Tuesday, March 15, 2011

क्रिकेट वर्ल्डकप: जाने कहां गुम हो जाती हैं ये टीमे





वर्ल्डकप 2011 अब तक अपने रोमांचक दौर पर है. जैसा कि हर बार होता है, इस बार भी कई उलटफेर हुए और आगे भी होंगे. जिन टीमों को फिसड्डी माना जाता है या यूं कहें कि जिन्हें स़िर्फ ग्रुप की लिस्ट लंबी करने के लिए शामिल किया जाता है, वही टीमें शुरुआती दौर में बड़ी-बड़ी टीमों को हराकर या उन्हें कांटे की टक्कर देते हुए रोमांचक मोड़ पर लाकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं. इन टीमों में आयरलैंड, नीदरलैंड, ज़िम्बाब्वे, कनाडा और बांग्लादेश का नाम लिया जा सकता है.

 इन सभी टीमों में एक चीज कॉमन है, वह यह कि इन सभी टीमों के नाम अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में स़िर्फ तब सुनाई देते हैं, जब वर्ल्डकप का आयोजन होता है. उसके बाद पता नहीं, ये सारी टीमें कहां ग़ायब हो जाती हैं. हालांकि इस मामले में कुछ हद तक बांग्लादेश को अपवाद माना जा सकता है. यह टीम कभी-कभी एशियाई देशों में होने वाली क्रिकेट प्रतिस्पर्धाओं में खेलती हुई ऩजर आ जाती है, लेकिन प्रदर्शन वही ढाक के तीन पात वाला ही रहता है. अपनी पिचों और 35,000 लोगों के बीच किसी भी टीम का हौसला बढ़ सकता है. ऐसे में वह कोई बड़ा चमत्कार करे तो कोई आश्चर्य नहीं. इसके अलावा एक महत्वपूर्ण कारण यह है कि इस तरह की टीमों के पास खोने के लिए कुछ खास नहीं होता. ऐसे में उन पर जीतने का कोई खास दबाव नहीं होता है और उस दबाव मुक्त माहौल में वे बेहतरीन प्रदर्शन कर जाती हैं.

फिर भी यह यक्ष प्रश्न तो अभी भी क़ायम है कि आ़खिर इन टीमों का अस्तित्व वर्ल्डकप से कभी बाहर निकलेगा या फिर ये सिर्फ ग्रुप लिस्ट बढ़ाती ही ऩजर आएंगी. कुल मिलाकर कहने का मतलब यह है कि विश्वकप में अपने उलटफेर प्रदर्शन से बड़ी-बड़ी टीमों के छक्के छुड़ाने वाली इन नई नवेली टीमों का आ़खिर बाद में क्या होता है. इस प्रतिस्पर्धा के खत्म होने के बाद ये कहां गायब हो जाती हैं. बाद में जब भी कोई बड़ी क्रिकेट प्रतियोगिता होती है तो इन्हें उसमें शामिल क्यों नहीं किया जाता है. अगर इनका प्रदर्शन इतना ही खराब होता तो फिर ये उलटफेर क्यों करतीं, जैसा कि इस बार इंग्लैंड और का़फी हद तक पाकिस्तान के साथ हो चुका है. अगर इस पर यह तर्क दिया जाए कि ये उलटफेर स़िर्फ तुक्के के बल पर हुए हैं तो इसका मतलब ये टीमें अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भाग लेने लायक हैं ही नहीं. आ़खिर कब तक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में वहीं गिने-चुने देशों के नाम सुनाई देते रहेंगे? क्या कभी ऐसा भी होगा, जब टॉप रैंकिंग में इन नई नवेली टीमों को भी जगह मिलेगी? इसके पीछे की असल वजह क्या है, इस पर जानकारों की अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन इतना तो तय है कि पिछले कई सालों से हम इस तरह की टीमों को स़िर्फ लिस्ट भरने के तौर पर ही देखते आ रहे हैं और शायद आगे भी यही देखते रहेंगे. इसका मतलब तो यही हुआ कि दूसरे देशों की टीमों को कभी नया मुकाम हासिल ही नहीं होगा. अगर ऐसा है तो यह बहुत सारे देशों की प्रतिभाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ होगा. हर बार कोई कमज़ोर सी टीम दिग्गज को पटक देती है और फिर पूरे वर्ल्डकप का समीकरण ही बदल जाता है. आयरलैंड ने इंग्लैंड को हराकर ऐसा ही किया है. हालांकि आयरलैंड की जीत के पीछे इंग्लैंड की दिशाहीन गेंदबाजी और घटिया क्षेत्ररक्षण की भी अहम भूमिका रही. इंग्लिश टीम को अपनी इन ग़लतियों का खामियाजा उलटफेर का शिकार होकर भुगतना पड़ा.

 इसके बावजूद आयरलैंड की मेहनत कम नहीं हो जाती. पिछले विश्वकप में भी पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसी टीमों को उलटफेर का शिकार बनाकर सनसनी फैलाने वाले आयरलैंड का नाम बीच में किसी प्रतिस्पर्धा में नहीं सुना गया. आयरलैंड के अलावा और भी कई टीमें हैं, मसलन हॉलैंड, कनाडा और नीदरलैंड, जो किसी भी मैच में खेल का रु़ख बदलने का माद्दा रखती हैं. बांग्लादेश का पूरा करियर ही उलटफेर की कहानी पर टिका हुआ है. इतने सालों के दौरान बांग्लादेश का नाम कभी भी टॉप रैंकिंग में नहीं आया. इस बार बांग्लादेश पहली बार वर्ल्डकप की मेजबानी कर रहा है. बांग्लादेश ने यह तो दिखा दिया कि अब वह भी ऐसे आयोजनों की मेजबानी करने में सक्षम है, लेकिन क्या वह आगे होने वाले मैचों में यह दिखा पाएगा कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उसका प्रदर्शन विश्वसनीय है. बांग्लादेश के लिए सबसे अच्छा वर्ल्डकप 2007 का था, जहां उसने पहले चरण में भारत को हराकर सुपर आठ में प्रवेश किया. सुपर आठ में भी उसने दक्षिण अफ्रीका को हराया. हालांकि इसके बाद वह सभी मैच हार गया, लेकिन इन दो ज़बरदस्त उलटफेरों ने उसे अचानक लाइम लाइट में ला दिया. उसके बाद से यह टीम आज तक छोटे-मोटे उलटफेरों के दम पर ही टिकी हुई है. इसने कभी भी यह साबित नहीं किया कि यह ए लिस्ट की रैंकिंग में शामिल होने लायक है. पिछले दो सालों में बांग्लादेश की टीम में बहुत परिवर्तन आया है. जहां उसने विदेशी धरती पर जाकर अच्छा प्रदर्शन किया है, वहीं घरेलू पिच पर भी बांग्लादेश ने पहले न्यूज़ीलैंड और फिर ज़िम्बाब्वे को एक दिवसीय सीरीज़ में हराया. अतः हम कह सकते हैं कि बांग्लादेश कुछ भी करने में सक्षम है. भारत के अलावा पाकिस्तान भी इस तरह के उलटफेरों का शिकार हो चुका है.



याद कीजिए 1999 का वर्ल्डकप, बांग्लादेश ने क्रिकेट वर्ल्डकप में पहली बार भाग लिया था. उस बार उसने लीग मैच में उलटफेर करते हुए पाकिस्तान को हराया था, लेकिन दूसरे मैचों में उसका प्रदर्शन खराब रहा. अतः उसे पहले दौर में ही बाहर होना पड़ा. ऐसा कोई नियम नहीं है कि इस तरह के उलटफेर करने वाली टीमें ए ग्रेड में नहीं आ सकती हैं. याद कीजिए 1983 का वर्ल्डकप, भारतीय टीम बेहद कमज़ोर मानी जाती थी. फिर भी किसी तरह वह वर्ल्डकप के फाइनल तक पहुंच गई. कुछ ने इसे तुक्का तो कुछ ने तक़दीर का खेल बताया. फाइनल में पहले बल्लेबाजी करते हुए टीम मात्र 183 रनों पर आउट हो गई. ज़्यादातर लोगों ने यह पक्का कर दिया कि यहां से भारत स़िर्फ उपविजेता ही बन सकता है, लेकिन बाद में मोहिंदर अमरनाथ की जादुई गेंदबाजी और कपिलदेव के करिश्माई कैच ने भारत को विश्व चैंपियन बना दिया. निश्चित तौर पर यह वर्ल्डकप का अब तक का सबसे बड़ा उलटफेर है. इसके दम पर चैंपियन बनने वाली उस व़क्त की कमज़ोर भारतीय टीम आज नंबर वन की पोजीशन में है. इससे यह तो साबित होता है कि पहली बार खेलना इस बात का ठप्पा नहीं हैं कि आप आगे भी न खेल पाओ. इसके अलावा कुछ और बड़े उलटफेरों पर ग़ौर फरमाइए. 2007 में आयरलैंड बनाम पाकिस्तान का मैच. भला उस मैच को कोई कैसे भूल सकता है. पिछले वर्ल्डकप में पाकिस्तान की टीम आयरलैंड की कमज़ोर टीम के सामने 132 रनों पर ऑल आउट हो गई थी. इसके बाद खुद आयरलैंड के सात विकेट 113 रनों पर गिर गए. उसी दौरान ट्रेंट जॉनटन ने छक्का मारकर अपनी टीम को ऐतिहासिक जीत दिला दी. उस रात पाकिस्तान के कोच बॉब वूल्मर को दिल का ऐसा दौरा पड़ा कि वह कभी उठ नहीं पाए. पाकिस्तान वर्ल्डकप से बाहर हो गया. पिछले वर्ल्डकप में अगर आयरलैंड ने पाकिस्तान को बाहर किया तो पिद्दी समझे जाने वाले बांग्लादेश ने भारत को. टीम इंडिया ने 191 रनों का कमज़ोर स्कोर बनाया, जिसे बांग्लादेश की टीम ने आसानी से पार कर लिया. इसी हार के बाद भारत को बाहर जाना पड़ा. इसी तरह 1983 में एक तरफ बॉर्डर, मार्श लिली और थॉमसन जैसे क्रिकेटरों से सजी ऑस्ट्रेलिया की टीम थी तो दूसरी तऱफ क्रिकेट की दुनिया में पहला क़दम रख रही जिम्बाब्वे. पर डंकन फ्लेचर की जादुई पारी के साथ जिम्बाब्वे ने 239 रन बना डाले, नतीजतन आस्ट्रेलिया हार गया.

2003 के वर्ल्डकप में केन्या ने भारतीय क्रिकेटर संदीप पाटिल की कोचिंग में ज़बरदस्त प्रदर्शन किया और विश्व विजेता रह चुकी श्रीलंका की टीम को परास्त करते हुए सेमी फाइनल तक जगह बना ली. हालांकि विशेषज्ञ कुछ और कारणों का ज़िक्र करते हैं. उनका मानना है कि इस तरह की टीमें उलटफेर कुछ खास कारणों से कर पाती हैं. मसलन वर्ल्डकप में बांग्लादेश के पास सबसे बड़ा लाभ यह है कि वह मैच अपने घर में खेल रहा है. अपनी पिचों और 35,000 लोगों के बीच किसी भी टीम का हौसला बढ़ सकता है. ऐसे में वह कोई बड़ा चमत्कार करे तो कोई आश्चर्य नहीं. इसके अलावा एक महत्वपूर्ण कारण यह है कि इस तरह की टीमों के पास खोने के लिए कुछ खास नहीं होता. ऐसे में उन पर जीतने का कोई खास दबाव नहीं होता है और उस दबाव मुक्त माहौल में वे बेहतरीन प्रदर्शन कर जाती हैं. फिर भी यह यक्ष प्रश्न तो अभी भी क़ायम है कि आ़खिर इन टीमों का अस्तित्व वर्ल्डकप से कभी बाहर निकलेगा या फिर ये सिर्फ ग्रुप लिस्ट बढ़ाती ही ऩजर आएंगी.

Tuesday, March 8, 2011

करे कोई भरे कोई

हमारे देश में क्रिकेट के अलावा लगभग सभी खेलों की स्थिति एक जैसी है यानी बदहाल और उपेक्षित. भले ही वे क्षेत्रीय स्तर पर होने वाले खेल हों या फिर राज्य स्तर पर. जब भी इन खेलों का आयोजन होता है, कभी मेज़बानी को लेकर समस्या पैदा हो जाती है तो कभी प्रायोजकों की भागीदारी को लेकर. अगर भूले-भटके उक्त दोनों समस्याओं से निजात मिल भी जाए तो असुविधा और बदइंतज़ामी मार जाती है.


इन सभी समस्याओं से इतर भी एक समस्या है, जिस पर शायद ही किसी का ध्यान जाता हो. यह समस्या है उन प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की, जो इन बदइंतज़ामियों के शिकार हो जाते हैं. उनका करियर शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाता है. कई सालों के अथक परिश्रम और प्रशिक्षण के बाद वे इस तरह की प्रतिस्पर्धाओं के लिए तैयार होते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि कब ये खेल राजनीति या फिक्सिंग के शिकार होकर उनका करियर चौपट कर देंगे. इस बात पर किसी का भी ध्यान नहीं जाता कि अगर एक बार म़ेजबानी छिन जाए तो कितना नुक़सान होता है. प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को नुक़सान तो होता ही है, साथ ही राज्य को आर्थिक क्षति भी होती है. उदाहरण के लिए आयोजन के पहले विज्ञापन हेतु लाखों रुपये खर्च हो जाते हैं.

कई समितियां बनाई जाती हैं, जिन पर मोटा खर्च आता है. इसके अलावा जो बदनामी होती है, वह अलग. 33वें राष्ट्रीय खेलों की स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी. वर्ष 2003-2004 में उसके आयोजन के लिए हरी झंडी भी मिल गई थी, लेकिन आज तक पता नहीं चल पाया कि उस आयोजन के रद्द होने के पीछे क्या कारण थे. ऐसा नहीं है कि इन खेलों का आयोजन एक बार ही रद्द हुआ हो, चार बार राष्ट्रीय खेलों के आयोजन रद्द हो चुके हैं. अब जाकर ये खेल संपन्न हुए हैं. लोग जश्न मना रहे हैं. कई प्रतिस्पर्धाओं में झारखंड के खिलाड़ियों ने कई पदक भी अपने नाम किए हैं, लेकिन इस बार प्रतिस्पर्धा में शामिल होने वाले खिलाड़ी नए थे. इनमें वे खिलाड़ी नहीं थे, जो पिछले आयोजन को लेकर तैयार थे. पुराने खिलाड़ी अपनी प्रतिभा दिखाने से वंचित रह गए. अगर ये राष्ट्रीय खेल सही समय पर होते तो इनकी तस्वीर कुछ और ही होती. खेल संघ को शायद इस बात का अंदाजा नहीं है कि इस दौरान खिलाड़ियों का कितनाक़ीमती वक्त बर्बाद हुआ. उन्हें सही समय पर अपनी प्रतिभा दिखाने का मौक़ा नहीं मिला. ग़ौरतलब है कि हर बार राष्ट्रीय खेलों के ज़रिए खिलाड़ियों की एक नई पीढ़ी उभर कर सामने आती है, लेकिन अगर एक बार प्रतिस्पर्धा रद्द हो जाए या मेज़बानी छिन जाए तो न जाने कितनी प्रतिभाएं गुमनामी में खो जाती हैं.जिन खिलाड़ियों को पिछली बार अवसर नहीं मिला, उनमें से कुछ खिलाड़ी इस बार की प्रतिस्पर्धा में शामिल तो हुए, पर उम्र ज्यादा होने या अन्य कारणों से भाग लेने से वंचित रह गए.

 झारखंड में खेलों की बदहाली के पीछे के कारणों को समझना जरूरी है. दरअसल जब भी इस तरह के आयोजन होते हैं तो सभी राज्यों को मेज़बानी के लिए दावेदारी करनी होती है. यह दावेदारी राज्यों द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली बेहतरीन सुविधा के आधार पर मजबूत होती है. बस इसी मामले में झारखंड की हालत ढीली हो जाती है. इस बात पर किसी का भी ध्यान नहीं जाता कि अगर एक बार म़ेजबानी छिन जाए तो कितना नुक़सान होता है. प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को नुक़सान तो होता ही है, साथ ही राज्य को आर्थिक क्षति भी होती है. उदाहरण के लिए आयोजन के पहले विज्ञापन हेतु लाखों रुपये खर्च हो जाते हैं. कई समितियां बनाई जाती हैं, जिन पर मोटा खर्च आता है. इसके अलावा जो बदनामी होती है, वह अलग. इस सबके बावजूद झारखंड ने महेंद्र सिंह धोनी के अलावा हॉकी, तीरंदाज़ी, एथलेटिक्स और अन्य खेलों में कई बेहतरीन खिलाड़ी दिए हैं. सोचने वाली बात यह है कि अगर इस सुविधाविहीन माहौल में इतनी प्रतिभाएं पैदा हो सकती हैं तो फिर अगर सब कुछ सही समय पर और सुविधाओं के साथ हो तो खेलों और खिलाड़ियों का भविष्य कितना उज्ज्वल होगा. 

विश्‍वकप- 2011: आगाज खूबसूरत है अंजाम क्‍या होगा




ढाका के ऐतिहासिक बंग बंधु स्टेडियम में विश्वकप का आ़गा़ज एक भव्य समारोह के साथ हो गया. समारोह में दुनिया भर के सुप्रसिद्ध कलाकारों के साथ-साथ विश्वकप में भाग लेने वाली 14 टीमों के कप्तानों ने भी अपने जलवे दिखाए. उद्घाटन समारोह के साथ ही सभी टीमों ने अपनी-अपनी जीत की दावेदारी की. विश्वकप उद्घाटन समारोह कई मायनों में भव्य और खास रहा. समारोह में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने औपचारिक रूप से विश्वकप शुरू होने की घोषणा करते हुए कहा कि यह प्रतियोगिता सफल होगी. इस मौके पर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) के प्रमुख शरद पवार भी मौजूद थे. इस रंगारंग कार्यक्रम में सबसे पहले बांग्लादेश के गायकों ने समां बांधा, फिर बारी आई सभी 14 टीमों के कप्तानों की. पहले मैदान के बीचोंबीच ठेले पर लोगो स्टंपी आया, फिर टीमों के कप्तान छोटे बच्चों के साथ सजे-धजे रिक्शे पर बैठकर आए. इस दौरान पूरा स्टेडियम विश्वकप थीम गीत-दे घुमा के से गूंज रहा था.

विश्वकप के लिए टीम इंडिया ने जो रणनीति बनाई थी, वह लीक हो गई. विश्वकप जैसी बड़ी प्रतियोगिता में दबदबा बनाने के लिए हर टीम अपनी एक खास रणनीति बनाती है. ज़ाहिर है, भारत ने भी एक रणनीति बनाई थी. टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और कोच गैरी कर्स्टन ने मिलकर अपनी योजना 150 पेजों के दस्तावेज में दर्ज की है. इस दस्तावेज को धोनी और कर्स्टन ने आओ अपना सपना साकार करें नाम दिया है, लेकिन टीम इंडिया का यह गुप्त दस्तावेज मीडिया में लीक हो गया है.

ग़ौरतलब है कि विश्वकप थीम को शंकर-एहसान-लॉय की तिकड़ी ने कंपोज किया है. इसी क्रम में पहले तीन बार के चैंपियन रिकी पोंटिंग बंग बंधु स्टेडियम पहुंचे. हर कप्तान के साथ रिक्शे में एक बच्चा था. पोंटिंग के बाद कनाडा के  कप्तान आशीष बगई, इंग्लैंड के कप्तान एंड्रयू स्ट्रॉस, आयरलैंड के कप्तान विलियम पोर्टरफील्ड, केन्या के जिमी कमांडे, हालैंड के पीटर बोरेन, न्यूजीलैंड के डेनियल विटोरी, पाकिस्तान के शाहिद आफरीदी, दक्षिण अफ्रीका के ग्रीम स्मिथ, वेस्टइंडीज के डेरेन सैमी और जिंबाब्वे के एल्टन चिगुंबुरा स्टेडयम में आए. फिर भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने इंट्री की. धोनी के बाद श्रीलंकाई कप्तान कुमार संगकारा और फिर मेजबान बांग्लादेश के कप्तान शाकिब अल हसन ने तालियों की गड़गड़ाहट के बीच स्टेडियम में प्रवेश किया. मशहूर गायक सोनू निगम ने अंग्रेजी गीत राइज अप फोर ग्लोरी गाकर सबको झूमने पर मजबूर कर दिया. रूना लैला के गीत दमादम मस्त कलंदर की भी ख़ूब सराहना हुई. इसके बाद अंतरराष्ट्रीय पॉप गायक ब्रायन एडम्स ने अपनी गायिकी का जादू बिखेरा. आख़िर में शंकर, एहसान और लॉय ने दे घुमा के गाकर माहौल में जोश भर दिया. इसके बाद हुई जमकर आतिशबाज़ी. रोशनी से जगमग स्टेडियम आतिशबाज़ी से गूंज उठा और एक अच्छे विश्वकप के आयोजन के वादे के साथ ख़त्म हुआ उद्घाटन समारोह.

हमारा देश इस महा आयोजन का आयोजक देश होने पर गर्व की अनुभूति कर रहा है.

- शेख हसीना, प्रधानमंत्री, बांग्लादेश


यह तो था विश्वकप का आग़ाज़, लेकिन इसका अंजाम भी इतना ही खूबसूरत होगा, इस बात को लेकर खेलप्रेमियों से लेकर आयोजकों तक के मन में संशय बरक़रार है. इस संशय की वजह हैं, मैच के पहले ही सुर्खियों में आईं विवादास्पद खबरें. हालांकि कई खबरों में का़फी हद तक सच्चाई भी है. अपने घर में विश्वकप खेल रही टीम इंडिया इस खिताब को जीतने के लिए पूरे जोश में है. कई कीर्तिमान रच चुके महेंद्र सिंह धोनी अपने नाम एक और इतिहास करने को आतुर हैं. इसके लिए उन्होंने अपने फॉर्म को भी दोबारा हासिल कर लिया है. लेकिन फिर भी कई सारी अड़चनें हैं, जो विश्वकप में भारत की जीत केआड़े आ सकती हैं. सबसे पहले तो टीम इंडिया के प्रदर्शन की बात करते हैं. टीम इंडिया के सामने सबसे बड़ा सवाल क्षेत्ररक्षण है. टीम इंडिया की कमज़ोर कड़ी उसकी फील्डिंग है. कुछ खिलाड़ियों को छोड़कर टीम में फुर्तीले फील्डरों की कमी है. इस कमी की वजह से कई ऐसे मौक़े आए हैं, जबकि टीम इंडिया को जीता हुआ मैच गंवाना पड़ा है. यदि भारतीय टीम अपनी इस कमज़ोरी पर क़ाबू पा ले तो कई सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे. इसके अलावा तेज़ गेंदबाजों का ज़्यादा रन लुटाना भी टीम को नुकसान पहुंचा सकता है. कई अवसरों पर देखा गया है कि जब मैच भारत के पक्ष में जा रहा होता है तो भारतीय बल्लेबाज अति आत्मविश्वासी होकर रन लुटाना शुरू कर देते हैं. नतीजतन टीम इंडिया को इसका खामियाजा हार के रूप में चुकाना पड़ता है. टीम प्रबंधन को तेज़ गेंदबाजी पर काम करने की भी ज़रूरत है.

भारतीय उपमहाद्वीप के लिए यह एक ऐतिहासिक दिन रहा और ऐसा भव्य उद्घाटन समारोह पहले मैंने कभी नहीं देखा. वन डे वर्ल्डकप आईसीसी का फ्लैगशिप टूर्नामेंट है. इसमें खेलना हर खिलाड़ी का सपना होता है.

- शरद पवार, आईसीसी प्रमुख

इतना का़फी नहीं था कि विश्वकप के लिए टीम इंडिया ने जो रणनीति बनाई थी, वह लीक हो गई. विश्वकप जैसी बड़ी प्रतियोगिता में दबदबा बनाने के लिए हर टीम अपनी एक खास रणनीति बनाती है. ज़ाहिर है, भारत ने भी एक रणनीति बनाई थी. टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और कोच गैरी कर्स्टन ने मिलकर अपनी योजना 150 पेजों के दस्तावेज में दर्ज की है. इस दस्तावेज को धोनी और कर्स्टन ने आओ अपना सपना साकार करें नाम दिया है, लेकिन टीम इंडिया का यह गुप्त दस्तावेज मीडिया में लीक हो गया है. अब इतनी जल्दी कोई नई रणनीति बनाना आसान नहीं है. यह भी किसी हद तक नुकसान पहुंचाने के लिए का़फी है. प्रदर्शन और खेल के मैदान के बाहर फिक्सिंग का काला साया भी मंडराया रहा है, जो समय-समय पर खिलाड़ियों का ध्यान भटकाएगा. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) ने विश्वकप मैचों के दौरान खिलाड़ियों और अधिकारियों द्वारा सोशल नेटवर्किंग साइट ट्‌वीटर के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है. यह क़दम फिक्सिंग, खास तौर से स्पॉट फ़िक्सिंग को रोकने के लिए उठाया गया है. आईसीसी की भ्रष्टाचार निरोधक और सुरक्षा इकाई की पहल पर ऐसा किया गया है.


आईसीसी चाहती है कि टी-20 की तरह विश्वकप में कोई भ्रष्टाचार न हो. आईसीसी का यह क़दम खिलाड़ियों और अधिकारियों से संपर्क करने की उन लोगों की कोशिश को रोकना भी है, जो ग़ैर क़ानूनी रूप से सट्टेबाज़ी करते हैं. आईसीसी के  मीडिया मैनेजर जेम्स फ़िट्ज़गेराल्ड के मुताबिक़, विश्वकप के सभी मैचों के दौरान खिलाड़ियों और टीम अधिकारियों के ट्‌वीट करने पर पाबंदी लगा दी गई है.

अब अगर टीम इंडिया को इस बार विश्वकप का खिताब अपने नाम करना है तो इन विवादों से दूर रहने के साथ-साथ अपनी उन सभी कमज़ोरियों की ओर ध्यान देना होगा, जो उसका प्रदर्शन प्रभावित कर सकती हैं.


Tuesday, March 1, 2011

जो जीता वही सिकंदर




जब तक यह आलेख पाठकों तक पहुंचेगा तब तक विश्व कप 2011 का विजेता सामने आ चुका होगा, लेकिन अपने आख़िरी पड़ाव की ओर पहुंच चुके इस महाकुंभ में अब तक जितने भी मैच हुए हैं उनमें किसी भी तरह का रोमांच देखने को नहीं मिला. जैसा कि पहले से ही उम्मीद थी कि आयरलैंड और कनाडा जैसी दूसरी टीमें शुरुआती राउंड से ही बाहर हो जाएंगी, ठीक वैसा ही हुआ. विश्व कप का पहला हफ़्ता बहुत रोमांचक नहीं रहा, जहां क्रिकेट जगत की शीर्ष टीमों और बाक़ी टीमों के बीच का अंतर इतना बड़ा था कि मुक़ाबला एकतरफ़ा होना ही था. सभी टीमें अपना-अपना खाता निपटाकर टूर्नामेंट से बाहर हो चुकी हैं. अब बची वही कुछ चुनिंदा टीमें, जो ज़्यादातर हर विश्वकप में सेमीफाइनल में भिड़ती हैं, मसलन इंडिया, ऑस्ट्रेलिया और पाकिस्तान. अगर क्रिकेट के जानकारों की मानें तो उपमहाद्वीप से बाहर की किसी भी टीम के लिए विश्व कप जीतना बेहद मुश्किल होगा, क्योंकि यहां की परिस्थितियां ही ऐसी हैं. नीची रहने वाली और धीमी घूमने वाली विकेट में बाहर की किसी भी टीम की गेंदबाज़ी में ऐसा संतुलन नहीं है जिससे कि वह नियमित रूप से मैच जिता सके, लेकिन इसी आधार पर अन्य टीमों की दावेदारी को कमज़ोर नहीं कहा जा सकता है. दरअसल मुश्किल उनको होगी, जिनकी बल्लेबाज़ी में इतना दम नहीं है कि वे शीर्षक्रम के लड़खड़ाने पर संभल सकें. बात अगर मेज़बान देश भारत की बात की जाए तो अब तक मैच देखने के बाद यही अनुमान निकाला जा सकता है कि इसका टॉप ऑर्डर बुरी तऱफ फ्लॉप रहा है. इक्का-दुक्का खिलाड़ियों को छोड़ दिया जाए तो ज़्यादातर मैचों में बल्लेबाज़ तू चल मैं आया की तर्ज़ पर ही खेले हैं. इसी वजह से दक्षिण अफ्रीका के  ख़िला़फभारत का 19 साल बाद वनडे सीरीज जीतने का सपना अधूरा ही रह गया. इसकी सबसे बड़ी वजह टॉप ऑर्डर का फ्लॉप होना रही. इसका उदाहरण तब देखने को मिला जब भारत नागपुर में खेले गए विश्व कप क्रिकेट के एक मैच में दक्षिण अफ्रीका से तीन विकेट से हार गया. दक्षिण अफ्रीका को जीत के लिए 297 रनों की आवश्यकता थी, जो उसने दो गेंद रहते ही हासिल कर ली. इस विश्व कप में यह भारत की पहली हार थी. इसके बाद भारत का मुक़ाबला वेस्टइंडीज से हुआ. मैच की शुरुआत में तो ऐसा ही लग रहा था यह मैच भी भारत की झोली से चला जाएगा, लेकिन क़िस्मत से टीम इंडिया जीत गई. इसके बाद भारत का मुक़ाबला आस्ट्रेलिया से हुआ और इस मैच को जीतकर भारत ने शानदार वापसी करते हुए किसी हद तक अपनी दावेदारी जता दी है. अब बचता है श्रीलंका. यह एक ऐसी टीम है जिसकी गेंदबाज़ी संतुलित है, मैदान पर खिलाड़ी चुस्त हैं और बल्लेबाज़ी ठोस है. वे किसी भी टीम को चुनौती दे सकते हैं. फ़ाइनल में भारत और श्रीलंका की टक्कर की संभावना पूरी बनती है, बशर्ते दोनों टीमें नॉक आउट दौर में न टकरा जाएं. लेकिन खेल प्रेमियों समेत कई लोगों की इच्छा भारत-पाक के मैच में दिखती है. ऐसे में अब अगर सेमीफ़ाइनल में इन दोनों टीमों के भिड़ने की संभावना हो जाए तब? इस रोचक संभावना से क्रिकेट प्रेमी तो उत्साहित हैं ही, लगता है अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद भी उत्साहित है, क्योंकि हारून लोर्गाट अहमदाबाद में संवाददाता सम्मेलन में आए और उन्होंने क्वार्टर फ़ाइनल मैचों का ज़िक्र शुरू किया तो पहले बोले कि भारत और पाकिस्तान के मैच का विजेता मोहाली में खेलेगा. इससे पहले कि वह आगे बढ़ते उनके साथियों और मीडिया वालों ने उन्हें याद दिलाया कि अभी क्वार्टर फ़ाइनल में ये दोनों टीमें अलग-अलग खेल रही हैं. भारतीय उपमहाद्वीप में क्रिकेट से आईसीसी को काफ़ी मुनाफ़ा होता है और वहां भारत-पाकिस्तान के मैच की तो बात ही क्या होगी, कहीं ऐसा तो नहीं कि नज़र उस मुनाफ़े पर रखे हुए लोर्गाट साहब दिल की बात बोल गए. ख़ैर जो भी हो हालात भारत पाक के साथ ही हैं.  वैसे भारत और पाकिस्तान जैसे देश इस टूर्नामेंट से पिछली बार की तरह जल्दी ही रुख्सत न हो जाएं, इसलिए इस बार ऐसा फ़ॉर्मेट बनाया गया, जहां दोनों टीमें कम से कम क्वार्टर फ़ाइनल तक तो पहुंचे ही जाएं. पिछली बार प्रायोजकों को भारी नुक़सान उठाना पड़ा था, क्योंकि क्रिकेट के बड़े प्रायोजक भारतीय बाज़ार को निशाना बनाते हैं. अब ऐसे में सचिन तेंदुलकर की लोकप्रियता को भी भुनाने का उन्हें मौक़ा मिलता है. इसलिए उम्मीद की जा सकती है कि विश्वकप में भारत या पाक ़फाइनल तक ज़रूर पहुंचेंगे. पाकिस्तान की गेंदबाज़ी उन तमाम झटकों के बाद जिन्होंने उसकी धार को कुंद किया है, मज़बूत लगती है, लेकिन तब क्या उसकी टीम नियमित तौर पर बड़े स्कोर कर सकेगी? इस पर संदेह है. ऐसे में बचते हैं केवल दो मुख्य दावेदार और उनके दावे को पहले हफ़्ते के उनके प्रदर्शन से और बल मिलता है. भारत की बल्लेबाज़ी, ऐसी परिस्थितियों में जिससे वह भली-भांति परिचित है, वह देखने में ही डरानेवाली और ठोस लगती है. अगर उसका ऊपरी और मध्य क्रम नहीं बैठा, जिसकी संभावना ऐसे विकेटों पर कम ही है तो खिला़डी निर्दयी होकर खेलेंगे.

और उनके पास ऐसे धीमी गति के गेंदबाज़ हैं जो किसी भी टीम की बल्लेबाज़ी का कचूमर निकाल सकते हैं. फिर भी, उनका कमज़ोर-तेज़ आक्रमण, मैदान पर सुस्त हाव-भाव और अपेक्षाओं के दबाव का सामना करने की टीम की क्षमता चिंता की वजह होनी चाहिए.इसके अलावा एक और बात यह कि यह विश्वकप सचिन और पॉन्टिग का आख़िरी विश्वकप माना जा रहा है. हालांकि रिकी इस बात से इंकार करते हैं कि वह विश्वकप के बाद संन्यास ले लेंगे. रिकी से संवाददाताओं ने पूछा कि विश्व कप जैसे मुक़ाबले में सचिन और पॉन्टिंग आख़िरी बार आमने-सामने होंगे तो वह बातों ही बातों में सचिन की तारीफ़ कर गए. बोले, जहां तक हमारे अंतिम विश्व कप की बात है तो सचिन जिस फ़ॉर्म में हैं वह तो अभी एक और विश्व कप खेल सकते हैं. मैं उम्मीद कर रहा हूं कि अगले मैच से मैं भी फ़ॉर्म में लौटूंगा और अगले विश्व कप तक खेल सकूंगा. वैसे सचिन के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 99 शतक हो चुके हैं और किसी भी मैच में वह शतकों का शतक जड़ सकते हैं. उनके प्रशंसकों को भी हर मैच से पहले बेसब्री से सचिन के  उस 100वें शतक का इंतज़ार रहता है. उपरोक्त विश्लेषण और आंकड़े बताते हैं कि विश्कप के असली मुक़ाबले अभी बाकी हैं और टीमों  का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन भी. एक ओर जहां जानकार मेज़बानों की दावेदारी मज़बूत बता रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर बाक़ी टीमों का प्रदर्शन बोल रहा है कि वे किसी भी वक्त तख्ता पलट सकते हैं. ख़ैर 2 अप्रैल का फाइनल मैच इन सब कवायदों का जवाब दे देगा. 

Monday, February 21, 2011

कोलकाता में भिखारी ठाकुर फेस्टिवल



भारत में सैकड़ों भाषाएं बोली जाती हैं, लेकिन हर भाषा को सरकारी दर्ज़ा हासिल नहीं होता है. हालांकि, किसी भी भाषा को दर्ज़ा मिलने का पैमाना उस भाषा को बोलने वालों की संख्या पर भी निर्भर करता है. अगर इस आधार पर भी उस भाषा को उसका दर्ज़ा हासिल न हो तो इसे अन्याय नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे. इसी अन्याय की शिकार भोजपुरी भी है. भोजपुरी को लेकर आज उत्तर भारत समेत संपूर्ण विश्व में चाहे जितने ज़ोर-शोर से बातें की जाएं, लेकिन यह सारी बातें तब तक निरर्थक हैं जब तक हिंदुस्तान में बोली के रूप में सिसक रही भोजपुरी को भाषा का दर्ज़ा दिलाने की सही लड़ाई नहीं लड़ी जाएगी. लेकिन अब कुछ लोग आगे आए हैं, जिन्होंने भोजपुरी को उसका अधिकार दिलाने के लिए कमर कस ली है.

इसमें राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन(डब्ल्यूएजेए) का नाम प्रमुख है. बदलते दौर में यदि भाषा की बात करनी है तो निश्चित रूप से बातूनी कटघरों को तोड़ इस भाषा के साहित्य को आगे लाकर भोजपुरी भाषा का प्रचार-प्रसार करना होगा. और इसके लिए भिखारी ठाकुर तथा उनकी रचनाओं से बड़ा हथियार भला और क्या हो सकता है? इसी को ध्यान में रखते हुए देश के समस्त रचनाकारों के सम्मान-स्वाभिमान एवं विभिन्न भाषा-साहित्य के विकास हेतु दृढ़ संकल्पित राष्ट्रीय स्तर पर रचनाकारों-पत्रकारों का साझा मंच राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन(डब्ल्यूएजेए) इस मामले में बेहद गंभीर है.

 इसीलिए वह भोजपुरी के उत्थान हेतु कार्य कर रहे प्रबुद्धजनों व संस्थाओं का इस संबंध में खुला समर्थन करता है. पिछले दिनों 18 दिसंबर 2010 को भिखारी ठाकुर के जन्मदिवस पर पटना में देश के भविष्य आईआईटियंस को प्रमोट कर रही विजन क्लासेज के साथ राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने अपनी संयुक्त प्रेस कांफ्रेस में यह घोषणा की थी कि भिखारी ठाकुर को नई पीढ़ी के समक्ष सही ढंग से प्रस्तुत कर उनके साहित्य को वैश्विक प्लेटफॉर्म पर लाने की ज़रूरत है. इसके लिए प्रसिद्ध भोजपुरी गायिका कल्पना अपने महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट द लीगेसी ऑफ भिखारी ठाकुर के माध्यम से एक सार्थक पहल कर रही हैं.


भविष्य में ऐसी अनेक पहल शुरू हों और भिखारी ठाकुर व उनके साहित्य के ज़रिए भोजपुरी भाषा मान्यता की राह में कुछ क़दम आगे बढ़ सके. इसी को ध्यान में रखते हुए राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने पटना की यह कांफ्रेंस नई पीढ़ी की नई सोच व स्थानीय स्तर पर इस पहल को समर्थन देने वाले जनांदोलन की पहली कड़ी के रूप में की. पटना व मुंबई के बाद तीसरे चरण में राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन आगामी 15 मार्च 2011 को कला मंदिर, थियेटर रोड कोलकाता में भिखारी ठाकुर फेस्टिवल का आयोजन कर रहा है. जिसमें भिखारी ठाकुर व उनके विचार साहित्य को आगे बढ़ाने वाली देश की कई प्रख्यात हस्तियों को सम्मानित किया जाएगा और भोजपुरी साहित्य में भिखारी ठाकुर के योगदान पर संपूर्ण चर्चा की जाएगी. इसी तरह राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने वाईबी चौहान सेंटर, नरीमन प्वाइंट, मुंबई में राष्ट्रीय स्तर पर लेखकों-पत्रकारों के स्नेह सम्मेलन के दौरान महाराष्ट्र, गुजरात एवं मध्य प्रदेश अध्यक्षों की उपस्थिति तथा महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर.आर.पाटिल, माया गोविंद (प्रख्यात रचनाकार) समेत कई दिग्गज हस्तियों की मौजूदगी में हिंदुस्तान की समस्त क्षेत्रीय भाषाओं को मज़बूत बनाने का आह्‌वान करते हुए कल्पना के सम्मान के ज़रिए भोजपुरी व भिखारी ठाकुर की तऱफ भी राष्ट्रीय स्तर पर लोगों का ध्यान केंद्रित किया.

 पटना व मुंबई के बाद तीसरे चरण में राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन आगामी 15 मार्च 2011 को कला मंदिर, थिएटर रोड कोलकाता में भिखारी ठाकुर फेस्टिवल का आयोजन कर रहा है. जिसमें भिखारी ठाकुर व उनके विचार साहित्य को आगे बढ़ाने वाली देश की कई प्रख्यात हस्तियों को सम्मानित किया जाएगा और भोजपुरी साहित्य में भिखारी ठाकुर के योगदान पर संपूर्ण चर्चा की जाएगी. इस समारोह में विश्व भोजपुरी उत्थान सेवा संस्थान समेत कई स्थानीय संस्थाएं तथा कई बड़ी इवेंट कंपनियां राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोशिएशन के कंधे से कंधा मिलाते हुए इस पुनीत कार्य में अपना सहयोग प्रदान कर रही हैं. मुंबई से उक्त बयान जारी करते हुए राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन के राष्ट्रीय महासचिव शिवेंद्र प्रकाश द्विवेदी के मुताबिक़ कोलकाता का यह भिखारी ठाकुर फेस्टिवल कई मायनों मे बहुत खास है. सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि राजाराम मोहन राय और विवेकानंद जैसी प्रतिभाओं ने कोलकाता में ही नव जागरण का पाठ सीख कर समूचे भोजपुरी भाषियों को अपने क्रांतिकारी विचारों से अभिसिंचित किया था. ऐसे में भोजपुरियों के चहेते शहर कोलकाता में होने वाला यह भिखारी ठाकुर फेस्टिवल न केवल भोजपुरी बेल्ट में नई क्रांति लाएगा बल्कि कई मायनों में ऐतिहासिक भी होगा. जिस तरह से लोग एकजुट हुए हैं, उसे देखकर तो यही लगता है कि इस भिखारी फेस्टिवल के ज़रिए भोजपुरी की आवाज़ सही तरीक़े से उठेगी. -

Sunday, February 20, 2011

गांव से सबक लें शहरवाले




एक समय था जब भारत को गांवों को देश कहा जाता था. किसान और ज़मीन से ही देश की अर्थव्यवस्था जुड़ी हुई थी. लेकिन समय बदला और शहरों के विकास की आंधी में गांव कहीं पीछे छूट गए. कहा जाने लगा कि शहर के लोग गांव के लोगों से हर हाल में बेहतर हैं. लेकिन नोएडा से लिए गए आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां करते हैं. नोएडा में जिस तरह से शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में लड़का-लड़की का लिंगानुपात बिगड़ा हुआ है उसे देखकर यही लगता है की शहरी क्षेत्र के लोगों में लड़के की चाह कुछ ज़्यादा ही ज़ोर मार रही है.

ऐसा कुछ करते समय उनको इस बात का एहसास बिल्कुल भी नहीं होता है कि आने वाले समय में अगर लड़कियां नहीं होंगी तो उनके लड़कों की शादी के लिए देखे गए उनके  सपने कहां से पूरे होंगे? पर शायद इन मां-बाप को अभी केवल इतना ही दिखाई दे रहा है कि वे आज अपने घरों में लड़कियों को आने से रोक सकने में समर्थ हो पा रहे हैं? आने वाले समय में उनके यही क़दम उन्हें पता नहीं कहां-कहां भटकने को मजबूर कर देंगे? आंकड़ों से पता चलता है कि 2001 की जनगणना के बाद से अब कन्या लिंगानुपात में कुछ सुधार हुआ है,  पर आज भी यह संतोषजनक नहीं है.

एक तऱफ जहां ग्रामीण क्षेत्रों  में यह अनुपात 920/1000 है वहीं शहरी क्षेत्र में यह 855/1000 पर अटकी हुई है. इसका क्या मतलब निकाला जाए कि शहरी क्षेत्रों के लोग अपनी शिक्षा का इस तरह से उपयोग कर रहे हैं. . इसका क्या मतलब निकाला जाए कि शहरी क्षेत्र में लोग अपनी शिक्षा का इस तरह से उपयोग कर रहे हैं और कुछ लालची चिकित्सकों की सहायता से कुछ रुपए खर्च करके वे पूरे समाज के ताने बाने को छिन्न-भिन्न करने पर आमादा हैं.


क्या शिक्षा का यही अर्थ लगाया जाए कि कुछ लोग आधुनिक तकनीक का ग़लत इस्तेमाल करके अपने मन की करने पर लगे हुए हैं. अभी तक जिन जांचों से गर्भ में होने वाली बीमारियों का पता लगाया जाता था, उसका दुरुपयोग आज भ्रूण लिंग परीक्षण के लिए किया जा रहा है? क्या आने वाले समय में भारत चिकित्सा जगत से जुड़े इन नए आयामों के प्रयोग के लायक़ समझा भी जाएगा? क्या हमारी शिक्षा अब इतनी ही रह गई है कि हम अपने भविष्य के निर्धारण के समय इस तरह से लड़कियों को नियंत्रित करते चलें? प्रकृति अपने हिसाब से चलती है और इस तरह से प्राकृतिक असंतुलन को जन्म देने वाले यह नहीं जानते हैं कि अनजाने में वे कहीं न कहीं से सामाजिक संघर्ष को बढ़ावा दे रहे हैं? अभी तक जो काम छोटे स्तर पर किया जा रहा है अगर उसे ही पूरा देश अपना ले तो इस समाज का क्या होगा.

 आने वाले समय में लड़कों के लिए शादी योग्य लड़कियां कहां से आएंगीं? धिक्कार है ऐसे चिकित्सकों पर जो केवल कुछ रुपयों के लालच में इस तरह की घटिया हरकतें करने से भी बाज़ नहीं आते हैं? क्या आधुनिक और सभ्य समाज इसी तरह के होते हैं? इस काम की शुरुआत पंजाब और हरियाणा से हुई थी और आज भी वहां पर स्थिति कुछ सुधरी सी नहीं लगती है? कई ख़बरें तो ऐसी भी मिली कि वहां के लड़कों के लिए केरल और बिहार से लड़कियां लाई जा रही हैं? इस सारे मसले पर हम सभी को अपनी-अपनी नैतिकता के साथ जीना सीखने की आवश्यकता है और जब तक हम यह नहीं सीख सकेंगे तब तक यह असंतुलन दूर नहीं होगा. अंत में तो यही कहा जा सकता है कि गांवों के हालात शहरों से बदतर हैं और शहरों को इनसे सबक लेने की ज़रूरत है.

Thursday, February 17, 2011

ईडन गार्डनः अधूरी तैयारी ने तोड़ दिया सपना


क्या वाकई क्रिकेट वर्ल्ड कप की तैयारियों में भी एक ब़डे भ्रष्टाचार का मामला सामने आ सकता है? सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि अभी कुछ ही समय पहले जब दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेल की तैयारी चल रही थी तब भी यही सब तमाशा हुआ था. अंतरराष्ट्रीय जांच दल ने कहा कि स्टेडियम का काम पूरा नहीं है और संभव है कि खेलों का आयोजन स्थगित हो जाए. हालांकि, जैसे-तैसे काम पूरा हुआ. खेल का आयोजन भी हुआ. खेल से पहले और खेल के बाद भी राष्ट्रमंडल आयोजन समिति का भ्रष्टाचार देश के सामने निकल कर आया. क्या क्रिकेट जगत में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिलने वाला है?




एक बार श्रीलंका के पूर्व टेस्ट कप्तान मरवन अटापट्टू ने नौकरशाही के खिला़फ कहा था कि ये सारे जोकर हैं. इन जोकरों का सरदार एक बड़ा जोकर है. यदि इस बात को बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन के लिए कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा. जिस तरीक़े से बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन और उसके अध्यक्ष जगमोहन डालमिया ने ईडन गार्डन, जो कि भारत में क्रिकेट का मक्का कहा जा सकता है, को शर्मसार किया है वो निश्चित ही जोकरों का सरदार होगा. कोलकाता के लोग ही नहीं बल्कि पूरा देश और पूरे विश्व में क्रिकेट को चाहने वाले भारतीय क्रिकेट बोर्ड और बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन से नाराज़ हैं

 याद रखने वाली बात यह है कि इससे पहले ईडन गार्डन भारत का सबसे विश्वसनीय स्टेडियम था. पूर्व में भी ईडन गार्डन में विश्व कप के ब़डे-ब़डे मैच आयोजित हो चुके हैं. यह पहली बार होगा कि भारतीय टीम अपने सबसे चहेते क्रिकेट ग्राउंड पर नहीं खेलेगी. 1987 वर्ल्ड कप का फाइनल और 1996 वर्ल्ड कप का सेमीफाइनल भी ईडन गार्डन में ही हुआ था. लेकिन इस बार के वर्ल्ड कप में ईडन गार्डन का मैदान सूना ही रहेगा. आईसीसी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हारून लोर्गट ने कहा कि ईडन की असफलता दुर्भाग्यपूर्ण है. ऐसा इसलिए कहा क्योंकि, यह स्टेडियम अंतरराष्ट्रीय मैचों की मेजबानी करता रहा है फिर भी वर्ल्ड कप के लिए भारत और इंग्लैंड के बीच 27 फरवरी खेले जाने वाले मैच को स्थगित कर दिया गया था. लोर्गट ने बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष जगमोहन डालमिया को ईमेल भेज कर कहा कि मैं भी उतना ही निराश हूं कि ईडन गार्डन में मैच आयोजित नहीं हो पायेगा, लेकिन मुझ पर विश्वास कीजिए, यह मेरे हाथो में नहीं है. यह सब तकनीकी समिति का फैसला है. मैं जल्दी ही आपसे मिलना चाहता हूं क्योंकि जो भी गलत़फहमियां है, वो जल्द ही दूर हो जाएं.

 इस फैसले से न स़िर्फ क्रिकेट खिला़डी बल्कि सभी क्रिकेट प्रेमी, अन्य खेलों से जु़डे खिला़डी भी आहत हैं. ईडन गार्डन सिडनी और लॉर्डस जैसा है. इंग्लैंड के लिए जो लॉर्डस के लिए स्थान है वही ईडन गार्डन का महत्व भारत के लिए है. खाली क्रिकेटर ही नहीं पूर्व ओलंपिक खिला़डी और फुटबॉल से जु़डे लोग भी भारत में हो रहे खेल आयोजनों के साथ जु़डे हुए भ्रष्टाचार को लेकर चिंतित है. आ़िखर भारत को लंदन से कुछ सीख लेनी चाहिए. लंदन में होने वाले ओलंपिक खेल 2012 में शुरु होंगे, उसके आज सभी स्टेडियम तैयार हो चुके हैं. लेकिन सवाल यह है कि यह सब हुआ क्यों? आ़िखर मैच क्यों रद्द करना प़डा? कारण बताया गया कि स्टेडियम की तैयारी तय समय पर पूरी नहीं हो सकी थी. आईसीसी के जांच दल के विशेष अधिकारी प्रो. यूजिन वान वूरेन ने बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन को सा़फ शब्दों में कहा कि 27 फरवरी  को भारत और इंग्लैंड के बीच होने वाले मैच को ईडन गार्डन की इस स्थिति को देखते हुए बिल्कुल नहीं कराया जा सकता.

आईसीसी के इस फैसले के बाद वही हुआ जो भारत में होता आया है. एक दूसरे पर छींटाकशी और अपनी नाक़ाबलियत को दूसरों के सर म़ढने का खेल शुरु हो गया. आ़खिर बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन ने क्या सोचा कि ईडन गार्डन कीकीर्ति को वे भुना लेंगे. उन्हें ऐसा क्यों लगा कि इतने गंदे रखरखाव के बाद भी आईसीसी वहां मैच की इजाज़त दे देगा. मामला यह है कि कहीं बीसीसीआई और भारतीय क्रिकेट में हमेशा चलने वाली राजनीति ने तो कहीं ईडन गार्डन पर धब्बा नहीं लगा दिया. क्या इस बार भी वही हुआ जो राष्ट्रमंडल खेल के दौरान हुआ था. क्या यहां भी घूसखोरी और भ्रष्टाचार का खेल खेला गया. जब बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन ने तीन बार स्टेडियम को तैयार करने की अंतिम समय सीमा लांघ दी तो फिर जगमोहन डालमिया की सारी अपील और दलील खोखली साबित होती हैं. कुछ लोगों का मानना है कि बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन के पास ईडन गार्डन को तैयार करने की कोई रणनीति ही नहीं थी. जब उन्हें पुनर्निमाण चरणों में करना चाहिए था तो उन्होंने सारे काम एक साथ करने का मूर्खतापूर्ण फैसला क्यों लिया? लेकिन, इंटरनेशनल क्रिकेट कांउसिल यानी आईसीसी को भी पूरी तरह बरी नहीं किया जा सकता. आईसीसी को पता था कि बहुत सारे स्टेडियमों को ठीक करना था. ये आईसीसी की ज़िम्मेदारी थी कि वो इन सारे निर्माण कार्यों को लगातार अपनी नज़र में रखता और अपना अंतिम निर्णय होने वाले प्रथम मैच के एक महीने पहले ही बता देता. आदर्श स्थिति तो यह होती कि आईसीसी सारे कार्यों और योजनाओं की समीक्षा और अध्ययन करता और एसोसिएशन को अपने हिसाब से सलाह देता. क्योंकि आईसीसी के पास हर मामले के विशेषज्ञ थे, जिन्होंने ब़डे-ब़डे स्टेडियमों का निर्माण करवाया था. वो चाहते तो तैयारियों का मूल्यांकन भी कर सकते थे. आईसीसी को अपनी तकनीकी टीम को स्थानीय क्रिकेट एसोसिएशन को मदद देने की सोचनी चाहिए थी. क्या आईसीसी ने ईडन गार्डन के निर्माण कार्य को इससे पहले समय रहते देखने का प्रयास किया था. हुआ यह कि थो़डा-थो़डा करके सारा काम इकट्ठा होता गया और अंत में काम इतना ब़ढ गया कि सारी एजेंसियां और जो भी लोग ईडन गार्डन के रखरखाव से जुड़े थे, आपस में समन्वय नहीं बैठा पाए और एक बार फिर विश्व पटल पर भारत की किरकिरी हो गई. सबसे ब़डी बात यह है कि सिर्फ ईडन गार्डन ही खस्ता हाल में नहीं है बल्कि वानखे़डे स्टेडियम की भी कुछ यही कहानी है.

 यहां भी वही ग़लतियां की गई हैं जो ईडन गार्डन में हुई. सबसे चौकाने वाली बात यह है कि ईडन गार्डन के नए स्टेडियम में पहले से 20 हज़ार सीटें कम हो गई होंगी. वानखे़डे स्टेडियम में ये कमी 5 हज़ार की है. सवाल यह है कि जब आईसीसी का किसी भी बात पर कोई नियंत्रण नहीं है तो इतने ब़डे आयोजन कराने की ज़रूरत क्या है? शर्मनाक बात यह भी है कि आईसीसी के वर्तमान अध्यक्ष भारत के ही कृषि मंत्री शरद पवार हैं और बंगाल एसोसिएशन क्रिकेट के अध्यक्ष जगमोहन डालमिया हैं, जो कि पूर्व आईसीसी अध्यक्ष हैं. याद रखने की बात यह है कि यह खेल भारत में क्रिकेट के साथ पहली बार नहीं हुआ है. पहले भी खराब पिचों और अधिकारियों का नकारापन सामने आता रहा है. लेकिन इस सबसे कभी भी कोई सबक नहीं लिया गया. दिसंबर 2009 में ऐसा ही कुछ फिरोज शाह कोटला मैदान, दिल्ली के साथ हुआ था. भारत और श्रीलंका का मैच पिच के खतरनाक तरीक़े से उछाल लेने की वजह से रद्द करना प़डा था. जो लोग इस पिच को बनाने के ज़िम्मेदार थे, उन्होंने ग़ैर पेशेवर और ग़ैर ज़िम्मेदाराना तरीक़े से सारा काम किया था.


 भारत को खेल जगत में अपनी किरकिरी कराने का खासा अनुभव हो चुका है. अभी राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार से उठी बदबू दबी भी नहीं थी कि क्रिकेट जगत की स़डांध लोगों के सामने आ गई. क्या वाकई क्रिकेट वर्ल्ड कप की तैयारियों में भी एक ब़डे भ्रष्टाचार का मामला सामने आ सकता है? सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि अभी कुछ ही समय पहले जब दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेल की तैयारी चल रही थी तब भी यही सब तमाशा हुआ था. अंतरराष्ट्रीय जांच दल ने कहा कि स्टेडियम का काम पूरा नहीं है और संभव है कि खेलों का आयोजन स्थगित हो जाए. हालांकि, जैसे-तैसे काम पूरा हुआ. खेल का आयोजन भी हुआ. खेल से पहले और खेल के बाद भी राष्ट्रमंडल आयोजन समिति का भ्रष्टाचार देश के सामने निकल कर आया. क्या क्रिकेट जगत में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिलने वाला है?