Wednesday, June 19, 2013

शादी की शोपिंग हो शानदार




शादी हर कपल के लिए जीवन का सबसे यादगार लम्हा होता है. यह मौका एक बार आता है. इस दिन से जुड़े हर पहलू ताउम्र यादों के आइनों में जीवनभर सामने आते रहते हैं.  उस दिन क्या पहना था, क्या खाया था और कौन कौन शरीक हुआ था, तमाम बातें तसवीरों के जरिए उन बेहतरीन लम्हों की याद दिलाती रहती हैं.  सामान्य तौर पर शादी की तारीखें निर्धारित होते ही दूल्हादुल्हन के करीबी लोग शादी की तैयारियों और शोपिंग में जुट जाते हैं लेकिन जब कपल्स अपना बैंड बाजा बारात खुद बजा रहे हों तो भावी दूल्हादुल्हन खुद ही शादी की पूरी शोपिंग करने की चाहत रखते हैंें.
इसके दो कारण हैं. पहला तो यह कि कपल एक नए शहर में शादी करने की प्लानिंग कर अपने गार्जियन को इनवाइट करते हैं और दूसरा यह कि नई जेनरेशन अपने लिए आकर्षक परिधानों और फैशन से जुड़े हर चीज का चयन स्वयं करना चाहती है. असल में दोनों की यही इच्छा यही रहती है इस खास और शुभ दिन पर उनकी चमक खास अंदाज में सबके सामने आए. जाहिर है इस दिन हर लड़की सबसे खूबसूरत दिखना चाहती है जिससे सबकी नजरें उसी पर टिकी रहें. वहीं लडका भी सबसे हैंडसम दिखने की ख्वाहिश रखता है. वह भी शोपिंग में कोई कसर नहीं छोड़ता. इस लिहाज से दोनों के लिए शौपिंग के दौरान स्मार्टनेंस दिखानी जरूरी हो जाती है. यों तो शोपिंग के अलावा भावी दूल्हा दुल्हन ही वेडिंग प्लैनर, वेडिंग डेकोरेटर, फ्लोरिस्ट, कैटरर, मेहंदी आर्टिस्ट, ब्यूटीशियन और फैशन डिजाइनर हायर करते हें पर अभी बात शादी की षौंपिंग की.

शॉपिंग लिस्ट बनाएं
शादी की शोपिंग करना आसान नहीं होता वो भी कम समय में. ऐसे में काम आता है अपनेे जानकार व अनुभवी रिष्तेदारों का साथ जो इस तरह की शोपिंग पहले भी कर चुके होते हैं. इनके मार्गदर्शन से यह काम फट से हो जाता है. इनका परामर्श हमेशा फायदेमंद साबित होता है. जरूरत हो तो इन्हें साथ भी लेकर जाएं. सबसे पहले बाजार या मौल जाने से पहले आप शादी के सामान की सूची बनाएं. आमतौर पर लडकियां शोपिंग में ज्यादा माहिर होती हैं इसलिए उनकी मदद से से लिस्ट जल्दी बनाई जा सकती है. बरहाल इस में बहन, दोस्त से लेकर मां या मौसी किसी की भी मदद ली जा सकती है. चूंकि शोपिंग में कपड़ों, गहनों, ऐसेसीरीज, फुटवियर, मेकअप किट से लेकर हर तरह का सामान शामिल होता इसलिए लिस्ट बनाकर चलने से बाजार में समय की काफी बचत होती है. और खरीददारी के लिए कोई सामान छूटता भी नहीं है.

सस्ती और अच्छी शॉपिंग के ठिकाने
अक्सर लोग शादी में दिखावे की मानसिकता के तहत बेवजह की फिजूलखर्ची में पड़ जाते हैं. ऐसा बिलकुल नहीं है कि जो चीज मंहगी है वह अच्छी भी होगी और सस्ती खराब. अगर बाजार की सही समझ और शोपिंग की स्मार्टनेस हो तोे शादी के लिए लिमिटेड बजट में अच्छी शोपिंग की जा सकती है. हां, स्मार्ट और सस्ती शोपिंग के लिए अहम बात यह है कि आपको शोपिंग के सही ठिकाने पता हों. यो तो हर बड़े शहर में मौल और होल सेल मार्केट मौजूद हैं. फिर भी अगर दिल्ली की बात करें तों यहां हर मिजाज और बजट के शोपिंग डेस्टीनेशन हैं. मसलन सदर बाजार, चांदनी चैंक, लाजपत नगर, सरोजनी नगर, करोल बाग, रजोरी गार्डन, कमला नगर आदि. इन तमाम जगहों पर हर रेंज ओर स्टाइल की शादी शोपिंग संभव है.
शादी की खरीदारी के लिए दिल्ली में चांदनी चैक का नाम अव्वल है. यहां से ब्राइड के लिए लहंगे, साड़ी, ऐसेसीरीज और फुटवियर से लेकर दूल्हे के लिए सूट, शेरवानी, जूतियां और सेहरा सब आसानी से वाजिब दाम पर मिल जाता है. यहां की स्पेषिसलिटी यह है कि यहां ट्रेडिशनल और मौडर्न फैशन, दोनों तरह का सामान मिलता है. सूट और बाकी कपड़ों के लिए नील, नवाब, खुशहाल और नया कटरा आदि ऐसे कई कटरे और गलियां हैं, जहां 2000 रुपये से 30 हजार तक का सूट मिल जाएगा. अप्सरा, मीना बाजार, ओमप्रकाश जवाहर लाल आदि ऐसी मशहूर दुकानें हैं, जहां आपको एक से बढ़कर एक डिजाइनर साडि़यां मिल जाएंगी.
बसुधा अरोड़ा जिन्होंने अपनी शादी की शो पिंग खुद की बताती है कि इस तरह की चीजों के लिए चांदनी चैक सबसे मुफीद जगह है. यहां 150  से 1000 रूपए तक अच्छी साड़ी मिल जाती हैं जो रिष्तेदारी में लेनदेन के काम आ सकती हैं. इसी तरह 10 हजार से 12 हजार के बीच में वेंडिंग लहंगा भी यहां आसानी से मिल जाता हे जबकि इसी तरह का लहंगा किसी मोल या षोरूम में कम से कम 50 हजार का पड़ता है. यही हाल सूट और षेरवानी का भी है. इसके अलावा जो सूट मौल से 2 हजार से 5 हजार का मिलता है वही यहां पर 500 से 1 हजार का मिल जाता है. इसी तरी कौस्मेटिक 120 से 200 तक मिल जाएगा. वहीं आर्टिफिषियल ज्वैलरी भी 250 से 2500 तक बेहतरीन डिजाइन में मिलती हैं. इसके अलावा फुटवेयर्स, बैग, बेल्ट और अन्य सामान के लिए करोलबाग बड़ा बाजार है. यहां जूते और सैंडल अच्छी रेंज में आसानी से कम कीमत में मिलते है.
कमलानगर बाजार में हर किसी के बजट के मुताबिक सामान मिल जाता है. लाजपत नगर, साउथ एक्सटेंशन  में भी शादी की खरीदारी के लिए विशिष्ट बाजार हैं. हां ब्रांडेड स्टोर्स के लिए सीपी और साउथ एक्सटेंशन बेहतर रहेंगे. वहीं बार्गेनिंग के लिए जनपथ, लाजपत नगर, सरोजनी नगर मुफीद हैं.
तो अगर आप भी शादी के सामानों की खरीदारी की अपनी लिस्ट तैयार कर चुके हैं तो इन जगहों अपनी रुचि व पसंद के हिसाब से शानदार और यादगार शो पिंग कर सकते हैं. यहां न तो आपका बजट बिगड़ेगा और न ही किसी भी तरह की दिक्कत होगी. गौर करने वाली बात यह है कि खुल बाजारों और होल सेल मार्केट में किसी भी तरह की बारगेनिंग करने में बिलकुल भी संकोच न करें बल्कि खुलकर मोलभाव करें.


सेल में करें सस्ती शॉपिंग
शादी की षांपिंग अगर फेस्टिव सीजन के दौरान कर रहे हैं तो मौजा ही मौजा. इन दिनों बाजारों में सेल की बहार होती है. चूंकि शादी के दौरान कई रिष्तेदारों के  लिए भी ढेर सारा सामान खरीदना पड़ता है,  ऐसे में  सेल में 2 के साथ 3 मुफत वाली स्कीम बहुत कारगर होती हे. सेल पीरियड में कई ब्रांडेड स्टोर्स ग्राहकों को  लुभाने के लिए लुभावनी सेल स्कीम्स अनाउंस करते हैं. आप भी ब्रैंडेड ड्रेसेज डिस्काउंट या औफर में लेना चाहते हैं, तो इसका फायदा जरूर उठाएं. फिलहाल  दिल्ली के कई मौल्स में सूट, षेरवानी, टीशर्ट, जींस, शर्ट, जूते और लड़कियों के लिए साड़ी, लहंगे, मेकअप किट, स्कर्ट के अलावा बैग, कैप, बेल्ट औ फुटवियर्स वगैरह भी 30 से 40 प्रतिशत तक के डिस्काउंट पर आसानी से मिल जाएंगे.
किराये पर भी ले सकते हैं
मेरा व्यक्तिगत अनुभव है, मैंने अपनी शादी के मौके पर परिधानों की खूब मंहगी खरीदारी की. 10000 हजार के सूट तो 2 से 5 हजार के महंगे जूते भी खरीदे. इसी तरह मेरी पत्नी ने भी महंगे लहंे, सूट और चांदनी चैक से 20 हजार की कीमत वाली साडि़यां खरीदीं.  वर वे कपड़े अब सिर्फ अलमारियों में धूल खा रहे हैं. कहने का मतलब यह हैं कि शादी के बाद वे किसी काम के नहीं रहे. 10000 का सूट, 15000 की षेरवानी और 38000 का लंगहा ड्राई क्लीनिंग के बाद अलमारियों में सजा भर है. शादी को एक साल पूरा होने को है पर अभी तक उन में से एक भी परिधान को दोबारा पहनने का मौका नहीं मिला. सिर्फ एक दिन के लिए पहनने वाले कपड़ों पर इतना खर्च करना अब मुझे नागवार गुजर रहा है. असल में शादी के कपड़े कुछ इस तरह के डिजाइन किए होते हैं कि उन्हें अन्य फंक्षनों में पहना ही नहीं जाता. मुझसे से सबक लेते हुए अगर अगर आप अपना बजट नहीं बिगाड़ना चाहते तो तो किराये पर भी अपना मनपसंद ड्रेस ले सकते हैं. अमूमन लोग दो दिन के लिए लहंगा शेरवानी किराये पर लेते हैं जिसमें कुल खर्च 5 से 10000 हजार रुपए तक खर्च आता है. जबकि वही 15 से 25 हजार रुपए के प्राइज टैग वाली साड़ी के किराये के रूप में दो से चार हजार रुपये का भुगतान करना पड़ता है.  किराए पर ड्रेसेज देने वालों की दुकानें दिल्ली में कई जगहों पर हैं मसलन वेस्ट पटेल नगर, चांदनी चैक, पीतमपुरा और राजौरी गार्डन में किराए पर ये परिधान लिए जा सकते हैं.

औनलाइन हो सस्ती शॉपिंग
मेट्रो सिटी में शादी की शो पिंग के ढेरों विकल्प मौजूद हैं. होल सेल, ओपेन मार्केट व मौल्स के अलावा औनलाइन शो पिंग औप्षन का चलन भी आजकल जोरांे पर है.घर बैठे सपरिवार मिलकर हरके की पंसद के अनुसार ईपोर्टल पर सामान चुनांे और और्डर कर दो. कुड ही दिनों में होम डिलीवरी के जरिए सारा सामान आपके घर पर होगा. शो पिंग का इतना आसान तरीका और न भागदौड़ की जरूरत. इससे समय और पैसे दोनांे की बचत होती है. यो तो औनलाइन शो पिंग कंपनियां साल भर सस्ते औफर देती हैं पर त्योहारों में डिस्कांउट और बढ जाते हैं. महंगे और ब्रांडेड सामानों पर सामान्य तौर पर 15 से 25 फीसदी तक की छूट असानी से मिल ही जाती है. कंपटीशन को दखते हुए आजकर औनलाइन शो पिंग वैबसाइट खूब छूट देती हैं. फ्लपकार्ट, स्नैपडील, 99 लेबल्स डौट कौम, फैशन एंड यू डौट कौम, एक्सक्लूसिवली डौट इन, मिंत्रा डौट कौम, नापतौल डौट कौम, होम शो प 18 और स्टार सीजे लाइव आदि कुछ प्रमुख वेबसाइट हैं जहां से  शदी की बेहतरीन खरीददारी की जा सकती है. जिस रंग का सूट या फैबरिक चाहिए या फिर मेकअप किट सब यहां उपलब्ध हैैं. कपड़ों के अलावा बेल्ट, बैग, परफ्यूम और घड़ी जैसे सामानों पर औनलाइन पोटर्ल 50 फीसदी की छूट मिल जाती है. इनके पास देशीविदेशी कई ब्रांड मौजूद हैं, बस एक क्लिक की जरूरत है.
इस तरह से आप एक स्मार्ट शो पिंग के जरिए अपना बैंड बाजा और बारात बड़े धूमधाम से बजा सकती हैं.
                                                 

Tuesday, June 4, 2013

खेल खेल में गार्डनिंग का मजा



रोहित पिछली बार अपनी नानी के यहां छुटिटयां मनाने गया तो वहां उसने ढेर सारी मस्ती के साथसाथ नानी के बगीचे और टेरिस में बागवानी का भी भरपूर मजा लिया. दरअसल नानी ने जिस तरह से घर को रंग बिरंगे फूलों और पौधों से सजाया था, वो रोहित कोे बहुत अच्छा लगा. उसने भी नानी से कहां कि वे उसे बागवानी कराना सिखाएं जाकि  घर जाकर वह  भी अपने घर को हरियाली और फूलों की खुशबू से भर दे. छुटिटयां खत्म होते ही रोहित ने नानी के बताए टिप्स को जमकर आजमाया और घर की टेरिस, विंडों और छत को कई तरह के फूलों, बेलों और पौधों से सजा डाला. नानी की टिप्स की बदौलत रोहित ने अपने घर को तो महकाया है साथ ही पूरी सोसाइटी का चहेता भी बन गया है. इस तरह रोहित ने खेलखेल में बागवानी को हौबी के साथ साथ लर्न एंड फन का बेहतरीन माध्यम बना लिया.  अब उसके सारे दोस्त उससे बागवानी की टिप्स लेने आते हैं.  वह भी अपने दोस्तों व रिश्तेदारों से अपनी नानी की गार्डनिंग टिप्स शेयर करता है. आप भी ऐसा कर सकते हैं.
टीनेजर्स की उनके स्वाभाव के हिसाब से अलग अलग हौबी होती हैं. किसी को किताबों का तो किसी को डांस की हौबी होती है लेकिन कुछ हौबी ऐसी भी होती हैं जो षौक के साथ खेलने का मजा भी देती है. ऐसी ही हौबी है गाईनिंग यानी बागवानी. हम देखते हैं कि मेट्रो सिटीज में हरियाली बेहद ही मुश्किल से दिखाई देती है. जबकि किषारों का तो फेवरेट स्पौट हरा भरा पार्क ही होता है. जो किषोर अपने घर को ही पार्क जैसा हरा भरा बनाना चाहते हैं उनके लिए बागवानी के कुछ ऐसे तरीके हैं जो आपको आपको पर्फेक्ट गार्डनर और घर को ही पार्क और बगीचे जैसा बना देंगे.  सबसे पहले तो घर में ऐसी जगह ढूढे जहां छोटा सा गार्डन बनाया जा सके. अगर स्पेस की समस्या हो तो आप विंडो बॉक्स, बालकनी और टेरेस का इस्तेमाल कर सकते हैं. फिर घर में बेकार पड़ी बोतलों और बाल्टियांे को गमले की तरह प्रयोग में लाने के लिए उनमें मिटटी भरें, इससे घर का वेस्ट मैटेरियल भी काम में आ जाएगा और रंग बिरंगी बोतल और बाल्टियों में पौधे भी बड़े अच्छे लगेंगे. अगर ये सब न मिले तो बाजार से छोटेछोटे प्लास्टिक के पौट या गमले खरीद लें. फिर उनमें मिटटी भरकर उनमें अपने पसंद की क्यारियां बनाएं. अपने हाथों से मिटटी से क्यारी बनाना और उनमें पाननी से स्पे्र करनो का मजा ही अलग होता है. इसके बाद उसमें अपने पसंद के रग बिरंगे फूलों के पौध लगाएं. वेजिटेबल्स, फ्रूट्स, हर्ब्स भी लगा सकते हैं. इसके लिए घर के किसी बड़े सदस्य की मदद लें. क्यारिष्यों लगाने के बाद उनमें समय समय पर पानी और जरूरी खद डालते रहें ताकि पौधों को बढने में कम समय लगे. हां, पौधों को हमेषा अंधेरे से दूर यानी धूप में ही. याद रखें पौधों को पानी और धूप की बहुत जरूरत होती है. नहीं तो ये मुरझा जाते हैं. इअसे तरह से आपे जो खेल खेल में फले उगाएं हैं उनका  इस्तेमाल आप घर को सजाने के अलावा पार्टी में खास एरिया को डेकोरेट करने में भ्सर कर सकते हैं. यानी आप डिजाइनर एंड डेकोरटर भी बन गए. कुल मिलाकर गार्डनिंग से आपको घर बैठे ही एक बडे़ पार्क में खेलने के मजे के साथसाथ  अपना षौक तो पूरा करते हैं और घर हरियाली से महकेगा अगल से. गार्डनिंग करने से किषारों की कैलरीज भी बर्न होती हैं और रात में अच्छी नींद आती है. तो हुआ ना दोहरा फायदा. हौबी की हौबी और हेल्थ को भी फायदा.

पर्फेक्ट गार्डनर बनने के लिए
जिनका मन गार्डनिंग में कुछ ज्यादा ही रमता है तो इसे बतौर करियर भी आजमा सकते हैं. इसके लिए बाकायदा कोर्स होते हैं. इन शॉट टर्म कोर्सो को करने के लिए किसी भी डिग्री की आवश्यकता नहीं होती. विद्यार्थी का बारहवीं पास होना ही काफी होता है. अगर गार्डनिंग आपकी हॉबी है तो छुट्टियों के खाली दिनों में इस कोर्स को चुना जा सकता है. इससे आप पर्फेक्ट गार्डनर बन सकते हैं.


जरूरी टिप्स

  • बेकार पड़ वेस्ट मैटेरियल को इस्तेमाल करें
  • पौधों को स्वस्थ रखने के लिए सनलाइट, वाटरिंग और खाद की व्यवस्था
  • रंग बिरेंगे और खुशबूदार फूलों का चुनें
  • कैक्टस और ओरनामेंटल ग्रास जैसे पौधे खूबसूरत होते हैं
  • जगह के हिसाब से पौधों का चयन करें.
  • पत्तियों को टेलकम पाउडर, हेयर स्पे्र से बचाकर रखें.
  • पौधों को अंधेरे से दूर बालकनी में धूप में रखें
  • कैक्टस के गमलों में मिट्टी ढीली रखें.
  • मिटटी में काम करने के बाद खुद को अच्छे से साफ करें

Tuesday, May 21, 2013

जनता को ठगने का महामुकाबला





क्‍या सरकार टीवी चैनलों को इसलिए लाइसेंस देती है कि वे जनता को बेवकूफ बनाकर पैसे कमाएं? क्या सरकारी अधिकारियों को पता नहीं है कि उनके  द्वारा जारी लाइसेंस का इस्तेमाल देश की जनता को मूर्ख बनाने में किया जा रहा है? रात के बारह बजते ही कई चैनलों पर ऐसे कार्यक्रम चलाए जाते हैं, जिन पर लाइव लिखा होता है. पर सच्चाई यह है कि उक्त सभी कार्यक्रम रिकॉर्डेड होते हैं. 

इन कार्यक्रमों के टेलीकास्ट के दौरान जब इन चैनलों के दफ्तरों में फोन करके असलियत जाननी चाही तो पता चला कि वहां तो स़िर्फ टेप प्ले करके छोड़ दिया गया है और स्टूडियों में कोई शूट नहीं चल रहा है. हमारी सरकार से मांग है कि ऐसे चैनलों का लाइसेंस रद्द करे, जो कुछ कंपनियों के  साथ मिलकर धोखाधड़ी करते हैं. और, देश की जनता से हम अपील करते हैं कि टीवी पर आने वाले किसी भी शो में फोन या एसएमएस का बहिष्कार करें. रात के  बारह बजते ही देश की जनता को मूर्ख बनाते हुए एसएमएस और फोन कॉल के जरिए जनता की जेबों पर डाका डालते हैं. ऐसे कार्यक्रमों की लंबी फेहरिस्त है. कुछ कार्यक्रम अंकों को दिखाकर उनका जोड़-भाग और कैलकुलेशन करवाते हैं, कुछ फिल्मी पहेली हल कराने के नाम पर अमिताभ बच्चन का चेहरा पहचानने जैसे कठिन सवाल पूछते हैं तो कुछ बड़े ब्रांड्‌स के प्रोडक्ट की नीलामी के नाम पर विज्ञापन भी कर लेते हैं.

वैसे सारी पहेलियों और सवालों के जवाब बहुत आसान होते हैं, लेकिन इन चैनलों पर आने वाले जवाब सुनकर लगेगा कि हमारे देश में गणित की पढ़ाई होती ही नहीं है. दरअसल जब टेलीविजन की शुरुआत हुई थी, तब दूरदर्शन ने लोगों को सा़फ-सुथरा मनोरंजन परोसने का ज़िम्मा उठाया था. 

यही वजह है कि हम लोग, नुक्कड़, रामायण और चंद्रकांता जैसे कार्यक्रम लोगों के जेहन में आज भी ताज़ा हैं. फिर केबल चैनल का दौर आया. इस दौर में रात होते ही पुराना और क्लासिक सिनेमा चलने लगा, पर जैसे ही मार्केटिंग, विज्ञापन एवं टीआरपी जैसे फैक्टर्स इन चैनलों की सफलता और असफलता तय करने लगे तो मानों चैनलों का काम ही बदल गया. वे दर्शकों का मनोरंजन करने के बजाय उनसे रुपये ऐंठने की नई-नई स्कीम बनाने लगे. आजकल टेलीविजन में अजीबोग़रीब मुकाबलों के ऐसे कार्यक्रम चल रहे हैं, जो यह साबित करने पर तुले हैं कि भारत की जनता मूर्ख और बेवकूफ है. म्यूजिक का मुक़ाबला, बिग बॉस और दूसरे रियलिटी शो तो जनता के एसएमएस के ज़रिए करोड़ों की कमाई करने में कामयाब होते हैं. 

मज़ेदार बात यह है कि वोट देने वाले ज़्यादातर दर्शकों को पता भी नहीं चलता है कि यह कार्यक्रम दरअसल कला और छुपे टैलेंट को देश के सामने लाने के  बजाय चैनलों की मोटी कमाई का ज़रिया मात्र है. सबसे पहले उन कार्यक्रमों के  बारे में बताते हैं, जो रात के  बारह बजते ही देश की जनता को मूर्ख बनाते हुए एसएमएस और फोन कॉल के जरिए जनता की जेबों पर डाका डालते हैं. ऐसे कार्यक्रमों की लंबी फेहरिस्त है. कुछ कार्यक्रम अंकों को दिखाकर उनका जोड़-भाग और कैलकुलेशन करवाते हैं, कुछ फिल्मी पहेली हल कराने के नाम पर अमिताभ बच्चन का चेहरा पहचानने जैसे कठिन सवाल पूछते हैं तो कुछ बड़े ब्रांड्‌स के प्रोडक्ट की नीलामी के नाम पर विज्ञापन भी कर लेते हैं.


 वैसे सारी पहेलियों और सवालों के जवाब बहुत आसान होते हैं, लेकिन इन चैनलों पर आने वाले जवाब सुनकर लगेगा कि हमारे देश में गणित की पढ़ाई होती ही नहीं है. ताज्जुब की बात यह है कि 4+18+30-15=? जैसी पहेली को हल करने में पूरे देश को तीन-चार दिन लग जाते हैं और हद तो तब हो जाती है, जब बिना सही जवाब के  कार्यक्रम बंद कर दिया जाता है. अगर कोई जीत भी गया तो न उसका फोन नंबर दिखाया जाता है और न उसकी तस्वीर. ऐसा इसलिए, क्योंकि सभी कार्यक्रम महज़ छलावा हैं. लाइव के नाम पर रिकॉर्डेड कार्यक्रम दिखाकर जनता को मूर्ख बनाया जा रहा है. कार्यक्रमों में क्रिकेट खिलाड़ी या बॉलीवुड की किसी हस्ती की तस्वीर दिखाई जाती है. फिल्मी हीरोइनों के दांत और आंख दिखाए जाते हैं और जनता से चैनल अपील करते हैं कि इन्हें पहचानो. वैसे इन तस्वीरों को इस तरह पेश किया जाता है कि कोई भी बच्चा सही जवाब दे दे. जैसे सचिन और द्रविड़ के चेहरे को मिलाकर पेश करके उन्हें पहचानने के लिए कहा जाता है. अब भला ऐसा कौन होगा, जो सचिन और द्रविड़ का चेहरा न पहचान सके. 

ऐसे ही अक्षय कुमार की तस्वीर दिखाकर पहचानने के लिए कहा जाएगा. अधिक एसएमएस के लालच में हिंट दी जाती है कि इस अभिनेता ने फिल्म सिंह इज किंग में काम भी किया है. मजेदार बात यह कि दो-तीन दिन बीत जाते हैं, लेकिन एक भी सही जवाब नहीं मिल पाता. चैनल बार-बार लगातार किसी भिखारी की तरह फोन करने की अपील करता रहता है और पहले से रिकॉर्ड किए गए ग़लत जवाब दिखाता रहता है, ताकि लोग समझें कि प्रतियोगिता में और लोग भी लगे हुए हैं. एक खूबसूरत एंकर लगातार यह कहती रहती है कि आपको लाइन पर बने रहना है. आगे यह प्रलोभन देती है कि अगले कॉलर को 3000 रुपये मिलेंगे. ग़लत जवाब देने वाले को भी इनामी राशि का कुछ भाग दिए जाने की झूठी घोषणा की जाती है. 

फिर कई मिनटों तक कोई कॉल नहीं ली जाती. मतलब यह कि लोग तीन हज़ार रुपये के लालच में लगातार फोन करते रहते हैं और फोन बिजी होने पर एसएमएस करना शुरू कर देते हैं. उक्त सभी फोन नंबर पीआरएम लाइंस के होते हैं. इस पर कॉल करने पर सामान्य कॉल रेट से कई गुना अधिक यानी छह से बारह रुपये प्रति मिनट खर्च होते हैं. फोन करने वाले दर्शक की कॉल को होल्ड पर रखा जाता है. ज़ाहिर है, जितना लंबा इंतज़ार, उतना ही ज़्यादा लंबा फोन बिल. फोन लगे या न लगे, फोन करने वाले का पैसा ज़रूर लग जाता है. कुछ फोन लाइंस में पहले से रिकॉर्डेड संदेश फीड होते हैं और अलग से जवाब तलब किया जाता है. एसएमएस के धंधे से होने वाली कमाई का कुछ हिस्सा फोन कंपनियों को जाता है और बाकी पैसा उनके खाते में जाता है, जिनके नाम से उक्त नंबर रजिस्टर होते हैं. उक्त कार्यक्रम लाइव नहीं होते. 

सभी कॉल्स चैनल के स्टूडियो के बजाय अलग-अलग कंपनियों के  कॉलसेंटर में जाती हैं. जनता को लगता है कि वह चैनल के एंकर से बात कर रही है. जबकि सच्चाई यह है कि वह कॉल किसी कंप्यूटर में जाती है. कॉलसेंटर्स से रिकॉर्डेड टेप टीवी चैनलों में जाते हैं. मतलब यह है कि जो लोग यह समझ कर फोन करते हैं कि वे चैनल के लाइव प्रोग्राम में फोन कर रहे हैं, उन्हें पता नहीं होता कि इस खेल के पीछे क्या चल रहा है. यह बात और है कि धोखाधड़ी करने वाले कार्यक्रमों की शुरुआत में एक डिस्क्लेमर लगाकर चैनल सारी ज़िम्मेदारियों से खुद को अलग कर लेते हैं. अब बात ऐसे कार्यक्रमों की, जिन्हें हम रियलिटी शो कहते हैं. 

उक्त रियलिटी शो कभी डांस तो कभी संगीत का महामुक़ाबला के नाम से जनता के सामने आते हैं. सर्वश्रेष्ठ गायक कौन है, यह जनता के वोट से तय होता है. नए-नए फॉर्मेट और नए-नए अंदाज़ में लोगों से एसएमएस मंगवा कर टीवी प्रोड्यूसर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं. रही बात हार और जीत की, सच पूछिए तो जनता के वोट का कोई मतलब ही नहीं होता है. हाल में हुए एक ऐसे ही मुक़ाबले में जनता के वोट से शान जीते थे, लेकिन जज की कुर्सी पर बैठे जावेद अख्तर ने एक ऐसा कारनामा किया कि उनकी अकेली च्वाइस लाखों-करोड़ों देशवासियों के  वोटों पर भारी पड़ गई. हमें यह भी याद रखना चाहिए कि जावेद साहब कोई संगीतकार नहीं हैं. अगर शंकर महादेवन को जजों के फैसले से ही जीतना था, तो जनता से लाखों की संख्या में एसएमएस क्यों मंगवाए गए? क्या इन रियलिटी शोज का एकमात्र मक़सद पैसा कमाना है? एसएमएस भेजने वाली जनता का भी हक़ है कि उसे बताया जाए कि किसी भी रियलिटी शो में कितने एसएमएस आए और कहां से आए? एसएमएस और फोन का यह खेल अभी रियलिटी टीवी तक सीमित है, लेकिन संकेत तो यह मिल रहे हैं कि टीवी सीरियलों में भी अब एसएमएस का खेल शुरू होने वाला है. 



बालिका वधू सीरियल में आनंदी के ठीक होने के लिए टीवी चैनल ने प्रार्थनासभाओं का ड्रामा शुरू किया है. वह दिन दूर नहीं, जब सीरियलों में सबसे पसंदीदा कलाकार को मारकर यह एसएमएस मंगवाया जाएगा कि वह फिर से जिंदा होनी चाहिए या नहीं. टीवी चैनलों और खासकर न्यूज़ चैनलों की बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है. लोगों का मीडिया पर भरोसा है. चंद पैसों और टीआरपी की खातिर इन ज़िम्मेदारियों को ताख पर नहीं रखा जा सकता. इस तरह की धोखाधड़ी के खेल में शामिल होकर न्यूज़ चैनल अपनी साख खोते जा रहे हैं और उनसे जनता का भरोसा उठता जा रहा है.

 ऐसे में इस भरोसे को कायम रखने की ज़िम्मेदारी भी न्यूज़ चैनलों की है. देश में क़ानून का राज चलता है, यही माना जाता है. धोखाधड़ी, चोरी और जालसाजी के लिए सजा का प्रावधान है. जब कोई छोटा-मोटा चोर पांच हज़ार रुपये की चोरी करता है तो अदालत उसे सजा देती है. अगर यही चोरी करोड़ों की हो, हर रोज़ हो और इसे करने वाले देश की बड़ी-बड़ी कंपनियां और टीवी चैनल्स हों तो क्या सरकार को उन पर कोई कार्रवाई नहीं करनी चाहिए? अगर इन चैनलों पर जल्द लगाम नहीं लगाई गई तो यह लूट यूं ही जारी रहेगी.

Wednesday, May 15, 2013

जैविक खेती - समय की जरूरत





क्या जैविक खेती से इतनी खाद्य सामग्री पैदा हो सकती है जिससे दुनिया भर का पेट भरा जा सके. जर्मनी में एक नई किताब फूड क्रैश- हम जैविक जीवनयापन कर पाएंगे या फिर बिल्कुल नहीं आई है, इसके लेखक फेलिक्स प्रिंस सू लौएवेनश्टाइन, जो जर्मन जैविक खाद्य संघ के प्रमुख हैं इस बात का समर्थन करते हैं. उनके मुताबिक जो खेती कीटनाशक और रसायनिक खादों से मुक्त हो, उस तकनीक से पैदा हाने वाली फसल  पूरी दुनिया का पेट भरा जा सकता है. यह बात सिर्फ जर्मनी में ही नहीं बल्कि बल्कि दुनिया के हर उस कोने में कही जा रही है. जो जैविक खेती अपना रहे हैं और इससे होने वाले फायदे देख रहे हैं. भारत के परिपेक्ष्य में भी यही बात लागू होती है. असल में खेती पहले भी होती थी पर तब रासायनिक खाद और जहरीले कीटनाशक उपलब्ध नहीं थे. तब गोबर किसानों के लिए बेहतर खाद का काम करता था. नीम और हल्दी उनके लिए प्रभावी कीटनाशक थी, लेकिन बाद में रासायनिक खाद और कीटनाषकों ने खेती को घाटे का सैदा बना दिया पर अब ऐसा नहीं है एक बार फिर से किसानों की समझ में आ गया है कि रासायनिक खाद और कीटनाशक का इस्तेमाल करने का नतीजा क्या होता है, और प्राकृतिक तरीके से बगैर किसी रासायनिक खाद, कीटनाशक और उर्वरक के इस्तेमाल के पैदा किए गए खाद्यान्न सेहत के लिए कितने लाभकारी हैं. षायद इसीलिए आज  भरत के गांवों में जैविक खेती के प्रति दिलचस्पी लगातार बढती जा रही है. अगर ये बढोतरी यो ही रही तो आने वाले दिनों में भारत विश्व स्तर पर जैविक खेती में निश्चित तौर पर नए आयाम स्थापित करेगा और एक बार फिर से कर अपने खेतों में हरा सोना पैदा करेगा.

जमीन और किसान दोनों के लिए सेहतमंद
जैविक खेती से अनाज के पैदावार में तो बढोेतरी हुई ही साथ में मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार से किसानों की परोक्ष आमदनी में भी इजाफज्ञ हुआ है. जैविक खेती के माध्यम से सूखे जैसी स्थितियों से भी निपटा जा सकता है, क्योंकि जैविक खेती में फसलों की सिंचाई के लिए पानी की ज्यादा जरूरत नहीं पड़ती. जैविक खेती से मिट्टी की पौष्टिकता बढ़ती है और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित रहती है.  इस तकनीक का इस्तेमाल करने वाले किसानों की संख्या भी लगातार बढ रही है, पिछले पांच सालों के मुकाबले में बाजार में यह आर्गेनिक फूड पहले की तुलना में कहीं ज्यादा मात्रा में उपलब्ध है.  जैविक खेती पैदावार, बचत और स्वास्थ्य के नजरिए से भी किसानों और जमीन दोनों के लिए लिए फायदेमंद है. लिहाजा किसान जैविक खेती की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं. इससे न सिर्फ पैदावार बढ़ती है, बल्कि उत्पादों की गुणवत्ता में भी बेतहाशा इजाफा होता है. इतना ही नहीं, जैविक खेती करने वाले किसानों की फसलों को अन्य फसलों की तुलना में कीमतें भी ज्यादा मिलती हैं, जिससे किसान आर्थिक रूप से भी संपन्न बनता है. फिलहाल देश खाद्यान्न की कमी से भी जूझ रहा है. खाद्य पदार्थों की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं. साथ ही हर साल खाद्यान्न की बर्बादी भी हो रही है. यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन जैविक खेती के जरिए इस बर्बादी को नियंत्रित किया जा सकता है. इसकी वजह यह है कि ऑर्गेनिक फूड लंबे समय तक खराब नहीं होते. उनके संरक्षण के लिए विशेष उपायों की आवश्यकता नहीं पड़ती.

देषी प्रजाति को बढावा
जैविक खेती से किसानो ंका भला तो ही रहा है लेकिन साथ में फसलो ंऔश्र देषी प्रजातियों की गुणवत्ता और पौश्टिकता को लेकर भी कई  ा सकारात्म्क परिणाम  देखने को मिले हैं. जैविक खेती का सबसे बडा फायदा तो यह हुआ है कि देशी प्रजाति के अनाज की खेती को बढावा मिला है. अब तक आम किसान संकर किस्म के बीजों का इस्तेमाल कर रहा था, लेकिन जैविक खेती करने वाले किसानों ने बेहतर परिणाम के लिए फिर से देशी किस्म के अनाजों का उत्पादन करना शुरु कर दिया. इसके अलावा, जैविक अनाज स्वास्थ्य की दृष्टि से भी काफी फायदेमंद होता है. अच्छा स्वास्थ्य पाने के लिए अब लोग मोटे अनाज की ओर आकर्षित हुए हैं. जैविक अनाज की शुद्धता और स्वाद का कोई जोड नहीं है और यह अनाज पेट के रोगों के लिए खासा कारगर साबित हुआ है. वैसे ही मधुमेह के रोगियों के लिए भी मोटा अनाज फायदेमंद साबित हुआ है.


पर्यावरण की सुरक्षा
इस बात ये तो इंकार नहीं किया जा सकता है कि हाल के दिनो ंमें बढती जनसंख्या और प्रदूशण ने पर्यावरण को दुनिया भर में चिंता का विशय बना दिया है.  आए दिन कोई न कोई बैठक अंतरराश्ट्रीय स्तर पर प्र्यावरण को बचाने के लिए होती रहती है. ग्लोबल वार्मिंग भी पूरी दुनिया के लिए चिंता का सबब है. वैसे तो लोग इन सब समस्याओं को हल करने के लिए वैज्ञानिक तरीकों पर निर्भर है पर कोई जमीनी कारणें की तरफ ध्यान नहीं दे रहा है. असल मंे जैविक खेती ही पर्यावरण के लिए काफी फायदेमंद है. जैविक तकनीक ही है जो खेती और फसल, सब्जियों और फलों को रसायनसे दूर रखकर जमीन को बंजर होने से बचा रही है. लोगों के पर्यावरण की तरफ बढते रुझान को देखत हुए केले के पेड या अलो विरा ग्वार के पटे से कपडे तैयार करने की विधियों को भी कारोबार के रूप में देखा जाने लगा है. 

विदेषी भी सीख रहे हैं गुर
भारत मंे जैविक खेती की तकनीकों से विदेषी भी प्रभवित हैं. नतीजनतन वे सात समुंदर पार कर भारत में जैविक खेती से जुडी तकनीको को भारतीय किसानो ंसे सीखने के लिए आ रहे है. हाल में सऊदी अरब के किसानों का एक दल राजस्थान आया था जैविक खेती के तौर तरीकों को सीखने. उन्होंने यहां पर न सिर्फ जैविक खेती से जुडी नई तकनीके सीखीं बल्कि इस बात से वाकिफ कराया कि किस तरह से पूरी दुनिया में भरत में होने वाली जैविक लेागों की दिलचस्पी की वजह बनी हुई है. इस काम में लगे एक गैर सरकारी संगठन मोरारका फाउंडेशन के मुकेश गुप्ता कहते हैं, दो तीन साल से हम देख रहे है, भारत ने इस क्षेत्र में बहुत प्रगति की है, भारत एक पॉवर हाउस के रूप में स्थापित हो सकता है. उनके मुताबिक जैविक चोती को अपनाने वाले किसानों के लिए खेती की लागत में कमी आई है. और भूमि के सूक्ष्म प्रबन्धन से खेती में पानी की 40 फीसद कमी आई है, इसीलिए किसानों को जैविक खेती काफी भा रही है. यही वजह है कि किसान इसके  जरिए आज विश्व बाजार से जुड़ रहे हैं ताकि  उन्हें उचित मूल्य मिल सके.बात अगर राजस्थान की करें तो यहां लगभग 70 हजार किसान जैविक खेती के इस अभियान में षामिल है. एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत के बाकी के राज्यों के मुकाबले राजस्थान में सबसे ज्यादा किसान इस खेती में हाथ बंटाते रहे हैं.

खेती के अलावा भी है उपयोगी
ऐसा नहीं है जैविक विधियो ंका इस्तेमाल सिर्फ खेती औश्र फस्ल उगाने में ही किया जा रहा है, असल में जैविक विधियां खेती के साथ साथ अन्य व्यवसायों के लिए भर बहुत फायदेमंइ बनकर उभर रही है. पिछले दिनों केले से कपडे का निर्माण करने वाली चेन्नई की एक कंपनी कोे फ्रांस, सिंगापुर, ब्रिटेन, और आस्ट्रेलिया जैसे बडे देशों के भी ऑर्डर मिल रहे हैं. ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने के लिए और कार्बन क्रेडिट को बढाने के लिए ये कंपनियां ऐसे और्डर देती हैं. गौश्रतलब है कि भारत दुनिया में सबसे ज्यादा केले उत्पादित करने वाले देशों में से एक है. ऐसे में कंपनी केले के बचे हुए कूडे का इस्तेमाल कपडे बनाने के लिए करती है। इसमें फाइबर को सुई की मदद से निकाला जाता है और इसे धागों में बदलने के लिए पूर्णतरू जैविक विधियों का ही प्रयोग किया जाता है. इसी तरह जैविक तकनीक कम्युनिटी आधारित आर्गेनाइज्ड फार्मिंग, रिसर्च , एग्रोप्रोसेसिंग, मार्केटिक और फार्म टूरिज्म जैसे आयामो ंमें अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है.


किसानों की जुबानी
मैं वाणिज्य में स्नातक हूं. पुश्तैनी खेत में पहले रासायनिक खाद का इस्तेमाल करते थे. इससे खाद उपज तो बढ जाती थी, लेकिन खर्च  में इजाफा हो रहा था. फिर मैंने अपनी जमीन पर जैविक खेती करने की ठानी. पहले साल उपज में दस फीसदी की कमी आई, लेकिन दूसरे साल से उपज बढ गई. अब, जब मैं अपना अनाज लेकर मंडी में जाता  हूं और सबाके बताता हूं कि हमारा अनाज जैविक विधि से उगाया गया है तो हमें प्रति क्विंटल दो सौ रुपये ज्यादा मिलते हैं.
 -शंकर लाल, बलवंतपुरा, झुंझुनू


हम तो गोबर और केंचुआ से खुद ही खाद ही खाद तैयार कर लेते हैं. नीम, हल्दी एवं लहसुन मिलाकर हर्बल स्प्रे बना लेते हैं. पिछले 4 सालों से हम इन्हीं सब चीजों का इस्तेमाल करके खेती कर रहे हैं.  इससे दो फायदे होते हैं. पहला तो यह कि जैविक विधि से खेती करने पर लागत कम हो जाती है, साथ ही उपज का मूल्य भी अधिक मिलता है. और दूसरा हमारी खेती की उर्वरकता भी बढती जाती है.                             -ओमप्रकाश, मझाओ, झुंझुनू

Tuesday, April 16, 2013

ट्रे कल्टीवेशन - किसानों के लिए नई सौगात



इस बात के इंकार नहीं किया जा सकता है कि आज देश में किसान और खेती दोनों ही खस्ताहाल में हैं. एक ओर जहां पानी के भूमिगत स्तर  आई तेजी से कमी ने खेती और किसान को संकट में डाल दिया है, वहीं दूसरी ओर खाद और सिंचाई साधनों की बढ़ती मंहगाई ने भी उनकी कमर तोड़कर रख दी है. षायद यही वजह है कि आज हमारे देश के किसाान जो कल तक देश में अन्नदाता माने जाते थे, भुखमरी की कगार पर आ गए हैं. बर्बाद होती फसलें, खेती के सीमित साधनों की वजह से ये किसान आए दिन आत्महत्याएं करने लगे हैं. फिर चाहे विदर्भ के किसान हों या बुंदेलखंड के. किसानों की यह समस्या इतनी जटिल होती जा रही है कि अब लोग यह तक कहने लगे हैं ऐसे में न सिर्फ सरकार को, बल्कि देश के वैज्ञानिकों को भी किसानों की इन समस्याओं से छुटाकरा दिलाने के लिए जरूरी उपाय ढूंढने होंगे. इस दिषा में कई प्रयास काफी वक्त से किए भी जा रहे हैं.

ट्रे कल्टीवेशन
इसी प्रक्रिया में कई नई तकनीकें ईजाद हुई है, जिनका इस्तेमाल किसानों के लिए नई उर्जा और उम्मीद लेकर आया है. ऐसी ही एक तकनीक है ट्रे कल्टीवेशन यानी ट्रे में खेती. दरअसल, इसे सरल भाशा में समझें तो ये एक ऐसी तकनीक है जिसमें कम पानी और कम मिट्टी में अधिक से अधिक सब्जियां उगाई जा सकती हैं. इस तकनीक में प्लास्टिक की ट्रे में मिट्टी रखकर सब्जियां उगाई जाती हैं. इससे कम लागत में उत्तम गुणवत्ता वाली सब्जियों का उत्पादन किया जा सकता है. इसके लिए सर्वप्रथम ट्रे में ग्रीन नेट एवं जूट बिछाकर उसमें वर्मी कंपोस्ट डाला जाता है, फिर उसमें उपचारित बीज या पौधे लगाते हैं. इसके बाद ट्रे में एग्री इनपुट्स एवं पोशक तत्वों का समय-समय पर छिड़काव किया जाता है. इस तकनीक से उस तरह की सब्जियां उगाने में बेहतर परिणाम मिलता है, जो हम अपने रोजमर्रा के भोजन में इस्तेमाल करते हैं. मसलन टमाटर, मिर्च, बैगन, भिंडी, करेला, ककड़ी, ग्वारफली का नाम प्रमुख रूप से लिया जा सकता है. इन तमाम सब्जियों को बड़ी आसानी से डेढ़ इंच मिट्टी में उगाया जा सकता है. इस विधि द्वारा एक किलो सब्जी उगाने में सिर्फ 30 से 70 लीटर पानी की आवश्यकता होती है.

किफायती और फायदेमंद 
इस तकनीक की विषेशता यही हैं कि इसमें पानी की बहुत बचत होती है यानी जिन किसानों को ंिसंचाई के साधनों का इंतजाम करने में दिक्कत पेश आती है या फिर जो आथर््िाक रूप से इतने कमजोर है कि सिंचाई क जल का खर्च वहन नहीं कर सकते, उनके लिए यह तकनीक किसी वरदान से कम नहीं है. इस तकनीक के इस्तेमाल से किसान बेहतर और अधिक उपज पैदा कर सकते हैं. इसकीं दूसरी सबसे अच्छी बात ये हैं यह उन किसानों के लिए ज्यादा फायदेमंद है जो पिछड़े होने के साथ साथ सूखे और भूमिहीन यानी जमीन की कमी से जूझ रहे हैं. इस तकीनीक की मदद से उन्हें उपज के लिए बहुत सारी जमीन की आवष्यकता नहीं पड़ती. ट्रे के कई स्तर बनाकर कम से कम जगह में खूब सारी उपज की जा सकती है. इसके अलावा इस इस विधि में फसल चक्र की भी आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि ट्रे के अंदर एक सब्जी तैयार होते ही आप उसमें कोई दूसरी सब्जी लगा सकते हैं.

कीटनाशकों से छुटकारा
केयर रेटिंग की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में कीटनाशकों के गलत प्रयोग से उत्पादकता में जबरदस्त गिरावत आई है. देश में हर साल कीटनाशकों के प्रयोग से न सिर्फ उपज की गुणवत्ता में कमी आती है बल्कि किसानों की जेबों पर भी अतिरिक्त भार पड़ता है. एक आंकड़े के मुताबिक भारत में कीटनाशकों के प्रयोग के कारण करीब 18 फीसदी फसल बर्बाद हो जाती है यानी इससे हर साल करीब 90 हजार करोड़ रुपये की फसल को नुकसान पहुंचता है. ट्रे कल्टीवेशन तकनीक से सबसे पहले किसानों को इसी समस्या से निजात मिलती है. जी हां, ट्रे कल्टीवेशन की तकनीक पर की गई उपज में कीटनाशक दवाइयों के छिड़काव की जरूरत नहीं पड़ती. ऐसा इसलिए क्योंकि ट्रे के ऊपर नेट लगा देने से कीड़े-मकोड़े सब्जियों को नुकसान नहीं पहुंचा पाते. जाहिर है जब फसल में कीट ही नहीं लगेंगे तो फिर कीटनाशकों की जरूरत ही नहीं पड़ेंगी. उपज की गुणवत्ता पर भी कोई दुश्प्रभाव नहीं पडे़गा. 


शहरों में भी ट्रे कल्टीवेशन
आमधारण होती है कि किसान और खेती का मतलब गांव. किसी हद तक ये धारणा सही भी होती है. क्योंकि भारत का कृशकवर्ग गावों में ही बसता है. लेकिन ट्रे कल्टीवेशन की तकनीक इस धारणा को काफी हद तक बदल देती है. इस तकनीक को शहरों भी कई लोग आजमा रहे हैं. आप आपने शहर में बने मकान के गार्डन में या फिर  किसी के कमरे में कोई स्थान, जो थोड़ा सा खुला हो या फिर छत पर ट्रे कल्टीवेशन के जरिए सब्जियां उागकर अपने हाथों सेे उगाई गई सब्जियों का मजा ले सकते हैं. इससे दो फायदे होंगे पहला, आप स्वादिश्ट, ताजी और पेस्टीसाइड से मुक्त भोजन पाएंगे और दूसरा सब्जी मंडी में बासी सब्जियों पर अधिक पैसे भी खर्च नहीं करने पडें़गे. आप कोट-पैंट, टाई लगाकर भी अपने घर की छत या बालकनी में इस विधि द्वारा सब्जियां उगा सकते हैं. किसानों की वेशभूशा में पानी और कीचड़ में उतरने की कोई आवष्यकता ही नहीं है. तो बन गए न आप मौडर्न किसान. 
राजस्थान के झुझुनूं जिले की शेखावाटी तहसील के कई किसान इस तकनीक से सब्जियां उगा रहे हें. मोरारका फाउंडेशन ने भी कुछ वर्श पहले दिल्ली में एक प्रदर्शनी लगाकर इस तकनीक को पेश किया था. मोरारका फाउंडेशन के कार्यकारी निदेशक मुकेश गुप्ता बताते हैं कि ट्रे कल्टीवेशन तकनीक खेती पैदावार, बचत और स्वास्थ्य के नजरिए से भी किसानों के लिए फायदेमंद है. लिहाजा किसान इस तकनीक की तरफ तेजी से रुख कर रहे हैं. आज यह तकनीक जहां भी पुहंचती है वहां के लोग इसे हाथोंहाथ लेते हैं. कम लागत पर ज्यादा सब्जियां उगाकर किसान अधिक से अधिक पैसे कमा रहे है. 




Tuesday, April 9, 2013

हेल्थ इंश्योरेंस - आपात समय की सुरक्षा


आज की आपाधापी और भागदौड़ भरी जिंदगी में सब से ज्यादा स्वास्थ्य हाशिए पर रहता है. काम का तनाव और अव्यवस्थित जीवन शैली के चलते देश  में हर दूसरा व्यक्ति किसी न किसी बीमारी से पीडि़त है. यह तो सब जानते हैं कि बीमारियां न तो समय व पता पूछ कर आती हैं और न ही जेब देखकर. हर बीमारी का सफर अस्पताल पर खत्म होता है. एक बार बीमार पड़ने का मतलब है अपनी सारी जमापूंजी दांव पर लगाना. इसलिए हेल्थ इंश्योरेंस  कराएं ताकि खुद या परिवार को कोई आदमी बीमार पड़े तो इलाज का सारा खर्च अपकी बीमा कंपनी उठाए और आप आर्थिक मोरचे पर निष्चिंत रहें. आज आपात समय में सुरक्षा बनकर उभर रहा है हैल्थ इंश्योरेंस.  
दिल्ली के व्यवसायी महेश अरोड़ा काफी समय से ब्ल्डप्रैशर और सुगर की समस्या से पीडि़त हैं. इसके चलते उन्हें इन बीमारियों का नियंत्रित रखने के लिए नियमित रूप्प से महंगे इलाज से गुजरना पड़ता है. चूंकि समय रहते उन्होंने अपनी हेल्थ इंश्योरेंस  नहीं कराया, और अब 55 साल की उम्र में स्वास्थ्य बीमा कराना कतई आसान नहीं है. उन्होंने इस अनुभव से सबक लेते हुए अपने युवा बेटे का सही समय पर हेल्थ इंश्योरेंस  करवा लिया. महेश  जी जानते हैं कि ये आनुवांशिक बीमारियां एक समय बाद उनके बेटे को भी होंगी. तब ये स्वास्थ्य बीमा उसके काम आएगा.

क्यों जरूरी है हेल्थ इंश्योरेंस
हेल्थ केयर फाउंडेश न औफ इंडिया के प्रैसीडेंट डाक्टर केके अग्रवाल कहते हैं कि इस देश  में बिना इंश्योरेंस  के कार या कोई और गाड़ी चलाना जुर्म माना जाता है जबकि दुर्भाग्वश  दुनिया के सबसे महंगे व्हीकल यानी मानव श रीर का इंश्योरेंस  आवष्यक हो, इस के लिए कोई कानून नहीं है. अगर हर किसी का हेल्थ इंश्योरेंस  हो तो स्वास्थ्य सेवाएं श हर क्या गांवों तक सुचारू रूप से पहुंच सकेंगी. आज भारत की जनसंख्या लगभग 1241491960 है. अगर हर व्यक्ति रोजाना 3 रुपये से कम बतौर प्रीमियम के हिसाब से साल का हजार रुपए देता है तो बीमा कंपनी के पास 124000 करोड़ की भारी धनराषि जमा होती है. जरा सोचिए इतने पैसों से देश  भर में कितने हेल्थ केयर सेंटर और अस्पताल खोले जा सकते हैं. और जो आदमी पैसे नहीं दे सकता उस का प्रीमियम सरकार को देना चाहिए. आज जब दवाओं और चिकित्सा के दाम आसमान छू रहे हैं. एक समय ऐसा भी आएगा जब बिना इंश्योरेंस  के चिकित्सा सुविधा पाना असंभव सा हो जाएगा. इसलिए हेल्थ इंश्योरेंस  सबके लिए बेहद जरूरी है. क्योंकि हेल्थ इंश्योरेंस  बीमाधारक या उस के आश्रित परिजनों को स्वास्थ्य समस्या, दुर्घटना या मृत्यु आदि की स्थिति में आर्थिक सहायता देता है.

हेल्थ इंश्योरेंस क्या है
हेल्थ इंश्योरेंस  यानी स्वास्थ्य बीमा को मेडिक्लेम भी कह सकते हैं. देश  की आबादी का एक बड़ा हिस्सा खासकर ग्रामीण हिस्सा तो हेल्थ इंश्योरेंस  के मायनों से वाकिफ तक नहीं है. आसान लहजे में समझें तो हेल्थ इंश्योरेंस  दो तरह का होता है. पहला इंडिविजुअल हेल्थ इंश्योरेंस यानी  व्यक्तिगत स्वास्थ्य बीमा और दूसरा फैमिली फ्लोटर बीमा यानी सामूहिक बीमा. इंडिविजुअल हेल्थ इंश्योरेंस के कवर क्षेत्र में सिर्फ बीमा स्वामी आता है. इस बीमा का षुल्क सामूहिक बीमा शुल्क की तुलना में अधिक होता है. जबकि फ्लोटर प्लान में बीमा करने वाला या प्रायोजक ही पौलिसी का स्वामी होता है और दूसरे पंजीकृत सदस्य भी पौलिसी में संलग्न होते हैं. उदाहरण के तौर पर अगर पिता ने अपने हेल्थ इंश्योरेंस  के प्लान में पत्नी और बच्चों को पंजीकृत कराया है तो जरूरत पड़ने पर उन को भी कवर किया जाता है. आमतौर पर फैमिली फ्लोटर प्लान को लोग तरजीह देते हैं. भारत में आजकई बीमा कंपनियां हैं जो अच्छी और सुलभ हेल्थ इंश्योरेंस  पौलिसी मुहैयया कराती हैं. हाल ही पंजाब नेश नल बैंक ने इस क्षेत्र में बढती आर्थिक संभावनाओं के चलते मेट लाइफ के साथ करार किया है. इसी तरह आईसीआईसीआई बैंक ने भी लोम्बार्ड कंपनी के साथ हेल्थ इंश्योरेंस  के क्षेत्र में करार किया है. 

यों तो सभी बीमा कंपनी बेहतर सुविधाओं और क्लेम का दावा करती हैं और देती भी हैं पर बीमा के मामाले में सबसे जरूरी बात यही होती है कि हम उससे जुड़े सभी नियमों, श र्तों को भलीभांति समझ लें. कुछ गंभीर रोगों के लिए बीमा कंपनिया कवर नहीं देती इसलिए यह अवश्य पता कर लेना चाहिये कि किन बीमारियों का बीमा होता है और किनका नहीं.

कैसे कैसे हेल्थ इंश्योरेंस  
बाजार में कई तरह की हेल्थ इंश्योरेंस  पौलिसी मौजूद हैं. सब कंपनियां प्रतिस्पर्धा के चलते कम राषि और बेहतरीन सुविधाओं से लैस आकर्शक प्लान दे रहीं हैं.उम्र और बीमारियों के आधार पर सबके लिए अलग अलग पौलिसी मुफीद हो सकती है. बाजार में मौजूदा कुछ हेल्थ प्लान की बात करें तो आईसीआईसीआई लोंबार्ड जनरल की कंप्लीट हेल्थ इंश्योरेंस, हेल्थ केयर प्लस, हेल्थ एडवांटेज प्लस, पर्सनल प्रोटेक्ट, क्रिटिकल केयर पौलिसी के अलावा अवीवा का अवीवा हेल्थ सिक्योर और आई लाइफ, बजाज अलायंज की इंडीविजुअल हेल्थ गार्ड, फैमिली फ्लोटर हेल्थ गार्ड व एक्स्ट्रा केयर, एगौन रेलीगेर का आई हेल्थ प्लान, कौम्प्रिहेंसिव हेल्थ प्लान आदि प्रमुख हैं.
इन ढेरों प्लान के तहत हर बीमा कंपनी की अलग अलग क्लेम राषि, प्रीमियम, सेवाएं, सुविधाएं और प्रोसेसिंग हैं. उदाहरण के तौर पर आईसीआईसीआई लोंबार्ड जनरल की कंपनलीट हेल्थ पौलिसी में 10 लाख तक का कवर मिलता है. इसके अंतर्गत 46 साल से कम उम्र वाले बीमा ग्राहक को मेडिकल टेस्ट की कोई जरूरत नहीं होती. अगर बात उम्र की करें तो इसे कोई भी ले सकता है. फिर भी कागजी तौर पर फैमिली फ्लोटर पौलिसी के लिए 3 महीने और इंडीविजुअल प्लान के लिए 6 साल है. इसके अलावा प्लान में पौलिसी लागू होने के 30 दिनों के अंदर किसी बीमारी पर क्लेम की सुविधा नहीं हैं सिवाए एक्सीडेंट की घटना के. इसी तरह क्लेम को लेकर और भी कई नियम होते हैं जो बीमा एजेंट पौलिसी देने से पहले ग्राहकों को बताते हैं. 
इसी कंपनी का एक और प्लान हेल्थ एडवांटेज प्लस ओपीडी के खर्च भी कवर करता है जबकि अन्य कई कंपनियां ऐसा नहीं करती. प्लान में 40 हजार से ज्यादा अस्पतालों का भारत भर में नेटवर्क हैं. आप अपने सुविधा से नजदीकी अस्पताल चुन सकते हैं. कुछ हेल्थ इंश्योरेंस  कंपनियां गंभीर बीमारियों जैसे कैंसर या हृदय संबंधी रोग से पीडि़त होने पर एक बार लाभ देते हैं. इसे एड औन हेल्थ कवर कहते हैं.
आईसीआईसीआई लोंबार्ड के अलावा इंडस इंड बैंक भी हेल्थ इंष्योंरेस देता है. यह अपनी विभिन्न हेल्थ पौलिसी के तहत भारत के 2200 से भी अधिक अस्पतालों में बिना नकदी दिए भर्ती रहने की सुविधा प्रदान करता है. यह भर्ती होने से पहले और अस्पताल से घर जाने के बाद के उपचार के दौरान हुए खर्च को भी भरता है. इनका दावा है कि चिकित्सा व्ययों का अस्पताल से निवृत्ति के 90 दिन तक भुगतान भी बीमा के तहत होता है. भारत की कोई भी अन्य हेल्थ इंश्योरेंस  पौलिसी इस सुविधा की बराबरी नहीं करती. ऐसी कई कंपनी हैं जो अलगअलग राषि के हेल्थ इंष्यारेंस पर कई लुभावनी सुविधाएं देती है. स्वास्थ्य बीमा कंपनी के सभी नियम व श र्तों का विवरिण यहां संभव नहीं. इसलिए जब भी स्वास्थ्य बीमा लें अपने बीमा फार्म को तसल्ली से पढें और एजेंट से सभी षंकाओं का समाधान कराएं.



इंश्योरेंस और राशि 
रही बात कीमत की तो इसकी इसके लिए कोई तय रकम नहीं है. हां, अपनी आय, स्वास्थ्य समस्याओं और जिम्मेदारियों के आधार पर बीमा तय करना फायदेमंद होता है. 21 से 25 साल की उम्र में आप 2 से 3 लाख रुपये का स्वास्थ्य कवर ले सकते हैं. बाद में इस कवर की राषि बढाई भी जा सकती है. वहीं अगर फैबिली मेंबर की आयु 28 से 35 के बीच है तो 3 से 5 लाख का फैमिली फ्लोटर प्लान लेकर बाद में आवष्यकताओं के अनुरूप राषि में इजाफा किया जा सकता है. हालांकि एक्पर्ट मानते हैं कि हेल्थ इंश्योरेंस  जितना जल्दी लिया जाए उतना ही फायदेमंद होता है. क्योंकि बाद में उम्र ज्यादा होने या किसी बीमारी का पता चलने पर या कई बीमा कंपनियां बीमा करने से इंकार कर देती हैं. और जो करती भी हैं उनका प्रीमियम बहुत ज्यादा होता है.
बीमारी, सुविधाएं और कवर
आमतौर पर 45 साल से कम उम्र के हैं तो पॉलिसी लेने से पहले किसी मेडिकल चेकअप की जरूरत नहीं होती. कुछ कंपनियों में यह उम्र 60 साल भी है. सामान्यत रक्तचाप, डाबिटीज, एसजीपीटी, कौलेस्ट्रोल, यूरीन रुटीन, ईसीजी, चेस्ट का एक्सरे, मोतियाबिंद और ग्लूकोमा आदि का मैडिकल टेस्ट करवाना पड़ता है. कुछ बीमारियां  मसलन एचआईवी, मनोरोग आदि कभी कवर नहीं होते. 
कुछ में प्लान ऐम्बुलेंस खर्च, हौस्पिटल का रोजाना का खर्च आदि भी कवर होते हैं. हालांकि मैटरनिटी का खर्च आमतौर पर कवर नहीं होता, लेकिन मैक्स बूपा और अपोलो म्यूनिख जैसी कुछ कंपनियां कुछ सीमा और शर्तों के साथ यह कवर दे देती हैं. हालांकि डाक्टर अग्रवाल का मनाना है कि ओपीडी भी इंश्योरेंस  के दायरे में आना चाहिए. इसके अलावा इंश्योरेंस  के लिए उम्र की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए और स्वास्थ्य बीमा जीवनपर्यंत चलना चाहिए.
गौरतलब है कि अब हेल्थ इंश्योरेंस सेक्टर में पोर्टेबिलिटी लागू हो चुकी है. इसलिए जब बीमा कंपनी पौलिसी के रिन्यूअल के दौरान प्रीमियम बढाए तो आप कंपनी बदल सकते हैं. हेल्थ इंश्योरेंस  पर टैक्स में भी छूट मिलती है. इसके अलावा समय और धन की बचत के लिए औनलाइन हैल्थ पौलिसी खरीदना एचित रहता है.
        
    गौर करने वाली कुछ बातें
  •    बीमा लेने के दौरान कंपनी को सही सूचनाएं दें अन्यथा क्लेम में मुष्किल होगी.
  •    बीमा की सभी शर्तों और सुविधाएं को अच्छे से समझें.
  •   बीमा लेने से पहले अन्य बीमाओं के दामों की जांच कर लें.
  •   फैमिली के लिए फैमिली फ्लोटर योजना को प्राथमिकता दें.
  •   बीमा एजेंट का लाइसेंस नम्बर अवष्य चेक करें.
  •   बीमा में क्या कवर होगा और क्या नहीं, जरूर पता करें.
  •   कंपनी से जुड़े अस्पतालों के नेटवर्क से अपनी सुलाभता जरूर देखें. 
  •   क्लेम के वक्त का सम एश्योर्ड और लिमिट के बारे में जानकारी लें.
  •  समय और धन की बचत के लिए औनलाइन पौलिसी खरीदें.
  •  हेल्थ इंश्योरेंस  करवाएं और टैक्स छूट का लाभ उठाएं.
  •  फार्म को तसल्ली से पढें और एजेंट से सभी षंकाओं का समाधान कराएं.


Monday, March 4, 2013

ताकि होली न हो बदरंग




पिछले साल की होली की बात है. होली के रंगों में पूरा देष सराबोर था. उसी दरम्यान खबर आई कि मुंबई के धारावी इलाके में लगभग 150 से ज्यादा बच्चों को रंग खेलते वक्त अचानक खुजली और उल्टी होने लगी. सभी को अस्तपाल लाया गया. पता चला कि होली में कैमिकलयुक्त रंगों के प्रयोग के चलते यह हादसा हुआ. इस हादसे के चलते मौजमस्ती और रंगों का उत्सव होली इन परिवारों के लिए मातम में तब्दील हो गया. कुछ ऐसा ही मेरठ की लड़की के साथ हुआ. किसी मनचले ने कैमिकल रंगों से भरा गुब्बारा उसके चेहरे पर मार दिया. रंग आंखों में चला गया वह टेम्पोरेरी ब्लाइंडनेस का षिकार हो गई.
अक्सर होली के दौरान इस तरह की घटनाएं प्रकाष में आती रहती हैं. इसके बावजूद न तो हम इन से सबक लेते हैं और न ही होली में कैमिकलयुक्त रंगों से तौबा करते हैं. लिहाजा रंगों के इस त्योहार में गाहेबेगाहे भंग पड़ती रहती है. होली आते ही बाजार रंगबिरंगे रंगों और गुलाल से सज जाते हैं. यों तो बाजार में नेचुरल कलर भी बिकते हैं और कैमिकल वाले भी. पर कैमिकल कलर्स की तुलना में नेचुरल कलर्स थोड़ा महंगे होते हैं. षायद यही कारण है लोग प्राकृतिक रंगों के बजाए कैमिकल कलर्स से होली खेलते हैं.
दरअसल रंग कई प्रकार के रसायनों से बने होते हैं जो मानव शरीर के लिए बेहद घातक साबित होते हैं. इन जहरीले रंगों के प्रयोग से किसी को स्किन इंफैक्शन होता है तो किसी की आंखे जख्मी हो जाती है. कई बार तो ये जहरीले रंग लोगों को अंधा तक कर देते हैं. बच्चों और गर्भवती महिलाओं पर इन कैमिकल्स का असर तो दोगुना होता है.
डाक्टर वीरेंद्र नाथ गर्ग के मुताबिक हर रंग में अलगअलग तरह के षरीर को नुकसान पहुंचाने वाले कैमिकल होते हैं. जैसे काला रंग. यह रंग लेड औक्साइड के मिश्रण से बनता है. इस के इस्तेमाल से किडनी प्रभावित होती है और लोग मंदबुद्धि के भी हो सकते हैं. इसलिए हमेषा रासायनिक रंगों के बजाए प्राकृतिक व सूखे रंगों मसलन गुलाल आदि से ही होली खेलनी चाहिए. क्योंकि होली का त्योहार खुषियां मनाने के लिए होता है, अस्पतालों के चक्कर काटने के लिए नहीं.
रासायनिक रंगों में लेड औक्साइड, एल्यूमिनियम ब्रोमाइड व लेट सल्फेट जैसे रसायन होते हैं, जिनका असर सीधे शरीर की त्वचा पर पड़ता है. कई रसायन तो इतने खतरनाक होते हैं कि इन से बच्चों को किडनी फेल, हार्ट अटैक, फेफडे का इंफेक्शन, कैंसर और अस्थमा जैसे घातक परिणाम भुगतने पड़ते हैं. इस के अलावा स्किन कैंसर, एग्जिमा या फिर फोड़ेफुंसी भी हो सकते हैं. स्वास्थ्य विभाग की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल लगभग 80 प्रतिशत लोगों को कैमिकल कलर्स के साइडइफेक्ट का षिकार होना पड़ता है.
रंगों के अलावा कई बार कुछ षरारती किस्म के लोग चमकीले पेंट या ग्रीस या कीचड़ से भी होली खेलते हैं. जबकि ये पदार्थ तो रासायनिक रंगों से भी ज्यादा खतरनाक होते हैं. डर्मेटोलोजिस्ट और चिकित्सकों की मानें तो रंगों में आजकल कैमिकल के अलावा रेत और डिटरजेंट पावडर भी मिलाया जा रहा है. जो त्वचा  आंखों, सांस की नली और बालों के लिए बेहद खतरनाक है. कई बार टेंपरेरी ब्लाइंडनेस का भी खतरा रहता है. इसलिए हम सबको हितायती तौर पर कैमिकल रंगों को छोड़ प्राकृतिक रंगों से होली खेलनी चाहिए. इससे त्योहार भी मजे से मनाया जा सकता है और विभिन्न  शारीरिक नुकसानों से भी बचा जा सकता है.


फिर भी अगर केमिकल रंग का प्रयोग करते हैं और इससे शरीर पर बुरा असर पड़ता है तो तुरंत चिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए ताकि प्रारंभिक दौर में ही बीमारी को रोका जा सके. लेकिन समझदारी तो इसी में हैं कि इस तरह के हादसों को कोई मौका ही न दिया जाए. अभिभावक बच्चों को होली खेलने के लिए सूखे रंग और गुलाल दें ताकि किसी की होली बदरंग न हो. गुलाल में रसायनों का प्रयोग नहीं किया जाता है. इसके अलावा ये ईको फ्रेंडली भी होता है. अगर आप भी अपने परिवार के साथ एक याादगार और हेल्दी होली खेलना चाहते हैं तो थोड़ी सी सावधानी बरतें ताकि होली खुषियों के रंगों से सराबोर हो.


   होली में क्या करें और क्या न करें

  • गीले रंगों से मुंह को बचाएं, रंग को मुंह के अंदर न जाने दें.
  • रंग खेलने से पहले नारियल तेल या जैतून का तेल लगाएं,
  • सरसों का तेल कतई न लगाएं.
  • षरीर को ढकने वाले कपड़े पहनकर होली खेलें
  • गुब्बारे में पानी भरकर किसी को न मारें.
  • सूखे रंग, गुलाल या हर्बल रंगों से ही होली खेलें.
  • रसायनिक रंगों का इस्तेमाल कतई न करें
  • चमकीले पेंट, कीचड़ या ग्रीस से होली ना खेलंे.
  • कान, मुंह और आखों में रंग जाने पर तुरंत साफ करें.
  • रंग साफ करने हेतु बेसन, दही आदि का इस्तेमाल करें.
  • रंग उतारने के लिए हार्ड साबुन, डिटरजंट या शैंपू का प्रयोग न करें.
  • रंग को धोने के लिए बेसन, दही आदि का इस्तेमाल करें.
  • त्चचा को रगड़े नहीं समय के साथ रंग फीका पड़ जाएगा.
  • रंग खेलते समय कौंटेक्ट लेंस न लगाएं,
  • अगर आंख में रंग चला जाए तो उसे तुरंत साफ पानी से धोएं.
  • होली खेलते समय जलन, उल्टी या खुजली हो तो तुरंत चिकित्सक से मिलें.