Monday, February 14, 2011

राष्‍ट्रकवि दिनकर के मकान पर जबरन कब्‍जा

 देश की उस महान कवि के अपमान की, जिसने न स़िर्फ अपनी लेखनी से देश को कई कालजयी रचनाएं दी हैं, बल्कि देश की आज़ादी की लड़ाई में भी महत्वपूर्ण भूमिका भी अदा की है. इससे ज़्यादा दुर्भाग्य की बात और क्या हो सकती है कि जिस आदमी ने देश को आज़ाद कराया, आज उसी का मकान उसके अपने लोगों ने ही क़ब्ज़ा लिया है.


मेरा भाई उप मुख्यमंत्री है और मेरा कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है. यह धमकी है बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी के भाई महेश मोदी की. इस धमकी से एक बार फिर साबित हो गया है कि हमारे देश में महापुरुषों की क्या हैसियत रह गई है. हालत यह है कि अब उनके मकानों पर भी क़ब्ज़ा किया जा रहा है. ताज़ा मामला, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का है.

 पटना स्थित उनके घर पर उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के भाई महेश मोदी ने क़ब्ज़ा कर रखा है. न स़िर्फ क़ब्ज़ा कर रखा है, बल्कि अपने भाई के मंत्री पद केज़ोर पर उनको घर से निकालने की धमकी भी दी है.. दरअसल, पटना के राष्ट्रकवि दिनकर गोलंबर से सटे आर्य कुमार रोड पर स्थित दिनकर भवन है. 
यह भवन सुविख्यात कवि रामधारी सिंह दिनकर का है. कुछ साल पहले दिनकर जी की विधवा पुत्रवधू हेमंत देवी ने बिहार के उपमुख्यमंत्री के भाई महेश मोदी को भवन परिसर में स्थित एकमात्र दुकान किराए पर दी थी. इस दुकान को तीन साल के इक़रार नामे पर किराए पर दिया गया था. जब 30 अप्रैल 2010 को यह इक़रारनामा खत्म हो गया तो महेश मोदी को दुकान खाली करने के लिए कहा गया. महेश मोदी ने दुकान खाली करना तो दूर उलटा घरवालों को धमकाना शुरू कर दिया.

 जब मामले की शिकायत करने की बात कही गई तो ऐसे में महेश मोदी का जवाब था कि जहां जाना चाहते हैं जा सकते हैं, मेरा भाई उप मुख्यमंत्री है. मेरा कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है. बार-बार दुकान खाली करने का आग्रह करने पर उप मुख्यमंत्री के लाडले महेश ने यह तक कह डाला कि दुकान के साथ-साथ एक महीने के अंदर पूरे मकान पर क़ब्ज़ा कर लेंगे. चौथी दुनिया से जब इस संबंध में दिनकर जी के परिवार से बात की तो कई बातें सामने आईं. दिनकर जी के पौत्र अरविंद कुमार ने बताया कि इस मामले को लेकर मुख्यमंत्री आवास एक अणे मार्ग जाकर नीतीश कुमार से गुहार भी लगा चुके हैं, लेकिन वहां से उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा. इसके अलावा उन्होंने इस धमकी की लिखित जानकारी उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी और बिहार के सभी राजनीतिक दलों के पास भेजी है. लेकिन अभी तक इस मामले पर कोई भी कार्रवाई नहीं की जा सकी है. 

इसलिए उन्होंने राजघाट पर शांतिपूर्ण धरने पर बैठने का फैसला लिया. जब हमने उनसे पूछा कि अगर धरने के बाद भी काई बात नहीं बनी तो क्या करेंगे? इस पर अरविंद कुमार का कहना था हमसे जो बन पड़ा, हमने किया. अगर फिर भी हमें मदद नहीं मिली तो हम सीधे प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौपेंगे. हालांकि, यहां पर बात स़िर्फ अवैध क़ब्ज़े की नहीं है, बात है देश की उस महान कवि के अपमान की, जिसने न स़िर्फ अपनी लेखनी से देश को कई कालजयी रचनाएं दी हैं, बल्कि देश की आज़ादी की लड़ाई में भी महत्वपूर्ण भूमिका भी अदा की है. इससे ज़्यादा दुर्भाग्य की बात और क्या हो सकती है कि जिस आदमी ने देश को आज़ाद कराया, आज उसी का मकान उसके अपने लोगों ने ही क़ब्ज़ा लिया है. यह स़िर्फ दुर्भाग्य ही नहीं बल्कि शर्मनाक भी है कि मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री को इस बात का संज्ञान है और तब भी कोई कार्रवाई नहीं हुई. अपनी पीड़ा का अंत न होते देख आ़खिर दिनकर जी के परिवार ने पिछले दिनों नई दिल्ली में महात्मा गांधी की समाधि राजघाट के सामने शांतिपूर्ण धरना दिया. इस धरने में दिनकर जी की के परिवार के अलावा राम विलास पासवान भी विरोध करते दिखे. 


 सभी ने इस घटना की निंदा करते हुए जल्द ही उचित कार्रवाई की मांग की. अब इस पर कितनी कार्रवाई होती है यह तो आने वाला व़क्त ही बताएगा पर इतना तो तय है कि दिनकर जी का जो अपमान होना था वह हो ही गया. यह शांतिपूर्ण धरना अपनी खामोशी के पीछे कई सवाल छोड़ गया. वो सवाल जिनके जवाब न तो नीतीश के पास हैं और न ही सुशील मोदी के पास. सवाल उस पी़ढी से भी है जो रामधारी सिंह दिनकर को प़ढते हुए बड़ी हुई है. क्या इन सबका दिनकर जी के प्रति कोई फर्ज़ नहीं है. क्या आज मंत्रियों के रिश्तेदार महान कवि से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं? अगर हमारे दिल में देश के महापुरुषों के लिए इतनी भी इज़्ज़त नहीं बची है तो आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि आने वाला कल कैसा होगा.

Monday, February 7, 2011

बुंदेलखंडः किराए की कोख, मजबूरी या शौक




 

उत्तर प्रदेश के बुदेलखंड क्षेत्र में अगर समस्याओं की बात की जाए तो का़फी लंबी फेहरिस्त बनती है. जिसमें बेरोजगारी, सूखा, भुखमरी और दस्यु सरगनाओं जैसी कई समस्याएं हैं. इन्हीं वजहों से बुंदेलखंड का सामाजिक और आर्थिक ढांचा चरमराया हुआ है. इन सबके बीच यहां के लोग किस तरह जीवन बसर करते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है. ज़्यादातर भूमिहीन किसान मजदूरी के वास्ते यहां से पलायन कर चुके हैं और महिलाएं किसी तरह से रोज़ी-रोटी का इंतेज़ाम करने में लगी हैं.

 लेकिन अब रोजगार और रोज़ी-रोटी की मार ने यहां की महिलाओं और लड़कियों को इतना मजबूर कर दिया है कि वे अपनी कोख का सौदा करने पर अमादा हैं. यानी सरोगेट मदर बनकर पैसा कमाने को रोजगार बना रही हैं. बुंदेलखंड में महिलाओं और लड़कियों को रोज़ी-रोटी की मार ने इतना मजबूर कर दिया है कि वे अपनी कोख का सौदा करने पर आमादा हैं. यानी सरोगेट मदर बनना अब उनके लिए रोज़गार का एक ज़रिया बन गया है. उन्हें इस बात का भी एहसास नहीं हैं कि इस तरह से कोख का सौदा कर वह अपना ही स्वास्थ्य बिगा़ड रही हैं. जी हां, भारत में सरोगेसी का यह कारोबार अब बुंदेलखंड में भी फैल रहा है.

आर्थिक हालात इतने बदतर हो गए हैं कि अब बुंदेलखंड के विभिन्न इलाक़ों की कुंवारी लड़कियां अपनी कोख किराए पर देकर अपने स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर रही हैं. सरोगेसी की सबसे बड़ी वजह है ग़रीबी. जिसकी बुंदेलखंड में कोई कमी नहीं है. ग़रीब महिलाओं की पैसों की चाहत उन्हें इस कारोबर में उतरने को मजूबर करती है. यह मामला बिल्कुल वैसा ही है जैसे पुरुष ग़रीबी से तंग आकर अपना खून और किडनी बेचने को तैयार हो जाते हैं, ताकि उनके घर में चूल्हा जल सके.


 वैसे ही महिलाएं भी ग़रीबी के कारण अपनी कोख को किराए में देकर अपनी जान जोखिम में डालती हैं और अपने घर परिवार को छोड़कर दूसरे के बच्चे को पालती हैं. इससे पहले सरोगेसी भारत के कुछ ही राज्यों जैसे उड़ीसा, भोपाल, केरल, तमिलनाडु, मुंबई आदि में फैली थी. पर अब इस विदेशी कारोबार ने यहीं भी अपने पैर जमाने शुरू कर दिए हैं. विदेशी कारोबार इसलिए, क्योंकि अब तक सरोगेट मदर बनने की घटनाएं स़िर्फ विदेशों में ही सुनने को मिलती थीं. यहां एक बात ध्यान देने योग्य है, वह यह कि सरोगेसी ऐसे राज्यों में ज़्यादा देखने को मिलती थी, जहां पर्यटक ज़्यादा आते थे.

पर अब सरोगेसी के मामले बुंदेलखंड में भी मेट्रो सिटीज की तरह बढ़ रहा है. आलम यह है कि यहां कई अन्य राज्यों समेत विदेशों से दंपत्ति सरोगेट मदर की तलाश में आ रहे हैं. इस कारोबार का सबसे बूरा पक्ष यह है कि इसमें अविवाहित लड़कियों की भी बड़ी संख्या सामने आ रही है, जो पैसों की खातिर बिन ब्याही मां बनने को भी तैयार हैं. अभी भी देश में बिन ब्याही मां बनना समाज के लिए कलंक माना जाता है. पर अब चंद रुपयों की खातिर लड़कियां घर से महीनों दूर रहकर कोख किराए पर देने जैसा जोखिम भरा काम कर रही हैं. जब इस तरह की लड़कियों से ऐसा करने की वजह पूछी जाती है तो सबका अलग-अलग जवाब होता है. अपना पूरा भविष्य दांव पर लगाने को तैयार ये लड़कियां बड़ी बेबाकी से कहती हैं कि भविष्य की कोई गारंटी नहीं है.


आज हमें कुछ महीनों में ही लाखों रुपए मिल रहे हैं, वो भी बग़ैर कोई ग़लत क़दम उठाए, तो फिर इसमें हर्ज़ क्या है? बुंदेलखंड की रमा (परिवर्तित नाम) की बचपन में ही शादी हो गई. गौने से 3 महीने पहले ही पति ने दूसरी शादी कर ली. अब वह आत्मनिर्भर होना चाहती है, लेकिन इसमें ग़रीबी आड़े आ रही है. विभा ने इसके लिए सरोगेट मदर बनने का रास्ता चुना. इसी तरह सुनीता (परिवर्तित नाम) के माता-पिता की मृत्यु हो गई है. अब वह एक ऑफिस में रिसेप्शनिस्ट है. पर इस नौकरी से वह संतुष्ट नहीं है.

उसने आत्मनिर्भर होने के लिए सरोगेट मदर बनने का निर्णय लिया है. जब उससे यह पूछा गया कि क्या उसे ऐसा करने में समाज से डर नहीं लगता है. तो उसने कहा, जब मुझे भूख लगती है तो कोई पुछने नहीं आता, ऐसे में डरे किससे? क्या उस समाज से डरूं, जो मेरी मदद नहीं कर सकता. इस तरह न जाने कितनी लड़कियां है, जो अपनी जिम्मेदारी और इच्छाओं की पूर्ति के लिए अपनी कोख का सौदा कर रही हैं. आगरा की झुग्गी बस्ती में काम करने वाले एक ग़ैर सरकारी संगठन ने क़रीब एक साल पहले एक सर्वेक्षण कराया. इस सर्वे में यह बात सामने आई थी कि वहां की अधिकांश महिलाएं मजबूरी में किराए की कोख पालती हैं.

 कुछ महिलाएं घरवालों की मर्ज़ी से ऐसा कर रही हैं. उन महिलाओं का दर्द असहनीय था, जो चुपके -चुपके  ऐसा करते पाई गईं. वह घरवालों को बता नहीं सकतीं. पति कमाता नहीं है, इसलिए बिना बताए ही किसी धनवान जोड़े के लिए बन जाती हैं सरोगेट मदर. ऐसी महिलाओं को समाज की भी चिंता रहती है. अपने पास रह रही औलाद की भी चिंता कचोटती रहती है. फिर भी दूसरों की औलाद को पैदा होने से पहले पालती हैं. अब आपको बताते हैं कि यह कारोबार कैसे होता है. सरोगेट मदर को अपनी कोख की कितनी क़ीमत मिलती है और कैसे यह बुंदेलखंड तक पहुंचता है. दरअसल, सरोगेट मदर की खोज के लिए पहले डॉक्टर की सलाह ली जाती है, फिर विभिन्न अ़खबारों में और आज-कल तो इंटरनेट पर भी सरोगेट मां की खोज की जाती है.

 उसके  बाद महिला की पूरी मेडिकल जांच की जाती है कि कहीं उसे कोई रोग तो नहीं है. सरोगेट मां की उम्र अमूमन 18 साल से 35 साल के बीच होती है. सरोगेट मां का सारा खर्च वही लोग उठाते हैं, जिन्हें बच्चा चाहिए और रही बात क़ीमत की तो, किराए पर कोख लेने का खर्च भारत में जहां तीन-चार लाख तक होता है, वहीं दूसरे देशों में कम से कम 35-40 लाख रुपए तक खर्च आता है. वजह सा़फ है कि क्यों विदेशी भारत कर रुख कर कर रहे हैं. इसके अलावा बांझपन भी सरोगेसी की एक बड़ी वजह मानी जाती है. बांझपन के  कारण महिलाएं भी अपने पति का इस कृत्य में साथ देने को तैयार हो जाती हैं. भारत के दक्षिणी इलाक़ों से शुरू हुआ यह कारोबार बुंदेलखंड जैसे इलाक़े तक पहुंच गया है. हालांकि बीच-बीच में खबरें आती रहती हैं कि सरकार इस कारोबार को नियंत्रित रखने के लिए कई प्रावधान बना रही है, लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा है. विशेषज्ञों के मुताबिक़ भारत में सरोगेसी इसलिए भी आसान है, क्योंकि हमारे यहां अधिक क़ानून नहीं हैं, और जो हैं उनकी नज़र में यह मान्यता प्राप्त है. यही वजह है कि आज सरोगेसी एक विवादास्पद मुद्दा बनता जा रहा है.



ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें सरोगेट मदर ने बच्चा पैदा होने के बाद भावनाओं के आवेश में आकर बच्चे को उसके क़ानूनी मां-पिता को देने से इंकार कर दिया. इसके अलावा सबसे ज़्यादा गंभीर मामले तब पैदा होते हैं, जब सरोगेट मां की कोख से पैदा हुआ बच्चा विकलांग हो या फिर करार एक बच्चे का हो और जुड़वा बच्चे हो जाएं. ऐसे में जेनेटिक माता-पिता बच्चे को अपनाने से इंकार करने लगते हैं. साथ ही भारत में एक बात और विवाद का विषय है. वह है विदेशी ग़े-दंपतियों को बच्चा कैसे दिया जाए? टेस्ट ट्यूब बेबी सेंटर के एक संचालक कहते हैं कि कोख किराए पर देने वाली महिलाओं की संख्या ब़ढने की असली वजह, इनके लिए उपलब्ध मार्केट है. वहीं उच्च वर्ग की महिलाएं अपने फिगर को मेंटेन रखने, गर्भपात होने से पैदा होने वाली परेशानियों से बचने के लिए सरोगेट मदर की मदद लेना ज़्यादा बेहतर समझती हैं. गर्भधारण का अनुभव प्रमाण सहित होना ज़रूरी है. इसके लिए विवाहित होने की बाध्यता नहीं है. अविवाहित लड़िकयां भी गर्भधारण का अनुभव होने पर सरोगेट मदर बन सकती हैं. हालांकि इसमें विवाहिता के पति की अनुमति ज़रूरी है.

 अविवाहिता और तलाकशुदा के लिए केवल उसकी अपनी मर्ज़ी ही का़फी है, जबकि तलाक के लंबित मामलों में महिला कोख किराए पर नहीं दे सकती. महिला को ऐसी कोई बीमारी न हो, जिसके बच्चे में स्थानांतरित होने की आशंका हो और उसकी उम्र 21 से 45 साल के बीच हो. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च डॉ. आर.एस. शर्मा की मानें तो सरोगेट मांओं का स्वास्थ्य चिंता का विषय है. हालांकि इस कारोबार का कुछ लोग सकारात्मक पहलू भी निकालते हैं. डॉक्टर पटेल के मुताबिक गर्भ धारण न कर पाना किसी भी दंपत्ति के लिए बहुत दुखद होता है. इसके लिए सरोगेसी एक अच्छा ज़रिया है.




लेकिन अब भारत सरकार सरोगेसी के इर्द-गिर्द कुछ नियम बनाने वाला है. क्योंकि इस कारोबार के बढ़ने के साथ-साथ इसमें होने वाली कुछ गड़बड़ियों को भी बढ़ावा मिल सकता है. सरकार तो खैर इन नियमों में समय-समय पर संशोधन करती रहेगी, लेकिन तब तक बुंदेलखंड में इस तरह के मामलों के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाएगा. क्योंकि यह मसला इतना साधारण नहीं है जितना इसे समझा जा रहा है. क्योंकि अगर बुंदेलखंड की ज़्यादातर महिलाएं और लड़कियां अपनी-अपनी मजबूरी का वास्ता देकर शॉर्टकट में पैसे कमाने के इस कारोबार के जुड़ जाएंगी तो परिणाम घातक होंगे. इससे न स़िर्फ सामाजिक ढांचा बिगड़ेगा बल्कि जान का भी जोखिम होगा. 

Thursday, January 13, 2011

काल कोठरी में खत्‍म होता बचपन



कहते हैं, क़ानून अंधा होता है. इसके इस अंधेपन की वजह से कितने लोगों की ज़िंदगियों में अंधेरा छा जाता है, इसका जीता-जागता उदाहरण बिहार के मुंगेर ज़िले का मनोज कुमार सिंह है. यह शख्स पिछले तेरह सालों से मंडल कारा मुंगेर की काल कोठरी में उस सज़ा को भुगत रहा है, जो उसके लिए है ही नहीं.

उसकी सज़ा लगभग दस साल पहले ही खत्म हो चुकी थी, लेकिन राज्य सरकार की लापरवाही, लालफीताशाही और क़ानूनी दांव-पेचों के चलते जेल में बंद वह आज भी अपनी रिहाई की बाट जोह रहा है. खानापूर्ति के लिए राज्य सरकार, राज्य सलाहकार बोर्ड, ज़िला सलाहकार बोर्ड, राज्य एवं ज़िला बाल संरक्षण इकाई जैसी कई संस्थाएं गठित की गई हैं, लेकिन सभी अपनी ज़िम्मेदारी को दूसरे के सिर डाल कर पल्ला झाड़ लेती हैं. इन सबका अब तक का यही काम है कि इन्होंने 10 वर्षों में मात्र तीन किशोर बंदी रिहा कराए हैं.

 इसके अलावा अन्य विचाराधीन किशोर बंदियों को रिहाई कब नसीब होगी, इसका जवाब किसी के पास नहीं है. मामला स़िर्फ इस तरह के ज़ुर्म में सजायाफ्ता किशोर बंदियों का ही नहीं है, बल्कि उनका भी है, जो अन्य कई मामलों में जेल में बंद हैं. दहेज उत्पीड़न के मामलों (डाउरी एक्ट 498 ए) में परिवार समेत उन दुधमुंहे बच्चों को भी जेल में डाल दिया जाता है, जो 18 साल तो क्या, 18 महीनों के भी नहीं होते. तो क्या तब किशोर न्याय अधिनियम की खुलेआम धज्जियां नहीं उड़तीं? 22 फरवरी, 1997 से जेल में बंद मनोज सज़ा के समय किशोर (16 वर्ष 5 माह) था और किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम 2002 की धारा 15 के तहत किसी भी किशोर, जिसकी उम्र 18 साल से कम हो, को अधिकतम तीन वर्ष की सज़ा होती है. इस हिसाब से मनोज की रिहाई तीन साल में हो जानी चाहिए थी.

चूंकि वारदात के समय उसकी उम्र 16 वर्ष 5 माह थी और किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम 1986 के तहत 16 साल की उम्र तक के बच्चों को ही बाल कैदी माना जाता है, इस हिसाब से उसे बाल क़ैदी नहीं माना गया और हत्या के जुर्म में आजीवन कारावास की सज़ा हुई थी, लेकिन 2002 के संशोधन के बाद बाल क़ैदी की उम्र 18 वर्ष कर दी गई है.

 मुंगेर के थाना तारापुर के लौंगाय गांव के मनोज कुमार उ़र्फ अमित कुमार मधुकर को हत्या के इल्ज़ाम में 4 फरवरी, 1986 को आजीवन कारावास की सज़ा हुई. इसके बाद वह पटना हाईकोर्ट तक अपील करते हुए ज़मानत पर रहा, लेकिन 22 फरवरी, 1997 को उसे जेल जाना पड़ा. तेरह सालों से काल कोठरी में सज़ा काट रहे मनोज को तीन साल बाद यानी 2000 में रिहा हो जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. कहने को इस अधिनियम को लचीला और कल्याणकारी बनाने के लिए केंद्र सरकार समय-समय पर संशोधन करती रही है, ताकि अधिक से अधिक कारा संसीमित दोषसिद्ध किशोर खुली हवा में सांस ले सकें और समाज की मुख्यधारा से जुड़कर देशहित में कुछ योगदान दें,

 लेकिन यह सब कागजों में ही सिमट कर रह जाता है. कई बंदी हैं, जो आज भी रिहाई की आस में हैं. जब एक जागरूक वकील एवं सामाजिक कार्यकर्ता ओम प्रकाश पोद्दार ऐसे मामलों की पड़ताल करते हैं तो पता चलता है कि मनोज जैसे कई किशोर और भी हैं, जो अपना बचपन न जाने कब खो चुके हैं. इस मामले पर पोद्दार ने राज्य गृह विभाग, समाज कल्याण विभाग और राज्य मानवाधिकार आयोग में भी गुहार लगाई है. इस बाबत जब किशोर न्याय परिषद, मुंगेर जेजे वार्ड से जवाब मांगा गया तो उसने भी जवाबदेही से मुंह फेर लिया. राज्य कारा प्रशासन और सलाहकार परिषद को भी इससे कोई वास्ता नहीं है. हालांकि 10 जून, 2008 में राज्य सलाहकार परिषद का गठन हुआ, जिसकी पहली बैठक 16 जुलाई, 2008 को हुई. इसमें प्रस्तुत 9 मामलों में 6 पर विचार करने के बाद 3 लोगों को दोषमुक्तकरार देकर रिहा करने का प्रस्ताव पारित हुआ. इन रिहा हुए तीन किशोर बंदियों में पटना के डॉक्टर उत्पलकांत के पुत्र सिद्धार्थ, अरिणित दास केंद्रीय कारा बेउर पटना और जितेंद्र सिंह शामिल हैं. ग़ौरतलब है कि इन तीनों किशोर बंदियों को मुक्त करने का आधार इनकी उम्र का 18 वर्ष से कम होना था. ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब इन तीन किशोरों को आज़ाद किया गया, तो फिर मनोज को रिहाई क्यों नहीं मिली?


 खानापूर्ति के लिए राज्य सरकार, राज्य सलाहकार बोर्ड, ज़िला सलाहकार बोर्ड, राज्य एवं ज़िला बाल संरक्षण इकाई जैसी कई संस्थाएं गठित की गई हैं, लेकिन सभी अपनी ज़िम्मेदारी को दूसरे के सिर डाल कर पल्ला झाड़ लेती हैं. इन सबका अब तक का यही काम है कि इन्होंने 10 वर्षों में मात्र तीन किशोर बंदी रिहा कराए हैं. इसके अलावा अन्य विचाराधीन किशोर बंदियों को रिहाई कब नसीब होगी, इसका जवाब किसी के पास नहीं है. मामला स़िर्फ इस तरह के ज़ुर्म में सजायाफ्ता किशोर बंदियों का ही नहीं है, बल्कि उनका भी है, जो अन्य कई मामलों में जेल में बंद हैं. दहेज उत्पीड़न के मामलों (डाउरी एक्ट 498 ए) में परिवार समेत उन दुधमुंहे बच्चों को भी जेल में डाल दिया जाता है, जो 18 साल तो क्या, 18 महीनों के भी नहीं होते. तो क्या तब किशोर न्याय अधिनियम की खुलेआम धज्जियां नहीं उड़तीं? हाल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक़, भागलपुर के महिला कारा मंडल में महिला क़ैदियों की संख्या 73, सजायाफ्ता क़ैदी 54, विचाराधीन 19 और उनके साथ 8 बच्चे भी शामिल हैं. ग़ौरतलब है कि इनमें से ज़्यादातर बच्चे दहेज उत्पीड़न मामले में ही परिवार के साथ बंदी हैं. अब इसमें इन बच्चों का क्या कसूर है? 

Thursday, December 30, 2010

साइना की साइनिंग रहे बरकरार



एक दौर था, जब टेनिस की दुनिया में भारत का नाम लेने वाला कोई नहीं था. अमृतराज के अलावा टेनिस में शायद ही कोई नाम हो, जिसकी वजह से भारत का नाम अंतरराष्ट्रीय खेल परिदृश्य में उभरा हो. व़क्त गुजरा और सानिया एवं साइना ने टेनिस वर्ल्ड में पदार्पण किया. इनके क़दम रखते ही ग्लैमर ने भी इस खेल में ज़बरदस्त घुसपैठ की. ग्लैमर के तड़के ने सानिया मिर्जा को तो अर्श से फर्श पर लाकर खड़ा कर दिया, लेकिन साइना अभी भी इस चक्रव्यूह से बाहर हैं. न स़िर्फ बाहर है, बल्कि उनका प्रदर्शन भी दिनोंदिन बेहतर होता जा रहा है. खेल के कई बड़े पुरस्कारों से नवाजी जा चुकीं 20 वर्षीय साइना इस समय भारत की सबसे सफल महिला खिलाड़ी हैं. जिस तरह उन्होंने हांगकांग सुपर सीरीज बैडमिंटन खिताब अपने नाम कर एक बार फिर विश्व बैडमिंटन रैंकिंग में दूसरे पायदान पर जगह बनाई है, वह काबिले तारी़फ है. ग़ौरतलब है कि साइना हांगकांग टूर्नामेंट से पहले दो स्थान गिरकर चौथे स्थान पर पहुंच गई थीं, लेकिन फिर से हांगकांग के एक कड़े मुक़ाबले मेंबाज़ी मारकर उन्होंने अपनी रैंकिंग में दो स्थान का सुधार किया और फिर से दूसरे पायदान पर पहुंच गईं. बीते साल के बेहतर प्रदर्शन को बरक़रार रखते हुए उन्होंने 2010 में पांच खिताबों और देश के सर्वोच्च खेल पुरस्कार राजीव गांधी खेल रत्न को अपनी झोली में डाला.

लेकिन यहां ग़ौर करने वाली बात यह है कि उन्हें यह सफलता यूं ही नहीं मिल गई है. इस सफलता की कहानी लिखने में कड़ी मेहनत और लंबे संघर्ष की स्याही छिपी हुई है. 17 मार्च, 1990 को हरियाणा के  हिसार में जन्मी साइना आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद में पली-बढ़ी हैं. उनका बैडमिंटन प्रशिक्षण सात साल की उम्र में ही हैदराबाद के लाल बहादुर स्टेडियम में शुरू हो गया था. उनके माता-पिता भी हरियाणा की तऱफ से बैडमिंटन खेलते थे. ज़ाहिर है, उनके असर से साइना अछूती नहीं रहीं. वह कहती हैं कि मेरे माता-पिता ने मुझे एक बेहतर खिलाड़ी बनाने में जितनी मेहनत की है, अच्छे प्रदर्शन के बल पर वह उसे सफल करना चाहती हैं. ग़ौरतलब है कि साइना के पिता हरवीर सिंह हैदराबाद के डायरेक्ट्रेट ऑफ ऑयल सीड्‌स रिसर्च में वैज्ञानिक हैं. पिता हरवीर सिंह के  मुताबिक़, साइना जिस स्टेडियम में प्रैक्टिस करने जाती थी, वह घर से 20 किलोमीटर की दूरी पर था. ट्रेनिंग सेशन के  बाद साइना को स्कूल भी जाना होता था. ऐसे में मैं उसे रोज स्कूल छोड़ने और ले आने के लिए 50 किलोमीटर स्कूटर चलाकर जाता था. बीते दिनों को याद करते हुए वह कहते हैं कि एक्स्ट्रा ट्रेनिंग सेशन शुरू होने के  बाद हर दिन साइना पर 150 रुपये का ख़र्च गाड़ी-भाड़ा पर आता था. इसके अलावा रैकेट एवं जूते आदि ख़रीदने पर भी ख़र्च होता था. इस तरह हर महीने उस पर 12 हज़ार रुपये ख़र्च होने लगे. चूंकि उस समय इतनी बड़ी राशि ख़र्च करना मेरे लिए मुश्किल था, सो इस ख़र्चे को मैनेज करने के लिए मुझे अपने प्रॉविडेंट फंड से पैसे भी निकालने पड़े. कभी-कभी साइना की खेल संबंधी ज़रूरतें पूरी करने के  लिए 30 हज़ार रुपये तो कभी एक लाख रुपये तक निकालने पड़े. इसी तरह न जाने कितने संघर्ष के रास्तों से गुजर कर साइना इस मुक़ाम तक पहुंची है.



हालांकि साइना अभी अपने लक्ष्य से थोड़ा दूर हैं. उनका अंतिम लक्ष्य विश्व रैंकिंग में एक नंबर के पायदान पर पहुंचना है. अगर थोड़ा पीछे जाकर देखें तो साइना ने 2006 में विश्व बैडमिंटन जगत में अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी थी. यह वह दौर था, जब उन्होंने फिलीपींस ओपन प्रतियोगिता जीती. बीजिंग में आयोजित ओलंपिक खेलों में वह अंतिम आठ में जगह बनाने वाली पहली भारतीय महिला बैडमिंटन खिलाड़ी भी बनी थीं. उसके  बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और तबसे अभी तक विश्व बैडमिंटन रैंकिंग में लगातार ऊपर की ओर ही बढ़ती जा रही हैं. हालांकि उनके सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं. इन चुनौतियों में कड़ी प्रतियोगिताएं हैं, साथ ही सफलता का गुरूर, ग्लैमर की चकाचौंध और पेज थ्री पार्टियां भी हैं. अगर इन सबसे साइना बची रहती हैं तो फिर खेलप्रेमियों का आशीर्वाद और उम्मीदें उनके साथ हैं.


साइना में ओलंपिक मेडल जीतने की क्षमता है. उसने अभी अपना करियर ही शुरू किया है. वह कम से कम दो और ओलंपिक में हिस्सा लेगी. दिनोंदिन उसका खेल और धारदार होता जा रहा है.

-पी गोपीचंद, साइना के कोच एवं पूर्व बैडमिंटन चैंपियन


साइना कई वर्षों से किसी पार्टी, रेस्तरां या सिनेमाहॉल में नहीं गई थी. जब पहली बार मीडिया वाले मेरे घर पर एक कार्यक्रम शूट करने आए तो मैं मिठाई भी नहीं खिला सका.

-हरवीर सिंह, साइना के पिता

Tuesday, November 16, 2010

सूफी सैय्यद जिलानी कत्ताल का अयोध्‍या दौरा : अमन की राह पर एक सार्थक पहल





जहां एक तरफ सुन्नी व़क्फ बोर्ड और विभिन्न हिंदू संगठनों ने अयोध्या मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का मन बना लिया है, वहीं दूसरी ओर इस मामले को अदालत से बाहर सुलझा लेने की कोशिशें भी जारी हैं. अच्छी बात यह है कि यह प्रयास हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्म के धर्मगुरुओं, विद्वानों एवं हाशिम अंसारी जैसे आम नागरिक की तऱफ से किए जा रहे हैं. ये नेक नीयत वाले लोग हैं, जो इस मसले को आपसी सद्भाव, सौहार्द्र और बातचीत से सुलझाने की कोशिशों में लगे हुए हैं. ऐसी ही एक कोशिश अक्टूबर की 26 तारी़ख को देखने को मिली, जिसके तहत श्री राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण न्यास के अध्यक्ष रसिक पीठाधीश्वर महंत जन्मेजय शरण और वर्ल्ड सूफी काउंसिल के चेयरमैन सूफी सैय्यद जिलानी कत्ताल ने मिलकर बैठक के ज़रिए अयोध्या मसले को निपटाने की बात कही.

सैय्यद मोहम्मद जिलानी के अयोध्या आगमन के बाद हुई इस पहल में रामनगरी के कई धर्माचार्य शामिल हुए. ग़ौरतलब है कि रसिक पीठाधीस्वर महंत जन्मेजय शरण सूफी सैय्यद जिलानी कत्ताल के साथ मिलकर दस वर्षों से भारत के कोने-कोने में सद्भाव यात्रा के माध्यम से शांति, अमन और सौहार्द्र का पैग़ाम दे रहे हैं. भक्ति आश्रम के महंत राम प्रिया शरण की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में बड़ा भक्तमाल के महंत कौशल किशोर दास, आचार्य राम टहल शरण वेदांती, सुतीक्ष्ण आश्रम के महंत जगदेव शरण, स्वामी पराकुंशाचार्य के अलावा आल इंडिया प्रियंका-राहुल गांधी फोरम के प्रदेश सचिव नारायण मिश्र, जिलाध्यक्ष मधुबन दास एवं कांग्रेस के ज़िला उपाध्यक्ष बालकृष्ण गोस्वामी भी मौजूद थे. महंत जन्मेजय शरण ने जानकी घाट स्थित बड़े स्थान मंदिर परिसर में आयोजित शांति सौहार्द्र वार्ता में उपस्थित संत समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि देश की अखंडता बनी रहेगी तो इस मामले का हल अपने आप हो जाएगा.


 महंत जन्मेजय शरण ने जानकी घाट स्थित बड़े स्थान मंदिर परिसर में आयोजित शांति सौहार्द्र वार्ता में उपस्थित संत समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि देश की अखंडता बनी रहेगी तो इस मामले का हल अपने आप हो जाएगा. उन्होंने कहा कि हम लोग देश के अलग-अलग इलाक़ों में सद्भावना स्थापित करने के साथ बातचीत के जरिए मसले के समाधान में जुटे हैं. देशवासियों की ओर से भी इस दिशा में सकारात्मक समर्थन मिला है. सूफी सैय्यद जिलानी जब अयोध्या पहुंचे तो वहां उन्होंने जन्मेजय शरण और अन्य संत-महंतों के साथ रामलला के दर्शन किए. उसके बाद वह गुरुद्वारा ब्रह्मकुंड गए, जहां उन्होंने माथा टेका. वर्ल्ड सूफी काउंसिल के चेयरमैन सूफी सैय्यद जिलानी ने कहा कि चाहे कश्मीर हो या अयोध्या, सभी मसलों का हल आपसी बातचीत से ही संभव है. फिर हम आपस में क्यों लड़ें? जरूरत तो इस बात की है कि इस दिशा में सार्थक पहल की जाए और लोग इसमें अपनी भरपूर भागीदारी करें.


इससे देश की एकता और अखंडता मज़बूत होगी. कोई भी मजहब खूऩखराबे की इजाज़त नहीं देता. फिर मंदिर-मस्जिद के नाम पर खून क्यों बहाया जा रहा है? अगर हम ही नहीं रहेंगे तो मंदिर-मस्जिद में इबादत आ़खिर करेगा कौन? इस्लाम गले लगाने का हिमायती है और मज़हब से बड़ी इंसानियत है. अयोध्या मसले के समाधान में सभी समुदाय के लोगों का सहयोग ज़रूरी है. उन्होंने कहा कि सुप्रीमकोर्ट के बाद क्या होगा, आ़खिर वहां से वापस आकर भी बातचीत का ही रास्ता अपनाना पड़ेगा. जिलानी ने बैठक में कई महत्वपूर्ण बातें कहीं. उन्होंने कहा कि मोहम्मद साहब ने हमें इंसानियत का पाठ पढ़ाकर ग़ैर मजहबी लोगों को गले लगाने और पीड़ितों की मदद करने का संदेश दिया है. उन्होंने बाबरी मस्जिद के मुद्दई हाशिम अंसारी के प्रयासों की सराहना की और कहा कि समय मिला तो वह उनसे मिलने भी जाएंगे. सबसे पहले खुद को भारतीय बताते हुए सैय्यद जिलानी ने देश की तरक्की को सर्वाधिक महत्वपूर्ण बताया.

महंत जन्मेजय शरण ने कहा कि अयोध्या मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की जन्मस्थली है, लेकिन यहां अन्य धर्मों को भी बराबर सम्मान मिलता रहा है. हम हिंदू-मुस्लिम बाद में हैं, पहले इंसान हैं. हनुमानगढ़ी के नागा रामलखन दास ने अयोध्या मसले को राजनीतिक रंग देने वालों को इससेदूर रहने की सलाह दी. ज़ाहिर है, इन विद्वानों के नेक प्रयास इस बात के उदाहरण हैं कि हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी तहज़ीब आज भी ज़िंदा है, जो किसी भी सांप्रदायिक संगठन या राजनीतिक दल के खतरनाक़ मंसूबों को पूरा नहीं होने देगी. 

Thursday, October 28, 2010

नायकों को सलामः सोना मिला, सोने जैसे खिलाड़ी भी





38 स्वर्ण, 27 रजत और 36 कांस्य यानी कुल 101 पदक. यह है 19वें राष्ट्रमंडल खेल में भारत की तस्वीर. खेलों के आठ दशकों के इतिहास में पहली बार भारत ने राष्ट्रमंडल खेल में दूसरा स्थान हासिल किया. शानदार प्रदर्शन और खेलों के सफल आयोजन का सेहरा अपने-अपने सिर बांधने की प्रतिस्पर्धा में शीला दीक्षित और सुरेश कलमाडी की ज़ुबान थक नहीं रही है, लेकिन हम आपको इस सबसे एक अलग कहानी बताते हैं. यह कहानी है कॉमनवेल्थ के पोस्टर को फाड़कर निकले उन नायकों की, जिन्होंने पदकों की बौछार करने में अपना पसीना बहाया है. इनमें से ज़्यादातर नायक दूरदराज के गांवों में रहने वाले वे खिलाड़ी हैं, जिनके पास न तो बेहतर सुविधा है, न प्रशिक्षक हैं और न ही प्रायोजक. इनके सामने कई मुश्किलें थीं.

 घर की आर्थिक हालत जर्जर है, परिवारीजनों का समर्थन नहीं है,  रोजी-रोटी के लिए नौकरी करनी है. इसके बावजूद इन्होंने वह कर दिखाया, जो पिछले 80 सालों में कभी नहीं हुआ था. ये अपने दम पर खेले. भारत एवं भारतीयों को गर्व और ख़ुशियों की सौगात दी. कीर्तिमान यही खिलाड़ी बनाएंगे, जो सुविधारहित संसार से आए हैं. इन खिलाड़ियों के जज़्बे को सलाम. तीरंदाजी में सोना जीतने वाली 16 वर्षीय दीपिका कुमारी झारखंड के एक छोटे से गांव रतुचेती में रहती हैं. उनके पिता रांची में ऑटो रिक्शा चलाते हैं. इसके बावजूद खुद कुछ कर जाने की जिद ने दीपिका को इस मुकाम तक पहुंचाया. वहीं दस हज़ार मीटर की दौड़ में कांस्य पदक जीतने वाली कविता राउत नासिक के एक गांव से हैं.

 उन्होंने धावक बनने का फैसला इसलिए किया ,क्योंकि वह नंगे पैर दौड़ सकती थीं. इतने पैसे नहीं थे कि जूते खरीद सकें. तैराकी में विकलांग खिलाड़ी प्रशांत ने दिखाया कि बिना सुविधाओं के अगर वह कांस्य जीत सकते हैं तो सुविधाएं मिलने पर क्या कर सकते हैं. हरियाणा में भिवानी के एक छोटे से गांव की गीता कुश्ती में स्वर्ण जीतने वाली पहली महिला रहीं. उनकी बहन बबीता 51 किलोग्राम फ्री स्टाइल कुश्ती में रजत मिलने पर कह रही थीं कि वह लाज नहीं रख पाईं. इसी तरह लंबी कूद में रजत पदक लेने वाली प्रजुषा के पिता त्रिचूर में रसोइया थे, लेकिन अब बेरोज़गार हैं. इस बेकारी की हालत में भी प्रजुषा के हौसले पस्त नहीं हुए. जिमनास्टिक में रजत और कांस्य पदक जीतने वाले आशीष कुमार और हॉकी में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ गोल करने वाले दानिश इलाहाबाद के हैं और बहुत ही साधारण पृष्ठभूमि वाले परिवारों से ताल्लुक रखते हैं.


इन दोनों ने इस भ्रांति को झुठलाया कि राष्ट्रमंडल में खेलने और जीतने के लिए किसी बड़े घराने का होना जरूरी है. ऐसा ही एक नाम मुक्केबाजी में भी आता है. छोटा टायसन के नाम से मशहूर मणिपुरी बॉक्सर सुरंजय सिंह भी साधारण परिवार से होने के बावजूद भारत को स्वर्ण पदक दिलाने में कामयाब रहे. मणिपुर से ही एक और भारोत्तोलक का नाम लेना बहुत ज़रूरी है. 58 किलोग्राम वर्ग में भारोत्तोलन में देश की झोली में स्वर्ण डालने वाली रेणु बाला का करियर कई कठिन रास्तों और लंबे संघर्ष से गुज़रा है. बताते हैं कि वह संघर्ष के दिनों में बस कंडक्टर का काम भी कर चुकी हैं. यहां तक पहुंचने में उनके जज़्बे का ही कमाल है.


64 किलोग्राम वर्ग की मुक्केबाजी में मनोज कुमार ने भी भारत को स्वर्ण से नवाज़ा. ऐसे ही कई नाम हैं, जिन्होंने बगैर सुविधा और सहयोग के देश को कई पदक दिलाए. मसलन मुक्केबाजी में परमजीत समोटा, कुश्ती में सुशील कुमार, सेंटर फायर पिस्टल में हरप्रीत सिंह, कुश्ती में ही अनिल कुमार, अनीता और अलका. स्वर्ण की बात हो और हरियाणा का नाम न आए, नामुमकिन है. ज़्यादातर विजेता खिलाड़ी हरियाणा से हैं. कुछ लोग तो राष्ट्रमंडल खेलों को हरियाणा का खेल तक कह रहे हैं. ग़ौर करने वाली बात है कि तीरंदाजी, जिमनास्टिक और पैरा स्वीमिंग में भारत को इससे पहले राष्ट्रमंडल खेलों में पदक नहीं मिला. इनमें पदक जीतने वाले ज़्यादातर विजेता अनजान गांवों और क़स्बों से आए हैं.


दूसरी सबसे बड़ी बात है कि ये खिलाड़ी उन खेलों में पदक ला रहे हैं, जो ग्लैमरस स्पर्धाओं की श्रेणी से बाहर है. यह संतोष की बात है कि गांवों में रहने वाले सुविधाहीन खिलाड़ियों ने कई पदक जीते हैं, लेकिन असल समस्या यह है कि इन खेलों के बाद हम उन्हें फिर भुला देंगे. हरियाणा एवं झारखंड सरकार से सबक लेते हुए केंद्र और अन्य राज्य सरकारों को चाहिए कि वे इन खिलाड़ियों को उचित सुविधा देकर ओलंपिक के लिए तैयार करें. अगले राष्ट्रमंडल खेल स्कॉटलैंड में होंगे. हमें यह मानकर चलना चाहिए कि यह तो महज़ शुरुआत है, अभी कई कीर्तिमान बनाने बाकी हैं और ये कीर्तिमान यही खिलाड़ी बनाएंगे, जो सुविधा और सहयोगरहित संसार से आए हैं. बहरहाल, इन खिलाड़ियों के जज़्बे को सलाम. 

Thursday, September 30, 2010

सामुदायिक रेडियो: आखिर किसके लिए






हाल ही में केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी नेे 2012 तक देश भर में चार हज़ार से अधिक सामुदायिक रेडियो स्टेशन खोलने की घोषणा की. हमेशा की तरह जनहित में एक और योजना घोषित हो गई, पर शायद अंबिका जी को पता नहीं है कि इस देश में योजनाओं की घोषणा करना जितना आसान है, उन्हें कार्यान्वित कर पाना उससे कहीं ज़्यादा मुश्किल है. मंत्री जब भी किसी क्षेत्र के दौरे पर होते हैं या मीडिया से मुखातिब होते हैं, घोषणाओं की एक लंबी फेहरिस्त जारी कर देते हैं. इसके बाद मीडिया और सरकार का काम पूरा हो जाता है और इन योजनाओं का क्रियान्वयन भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है. फिर भले ही इन योजनाओं को व्यवसायिक संस्थान अपने तरीके से तोड़- मरोड़ कर निजी स्वार्थों के लिए प्रयोग करें. सामुदायिक रेडियो यानी कम्युनिटी रेडियो की भी यही कहानी है. विकास से वंचित और पिछड़े समुदायों को ब़ढावा देने के लिए शुरू किए गए सामुदायिक रेडियो स्टेशन भी व्यवसायिक कंपनियों की कमाई का ज़रिया बनते जा रहे हैं.

एक ग़ैर सरकारी आंकड़े के मुताबिक, कम्युनिटी रेडियो के ज्यादातर लाइसेंस प्राइवेट सेक्टर के गिने-चुने मीडिया ग्रुपों को ही दिए गए हैं. पिछले साल तक सरकार ने एफएम चैनल चलाने के लिए अलग-अलग राज्यों के लगभग 100 शहरों में विभिन्न कंपनियों को लगभग 350 लाइसेंस बांटे. इस बंदरबांट में लाइसेंस बड़े संस्थानों की ही झोली में गए और छोटे समूह अपनी जगह भी नहीं बना पाए यानी उन्हें कोई भागीदारी नहीं मिली. रेडियो के इस कारोबार को विदेशी कंपनियां अपने कब्जे में लेने के लिए उतावली हैं. लाभ कमाने के लिए बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश के लिए मीडिया संस्थान आगे आ रहे हैं और इसके लिए सामुदायिक रेडियो के नाम पर एफएम को प्रोत्साहित किया जा रहा है.

सब जानते हैं कि रेडियो में विज्ञापन कमाई का एक बहुत बड़ा जरिया है. जबकि भारत सरकार ने 2002 में आईआईटी/आईआईएम सहित सुस्थापित शैक्षणिक संस्थानों में सामुदायिक रेडियो को स्थापित करने के लिए लाइसेंस प्रदान करने हेतु एक नीति अनुमोदित की थी. बाद में पुनर्विचार करते हुए सरकार ने अब विकास और सामाजिक परिवर्तन से संबधित मुद्दों पर और अधिक भागीदारी की अनुमति देने के उद्देश्य से सिविल सोसाइटी एवं स्वैच्छिक संगठनों को अपने सीमा क्षेत्र के अंतर्गत लाकर इस नीति को विस्तार दिया. इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सामुदायिक रेडियो को चलाने के इच्छुक संगठन ग़ैर लाभकारी संगठन के रूप में गठित होने चाहिए. इसके अलावा सामुदायिक रेडियो चलाने के लिए सरकार मुफ्त में लाइसेंस देती है. बशर्ते इसमें करियर, व्यवसाय, महिला सशक्तिकरण, स्वास्थ्य, स्थानीय संगीत, खेल और स्थानीय मुद्दों पर आधारित कार्यक्रमों का प्रसारण किया जाए, लेकिन होता कुछ और है.


वर्ष 1991 के आसपास जैसे ही उदारीकरण के नाम पर बाजार खुला, देश में कई माध्यमों की अवधारणाओं का अंकुर फूट पड़ा. यह वह दौर था, जब प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सूचना का अधिकार जैसे माध्यम गांव तक बेअसर हो रहे थे. इन माध्यमों को प्रभावी बनाने के साथ-साथ बाज़ार में खड़ा करने की पुरजोर कोशिशों के बीच ही कम्युनिटी रेडियो की अवधारणा पनपी. अगर वैश्विक स्तर पर बात करें तो सामुदायिक रेडियो का बीज 1940 के दशक में लैटिन अमेरिका में पड़ा था और दक्षिण एशिया में नेपाल पहला देश है, जहां 1997 में सामुदायिक रेडियो की शुरुआत हुई. भारत में पहली बार सामुदायिक रेडियो की शुरुआत आकाशवाणी के सहभागी के तौर पर भुज (गुजरात) में हुई. लगभग 10 से 12 किमी तक की रेंज कवर करने वाले इस सामुदायिक रेडियो की जब नींव डाली गई थी, तब इसका मकसद ग्रामीण जनता की आवश्यकता, प्राथमिकता, समस्या, सुझाव और समाधान से जुड़ा था. शुरुआत में तो सब ठीक चला, लेकिन जैसे-जैसे निजी क्षेत्रों और बहुराष्ट्रीय संस्थानों का उदय हुआ, बड़े-बड़े व्यापारियों की मुनाफाखोर नज़रें रेडियो बाजार पर टिक गईं और सामुदायिक समस्याओं के निवारण के लिए बना यह साधन आज मनोरंजन का साधन मात्र बनकर रह गया है. इससे भी ज़्यादा चिंता का विषय यह है कि आज इसके नाम पर कई गतिविधियां बगैर सामुदायिक सहयोग से चल रही हैं. कम्युनिटी रेडियो में बतौर आरजे (रेडियो जॉकी) काम कर रहे सुशांत सिंह बताते हैं कि आज कम्युनिटी रेडियो में काम करने वाले कर्मचारी प्रशासनिक पहुंच के दम पर काम कर रहे हैं या फिर वे लाइसेंस धारक कंपनियों के फिरंगी रिश्तेदार हैं.

कुल मिलाकर जिस तबके के लोगों के सामाजिक, कलात्मक, रचनात्मक और आर्थिक विकास के लिए यह रेडियो शुरू किया गया था, वहां अब इसका नामोनिशान तक नहीं दिखता. हालांकि बिहार और हरियाणा के गांवों में चलने वाले कुछ सामुदायिक रेडियो आज भी अपने लक्ष्य की तऱफ बढ़ रहे हैं, पर इतना नाकाफी है. सरकारी ज़ुबान में बोलें तो सामुदायिक रेडियो का स्वरूप लोकतांत्रिक है, जिसमें हर व्यक्ति को बोलने, सुनने और जनहित के कार्यक्रम बनाने की पूरी आज़ादी है. इस माध्यम के ज़रिए ग्रामीणों और मूलभूत सुविधाओं से वंचित तबकों के विकास और सशक्तिकरण की राह खुलती है. इससे जुड़कर हम विकास से वंचित, उपेक्षित और सताए हुए लोगों की मुक्ति का माध्यम बनकर समुदाय में गुणात्मक परिवर्तन ला सकते हैं, लेकिन ऐसा कितने सामुदायिक रेडियो स्टेशनों में हो रहा है, यह शोध का विषय है.



राघव रेडियो का जिंदा रहना जरूरी

एक तऱफ सरकार सामुदायिक रेडियो स्टेशन के लाइसेंस के लिए इच्छुक संस्था को कई विभागों के चक्कर कटवाती है, वहीं बिहार के वैशाली जिले के मंसूरपुर में रहने वाले राघव महतो की कहानी चौंकाने वाली है. राघव ने बिना किसी सरकारी मदद के अपने दम पर कम्युनिटी रेडियो का संचालन किया है. राघव ने एक साल के दौरान इकट्ठे किए हुए यंत्रों और उपकरणों के साथ रेडियो स्टेशन शुरू किया था. यह स्टेशन मुजफ्फरपुर, वैशाली और सारण ज़िलों में एक सामुदायिक रेडियो सेवा संचालित करता था. इस पर स्थानीय बोली में स्थानीय ख़बरें, गीत, एड्स जागरूकता, पोलियो उन्मूलन, गुमशुदगी की खबरें, साक्षरता पहल से संबंधित कार्यक्रम और इलाक़े में हो रहे अपराधों की सूचना आदि का नि:शुल्क प्रसारण किया जाता था. राघव रेडियो की बढ़ती लोकप्रियता देख 2006 में केंद्रीय संचार मंत्रालय ने राघव से चैनल की वैधानिकता पर रिपोर्ट मांगी. लाइसेंस न होने पर ज़िला अधिकारियों ने भारतीय टेलीग्राफ क़ानून के उल्लंघन के आरोप में राघव रेडियो बंद कर दिया. इतना ही नहीं, राघव को दोषी मानकर कुछ समय के लिए गिरफ़्तार भी किया गया, लेकिन मंसूरपुर गांव के लिए वह हीरो था. कई संस्थानों की मदद से अब इस अशिक्षित युवक की प्रेरणादायी कहानी एनसीईआरटी की किताबों में शामिल की गई है. वर्तमान में राघव राजस्थान के अजमेर ज़िले में एक सामुदायिक रेडियो स्टेशन बेयरफुट कम्युनिटी रेडियो स्टेशन में परियोजना प्रमुख के तौर पर काम कर रहे हैं. अगर प्रशासन और सरकार राघव जैसी प्रतिभाओं का हौसला बढ़ाए तो कम्युनिटी रेडियो की परिकल्पना साकार होने से कोई नहीं रोक सकता, पर सरकार के रवैए से ऐसा लगता नहीं है.