घाटन समारोह के साथ ही सभी टीमों ने अपनी-अपनी जीत की दावेदारी की. विश्वकप उद्घाटन समारोह कई मायनों में भव्य और खास रहा. समारोह में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने औपचारिक रूप से विश्वकप शुरू होने की घोषणा करते हुए कहा कि यह प्रतियोगिता सफल होगी. इस मौके पर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) के प्रमुख शरद पवार भी मौजूद थे. इस रंगारंग कार्यक्रम में सबसे पहले बांग्लादेश के गायकों ने समां बांधा, फिर बारी आई सभी 14 टीमों के कप्तानों की. पहले मैदान के बीचोंबीच ठेले पर लोगो स्टंपी आया, फिर टीमों के कप्तान छोटे बच्चों के साथ सजे-धजे रिक्शे पर बैठकर आए. इस दौरान पूरा स्टेडियम विश्वकप थीम गीत-दे घुमा के से गूंज रहा था.

विश्वकप के लिए टीम इंडिया ने जो रणनीति बनाई थी, वह लीक हो गई. विश्वकप जैसी बड़ी प्रतियोगिता में दबदबा बनाने के लिए हर टीम अपनी एक खास रणनीति बनाती है. ज़ाहिर है, भारत ने भी एक रणनीति बनाई थी. टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और कोच गैरी कर्स्टन ने मिलकर अपनी योजना 150 पेजों के दस्तावेज में दर्ज की है. इस दस्तावेज को धोनी और कर्स्टन ने आओ अपना सपना साकार करें नाम दिया है, लेकिन टीम इंडिया का यह गुप्त दस्तावेज मीडिया में लीक हो गया है.

ग़ौरतलब है कि विश्वकप थीम को शंकर-एहसान-लॉय की तिकड़ी ने कंपोज किया है. इसी क्रम में पहले तीन बार के चैंपियन रिकी पोंटिंग बंग बंधु स्टेडियम पहुंचे. हर कप्तान के साथ रिक्शे में एक बच्चा था. पोंटिंग के बाद कनाडा के  कप्तान आशीष बगई, इंग्लैंड के कप्तान एंड्रयू स्ट्रॉस, आयरलैंड के कप्तान विलियम पोर्टरफील्ड, केन्या के जिमी कमांडे, हालैंड के पीटर बोरेन, न्यूजीलैंड के डेनियल विटोरी, पाकिस्तान के शाहिद आफरीदी, दक्षिण अफ्रीका के ग्रीम स्मिथ, वेस्टइंडीज के डेरेन सैमी और जिंबाब्वे के एल्टन चिगुंबुरा स्टेडयम में आए. फिर भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने इंट्री की. धोनी के बाद श्रीलंकाई कप्तान कुमार संगकारा और फिर मेजबान बांग्लादेश के कप्तान शाकिब अल हसन ने तालियों की गड़गड़ाहट के बीच स्टेडियम में प्रवेश किया. मशहूर गायक सोनू निगम ने अंग्रेजी गीत राइज अप फोर ग्लोरी गाकर सबको झूमने पर मजबूर कर दिया. रूना लैला के गीत दमादम मस्त कलंदर की भी ख़ूब सराहना हुई. इसके बाद अंतरराष्ट्रीय पॉप गायक ब्रायन एडम्स ने अपनी गायिकी का जादू बिखेरा. आख़िर में शंकर, एहसान और लॉय ने दे घुमा के गाकर माहौल में जोश भर दिया. इसके बाद हुई जमकर आतिशबाज़ी. रोशनी से जगमग स्टेडियम आतिशबाज़ी से गूंज उठा और एक अच्छे विश्वकप के आयोजन के वादे के साथ ख़त्म हुआ उद्घाटन समारोह.

हमारा देश इस महा आयोजन का आयोजक देश होने पर गर्व की अनुभूति कर रहा है.

- शेख हसीना, प्रधानमंत्री, बांग्लादेश


यह तो था विश्वकप का आग़ाज़, लेकिन इसका अंजाम भी इतना ही खूबसूरत होगा, इस बात को लेकर खेलप्रेमियों से लेकर आयोजकों तक के मन में संशय बरक़रार है. इस संशय की वजह हैं, मैच के पहले ही सुर्खियों में आईं विवादास्पद खबरें. हालांकि कई खबरों में का़फी हद तक सच्चाई भी है. अपने घर में विश्वकप खेल रही टीम इंडिया इस खिताब को जीतने के लिए पूरे जोश में है. कई कीर्तिमान रच चुके महेंद्र सिंह धोनी अपने नाम एक और इतिहास करने को आतुर हैं. इसके लिए उन्होंने अपने फॉर्म को भी दोबारा हासिल कर लिया है. लेकिन फिर भी कई सारी अड़चनें हैं, जो विश्वकप में भारत की जीत केआड़े आ सकती हैं. सबसे पहले तो टीम इंडिया के प्रदर्शन की बात करते हैं. टीम इंडिया के सामने सबसे बड़ा सवाल क्षेत्ररक्षण है. टीम इंडिया की कमज़ोर कड़ी उसकी फील्डिंग है. कुछ खिलाड़ियों को छोड़कर टीम में फुर्तीले फील्डरों की कमी है. इस कमी की वजह से कई ऐसे मौक़े आए हैं, जबकि टीम इंडिया को जीता हुआ मैच गंवाना पड़ा है. यदि भारतीय टीम अपनी इस कमज़ोरी पर क़ाबू पा ले तो कई सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे. इसके अलावा तेज़ गेंदबाजों का ज़्यादा रन लुटाना भी टीम को नुकसान पहुंचा सकता है. कई अवसरों पर देखा गया है कि जब मैच भारत के पक्ष में जा रहा होता है तो भारतीय बल्लेबाज अति आत्मविश्वासी होकर रन लुटाना शुरू कर देते हैं. नतीजतन टीम इंडिया को इसका खामियाजा हार के रूप में चुकाना पड़ता है. टीम प्रबंधन को तेज़ गेंदबाजी पर काम करने की भी ज़रूरत है.

भारतीय उपमहाद्वीप के लिए यह एक ऐतिहासिक दिन रहा और ऐसा भव्य उद्घाटन समारोह पहले मैंने कभी नहीं देखा. वन डे वर्ल्डकप आईसीसी का फ्लैगशिप टूर्नामेंट है. इसमें खेलना हर खिलाड़ी का सपना होता है.

- शरद पवार, आईसीसी प्रमुख

इतना का़फी नहीं था कि विश्वकप के लिए टीम इंडिया ने जो रणनीति बनाई थी, वह लीक हो गई. विश्वकप जैसी बड़ी प्रतियोगिता में दबदबा बनाने के लिए हर टीम अपनी एक खास रणनीति बनाती है. ज़ाहिर है, भारत ने भी एक रणनीति बनाई थी. टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और कोच गैरी कर्स्टन ने मिलकर अपनी योजना 150 पेजों के दस्तावेज में दर्ज की है. इस दस्तावेज को धोनी और कर्स्टन ने आओ अपना सपना साकार करें नाम दिया है, लेकिन टीम इंडिया का यह गुप्त दस्तावेज मीडिया में लीक हो गया है. अब इतनी जल्दी कोई नई रणनीति बनाना आसान नहीं है. यह भी किसी हद तक नुकसान पहुंचाने के लिए का़फी है. प्रदर्शन और खेल के मैदान के बाहर फिक्सिंग का काला साया भी मंडराया रहा है, जो समय-समय पर खिलाड़ियों का ध्यान भटकाएगा. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) ने विश्वकप मैचों के दौरान खिलाड़ियों और अधिकारियों द्वारा सोशल नेटवर्किंग साइट ट्‌वीटर के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है. यह क़दम फिक्सिंग, खास तौर से स्पॉट फ़िक्सिंग को रोकने के लिए उठाया गया है. आईसीसी की भ्रष्टाचार निरोधक और सुरक्षा इकाई की पहल पर ऐसा किया गया है.


आईसीसी चाहती है कि टी-20 की तरह विश्वकप में कोई भ्रष्टाचार न हो. आईसीसी का यह क़दम खिलाड़ियों और अधिकारियों से संपर्क करने की उन लोगों की कोशिश को रोकना भी है, जो ग़ैर क़ानूनी रूप से सट्टेबाज़ी करते हैं. आईसीसी के  मीडिया मैनेजर जेम्स फ़िट्ज़गेराल्ड के मुताबिक़, विश्वकप के सभी मैचों के दौरान खिलाड़ियों और टीम अधिकारियों के ट्‌वीट करने पर पाबंदी लगा दी गई है.

अब अगर टीम इंडिया को इस बार विश्वकप का खिताब अपने नाम करना है तो इन विवादों से दूर रहने के साथ-साथ अपनी उन सभी कमज़ोरियों की ओर ध्यान देना होगा, जो उसका प्रदर्शन प्रभावित कर सकती हैं.


Tuesday, March 1, 2011

जो जीता वही सिकंदर




जब तक यह आलेख पाठकों तक पहुंचेगा तब तक विश्व कप 2011 का विजेता सामने आ चुका होगा, लेकिन अपने आख़िरी पड़ाव की ओर पहुंच चुके इस महाकुंभ में अब तक जितने भी मैच हुए हैं उनमें किसी भी तरह का रोमांच देखने को नहीं मिला. जैसा कि पहले से ही उम्मीद थी कि आयरलैंड और कनाडा जैसी दूसरी टीमें शुरुआती राउंड से ही बाहर हो जाएंगी, ठीक वैसा ही हुआ. विश्व कप का पहला हफ़्ता बहुत रोमांचक नहीं रहा, जहां क्रिकेट जगत की शीर्ष टीमों और बाक़ी टीमों के बीच का अंतर इतना बड़ा था कि मुक़ाबला एकतरफ़ा होना ही था. सभी टीमें अपना-अपना खाता निपटाकर टूर्नामेंट से बाहर हो चुकी हैं. अब बची वही कुछ चुनिंदा टीमें, जो ज़्यादातर हर विश्वकप में सेमीफाइनल में भिड़ती हैं, मसलन इंडिया, ऑस्ट्रेलिया और पाकिस्तान. अगर क्रिकेट के जानकारों की मानें तो उपमहाद्वीप से बाहर की किसी भी टीम के लिए विश्व कप जीतना बेहद मुश्किल होगा, क्योंकि यहां की परिस्थितियां ही ऐसी हैं. नीची रहने वाली और धीमी घूमने वाली विकेट में बाहर की किसी भी टीम की गेंदबाज़ी में ऐसा संतुलन नहीं है जिससे कि वह नियमित रूप से मैच जिता सके, लेकिन इसी आधार पर अन्य टीमों की दावेदारी को कमज़ोर नहीं कहा जा सकता है. दरअसल मुश्किल उनको होगी, जिनकी बल्लेबाज़ी में इतना दम नहीं है कि वे शीर्षक्रम के लड़खड़ाने पर संभल सकें. बात अगर मेज़बान देश भारत की बात की जाए तो अब तक मैच देखने के बाद यही अनुमान निकाला जा सकता है कि इसका टॉप ऑर्डर बुरी तऱफ फ्लॉप रहा है. इक्का-दुक्का खिलाड़ियों को छोड़ दिया जाए तो ज़्यादातर मैचों में बल्लेबाज़ तू चल मैं आया की तर्ज़ पर ही खेले हैं. इसी वजह से दक्षिण अफ्रीका के  ख़िला़फभारत का 19 साल बाद वनडे सीरीज जीतने का सपना अधूरा ही रह गया. इसकी सबसे बड़ी वजह टॉप ऑर्डर का फ्लॉप होना रही. इसका उदाहरण तब देखने को मिला जब भारत नागपुर में खेले गए विश्व कप क्रिकेट के एक मैच में दक्षिण अफ्रीका से तीन विकेट से हार गया. दक्षिण अफ्रीका को जीत के लिए 297 रनों की आवश्यकता थी, जो उसने दो गेंद रहते ही हासिल कर ली. इस विश्व कप में यह भारत की पहली हार थी. इसके बाद भारत का मुक़ाबला वेस्टइंडीज से हुआ. मैच की शुरुआत में तो ऐसा ही लग रहा था यह मैच भी भारत की झोली से चला जाएगा, लेकिन क़िस्मत से टीम इंडिया जीत गई. इसके बाद भारत का मुक़ाबला आस्ट्रेलिया से हुआ और इस मैच को जीतकर भारत ने शानदार वापसी करते हुए किसी हद तक अपनी दावेदारी जता दी है. अब बचता है श्रीलंका. यह एक ऐसी टीम है जिसकी गेंदबाज़ी संतुलित है, मैदान पर खिलाड़ी चुस्त हैं और बल्लेबाज़ी ठोस है. वे किसी भी टीम को चुनौती दे सकते हैं. फ़ाइनल में भारत और श्रीलंका की टक्कर की संभावना पूरी बनती है, बशर्ते दोनों टीमें नॉक आउट दौर में न टकरा जाएं. लेकिन खेल प्रेमियों समेत कई लोगों की इच्छा भारत-पाक के मैच में दिखती है. ऐसे में अब अगर सेमीफ़ाइनल में इन दोनों टीमों के भिड़ने की संभावना हो जाए तब? इस रोचक संभावना से क्रिकेट प्रेमी तो उत्साहित हैं ही, लगता है अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद भी उत्साहित है, क्योंकि हारून लोर्गाट अहमदाबाद में संवाददाता सम्मेलन में आए और उन्होंने क्वार्टर फ़ाइनल मैचों का ज़िक्र शुरू किया तो पहले बोले कि भारत और पाकिस्तान के मैच का विजेता मोहाली में खेलेगा. इससे पहले कि वह आगे बढ़ते उनके साथियों और मीडिया वालों ने उन्हें याद दिलाया कि अभी क्वार्टर फ़ाइनल में ये दोनों टीमें अलग-अलग खेल रही हैं. भारतीय उपमहाद्वीप में क्रिकेट से आईसीसी को काफ़ी मुनाफ़ा होता है और वहां भारत-पाकिस्तान के मैच की तो बात ही क्या होगी, कहीं ऐसा तो नहीं कि नज़र उस मुनाफ़े पर रखे हुए लोर्गाट साहब दिल की बात बोल गए. ख़ैर जो भी हो हालात भारत पाक के साथ ही हैं.  वैसे भारत और पाकिस्तान जैसे देश इस टूर्नामेंट से पिछली बार की तरह जल्दी ही रुख्सत न हो जाएं, इसलिए इस बार ऐसा फ़ॉर्मेट बनाया गया, जहां दोनों टीमें कम से कम क्वार्टर फ़ाइनल तक तो पहुंचे ही जाएं. पिछली बार प्रायोजकों को भारी नुक़सान उठाना पड़ा था, क्योंकि क्रिकेट के बड़े प्रायोजक भारतीय बाज़ार को निशाना बनाते हैं. अब ऐसे में सचिन तेंदुलकर की लोकप्रियता को भी भुनाने का उन्हें मौक़ा मिलता है. इसलिए उम्मीद की जा सकती है कि विश्वकप में भारत या पाक ़फाइनल तक ज़रूर पहुंचेंगे. पाकिस्तान की गेंदबाज़ी उन तमाम झटकों के बाद जिन्होंने उसकी धार को कुंद किया है, मज़बूत लगती है, लेकिन तब क्या उसकी टीम नियमित तौर पर बड़े स्कोर कर सकेगी? इस पर संदेह है. ऐसे में बचते हैं केवल दो मुख्य दावेदार और उनके दावे को पहले हफ़्ते के उनके प्रदर्शन से और बल मिलता है. भारत की बल्लेबाज़ी, ऐसी परिस्थितियों में जिससे वह भली-भांति परिचित है, वह देखने में ही डरानेवाली और ठोस लगती है. अगर उसका ऊपरी और मध्य क्रम नहीं बैठा, जिसकी संभावना ऐसे विकेटों पर कम ही है तो खिला़डी निर्दयी होकर खेलेंगे.

और उनके पास ऐसे धीमी गति के गेंदबाज़ हैं जो किसी भी टीम की बल्लेबाज़ी का कचूमर निकाल सकते हैं. फिर भी, उनका कमज़ोर-तेज़ आक्रमण, मैदान पर सुस्त हाव-भाव और अपेक्षाओं के दबाव का सामना करने की टीम की क्षमता चिंता की वजह होनी चाहिए.इसके अलावा एक और बात यह कि यह विश्वकप सचिन और पॉन्टिग का आख़िरी विश्वकप माना जा रहा है. हालांकि रिकी इस बात से इंकार करते हैं कि वह विश्वकप के बाद संन्यास ले लेंगे. रिकी से संवाददाताओं ने पूछा कि विश्व कप जैसे मुक़ाबले में सचिन और पॉन्टिंग आख़िरी बार आमने-सामने होंगे तो वह बातों ही बातों में सचिन की तारीफ़ कर गए. बोले, जहां तक हमारे अंतिम विश्व कप की बात है तो सचिन जिस फ़ॉर्म में हैं वह तो अभी एक और विश्व कप खेल सकते हैं. मैं उम्मीद कर रहा हूं कि अगले मैच से मैं भी फ़ॉर्म में लौटूंगा और अगले विश्व कप तक खेल सकूंगा. वैसे सचिन के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 99 शतक हो चुके हैं और किसी भी मैच में वह शतकों का शतक जड़ सकते हैं. उनके प्रशंसकों को भी हर मैच से पहले बेसब्री से सचिन के  उस 100वें शतक का इंतज़ार रहता है. उपरोक्त विश्लेषण और आंकड़े बताते हैं कि विश्कप के असली मुक़ाबले अभी बाकी हैं और टीमों  का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन भी. एक ओर जहां जानकार मेज़बानों की दावेदारी मज़बूत बता रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर बाक़ी टीमों का प्रदर्शन बोल रहा है कि वे किसी भी वक्त तख्ता पलट सकते हैं. ख़ैर 2 अप्रैल का फाइनल मैच इन सब कवायदों का जवाब दे देगा.